उम्मत-ए-हिंद


अब यह तो मालूम नहीं कि अरबी और फ़ारसी भाषाओं के व्याकरण के अनुसार यह शब्दावली — ‘उम्मत-ए-हिंद’ — सही है या नहीं. यदि समय रहते विश्व की ये दोनों शास्त्रीय भाषाएं – classical languages — सीखने को मिली होतीं तो मैं अपनी बात और अधिक आत्मविश्वास के साथ कह रहा होता. ‘जश्न-ए-रेख्ता’ के एक अधिवेशन में परम पूज्य श्री जावेद अख़्तर से पता चला था बादशाह अकबर कैसे एक मामूली इंसान था, तहमद (लुंगी) बांधकर घूमता था, कहीं भी खड़े होकर लोगों से बतियाता था, और चूँकि उस वक़्त उर्दू ने भाषा के रूप में शक्ल अख़्तियार नहीं की थी पंजाबी में बतियाता था. जब ऐसा अकबर ‘मुग़ल-ए-आज़म’ हो सकता है तो जिस राष्ट्र ‘हिन्द’ के लोग ‘हिंदू’ कहलाए, वहाँ की ‘उम्मत’ को अवश्य ‘उम्मत-ए-हिंद’ कहा जा सकता होगा.

अरबी भाषा के इस शब्द ‘उम्मत’ का अर्थ है किसी पैगम्बरी धर्म के तमाम अनुयायियों का समुदाय. इसे समूह और गिरोह के भी अर्थ में प्रयोग किया जाता है.

इस्लाम की यह प्रतिबद्धता प्रशंसनीय है कि ‘उम्मत’ के चलते दुनिया के किसी एक कोने में रहने वाला मुसलमान किसी दूसरे कोने में रह रहे अपरिचित मुसलमान से भी सबसे पहले जुड़ाव रखेगा और उसके लिए फ़िक्रमंद रहेगा. अपने लोगों को आपस में बाँधकर रखने के लिए यह भाव अत्यन्त सहायक है.

संसार के किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों को इस्लाम के प्रशंसनीय पक्षों को कलंकित करने वालों का समूह देखना हो तो उन्हें पाकिस्तान अथवा उससे भी बढ़कर हिंदुस्तान का वीज़ा लेना चाहिए. हिंदुस्तान में तो ‘मुसलमान-मुसलमान’ करते हुए रात-दिन मुहर्रम-mode में बने रहने वालों की अच्छी-ख़ासी भीड़ देखने-सुनने को मिलेगी. पाकिस्तान को भी और कहीं के नहीं, हिंदुस्तान के ही मुसलमानों की इतनी चिंता है कि वहाँ की स-फ़ौज सरकार को नींद न आने की बीमारी हुई रहती है.

इस तरह की बेमतलब बीमारियों का इलाज हो नहीं पा रहा. ‘उम्मत-ए-हिन्द’ की सही-सही समझ के बिना होगा भी कैसे?

दरअसल ‘उम्मत-ए-हिन्द’ की तरफ़ उस समय बेसाख्ता ध्यान चला गया जब भारतीय संसद् ने दोनों सदनों में नागरिकता संशोधन बिल को स्वीकार कर लिया और असम सुलग गया. उसके बाद देश के और हिस्से भी भभके –  विशेषतः जहाँ-जहाँ ‘हिन्दू-राष्ट्र की प्रतीक’ बी.जे.पी. सरकार थी.

संशोधित अधिनियम का हिन्दुत्व से कुछ लेना-देना न होते हुए भी पहली लपट असम के आसमान में लपकी, इसलिए पहले असम की बात.

अंग्रेज़ी के पत्रकार अर्नब गोस्वामी ने असम का होने के बूते अपने कार्यक्रम में असम के लोगों को भी बहस में शामिल किया और स्पष्ट किया यद्यपि वह स्वयं भी नागरिकता संशोधन का समर्थक नहीं, मगर देख रहा है कि देश के अन्य हिस्सों में भ्रम फैलाकर हिंसा करवाई जा रही है. अर्नब ने बताया आप हिन्दू हैं या मुसलमान, असम में मायने नहीं रखता.

और जगह रखता है?

यह भी बताया भारत रत्न भूपेन हज़ारिका क़व्वाली गा लेते थे, परवीन सुलताना भजन.

कोई अहसान करते थे क्या?

शिव कृष्ण बिस्सा ने शीन काफ़ निज़ाम नाम से और रघुपति सहाय ने ‘फ़िराक’ नाम से उर्दू में शायरी की तो कोई अहसान किया क्या? जायसी, रहीम, रसखान ने और राही मासूम रज़ा ने हिन्दी में लिखा तो पूरी ‘हिन्दू’ क़ौम पर परोपकार कर दिया क्या? या ऐसा होना यों ही भारतीय (हिन्दू) संस्कृति की रवायत है? एक सामान्य जीवन-शैली मात्र है?   

दूसरे असमिया बंधुओं ने बताया वे पहले असमी हैं, तभी तो भारतीय हैं. उनके अनुसार बी.जे.पी. और कुछ नहीं, भगवा कांग्रेस है और हम उसे भी निकाल बाहर करेंगे. 1985 के असम समझौते का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं किया जा सकता? असम-अस्मिता का प्रश्न है.

अर्नब के चैनल के Nation First No Compromise का क्या हुआ? हमें तो ‘असम फ़र्स्ट’ सुनाई दिया. असम में आंदोलन करने वाले लोगों और इन असमिया बांधवों ने एक बार को नहीं सोचा राजनैतिक दल और मुसलिम नेता देश में अस्थिरता लाने के लिए बस एक बहाना ढूँढ रहे थे. वह बहाना हाथ में आया नहीं कि शुरु! असम किसी रिले रेस की तरह baton इन्हें थमाकर हरी घास पर बैठ धूप सेकने लगा और ये भारत-माता की सिकाई करने के अपने पुश्तैनी धंधे में लग गए. ‘हिन्दू राष्ट्र’ की इतनी हिम्मत कि मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक़ से छुटकारा दिला दे और शांति बनी रहे! कश्मीर पर इस्लामी नियंत्रण न रहकर वह ‘हिन्दू-राष्ट्र’ का हिस्सा हो जाये और कहीं पत्थरबाज़ी न हो? चलो, बनाओ सब जगह कश्मीर! हद तो तब हो गई जब सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में मंदिर के पक्ष में फ़ैसला दे दिया और कहीं मुंबई के बम-ब्लास्ट या 26/11 जैसा कुछ हुआ नहीं! ऐसा कैसे चलेगा?

असम-समझौता के हिमायतियों ने बता दिया कि ‘असम’ एक उम्मत-ए-हिन्द है!

हमारी एक और उम्मत है बंगाल, एक है मराठा, एक उम्मत है तमिल – हमारे राष्ट्र-गान में हमारी अधिकांश उम्मतें गिना दी गई हैं – पंजाब, सिंध (?), गुजरात, मराठा, द्राविड़, उत्कल, बंग! और भी हैं जो गिनायी भले नहीं गयीं मगर हैं – जाट, गुज्जर, पटेल, राजपूत, ब्राह्मण, बनिया! हम किस मुँह से मुसलमानों की निंदा करते हैं जिनकी तो एक नबी की उम्मत है, मगर यहाँ तो उम्मतों का अंबार लगा हुआ है? उम्मतें ही उम्मतें!!

किसी को यह चिंता कि लालू यादव को जेल से कैसे निकालें? किसी को फ़िक्र कहीं उनके हुक्काम चिदम्बरम के जैसे तिहाड़-वास न करने लगें. कोई इसलिए दाहिनेहुं बायें (बिनु काज एक्को नाहीं, बेचारे परले दर्जे के संत जो ठहरे!) कि दाऊद को पाकिस्तान भगा देने में अपने मददगार नेता की मदद कैसे की जाये! इसलिए दे पत्थर, दे आग, दे तोड़-फोड़, दे छात्र, दे बुद्धिजीवी! आख़िर, इस ढेर-ए-उम्मत-ए-हिन्द का दम घुटा जा रहा था! देश को साँसत में डाल अब साँस में साँस आयी!

और, बात कुछ नहीं! सिर्फ़ इतनी कि उन ग़ैर-मुस्लिमों को नागरिकता देकर बात ख़त्म करो जो क़ानूनी कागज़ात लेकर आए थे, बरसों से यहाँ रह रहे थे, धार्मिक प्रताड़ना के कारण जाने से इनकार कर रहे थे! मुसलमानों के अतिरिक्त ग़ैर-मुस्लिमों के प्रति अगर सरकार अपना कोई भी दायित्व निभाती है तो देश ‘हिन्दू-राष्ट्र’ हुआ जा रहा है! लगाओ आग!!

इसलिए क्या कोई यह बताने का कष्ट करेगा, हम तब इनमें से कौन सी उम्मत में से गर्दन उचका कर कह रहे होते हैं – “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई” –  जब हमारे मेहमाने-ख़ास कह रहे होते हैं – “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्ला, इंशा अल्ला”? अल्ला ने तो इंशा कर ही रखी है — होंगे नहीं, टुकड़े हुए रखे हैं! इस बात को कहने के लिए हिम्मत की नहीं, इस सत्य को जान रखने भर की ज़रूरत है.  

पाकिस्तान के बाशिंदे और हिन्दुस्तान के मुस्लिम नेता-प्रवक्ता-मौलवी हमारे इस सत्य को अच्छी तरह जानते हैं, इसलिए संभालकर रखे हुए हैं. जब-तब पानदान में से निकालते भी रहते हैं. इन सबका हर बयान इसी सत्य की तश्तरी में रखकर पेश किया जाता है. तश्तरी दिखाई नहीं देती क्योंकि ‘यह हमारा भी देश है’ के रूमाल से ढँकी होती है, जिसमें ‘वन्दे मातरम् नहीं बोलेंगे’ की गाँठ भी लगी रहती है.

यह शायद क़ुदरत का इंसाफ़ है कि इन कठमुल्लों की बातों में न आकर भारत के अनेक शिक्षित मुसलमान खुलकर सामने आना शुरु हुए हैं जो इस्लाम की अच्छाइयों से जुड़े रहते हैं. इस तरह वे अपने धर्म और देश-धर्म में संतुलन बनाकर इनकी बातों को निरर्थक सिद्ध करने का भी काम करते हैं. जबकि ये कठमुल्ले अधिकांश मुसलमानों को शिक्षा से दूर रखते हैं और उस हालत में रखते हैं जिसमें हमने गोल टोपी लगाए मुसलिम युवाओं को पत्थरबाज़ी करते पाया था. यह भीड़ इन मुस्लिम नेताओं की ‘वर्क-फ़ोर्स’ है, इसलिए उन्हें समुचित शिक्षा से दूर रखना इनके लिए ज़रूरी है.

पत्थरबाज़ी को अभी तक हम अपने न्यूज़ चैनलों पर देख-देख कर ‘लॉ एण्ड ऑर्डर’ से आगे और कुछ नहीं समझ रहे. कश्मीर में बरसों-बरस चली पत्थरबाज़ी को कैसे और क्यों हिन्द के हर उस शहर में लाया गया, बोरियों में भर-भरकर पत्थर क्यों इकट्ठे किए गए, क्यों गाड़ियों-ऑटोरिक्शाओं में ढोये गए और कैसे पूरी प्लानिंग की गई इसकी गंभीरता हम तब तक नहीं जान पाएंगे जब तक हम इस्लाम में ‘रज्म’ का महत्व नहीं जानेंगे. अपनी बेशुमार उम्मतों में उलझे हुए हिन्द को इतमीनान है पत्थर और इस्लाम-कनेक्शन जैसा कुछ होता नहीं. चाहे तस्लीम रहमानी हो, चाहे महमूद पराचा और चाहे असदुद्दीन ओवेसी, इन सबके बयानों और गतिविधियों को हम रज्म, हिज्राह, शिर्क-अल-अकबर, दारुल इस्लाम आदि को जाने बिना समझ नहीं पाएंगे. ये लोग इन्हीं को घिस-घिस कर अपनी ‘वर्क-फ़ोर्स’ को काम में लगाते हैं, जैसे पहले कश्मीर में और अब हिन्द के बड़े हिस्से में लगाया.

‘रज्म’ का सीधा-सा मतलब है पत्थर मारना. हज के दौरान शैतान को सात पत्थर मारना भी यही है. ‘हुदूद’ की सज़ाओं के लिए भी शरीयत में ‘रज्म’ prescribe किया गया है. ‘हुदूद’ को हम हिन्द के उम्मती इस तरह समझें कि जिसने लक्ष्मण-रेखा पार कर दी, हद से आगे चला गया. उसे ‘रजीम’ करना ही पड़ेगा. ‘रजीम’ यानी जिसे पत्थरों से मारा जाए. ‘रजीम’ के लिए ‘रजूम’ हो जाना – पत्थरबाज़ बनना — मोमिनों पर फर्ज़ है.

हिन्दी हिंदुओं से बढ़कर ‘रजीम’ और कौन होगा जो अल्लाह के बराबर बहुत-से देवी-देवता लाकर, ईश्वर की मूर्त्ति बनाकर, और भी बहुत सी मूर्त्तियाँ – जैसे बुद्ध आदि की मूर्त्ति बनाकर हद पार कर गए हैं. यह ‘शिर्क-अल-अकबर’ है – बहुत बड़ा कुफ़्र. हिन्दू तो अल्लाह के सिवा दूसरे की भी कसम खा लेते हैं, जैसे ‘राम-कसम’. यह थोड़ा छोटा कुफ़्र है – ‘शिर्क-अल-असग़र’. इसलिए इनके ऊपर पत्थरबाज़ी मुसलमानों पर फर्ज़ है.

यह कारण है कि ये मुसलिम-नेता ‘पत्थरबाज़ी’ की निंदा करते कभी दिखाई नहीं देते. इसी पत्थरबाज़ी – रज्म – के वीडियो और फ़ोटो दिखाकर आतंकवाद से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े इन मुस्लिम लीडरान को विदेश से और पैसा मिलेगा. ‘दार-अल-हर्ब’ हिन्द को ‘दार-अल-इस्लाम’ बनाने के इस नमूने से मिले पैसे को ‘काम पूरा करने’ के लिए लगाया जाएगा.

नागरिकता संशोधन क़ानून किसी की भी नागरिकता लेने के लिए नहीं, बहुत समय से अटके पड़े कुछ ग़ैर-मुस्लिमों को नागरिकता देने का अधिनियम है. तब यह मुसलमानों के विरुद्ध कैसे हो गया?

जो बात ये मुसलिम नेता असलीयत सामने आ जाने से बचने के लिए बोलेंगे नहीं मगर जिस कारण इन्होंने इस अधिनियम के सामने मुसलमानों को ‘रजूम’ अर्थात् पत्थरबाज़ हो जाने को सबाब और फर्ज़ कहकर उकसाया उसका आधार है ‘हिज्राह’.

‘हिज्राह’ यानी अपनी जगह से दूसरी जगह जाना. हज़रत मुहम्मद साहब जब मक्का से मदीना गए थे तो वह ‘हिजरत’ थी. अनावश्यक युद्ध टालने के लिए ऐसे ही कभी भगवान् श्रीकृष्ण भी मथुरा से द्वारका जाकर ‘रणछोड़राय’ हुए थे. हिंदुओं में भी कोई ओवेसी हो और चाहे तो वह भी श्रीकृष्ण के ‘हिज्राह’ को तोड़-मरोड़कर उलटा-सीधा भड़काने के लिए काम में ला सकता है.

बहरहाल, ‘हिज्राह’ को मस्जिदों और मदरसों में जिस तरह समझाया जाता है उसे देखते लगता है यह पत्थरबाज़ी तो बहुत कम रही!

एक मुसलिम देश से जाकर दूसरे मुसलिम देश में पनाह लेने को सऊदी अरब जैसे देश बढ़ावा नहीं देते. उन्हें मालूम है मुसलमानों को ग़ैर-मुसलिम देशों में जाकर बसना चाहिए. इसके लिए ये देश बहुत पैसा भी ख़र्च करते हैं.  क्योंकि इनके मुताबिक़ इस्लाम ने दुनिया को एकदम साफ़-साफ़ बाँट रखा है.

अल्लाह की बनाई इस ज़मीन का वह हिस्सा जहाँ के लोग इस्लाम पर ईमान लाते हैं ‘दारुल-इस्लाम’ है. सभी घोषित इस्लामी देश ‘दारुल-इस्लाम’ हैं. कुछ जगहें ऐसी हो सकती हैं जहां सब तो मुसलमान नहीं हो गए, मगर उन देशों के पड़ोस में जो ‘दारुल-इस्लाम’ है उसके साथ अगर यह समझौता हो गया है कि हम अपने मुसलमानों का पूरा-पूरा ध्यान रखेंगे तो ऐसे देश ‘दारुल-सुलह’ या ‘दारुल-अहद’ हुए. अर्थ हुआ ‘संधि-प्रदेश’. ऐसे देशों के इस्लामीकरण की प्रक्रिया जारी रहती है.

मगर जो देश जब तक पूरी तरह इस्लामी नहीं बन जाते उन्हें ‘दारुल-हर्ब’ कहा जाता है. ‘दारुल-हर्ब’ – युद्ध क्षेत्र. 1947 में पाकिस्तान बना तो वह हुआ ‘दारुल-इस्लाम’. भारत जो रह गया वह हुआ ‘दारुल-हर्ब’. अतः, टुकड़े-टुकड़े गैंग का एक और इंशा अल्ला नारा है – “भारत तेरी बरबादी तक जंग रहेगी, जंग रहेगी”. ‘दारुल-हर्ब’ में जिहाद हमेशा जारी रहता है. हिन्द है तो जब तक ‘ग़ज़वा-ए-हिन्द’ करके ईंट से ईंट न बजा दी जाए, तब तक जिहाद होता रहेगा. बचना है तो इस्लाम क़बूल कर लो.

राजनीति में शौकिया लिप्त हमारी बुद्धि आज तक यही माने बैठी है पाकिस्तान का बनना एक राजनैतिक घटना थी. ये जो ‘रज्म’ के पत्थर आज नज़र आ रहे हैं हमारी अक्ल पर पड़े रहे हैं जो हमें मार्क्स की उक्ति कभी ठीक नहीं लगी – धर्म अफ़ीम है. दारुल-इस्लाम पाकिस्तान इसी अफ़ीम की लहलहाती खेती था, है और रहेगा.   

नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की, इन तमाम काफ़िर हिंदुओं की इतनी हिम्मत कि ‘दारुल-इस्लाम’ पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान और बांग्ला देश से ‘दारुल-हर्ब’ हिन्द में आ रहे मुसलमानों को आने वालों में नहीं गिनेंगे! अल्पसंख्यक वहाँ रह नहीं सकेंगे, और हिन्द के मुसलमान उन्हें यहाँ रहने नहीं देंगे. मुसलमानों को भी आने दो क्योंकि उनका कैसे भी वहाँ से यहाँ आना ‘हिज्राह’ नामक इस्लामी फर्ज़ है, ताकि वे दारुल-हर्ब को दारुल-इस्लाम बनाने के काम में जुट सकें. उन्हें न आने देना इस्लाम से दुश्मनी है जिसकी सज़ा है पत्थरबाज़ी – रज्म!

यह कारण था जो इन नेताओं के लिए बहुत ज़रूरी हो गया कि बोरियाँ और गाड़ियाँ भर-भर पत्थरों का इंतज़ाम करें और दिखा दें ‘रज्म’ का इस्लामी हुक्म कैसे बजाया जाता है.

मुझे पक्का विश्वास है क़ुर’आन-ए-पाक में ये सब बातें इस रूप में और इस उद्देश्य से नहीं कही गई होंगी. ये शैतान आई.एस.आई.एस.-मानसिकता के समर्थन में क़ुर’आन की आयतें उद्धृत करते हैं और यदि कोई नेक मुसलमान दुनिया के किसी कोने से उठकर इन्हें ग़लत कहता भी है तो ये उसे काफ़िर घोषित करके उसकी जान तक लेने पर उतारू हो जाते हैं. जितना मेरी समझ में आया है हज़रत मुहम्मद इतनी बड़ी हस्ती थे कि ज़रा से में उनका अपमान या ‘ईश-निन्दा’ – blasphemy – हो ही नहीं सकती. संभव ही नहीं है.

इस एक उदाहरण से यह बात समझ में आ सकेगी.

अल्लाह के जो 99 नाम इस्लाम में बताए गए हैं और जो क़ुर’आन के पाठ में से संकलित हैं, वे सभी ‘विष्णुसहस्रनाम’ में आ गए हैं.

आप स्वयं देख लीजिए

1  अर रहमान   — बहुत मेहरबान  — प्रियकृत्

2  अर रहीम    — निहायत रहम वाला   — प्रीतिवर्धन:

3  अल मलिक  — बादशाह  — लोकनाथ:

4  अल कुद्दुस  —  पाक ज़ात  — पूतात्मा

5   अस सलाम — सलामती वाला  — शरणं शर्म

6   अल मु अमिन — अमन देने वाला — शांतिद:

7   अल मुहयमिन — निगरानी करने वाला  — रक्षण:

8   अल अजीज़ – ग़ालिब — जेता

9   अल जब्बार   — ज़बरदस्त — महाबल:

10  अल मुतकब्बिर — बड़ाई वाला  – महाशक्ति:

11  अल खालिक — पैदा करने वाला — स्रष्टा

12  अल बारी — जान डालने वाला — विधाता

13  अल मुसव्विर — सूरतें बनाने वाला — विश्वकर्म्मा

14  अल गफ़्फ़ार — बख्शने वाला   — क्षमिणावर:

15  अल क़हहार — सब को अपने काबू में रखने वाला —

— दारुण:

16  अल वहहाब — बहुत अता करने वाला — वरद:

17  अर रज़्ज़ाक —  रिज़क देने वाला — वाजसन:

18  अल फतताह  — खोलने वाला — योगविदांनेता

19  अल अलीम  — खूब जानने वाला — सर्वज्ञ:

20  अल काबिज़ — नपी तुली रोज़ी देने वाला — प्रग्रह:

21  अल बासित — रोज़ी को फराख देने वाला — उदारधी:

22  अल खाफ़िज़ — पस्त करने वाला — दमयिता

23  अर राफ़ी — बुलंद करने वाला — उत्तारण:

24  अल मुईज़ — इज्ज़त देने वाला — मानद:

25  अल मुज़िल — ज़िल्लत देने वाला — दर्पहा

26  अस समी — सब कुछ सुनने वाला — विश्रुतात्मा

27  अल बसीर — सब कुछ देखने वाला — सर्वदृक्

28  अल हकम – फ़ैसला करने वाला — नियन्ता

29  अल अदल — अदल (न्याय) करने वाला — समात्मा

30  अल लतीफ़ — बारीक बीं — सूक्ष्म:

31  अल खबीर — सब से बाख़बर — विद्वत्तम:

32  अल हलीम — निहायत सहनशील — सहिष्णु:

33  अल अज़ीम  — बुज़ुर्ग — महान्

34  अल गफ़ूर — गुनाहों को बख्शने वाला — सर्वसह:

35  अश शकूर – कदरदान — कृतज्ञ:

36  अल अली — बहुत बुलंद, बरतर — प्रांशु:

37  अल कबीर — बहुत बड़ा — श्रेष्ठ:

38  अल हफ़ीज  — निगेहबान — गोप्ता

39  अल मुक़ीत  — सबको रोज़ी, तवानाई (बल) देने वाला    —                     

                                                            — भूतभृत

40  अल हसीब   — काफ़ी — पुष्ट:

41  अल जलील — बुज़ुर्ग  — प्रतिष्ठित:

42  अल करीम   — बेइंतिहा करम करने वाला — भक्तवत्सल:

43  अर रक़ीब – निगेहबान — प्रजागर:

44  अल मुजीब  — दुआएं सुनने और कुबूल करने वाला

— अनुकूल: 

45  अल वासिऊ — फराखी देने वाला — व्यापी

46  अल हकीम  — हिकमत वाला — वैद्य:

47  अल वदूद — मुहब्बत करने वाला — सुहृत्

48  अल मजीद — बड़ी शान वाला — गुरुतम:

49  अल बाईस — उठाने वाला — बीजमव्ययम्

50  अश शहीद — हाज़िर — साक्षी

51  अल हक़ —   सच्चा मालिक — सत्य:

52  अल वकील  — काम बनाने वाला — आधारनिलय:

53  अल क़वी – ज़ोरावर — शक्तिमताम्श्रेष्ठ:

54  अल मतीन — कुव्वत वाला — महावीर्यः

55  अल वली — हिमायत करने वाला — लोकबंधु:

56  अल हमीद   — ख़ूबियों वाला  — स्तव्य:

57  अल मुह्सी   — गिनने वाला — कालः

58  अल मुब्दी    — पहली बार पैदा करने वाला — उद्भवः

59  अल मुईद — दोबारा पैदा करने वाला — समावर्त:

60  अल मुह्यी — ज़िंदा करने वाला — प्राणद:

61  अल मुमीत   — मारने वाला — शर्व:

62  अल हय्युल — ज़िंदा  — जीवन:

63  अल क़य्यूम  — सबको क़ायम रखने,निभाने वाला — शाश्वतः

64  अल वाजिद — हर चीज़ को पाने वाला — संग्रह:

65  अल माजिद — बुज़ुर्गी और बड़ाई वाला — शुचिश्रवा:

66  अल वाहिद  — एक अकेला — एकः

67  अल अहद — एक अकेला — एकात्मा

68  अस समद — बेनियाज़ (निस्पृह) — विविक्त:

69  अल क़ादिर  — कुदरत रखने वाला — विक्रमी

70  अल मुक्तदिर — पूरी कुदरत रखने वाला — क्षम:

71  अल मुक़द्दम — आगे करने वाला — भूतादि:

72  अल मुअख्खर — पीछे और बाद में रखने वाला — अंतक:

73  अल अव्वल — सब से पहले — सर्वादि:

74  अल आख़िर — सब के बाद — विक्षर:

75  अज ज़ाहिर  — ज़ाहिर व आशकार — व्यक्तरूप:

76  अल बातिन — पोशीदा व पिन्हा — अव्यक्त:

77  अल वाली –मुतवल्ली (देखरेख करने वाला) — शास्ता

78  अल मुताआली — सब से बुलंद व बरतर — उदीर्ण:

79  अल बर — बड़ा अच्छा सुलूक करने वाला — पुरुसत्तम:

80  अत तव्वाब — सब से ज्यादा कुबूल करने वाला  — पापनाशन:

81  अल मुन्ताक़िम — बदला लेने वाला — शत्रुतापन:

82  अल अफ़ुव्व — बहुत ज्यादा माफ़ करने वाला — सह:

83  अर रऊफ़ — बहुत बड़ा मुश्फ़िक (कृपालु) — सुंद:

84  मालिकुल मुल्क — मुल्कों का मालिक — लोकस्वामी 

85  अजजुल जलाली वल इकराम —- अज़मतो जलाल और इकराम वाला  

— महातेजा: मान्य:

86  अल मुक्सित — अदलो इन्साफ कायम  करने वाला —                            

                                                            — न्याय:

87  अल जामिऊ — सब को जमा करने वाला — श्रीनिधि:

88  अल गनी — बड़ा बेनियाज़ व बेपरवा    — निधिरव्यय:

89  अल मुग्नी — बेनियाज़ व गनी बना देने वाला — धनेश्वर:

90  अल मानिऊ — रोक देने वाला — दुरारिहा

91  अज ज़ार्र — ज़रर (आघात)  पहुँचाने वाला — प्रतर्दन:

92  अन नाफ़िऊ — नफ़ा पहुँचाने वाला — सिद्धिद:

93  अन नूर —    सर से पैर तक नूर बख्शने वाला —            

                                                — प्रकाशात्मा

94  अल हादी — सीधा रास्ता दिखाने व चलाने वाला —                             

                                                            — नेता

95  अल बदी — बेमिसाल चीज़ को ईजाद करने वाला — सर्गः

96  अल बाक़ी — हमेशा रहने वाला — सनात्

97  अल वारिस  — सब के बाद मौजूद रहने वाला — वंशवर्धन:

98  अर रशीद — बहुत रहनुमाई करने वाला — गुरु:

99  अस सबूर — बड़े तहम्मुल(सहिष्णुता)वाला — धृतात्मा

अल्लाह अनन्त है. उसे न 99 नामों में समेटा जा सकता, न एक हज़ार नामों में. इसका यह अर्थ नहीं कि हज़रत मुहम्मद को 99 से आगे मालूम नहीं था. अनादि, अनन्त, असीम, अरूप, अविकार अल्लाह को वह पूरा-पूरा जानकर ही कुछ कहते-करते थे. इसलिए उन्होंने प्रकट रूप से उतना ही कहा जितना अरबिस्तान की तात्कालिक परिस्थितियों में ज़रूरी था. बर्बर जीवन के लिए अभिशप्त वहाँ की मनुष्य-श्रेणी के अन्तर्मन में अध्यात्म और अल्लाह के प्रति समर्पण का फूल खिलाने के लिए जितना और जो कुछ ज़रूरी था, वह सब उन्होंने कहा और 99 नामों में समेटकर रख दिया.

हमारे शैतान दोस्त इसी सब को तोड़-मरोड़ कर अपनी कट्टरता के लिए इस्तेमाल करते हैं. अपनी इस तोड़-मरोड़ और संकीर्णता को यह डेढ़ हज़ार वर्ष पहले के अरबिस्तान पर रुका हुआ देखना चाहते हैं. इनकी साम्प्रदायिकता का विरोध करो तो उसे अपना नहीं इस्लाम का विरोध सिद्ध करने में लग जाते हैं. इनके तिलिस्म के शिकार, शिक्षा से दूर, अल्लाह के नहीं मुल्ला के इस्लाम पर ईमान लाने वाले मुसलमान हाथ में पत्थर उठा भी लेते हैं.

बहुत लोगों को एक बात पर हैरानी होती होगी. ये मुसलिम नेता और प्रवक्ता इतनी वफ़ादारी से अपने मज़हब के लिए ज़ोर देकर कैसे बोल लेते हैं कि हिन्द का मुसलमान वास्तव में बहुत परेशान जान पड़ता है?

दरअसल ये क़ुरान-ए-पाक और इस्लाम की बहुत सी शब्दावली और सिद्धांतों-अवधारणाओं से हमारे-आपके अपरिचय का लाभ उठाकर साफ़-साफ़ झूठ बोल रहे होते हैं. जिस तरह पत्थरबाज़ी इस्लाम की एक धार्मिक गतिविधि है – रज्म, उसी तरह एक अन्य इस्लामिक सिद्धान्त है – ‘तक़ीया’. यों तो ‘तक़ीया’ का सामान्य सा अर्थ है-  दुराव, छिपाव. अपने प्राण बचाने के लिए बोला गया झूठ ‘तक़ीया’ है. सुन्नियों से अपने प्राण बचाने के शिया मुसलमान ‘तक़ीया’ को अमल में लाते थे. काफ़िरों और ग़ैर-मुस्लिमों के बीच सच का दुराव करते हुए, झूठ को घुमावदार ढंग से सच की तरह कह डालना इस्लाम में जायज़ है. इस्लाम में धैर्य, साहस और आत्मोत्सर्ग जैसे जो आदर्श कहे गए हैं, ‘तक़ीया’ को उनसे भी ऊपर रखा गया है, ख़ास तौर से तब जब कि मोमिनों के सामने दीन के लिए एक बड़ा मक़सद मौजूद हो. भारत में इनके सामने ‘ग़ज़वा-ए-हिन्द’ अथवा एक बार और पार्टीशन की माँग या पूरे भारत का इस्लामीकरण आदि इतने बड़े मक़सद उपस्थित हैं कि ये कभी भी सच बोलने के फेर में न पड़कर हमेशा ‘तक़ीया’ से काम लिया करते हैं. यह मानसिक-वाचिक ‘तक़ीया’ उस समय स्थूल शारीरिक स्वरूप में लागू किया जाता है जब जिहाद को समर्पित मुसलमान के लिए मुँह पर नक़ाब लगाकर पत्थरबाज़ी, आगज़नी या अन्य हिंसा करना अनुकूल रहता है. ऐसे नक़ाबपोश जिहादी जब छात्रों के बीच जाकर सक्रिय होते हैं तब उस राजनैतिक दल को बदनाम करने में बहुत कारगर सिद्ध होते हैं जो सत्तारूढ़ होता है. इस्लाम-समर्थित इस ‘रज्म’ (पत्थरबाज़ी) अथवा ‘तक़ीया’ (झूठ) से ये कोई पाप नहीं कर रहे होते, इनकी समझ में स्वयं को पक्का मुसलमान सिद्ध कर रहे होते हैं.  

नागरिकता संशोधन के बहाने ‘रज्म’ की पत्थरबाज़ी से हिन्द को ‘दारुल-इस्लाम’ बनाने की दिशा में जो क़दम बढ़ाया गया है उसे, और इनके लगातार चलते ‘तक़ीया’ को देखते हुए अब समय आ गया है कि इन सब तथ्यों को लेकर इन मुसलमानों की आँख में आँख डालकर देखा जाए, इनसे बेखौफ़ सवाल किया जाए. इन्हें बेधड़क दण्डित किया जाए और इनकी परवाह करना छोड़ दिया जाए. पाकिस्तानी मानसिकता के ये लोग ‘हिन्दू-राष्ट्र’-‘हिन्दू-राष्ट्र’ क्यों चिल्लाते हैं, अब यह समझ में आ जाना चाहिए. यह वक़्त है कि पूरा ध्यान उन मुसलमानों पर लगाया जाए जो राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़े हुए हैं. सौभाग्य से हिन्द के कुल मुसलमानों का दो तिहाई राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़ा हुआ है. सब औरंगज़ेब नहीं, दारा शिकोह भी हैं और इस बार वे सुरक्षित रहने चाहिएं, उनका सिर कटना नहीं चाहिए. ये ही सबको यह बताकर मदद कर सकते हैं कि रज्म, शिर्क, हिज्राह, तक़ीया आदि इस्लामी अवधारणाओं का देश को अस्थिर बनाने के लिए राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा है. दीन के इस राजनैतिक इस्तेमाल को बेनक़ाब करना हर हिन्दुस्तानी का फ़र्ज़ है. 

इन शैतानों को सबसे बड़ी मदद मिलती है हिन्द में उम्मतों के अंबार से जो कि राजनीति चलाने का भी आधार है. जिसे हम ‘अनेकता में एकता’ कहते आ रहे हैं वह दरअसल इन उम्मतों के ढेर का आधार सिद्ध हुई है – अनेकता विभिन्न अस्मिताओं की अलग-अलग ललक में बदलती चली गई है और एकता मजबूरी में बोला गया एक नारा लगने लगी है.

क्या हुआ उस एक उम्मत-ए-हिन्द का जिसे हम राष्ट्र-भारती, भारत माता, जननी जन्मभूमि जैसे सम्बोधन देते आये हैं और जिसके लिए ‘वन्देमातरम्’ उच्चारते आये हैं? यदि यह ‘हिन्दुत्व’ है और इससे देश बच जाता  है – दारुल-हर्ब – युद्ध-क्षेत्र — कहलाने से, या रज्म से – पत्थरबाज़ी से, तब भी यह इस्लाम-विरोधी नहीं है. ‘विष्णुसहस्रनाम’ के उपरिकथित उदाहरण से स्पष्ट है हिन्दुत्व इस्लाम को आग़ोश में लेकर ही चलता है.

यह हिन्दुत्व ‘उम्मत-ए-हिन्द’ है.  

25-12-2019  

मौलाना गाँधी


चौंक गए ?

मत चौंकिए.

यह शीर्षक मेरा दिया हुआ नहीं है, कांग्रेसियों का है. मैं इन शब्दों को प्रयोग करने वाला (शायद) तीसरा व्यक्ति हूँ. मुझ से पहले दो बड़े कांग्रेसी नेता यह नेक काम कर गये हैं.

सन् 1942 में महात्मा गाँधी ने वर्धा में ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ की स्थापना की. डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, पंडित जवाहरलाल नेहरु, डॉ. ज़ाकिर हुसैन, आचार्य काकासाहेब कालेलकर, श्री बाला साहेब खेर, डॉ. ताराचंद, डॉ. जाफ़र हसन, प्रो. नजीब अशरफ नदवी, श्री श्रीमन्नारायण, पंडित सुन्दरलाल, पंडित सुदर्शन, श्री सीताराम सेक्सरिया, श्री अमृतलाल नानावटी, श्री वेदप्रकाश नायर जैसे अग्रगण्य कांग्रेसी नेताओं ने इस ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ के माध्यम से गाँधीजी के ‘उसूलों’ के प्रचार के लिए योगदान दिया.

इनमें श्री श्रीमन्नारायण (जिनका पूरा नाम श्रीमन्नारायण अग्रवाल था, और जो श्री जमनालाल बजाज के दामाद थे) इस सभा के संस्थापकों में थे और वर्धा के ही बजाज कॉलेज के प्रिंसिपल भी थे. (सब कुछ अपने परिवार का है — यह कांग्रेस के डी.एन.ए. में है!) अपने अंतिम दिनों में श्रीमन्नारायणजी गुजरात के राज्यपाल भी रहे. यही श्री श्रीमन्नारायण 1946 में हिन्दुस्तानी प्रचार सभा, वर्धा के प्रधानमन्त्री बने.

1946 में प्रकाशित ‘विशाल भारत’ का एप्रिल अंक और 19 मई, 1946 का ‘देशदूत’ यदि किसी ग्रंथालय-संग्रहालय में देखने को मिल जाए तो हम पायेंगे कि इन दोनों में श्री श्रीमन्नारायण का एक लेख प्रकाशित हुआ था. शीर्षक था “मौलाना गाँधी”. इस लेख में श्रीमन्नारायणजी ने गाँधीजी के ‘उसूलों’ को स्थापित करते हुए कहा था कि हिन्दी जैसी भाषा के स्थान पर हमें हिन्दुस्तानी का इस्तेमाल करना चाहिए. इस ‘उसूल’ के चलते हिन्दू नाम के पहले भले ‘श्री’ कहें, मगर अन्य धर्मों के लोगों का लिहाज़ रखते हुए ‘जनाब’ कहना चाहिए. ‘हिन्दी पत्र-पत्रिका’ मगर ‘उर्दू रिसाले’, ‘शब्द’ के बजाय ‘लफ़्ज़’, ‘संस्कृति’ के बजाय ‘तहज़ीब’, ‘साहित्य’ को ‘अदब’, ‘कविता’ को ‘नज़्म’, ‘विद्वान्’ को ‘माहिर’ आदि कहना राष्ट्रीय और भावनात्मक एकता के अनुकूल रहेगा.

उन दिनों रेडियो के लिए ‘आकाशवाणी’ शब्द प्रचलित नहीं हुआ था अतः ब्रिटिश हुकूमत होते हुए भी गाँधीजी के ‘उसूल’ के मुताबिक उसे ‘ऑल इंडिया रेडियो’ कहकर बोला जाता था. अतः वहाँ भी ‘हिदुस्तानी’ का प्रचलन हुआ और यह ध्यान रखा जाने लगा कि किसी हिन्दू के लिए ‘स्वागत’ बोलें तो मुसलमान-ईसाई आदि के लिए ‘इस्तक़बाल’ कहा जाए. हिन्दू के बारे में बताना हो तो ‘सुरगबास हो गए’ और अन्य के लिए ‘इंतक़ाल फ़रमा गए’ अनाऊंस किया जाए. यह भी तय कर दिया गया कि जिस तरह अंग्रेज़ी भाषा की संस्कृति-धर्म ‘ईसाइयत’ है वैसे ही ‘हिन्दुस्तानी’ भाषा की धर्म-संस्कृति ‘इस्लाम’ निर्धारित कर दी जाए. इसलिए ऑल इंडिया रेडियो पर गॉड का अनुवाद हमेशा ‘ख़ुदा’, रिलीजन का ‘मज़हब’, फ़्राईडे का ‘जुम्मा’, ‘प्रे’ (pray) का ‘दुआ’ और ‘हिज़ एक्सेलैन्सी’ का ‘हुज़ूर वायसराय’ बोलकर प्रसारण किया जाने लगा. यह तो तब था जबकि अभी गाँधीजी ने हमको ‘बिना खड्ग-बिना ढाल’ वाली आज़ादी नहीं ले दी थी.

और इस तरह गाँधीजी के उसूलों ने शुद्ध भारतीय भाषा उर्दू को एक धर्म दे दिया. बैठे-ठाले उसे मुसलमानों की भाषा बना दिया !

इसलिए अपने लेख में श्री श्रीमन्नारायण अग्रवालजी ने बताया कि ‘मौलाना’ शब्द ‘महात्मा’ के ही अर्थ में है, इसलिए हमें अब से ‘महात्मा गाँधी’ को ‘मौलाना गाँधी’ कहना चाहिए ताकि ‘हिन्दुस्तानी’ ज़ुबान को बढ़ावा मिल सके !

एक अन्य कांग्रेसी नेता थे पण्डित रविशंकर शुक्ल, श्री विद्याचरण शुक्ल के पिता, जो उस समय के ‘सेंट्रल प्रोविंस’ और स्वातंत्र्योत्तर मध्य प्रदेश के पहले मुख्य मंत्री बने. रविशंकर शुक्लजी निष्ठावान् हिन्दी-सेवी थे और हिन्दी को बढ़ावा देने वालों में गिने जाते थे. आप गांधीजी का विरोध तो नहीं करते थे, मगर हिन्दी के मामले में स्पष्टोक्ति कर दिया करते थे. शुक्लजी मानते थे कि भाषा और साहित्य की परम्पराएं हमें वाल्मीकि, व्यास, कालिदास और तुलसी से मिली हैं; अशोक, समुद्रगुप्त, अकबर और बाजीराव से नहीं. इसलिए न तो गाँधीजी हिन्दी के भाग्य का निर्णय कर सकते, न कांग्रेसी यह बता सकते कि इस लिपि में लिखो और ऐसी भाषा में बोलो.

यह पूरा प्रकरण इतिहास-वृक्ष का वह पत्ता है जिसे जान-बूझकर सूख जाने दिया गया क्योंकि यह हवा के हर झोंके के साथ सरसरा रहा था कि गाँधीजी के नेतृत्त्व में कांग्रेस बेतरह देश को गुमराह करने में लगी है. ये सब कांग्रेसी कर क्या रहे थे ? एक ओर गाँधीजी स्वयं ‘हरिजन’ की बात करते हुए डॉ. भीमराव अंबेडकर को आगे बढ़ा रहे थे, (जिन्होंने आगे चलकर बी.बी.सी. के अपने इंटरव्यू में कह दिया कि गाँधीजी ‘महात्मा’ कहलाने लायक व्यक्ति नहीं थे !), दूसरी ओर डॉ. सम्पूर्णान्द (जो गोविंदवल्लभ पंत के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे) किताब लिख रहे थे — ‘ब्राह्मण, सावधान’ ! एक ओर गाँधीजी ‘यूनाइटेड प्रोविंस’ (आज का यू.पी.) में ‘हिन्दी’ और ‘गाय’ की रक्षा करने की बात करने वाली कांग्रेसी सरकार बनवा रहे थे (जिससे जिन्नाह व अन्य मुसलमान और ‘असुरक्षित’ हो गए — “मुझे इस देश में डर लगता है” का मनोविज्ञान तभी से काम कर रहा है), दूसरी तरफ़ वही गाँधीजी वर्धा की ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ के माध्यम से हिन्दी की लुटिया डुबो रहे थे !

लिहाज़ा, पण्डित रविशंकर शुक्ल ने एक किताब लिखी — “हिन्दी वालो, सावधान”. उन्होंने इसकी भूमिका में स्वीकार किया कि शीर्षक की प्रेरणा उन्हें डॉ. संपूर्णानन्द की पुस्तक “ब्राह्मण, सावधान” से मिली है ! ‘हिन्दी वालो, सावधान’ में शुक्लजी ने एक पूरा प्रकरण रखा — “हिन्दुस्तानी की बला” — हिन्दुस्तानी अर्थात् गाँधीजी के ‘उसूलों’ वाली भाषा ! इस प्रकरण के तीन चेप्टर भी दिलचस्प हैं — हिन्दुस्तानी आंदोलन का एकतरफ़ा स्वरूप, हिन्दुस्तानी वालों की कारगुज़ारी, और हिन्दुस्तानी वालों के हथकण्डे !!!

‘हिंदुस्तानीवाले’ ‘हिंदीवाले’ — यानी अख़बारवाले, रद्दीवाले, दूधवाले, सब्ज़ीवाले, कपड़े इस्तरी करने वाले, बोझा ढोने वाले, वगैरह- वगैरह — समाज का अलग ही वर्ग — ऐसे ही हिंदी’वाले’ !!

वाह री कांग्रेस ! और वाह वाह हमारे राष्ट्रपिता !!

आँख पूरी-पूरी खोलने के लिए यह देखना-जानना शायद मददगार हो कि श्री श्रीमन्नारायण के लेख ‘मौलाना गाँधी’ को पं. रविशंकर शुक्ल ने क्या जवाब दिया. उन्होंने इसके उत्तर में एक सुदीर्घ लेख लिखा जो लगभग सौ पृष्ठ की एक लघु पुस्तिका बन गया. इस पुस्तिका को शुक्लजी ने भी शीर्षक दिया — ‘मौलाना गाँधी’ !

इस तरह मैं शायद “मौलाना गाँधी” — इन शब्दों को प्रयोग करने वाला तीसरा व्यक्ति रहा होऊँ !

श्रीमन्नारायणजी ने अपने लेख ‘मौलाना गाँधी’ में चिंता व्यक्त की — “उर्दू अख़बार और रिसाले यह कहकर गाँधीजी को दोष देते रहते हैं कि वह हिन्दुस्तानी की ओट में उर्दू का नाश कर हिन्दी का प्रचार करना चाहते हैं.”

पं. रविशंकर शुक्ल ने अपनी पुस्तिका ‘मौलाना गाँधी’ में इस चिंता का निवारण यों किया — “गाँधीजी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन छोड़ते हुए अपने मुँह से कहा है कि ‘सम्मेलन छोड़कर हिन्दी की और सेवा हो सकेगी’. ठीक भी है. सम्मेलन में रहते तो सेवा प्रत्यक्ष थी. ‘और सेवा’ करनी हो तो ओट से ही हो सकती है. ‘हिन्दुस्तानी’ ही तो वह ‘ओट’ है जिससे चाहे हिन्दी का नाश कर दो — (रेडियो की तरह), चाहे उर्दू का”.

गाँधीजी हिन्दू और मुसलमान को एक करने के नाम पर कैसे साफ़-साफ़ बाँट रहे थे उसकी झलक श्री श्रीमन्नारायण के ‘मौलाना गाँधी’ में इस तरह मिलती है — “अभी तक तो गाँधीजी क़ौमी ज़बान को ‘हिन्दी’ नाम से पुकारते रहे. लेकिन जब उन्होंने देखा कि ‘हिन्दी’ और ‘उर्दू’ धीरे-धीरे दो अलग-अलग धारायें हो रही हैं तो उन्हें मिलाने के लिए ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ की नींव डाली गई”.

शुक्लजी के ‘मौलाना गाँधी’ में इसके जवाब में लिखा है — “जब गाँधीजी ने ‘क़ौमी ज़बान’ को ‘हिन्दी’ नाम से पुकारना शुरू किया था, उस समय क्या ‘उर्दू’ भाषा और उस भाषा के इस नाम ‘उर्दू’ का अस्तित्त्व था या नहीं ? या उस समय हिन्दी और उर्दू एक ही चीज़ थीं ? और गाँधीजी वाली हिन्दी वही थी जो उर्दू थी ? हिन्दी और उर्दू की धारायें कब से ‘धीरे-धीरे’ अलग होना शुरु हुईं ? आज की ‘अलग-अलग धारा’ हिन्दी और उर्दू की तुलना में क्या तुलसी का ‘मानस’ और ग़ालिब का ‘दीवान’ एक-दूसरे के अधिक निकट हैं जो आज हिन्दुस्तानी की ज़रूरत आन पड़ी ? अब क्या देवनागरी और फ़ारसी लिपियाँ भी ‘धीरे-धीरे’ दो अलग धारायें होना शुरु हो गई हैं या जब गाँधीजी ने ‘क़ौमी ज़बान’ को ‘हिन्दी’ कहना शुरु किया था उस समय सब हिंदियाँ देवनागरी में ही लिखी जातीं थीं? फिर, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा तो गाँधीजी के ही हाथ में थी. तभी उन्होंने वहीं से ‘दोनों लिपियाँ’ का प्रचार शुरु क्यों नहीं किया ? 1946 तक क्यों रुके रहे ? ‘हिन्दुस्तानी’ का प्रस्ताव तो 1925 में ही पास हो गया था. तब से 1946 तक क्यों गाँधीजी ‘राष्ट्र-लिपि देवनागरी’ के प्रचार में बराबर सहयोग देते रहे ? या फिर क्या वह देवनागरी को फ़ारसी लिपि का पर्याय मानने की भूल करते रहे थे ? ”

कहना न होगा कि गाँधीजी के ‘उसूल’ वर्धा की ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ की बदौलत पूरे-पूरे लागू हो गए होते तो आज तमिलनाडु को दो भाषाओं और दो लिपियों का विरोध करना पड़ रहा होता – हिन्दी का भी और उर्दू का भी! क्योंकि उन्हें तीन भाषाएं — तमिल, अंग्रेज़ी, और ‘हिन्दुस्तानी’ तथा चार लिपियाँ — अंग्रेज़ी की रोमन, तमिल, और ‘हिंदुस्तानी’ की ‘दो लिपियाँ’ — देवनागरी और उर्दू-लिपि सीखनी पड़तीं !

‘हिन्दुस्तानी’ भाषा और गाँधीजी के परम भक्त डॉ. ताराचंद ‘रेडियो कमेटी’ के सदस्य थे. सम्बन्धित बैठक में उन्होंने हिन्दी में और उर्दू में भी ख़बरें प्रसारित करने का विरोध यह कहकर किया कि इससे ‘हिन्दुस्तानी’ का एक्सपेरिमेंट सफल नहीं होगा. शुक्लजी पूछते हैं कि क्या यह हिन्दी और उर्दू दोनों को एक साथ हलाल करना नहीं हुआ ? मगर दूसरे ‘हिन्दुस्तानी’-स्टार और गाँधी-वादी पं. सुंदरलाल ने यहाँ तक कह डाला कि इस तरह हिन्दी और उर्दू में ख़बरों की मांग ‘टू नेशन थ्योरी विद ए वेंजिएन्स’ है !

उर्दू को उर्दू की और हिन्दी को हिन्दी की तरह सम्मान देने की हिमायत करते हुए शुक्लजी ने याद दिलाया है कि ‘मैं बड़ा होता हूँ तो अपनी शक्तियों से’. गाँधीजी के ‘उसूलों’ वाली ‘हिन्दुस्तानी’ और उसे लिखी जाने वाली दोनों लिपियों की स्वीकृति (देवनागरी और फ़ारसी) से भारतवर्ष का जो होगा उसकी ओर भी उन्होंने ध्यान आकर्षित किया है.

“हमारे पूर्वजों ने हमें सिखाया कि शब्द का अशुद्ध उच्चारण करने से पाप होता है. मन्त्र का अशुद्ध उच्चारण करने से उसका फल नहीं होता. और उन्होंने हमें एक ऐसी लिपि भी दी जिसमें दस हज़ार वर्ष पुराने उच्चारण सुरक्षित हैं. आज भी हम अपने एक शब्द का उच्चारण वैसा कर सकते हैं जैसा हमारे पूर्वज करते थे. ‘हिन्दुस्तानी’ और उसकी उर्दू-लिपि के कारण अब हमें सीखना होगा — साहित्या, वरत, रामायन, गनेश, बरहमन, सभापती, आचारिया नरेंदर देओ. अगर किसी को संदेह हो तो सुन ले रेडियो के हिन्दुस्तानी माहिरों का उच्चारण !”

बात यहाँ तक नहीं रुकी. गाँधीजी ने इस नियम को स्वीकृति दी कि ‘हिन्दुस्तानी’ अपनाने में उर्दू-बहुल क्षेत्रों पर यह बाध्यता नहीं होगी कि वे दोनों लिपियों का सिद्धान्त अपनाएं. वे नहीं चाहेंगे तो उन्हें देवनागरी सीखनी नहीं पड़ेगी. मगर हिन्दी-बहुल इलाक़ों में नागरी और उर्दू दोनों लिपियाँ सीखना ज़रूरी होगा. इसी तरह उर्दू-बहुल क्षेत्रों में उनका ‘मतरूकवाद’ भी मंज़ूर होगा — यानी उनके हिन्दी-अज्ञान और हिन्दी न सीखने की उनकी दृढ़-प्रतिज्ञा का भी सम्मान रखा जाएगा.

ये उर्दू-बहुल क्षेत्र थे कौन से, यह जानना बहुत ज़रूरी है. ये थे पंजाब, सिंध और सीमा-प्रान्त !

मतलब साफ़ है. ‘हिन्दुस्तानी’ भाषा पाकिस्तान बनाये जाने की रिहर्सल सिद्ध हुई. और बापू कह रहे थे पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा ! यह लाश 30 जनवरी, 1948 तक कहीं नज़र नहीं आई जबकि पाकिस्तान 14 अगस्त, 1947 को ही वजूद में आ चुका था — लाखों लोगों के रक्त की बाढ़ में तैरते पनीर के टुकड़े की तरह !!

भाषा केवल एक उदाहरण है जिसमें ‘महात्मा’ के स्थान पर ‘मौलाना गाँधी’ कहने की इस पुरज़ोर सिफ़ारिश के बाद गाँधीजी की और पड़ताल करना कुछ और भी सरल हो जाता है.

1915 में गाँधीजी दक्षिण अफ़्रीका से भारत लौटे तो सर ए. ओ. ह्यूम, दादाभाई नौरोजी और दिनशा वाचा द्वारा स्थापित कांग्रेस अङ्गरेज़ों और भारतीयों के बीच संवाद स्थापित करने के उद्देश्य को लेकर सक्रिय थी. इसमें दो तरह के मिजाज़ काम कर रहे थे. एक वे जो शांति के साथ अंग्रेज़ों से बात करने के विश्वासी थे ताकि उनके साथ मिलकर सरकार बनाई जा सके. इनमें गोपालकृष्ण गोखले और मोतीलाल नेहरू जैसे लोग थे. इन्हें कांग्रेस का ‘नरम दल’ कहा जाता था.

दूसरे वे लोग थे जो शुद्ध रूप से अंग्रेज़ों से मुक्त होकर अपनी सरकार बनाना चाहते थे. इनमें बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिनचन्द्र पाल प्रमुख थे जो ‘लाल-बाल-पाल’ के नाम से जाने जाते थे. इन्हें ‘गरम दल’ के ख़िताब से नवाज़ा गया था क्योंकि ये कहते थे ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा’.

गाँधीजी ने कांग्रेस की बैठकों में हिस्सा लेना शुरू किया और शीघ्र ही उनके विचारों, अनुभवों व जानकारी ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया. अब यह कल्पना करना हमारे लिए कठिन नहीं है कि यह प्रभाव नरम दल के लिए अधिक अनुकूल सिद्ध हुआ. गोखलेजी को गाँधीजी ने अपना राजनैतिक गुरु माना और आगे चलकर उनका अर्थव्यवस्था-सम्बन्धी ज्ञान गाँधीजी के बहुत काम आया. गरम दल धीरे-धीरे कांग्रेस से विदा हो गया. 1915 में ही गोखलेजी के देहान्त के बाद कांग्रेस पर मोतीलाल नेहरू और गाँधीजी का वर्चस्व स्थापित हो गया.

गाँधीजी के ये विचार और अनुभव क्या थे ?

अमेरिकी गृह युद्ध के बाद के विचारकों में एक प्रमुख नाम था हेनरी डेविड थोरो जिन्हें सँवारा था राल्फ़ इमर्सन नामक बड़े विचारक ने. थोरो चाहते थे कि वह जीवन के केवल बेहद ज़रूरी तथ्यों से सरोकार रखने वाला जीवन जीयें. ऐसा न हो कि मृत्यु की घड़ी में उन्हें आभास हो कि जीवन तो उन्होंने जीया ही नहीं. उनकी इस चिंता का समाधान दिया उन्हें इमर्सन ने. मेसाशुशेट के कोंकोर्ड में जंगलों की अपार शांति के बीच इमर्सन की जो संपत्ति थी वहाँ ‘वॉल्डन’ नामक तालाब के किनारे थोरो एक छोटी-सी कुटिया छाकर रहने लगे. यहाँ से उनका ‘सादा जीवन’-सिद्धान्त निकला.

कुछ समय बाद थोरो से सैम स्टेपल्स नाम का सरकारी अधिकारी टकरा गया जिसका काम था लोगों से टैक्स वसूलना. स्टेपल्स ने थोरो को बताया कि उन्होंने पिछले छः वर्ष से ‘चुनाव-टैक्स’ नहीं भरा है क्योंकि वह अपने स्थान से ग़ायब रहे हैं. वह टैक्स उन्हें अब देना पड़ेगा.

थोरो ने यह टैक्स देने से इनकार कर दिया. लिहाज़ा उन्हें एक रात के लिए हवालात में बन्द कर दिया गया. यहाँ से निकला थोरो का ‘सविनय अवज्ञा’-सिद्धान्त जिसके अनुसार व्यक्ति अपने तईं अन्याय करने वाली सरकार के नियम मानने से इनकार करने का हौसला दिखाये.

महान् रूसी लेखक लियो तोल्स्तोय ने ‘सादा जीवन’ और ‘सविनय अवज्ञा’ के ये दोनों सिद्धान्त थोरो से ग्रहण किए. दक्षिण अफ़्रीका में अपने ‘तोल्स्तोय फ़ार्म’ पर रहते हुए गाँधीजी ने ये दोनों सिद्धान्त तोल्स्तोय से प्राप्त किए. गाँधीजी का ‘सादा जीवन उच्च विचार’ का सन्देश यहीं से आरम्भ हुआ.

भारत में इन सिद्धान्तों ने लोगों के मन पर गहरी छाप छोड़ी. थोरो की ‘सविनय अवज्ञा’ व्यक्तिगत स्तर पर थी जबकि एक कुशल वकील होने के नाते गाँधीजी यह जानते थे कि क़ानून की हद में रहकर ही सरकार से भिड़ा जाना चाहिए. इस तरह उन्होंने सरकार की तरफ़ मुँह करके ख़ुद को सुरक्षित कर लिया. बहुत सोच-समझकर ‘सविनय अवज्ञा’ को ‘जन-आन्दोलन’ बनाने की प्रेरणा उन्होंने मार्क्सवाद से ग्रहण कर ली और पीठ की तरफ़ से भी सुरक्षित हो लिये.

इस सब में गाँधीजी का अपना क्या था ? एक चतुर भ्रमर की भाँति विभिन्न पुष्पों से अपने काम का तत्त्व ग्रहण करने की कला उनकी अपनी थी ! इस तरह कुछ ऐसा हुआ कि ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध बड़े-से-बड़ा जन-आन्दोलन गाँधीजी ने छेड़ा, महात्मा कहलाये, राष्ट्र-पिता बने, सरकार को चुनौती देने का साहस दिखाया, सब कुछ किया — मगर अपने को बचा-बचाकर किया. उनके ख़ासमख़ास मोतीलाल नेहरू — एक और कुशल वकील — यों भी सरकार के दुलारे थे ही — ‘क़ौम के ग़म में खाते हैं डिनर हुक्काम के साथ’ ! किसी भगतसिंह या सुभाषचन्द्र बोस की तरह गाँधीजी ने अपने को कभी किसी बड़े संकट में नहीं डाला. अंग्रेजों की सुरक्षित जेल में उनकी ‘अवज्ञा’ को सुभीता था. क़ानूनन उन्हें आग़ाखाँ महल वगैरह में ऐसी जेल ही दी जा सकती थी. गाँधी और नेहरू अगर वीर सावरकर से ज़्यादा बड़े देशभक्त थे तो उन्हें क्यों नहीं सर आग़ाखाँ पैलेस की जगह कभी काला पानी मिला?

वकील किस तरह राजनीति को पथभ्रष्ट करते हैं, कर सकते हैं, गाँधीजी का सिद्ध किया वह आदर्श हमारे देश में आज अडिग परम्परा बनकर स्थापित हो चुका है !

‘गरम दल’ कांग्रेस से विदा हुआ तो गाँधीजी को कोई कष्ट नहीं हुआ. जब भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दी गई तो गाँधीजी को बुरा नहीं लगा. ये क्रान्तिकारी देश का ‘ब्रिटिश’ क़ानून जो तोड़ रहे थे ! केशव बलिराम हेडगेवार ने कांग्रेसी नेता के रूप में 1921 के असहयोग आन्दोलन में गिरफ़्तारी दी और 1925 में कांग्रेस छोड़कर ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना करने के बावजूद गाँधीजी के 1930 के नमक-आंदोलन में शामिल हुए, उनके कांग्रेस का त्याग कर देने पर भी गाँधीजी को तकलीफ़ नहीं हुई. नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने कांग्रेस से निकलने का फ़ैसला किया तो शायद बापू ख़ुश ही हुए होंगे. हाँ, दोनों विश्वयुद्धों में ‘सरकार’ को सहयोग देकर, ब्रिटिश फ़ौजों के लिए भर्ती करवाकर अपने ‘अहिंसा’ के ‘उसूल’ पर प्रश्नचिह्न लगवाकर भी राष्ट्रपिता को कुछ फ़र्क नहीं पड़ा. लेकिन जब मुहम्मद अली जिन्नाह कांग्रेस से अलग हुए गाँधीजी की रातों की नींद ख़राब हो गई. एक बार बकरा खा ही चुके थे जो रात भर पेट में मिमियाता रहा था, तब भी नींद ख़राब हुई थी.

मौलाना गाँधी के हिंदुई मुसलमानों से इस रिश्ते को भी भली भाँति खंगालना बनता है.

मुहम्मद अली जिन्नाह कांग्रेस के ‘नरम-दल’ का हिस्सा थे. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के शिक्षा-जगत् से सर सैय्यद अहमद ख़ान की सरपरस्ती में पैदा हुई ‘मुस्लिम लीग’ में जिन्नाह को कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी. उनकी ज़्यादा रुचि थी अपनी वक़ालत में और अंग्रेजों से आज़ादी हासिल करने की नरम-दल कांग्रेसी कोशिशों में. लीग द्वारा प्रचारित मुसलमानों के अलग निर्वाचन-क्षेत्र के भी वह पक्षधर नहीं थे.

पहले विश्वयुद्ध में इंग्लैंड की जीत के बाद जर्मनी का साथ देने वाले उस्मान ख़लीफ़ा वाले तुर्की के लिए मुश्किल पैदा हो गई थी. दुनिया भर के मुसलमानों की तरह हिंदुस्तान के मुस्लिमों को भी तुर्की की ‘खिलाफ़त’ को सुरक्षित रखने की चिंता हुई और भारत में खिलाफ़त-आन्दोलन शुरू हुआ. जिन्नाह ने इस आंदोलन में भी दिलचस्पी नहीं ली, हालांकि अब वह मुस्लिम लीग में आ चुके थे. उनका कहना था हमें भारतीय मुसलमानों पर ध्यान देना चाहिए, तुर्की की ‘खिलाफ़त’ से हमें क्या लेना-देना.

इधर मौलाना गाँधी के क़ानूनी मन में एक पत्थर फेंक कर दो चिड़ियों को एक साथ चौंका देने का विचार आया. भारत का खिलाफ़त-आन्दोलन एक तरफ़ अंग्रेज़ों पर दबाव बनाने का अच्छा मौक़ा हो सकता था, तो दूसरी ओर यही अवसर था कि लीग के मुक़ाबले में हिंदुई मुसलमानों का दिल जीत लिया जाए. मुसलमानों का भी नेता बन जाया जाए.

गाँधीजी ने खिलाफ़त-आन्दोलन को कांग्रेस के समर्थन की घोषणा कर दी. जल्दी ही जिन्नाह को भी गाँधीजी को यह मौक़ा बख़्शने की भूल का अहसास हो गया. इस तरह कांग्रेस का नरम दल छोड़ने वाले जिन्नाह मुसलमानों के ‘गरम-दल’ में तब्दील हो गए !

जिन्नाह और मौलाना गाँधी की उड़ती नींदों ने यहीं सात फेरे ले लिए !

वह दिन और आज का दिन, हिंदुस्तान का मुसलमान अपना नेता किसे कहे इसी संभ्रम में चकराया बैठा है.

मौलाना गाँधी तो मुसलमानों के नेता नहीं बन पाये, जिन्नाह की भी इकलौती मुस्लिम-लीडरी स्थापित नहीं हो सकी. जिन्नाह और दूसरे मुसलमानों से गाँधीजी की यह लालसा छिपी न रही कि देश को अंग्रेज़ों से आज़ाद करवाते समय मुग़ल पकड़ से भी छुटकारा दिलाना है. वह दिल से चाहते थे कि स्वतन्त्र भारत मुसलमानों सहित एक आदर्श लोकतान्त्रिक राज्य बने — जो राम-राज्य हो ! उस समय तक यह स्पष्ट नहीं था कि स्वातंत्र्योत्तर भारत में उन पाँच-सात सौ राजे-रजवाड़ों का क्या स्वरूप होगा जो तब ब्रिटिश राज के झंडे तले अनुस्यूत थे. गाँधीजी को डर था ऐसा न हो अंग्रेजों से छूटें और एक केंद्रीय सत्ता के रूप में फिर मुसलमानों की बादशाहत के चंगुल में आ जाएं और हिन्दू हमेशा की तरह बिखरा-बिखरा ही रह जाए !

गाँधीजी को अपने वकीली कौशल पर इतना भरोसा था कि जैसे वह अंग्रेज़ों के सामने क़ानूनन डटे रह सके, वैसे ही प्रार्थना सभा, ईश्वर-अल्ला तेरो नाम और हिन्दुस्तानी भाषा जैसी ‘उदारता’ से मुसलमानों को भी समझा लेंगे. ऐसा हो न सका. हिन्दी, देवनागरी, गाय, राम-राज्य जैसे गाँधी-उद्गारों के सामने जिन्नाह जैसे मोहभंग से गुज़रे मुस्लिम-नेता एक आम मुसलमान का यह अहसास ज़िन्दा रखने में कामयाब रहे कि हिन्द के बादशाह तो मुसलमान ही हैं. अगर नहीं तो अलग मुस्लिम देश ही एक रास्ता है ताकि हिन्दू लोग मुसलमानों को परेशान न कर सकें. वे कैसे कहते कि लोभ या भयवश धर्म-परिवर्त्तन कर लेने वाला हर आदमी शाही-खानदान का नहीं हो जाता ! मौलाना गाँधी की ऐसा कहने की हिम्मत न हुई क्योंकि मुसलमानों को लेकर साफ़-साफ़ कुछ कहने की अनुमति उनकी वकीली अक्ल देती नहीं थी.

किसी एक महानायक के होने से समाज को बहुत से लाभ रहते हैं. हम भारतीयों के स्वभाव में विशेष रूप से ऐसा है कि कोई करने वाला मिल जाए तो हम जी-जान से उसके पीछे हो लेते हैं. महाभारत-युग में हमने श्रीकृष्ण को ऐसे ही महानायक के रूप में देखा था. इस बात को कैसे भुलाया जा सकता है कि श्रीकृष्ण के एक अवतारी पुरुष के रूप में स्थापित होने में उनके गुण जितने ज़िम्मेदार थे, जन-साधारण का जी-जान से अपने नायक के पीछे चल देने का गुण भी श्रेय का कम अधिकारी नहीं था. श्रीकृष्ण को श्रीकृष्ण बनाना ईश्वर का काम था या नहीं, मालूम नहीं, मगर भारतीय जन-जन का काम ज़रूर था. श्रीकृष्ण हों कि गाँधी, या फिर भले आज के मोदी, हम ‘We, the people’ को कभी न भूलें!

गाँधी की आँधी जो बीसवीं सदी में चली उसका हश्र यह हुआ कि हमारे मौलाना गाँधी हिन्दू और मुसलमान दोनों से मिले श्राप के कारण उस दिन कोलकाता (तब का कलकत्ता) में अनशन करते हुए खटिया पर पड़े थे जिस दिन उनका प्रिय जवाहरलाल अंग्रेज़ों से भी बढ़िया अङ्ग्रेज़ी में Tryst With Destiny वाला अपना भाषण दे रहा था और ‘बापू के बिना तिरंगा नहीं फहरेगा’ कहने की जिसके पास फ़ुरसत नहीं थी. परिणाम यह हुआ कि गाँधीजी इस देश को हमेशा के लिए एक नायक-विहीन समाज दे गए. नायक-विहीन समाज के सामने बहुत-से ख़तरे रहते हैं और आज का भारत उन्हीं ख़तरों के थपेड़ों में हाथ-पाँव मारता हुआ जैसे-तैसे तैर ले रहा है.

माँ-बाप के लाड़-प्यार से बिगड़े बच्चों को सबने देखा है. मगर राष्ट्र-पिता को जन-जन के लाड़-दुलार-विश्वास से बिगड़ते केवल बीसवीं सदी के भारत ने देखा है. सबने जिस बेतरह महात्माजी के हर आदेश को माना उसके नतीजे में जब कोई न माने तो अनशन की ज़बरदस्ती से मनवाने का हथियार इन बिगड़े हुए पिता के पास था. उन्हें भरोसा था कि मौलाना गाँधी होने में कोई अड़चन आएगी तो इस हथियार का इस्तेमाल कर लूँगा और देश का बँटवारा नहीं होने दूँगा. राष्ट्रपिता का वह हथियार अब बात-बिना बात के सत्याग्रहों और हड़तालों के रूप में हमारे सिरों के ऊपर मण्डराया करता है.

अफ़सोस कि गाँधीजी जीवनभर सत्य के प्रयोग करते रह गए और जिस दिन सत्य तक पहुँचे भी तो बहुत देर हो चुकी थी. जिन्नाह को अविभाजित भारत का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, उनका यह प्रस्ताव भी किसी काम न आया. अनेक इतिहासकारों ने इसे एक पराजित ‘बूढ़े फ़कीर’ की गाथा की तरह देखने की कोशिश की है. शायद इसीलिए 1960 का दशक आते-आते एक कहावत चल पड़ी थी — “मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी”.

1982-83 में कभी रिचर्ड एटनबोरो की फ़िल्म ‘गाँधी’ के आने के साथ ही गाँधी-गो लोगों ने फिर करवट ले ली और सब तरफ़ एक बार फिर ‘गाँधी-गाँधी’ होने लगा. यह आज तक पता नहीं चल पाया ये ‘गाँधी-गाँधी’ कर रहे लोग गाँधीजी से प्रभावित हैं या रिचर्ड एटनबोरो से ! कहावत के आसमान से गिरे तो एटनबोरो के खजूर में अटके!!

कुछ भी हो, आने वाले किसी भी युग में भारत की जब भी बात होगी गाँधीजी को छोड़ हो न सकेगी. सत्य के प्रयोग करते-करते सो जाने वाला यह बूढ़ा फ़कीर एक काम तो हम लोगों के लिए कर ही गया है. जिस तरह कुशल गृहिणियाँ जानती हैं कच्चे आम का मौसम हमेशा नहीं रहता. वे केरी के अचार से मर्त्तबान भर-भर कर रख लेती हैं ताकि आने वाले वक़्तों में काम आए. उसी तरह गाँधीजी ने भारत-राष्ट्र को लेकर शायद ही कोई चिंता हो जिस पर अपना चिन्तन मुखर न किया हो — स्वराज्य और अहिंसा से लेकर राष्ट्र, राम-राज्य, और पंचायत तक; जाति-व्यवस्था और धर्म से लेकर स्वच्छता, दलित, महिलाएं और प्रशासन तक. उन्हें लगता रहा सत्य के प्रयोगों का यह मौसम कभी-न-कभी तो बीतेगा. तब प्राप्त सत्य के मर्त्तबान काम आएंगे. वह सब किताबों में है पर एक भी बात किताबी नहीं है. ‘महात्मा’ से मौलाना’ के बीच का सफ़र गाँधीजी ने जितना सोचा था उतने से कहीं ज़्यादा लम्बा निकला — और अन्ततः निरर्थक भी. इसने ख़ुद गाँधीजी को अपने पाये सत्य को जी पाने का समय नहीं दिया. फिर भी वे सत्य हमारे लिए pre-cooked tinned food की तरह उपलब्ध हैं. बेईमान गाँधीवादी हमें उनका आस्वादन नहीं करने देंगे.

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और तकनीकी विज्ञानवाद के इस युग में एक बात तो तय है. हमारा साबिका अब सूक्ष्म से नहीं स्थूल से पड़ता है. बन्द tin को खोलने में स्थूल ही काम आयेगा. यहाँ इस्लाम हमारे लिए सहायक सिद्ध हो सकता है. अरबिस्तान की बर्बर जातियों के मनों में कभी ‘अल्लाहो-अकबर’ की स्थूल हुंकार ने अध्यात्म जैसे सूक्ष्म का ताला खोल डाला था. गाँधीजी के उपलब्ध सत्य का बन्द डिब्बा खोलने और देश के काम में लाने के लिए एक ठोस किस्म का ‘राष्ट्रवाद’ अपनी पूरी कट्टरता के साथ एकमात्र सटीक औज़ार है. आज बहुत लोग कहते हैं कि हमें किसी से देशभक्त होने का सर्टिफ़िकेट नहीं चाहिए. मगर सच यह है कि गाँधीजी निश्चित रूप से सही अर्थ में ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें किसी से राष्ट्र-भक्ति के सर्टिफ़िकेट की ज़रूरत नहीं. राष्ट्र-भावना की स्थूल तीव्रता के बिना महात्मा गाँधी 15 अगस्त, 1947 के पहले वाले मौलाना गाँधी होने पर ही रुक कर रह जाएंगे.

कोई क्योंकर भूले कि इन मौलाना गाँधी को दुलत्ती खाकर देश-विभाजन भी देखना पड़ा और स्वातंत्र्य के प्रथम ग्रास में अपने हाथों जवाहरलाल नामक मक्षिका-पात कर वह ग्रास निगलना भी पड़ा.

व्यक्ति-पूजा वाला यह ‘आँख-बन्द’ गाँधीवाद किस काम का?

केवल इस काम का कि सरकार का मतलब ‘गोरा साहब’ (जवाहरलाल) और गाँधी यानी अवज्ञा! आज़ादी है तो अब ‘अविनय’-अवज्ञा — फ़्रीडम ऑफ़ एक्स्प्रेशन!!

गाँधीजी के मर्त्तबान में यह नहीं मिलेगा!

हम राष्ट्र से जुड़कर चखें तो सही!!

गाँधीजी की क्या किसी की भी हत्या करने में नाथूराम गोडसे क़ानूनन उतना ही अपराधी होता. क़ानून ने उसे दण्डित भी किया. वह हर हाल में एक भावुक और कट्टर देशप्रेमी तो था ही. उसका अपराध हत्या का था, ‘महात्मा’ की ‘मौलाना’-असफलता को रिजेक्ट कर देने का नहीं. मौलाना गाँधी को नकार तो कांग्रेसियों ने ही दिया था !

अर्थहीन गाँधी-भक्तों की सुनने के पहले उन्हें ठोक-बजाकर परख लेना चाहिए. जो बहुत ‘गाँधी-गाँधी’ करे उसके गाल पर ज़न्नाटेदार थप्पड़ जड़ देना चाहिए. वह दूसरा गाल आगे करे तो समझ लीजिए गाँधीवादी है. पलटकर जवाब देने चले तो जान रखिए गोडसे-वादी है !

गाँधी-गाँधी सब करें, गाँधी बने न कोय.

थप्पड़ पड़े जो गाल पर, तुरत गोडसे होय.

अल्लाहो-अकबर !!!

11-12-2019

राजा तालध्वज और महाराष्ट्र सरकार


सोशल मीडिया पर एक छोटी सी क्लिप चली थी जिसे lenticular आर्ट का नमूना कहा गया था. Lenticular यानी ऐसी सतह जो आगे-पीछे दोनों तरफ़ से convex हो — Bi-convex, जिसमें हल्का-सा एक गोल उभार हो. जैसे कि काली मसूर की साबुत दाल का एक दाना. इस तरह के lenticular काँच पर एक छोटी लड़की का चित्र बना हुआ था. बाएँ से दायीं ओर चलते हुए हम देखते हैं कि उस लड़की की उम्र बढ़ती जाती है और अन्तिम छोर पर पहुँचते तक वह एक बुढ़िया में तब्दील हो जाती है ! यदि हम दायें से देखना शुरू करेंगे तो एक बूढ़ी औरत का चित्र मिलेगा जो बायें चलते-चलते आख़िर में एक कम-उम्र लड़की के चित्र में बदल जाएगा. ऐसे चित्र और भी देखे गए हैं जिनमें एक आदमी हौले-हौले शेर में बदल जाता है, या एक औरत आदमी बन जाती है. इस तरह के आर्ट को optic illusion कहकर भी वर्णन किया गया है.

लेकिन उस दिन हमारे अपने ब्रह्मापुत्र मुनिवर नारदजी के साथ जो हुआ वह न जाने किसी तरह का कोई आर्ट था, या फिर कोई optical illusion ! देवर्षि को स्वयं को बहुत बाद में समझ में आया कि हुआ क्या था, जबकि सब कुछ हो लिया था !

हुआ यूँ कि नारदजी सुर और तान से विभूषित अपनी वीणा बजाते-बजाते साम-गान करते हुए भगवान विष्णु के दर्शनार्थ श्वेतद्वीप पहुँचे. उस समय श्रीविष्णु लक्ष्मीजी के साथ विराजमान थे. उन्हें आया देखकर सर्वलक्षण-सम्पन्ना, सर्वभूषण-भूषिता, रूपवती नारियों में सर्वश्रेष्ठ भगवती लक्ष्मीजी अन्त:पुर में चली गयीं.

नारदजी ने पूछा, “हे पद्मनाभ भगवन् ! मैं कोई धूर्त्त या दुष्ट व्यक्ति तो हूँ नहीं. मैं तो इंद्रियों को, क्रोधादि को और सबसे बढ़कर माया को जीत लेने वाला तपस्वी हूँ. फिर माता लक्ष्मी मुझे आया देख इस तरह चली क्यों गयीं ?”

विष्णुजी ने कहा, “देवर्षि ! बात तो मात्र सामान्य शिष्टाचार की है कि दो मित्रों को बातचीत करने के लिए एकान्त दिया जाए. मगर चूँकि आपने माया की बात की है, तो बता दूँ कि माया उन लोगों के लिए भी अति दुर्जय है जो श्वास को जीत लेने वाले योगी हैं, सांख्य के ज्ञाता हैं, निराहार रहने वाले तपस्वी हैं, जितेन्द्रिय पुरुष हैं अथवा देव-जाति के हैं. स्वयं मैं, शिव और ब्रह्मा भी अजन्मा माया को जीत नहीं सके हैं. क्या आपको ऐसा बोलना उचित है कि ‘मैंने माया पर विजय प्राप्त कर ली है’ ?”

नारदजी को कुछ कहना नहीं पड़ा क्योंकि अभिमान की उस घड़ी में उनका अविश्वास और संशय उनके चेहरे और हाव-भाव से बोल रहा था.

यह देखकर विष्णुजी ने कहा, “नारदजी, छोड़िये इन बातों को. चलिये, कहीं घूमकर आते हैं.”

भगवान् विष्णु ने अपने वाहन विनतापुत्र गरुड़ को याद किया और गरुड़जी तुरन्त हाज़िर !

दोनों सवारियों को लेकर गरुड़जी उड़े और बहुत से विशाल वनों, दिव्य सरोवरों, नदियों, ग्राम-नगरों, पर्वत्तों, ऋषियों के आश्रमों, कमलों से सुवासित छोटे-बड़े तालाबों को पार करते हुए एक गहन-मनोहर वन में जा पहुँचे. वहाँ विष्णुजी ने नारदजी को एक अत्यंत रमणीय सरोवर दिखाया और मुस्कुराते हुए उनका हाथ पकड़कर उस सरोवर के किनारे ले गए.

सुंदर वन-प्रान्तर, सरोवर का स्वच्छ जल, अनेक कमलों की सुगंध, चहचहाती चिड़ियाँ, ढलती दोपहर. यात्रा की थकान ऊपर से.

भगवान् बोले, “मुनिश्रेष्ठ ! स्नान करना चाहेंगे ? थकान दूर हो जाएगी और आप एकदम फ़्रेश हो जाएंगे?”

नारदजी को आइडिया जंच गया. शिखा बाँध उतर गये सरोवर में.

तैरते-तैरते दूसरे किनारे पर पहुँचे तो एक अत्यन्त रूपवती स्त्री तालाब से निकलकर उस सुनसान जंगल में चारों ओर चकित-भीत नेत्रों से देख रही थी. नारदजी स्त्री-रूप में बदलने के बाद सब कुछ भूल चुके थे. उन्हें यह भी ध्यान नहीं आया कि विष्णुजी उनकी वीणा और मृगचर्म आदि लेकर सामने वाले किनारे से ग़ायब हो चुके हैं.

हो-न-हो, वह तालाब lenticular गुण-धर्म वाली कला का नमूना रहा होगा.

उस एकांत में वह अकेली मोहिनी बैठी सोच रही थी कि अब उसे क्या करना होगा. तभी सुसज्जित हाथियों से घिरा हुआ एक रथ वहाँ आ निकला. उस रथ में आभूषणों से सज्जित एक सुंदर युवक विराजमान था मानो शरीर धारण करके अनंग कामदेव स्वयं वहाँ बैठे हों.

रथ से उतरकर उस युवक ने स्त्री से पूछा, “पूर्णिमा के चन्द्र जैसे मुख वाली कल्याणि ! आप कौन हैं ? क्या आप किसी देवता, मनुष्य, गंधर्व अथवा नाग की पुत्री हैं? रूप और यौवन से सम्पन्न, दिव्य आभूषणों से मण्डित युवती होते हुए भी आप यहाँ इस सुनसान वन में अकेली क्यों हैं?”

उस कन्या ने उत्तर दिया, “मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकती मैं किसकी कन्या हूँ, मेरे माता-पिता कौन हैं और इस सरोवर पर मुझे कौन लाया है. किन्तु, आप कौन हैं?”

उस युवक ने बताया, “मैं राजा तालध्वज हूँ.”

वह बोली, “राजन् ! यहाँ कोई मेरा रक्षक नहीं है, न पिता हैं, न माता, न बंधु-बान्धव, और न ही मेरा कोई ठौर-ठिकाना है. मेरा कल्याण कैसे होगा इसका निर्णय मुझे अपनी प्रजा जान आप ही कीजिये.”

राजा तालध्वज उस युवती के लावण्य पर आसक्त हो चुके थे. उन्होंने अपने सेवकों को एक आरामदेह पालकी की व्यवस्था करने का आदेश दिया और उस स्त्री को आश्वासन दिया कि वह उसके साथ विवाह करेंगे जिससे वह रानी बनकर सभी मनोवांछित सुख पा सकेगी.

इस प्रकार वे पति-पत्नी हुए और विभिन्न राजसी भोग, विलास, मधुपान और क्रीड़ाओं में जीवन व्यतीत करने लगे. उन्हें समय बीतने का बोध तक नहीं रहता था. नारदजी को अपने पहले के पुरुष-शरीर और मुनि-जन्म का कुछ भी स्मरण नहीं था. इसलिए वह इस स्त्री-शरीर से अनेक पुत्रों को जन्म देने वाले बने. समयानुसार उन सभी पुत्रों का विवाह भी हुआ. इस तरह राजा तालध्वज और उनकी पत्नी का एक बड़ा परिवार हो गया. कभी-कभार उनके पुत्र और वधुओं में मन-मुटाव हो जाया करता था. रानी का कुछ समय उस खिन्नता में बीत जाता था. पराक्रमी पुत्रों, उत्तम कुल की वधुओं और पौत्रों को देख-देखकर वह अक्सर अभिमान से भी भर जाया करती थी. संक्षेप में, नारदजी को केवल इतना अहसास था कि वह एक पतिव्रता राजमहिषी हैं जिसका उत्तम आचरण है, बड़ा परिवार है, राजा तालध्वज जैसा प्रतापी पति है और वह इस संसार की धन्य स्त्री हैं.

समय बीतते-न-बीतते दुर्दैव हुआ और दूर देश के एक आक्रान्ता के साथ राजा तालध्वज और उसके पुत्र-पौत्रों का तुमुल युद्ध हुआ. उस युद्ध में पुत्र-पौत्र सभी काम आ गए. राजा पराजित हुआ और किसी तरह जीवित रह गया. सन्तानों की मृत्यु का समाचार पाकर रानी विलाप करती हुई युद्धभूमि में जा पहुँची और पुत्र-पौत्रों को भूमि पर गिरा देख शोक-सागर में डूब गई.

उसी समय एक कांतिमान् वृद्ध ब्राह्मण का रूप धरकर भगवान् विष्णु वहाँ आ पहुँचे और उस विषादग्रस्त स्त्री से कहने लगे, “लगता है पति-पुत्रादि से सम्पन्न गृहस्थी में अत्यधिक मोहवश आप विचार नहीं कर पा रहीं आप कौन हैं, ये किसके पुत्र हैं तथा ये कौन हैं. यह आपके लिए शोक छोड़कर परम आत्मगति पर विचार करने का अवसर है. मर्यादा की रक्षा हेतु अब आप परलोक गए पुत्रों के निमित्त तिलदान आदि कीजिये. धर्म्मशास्त्र का निर्णय है कि मृत नातेदारों के निमित्त तीर्थ में स्नान करना चाहिए. ”

वृद्ध ब्राह्मण के सांत्वना देने वाले वचन सुनकर रानी उठी और उसी वृद्ध से उचित तीर्थ पर ले चलने की विनय की.

वह ब्राह्मण कृपापूर्वक शोकसंतप्त रानी को उसके पति सहित ‘पुंतीर्थ’ सरोवर पर ले गए और कहा, “देवी ! इस पवित्र सरोवर में स्नान कीजिए और निरर्थक शोक का त्याग करके पुत्रों की सद्गति के लिए आवश्यक (तिलांजलि आदि) क्रियाएँ पूरी कीजिए.”

सरोवर में स्नान करते ही वह स्त्री मूल स्वरूप को प्राप्त कर पुन: देवर्षि नारद बन गयी. मुनिवर ने देखा कि भगवान् विष्णु उनकी वीणा थामे अपने स्वाभाविक रूप में सरोवर के तट पर बैठे मुस्कुरा रहे हैं. भगवान् का दर्शन करते ही नारद मुनि को एक-एक बात का स्मरण हो आया.

उधर राजा तालध्वज इस आश्चर्य में पड़ गए कि मेरी पत्नी कहाँ चली गई और ये मुनिश्रेष्ठ कहाँ से आ गए ? पत्नी को पुकारते हुए राजा विलाप करने लगे.

श्रीभगवान् ने अब राजा को समझाया, “ राजेन्द्र ! क्यों विलाप करते हो ? तुम कौन और तुम्हारी वह भार्या कौन ? कैसा संयोग और कैसा वियोग ? उस सुंदर स्त्री के साथ जो भोग करना था वह आप कर चुके. उसके साथ संयोग का समय अब समाप्त हुआ. एक सरोवर के किनारे वह आपको मिली थी. तब आपको उसके माता-पिता कहाँ दिखाई पड़े थे? वह अवसर जैसे आया था वैसे ही चला गया.”

राजा को भी बात समझ में आई और नारदजी ने भी हाथ जोड़े, “हे देव ! महामाया की शक्ति को मैं जान गया. हम सभी अन्ततः उनके अधीन हैं.”

उस समय के सबसे बड़े और सबसे ज़्यादा टी.आर.पी. वाले न्यूज़ चैनल के स्वामी वेदव्यास नाम के महर्षि ने अपने प्राइम टाईम शो ‘देवी भागवत महापुराण’ में यह प्रकरण प्रकट किया था. न्यूज़ यानी इतिवृत्त>सूचना>विवरण>घटना का इतिहास>पुराना (इतिहास)>पुराण.

देवर्षि नारद क्या जान गये, क्या नहीं वह हम भले जानें न जानें, इतना ज़रूर जान गए हैं कि इस महाराष्ट्र सरकार के गठन की घटना को भारतीय लोकतन्त्र के पुराण (इतिहास) में सदा उल्लिखित किया जाएगा.

महाराष्ट्र में सरकार बनाने का यह पोलिटिकल थ्रिलर सिद्ध कर रहा है कि हमारे चुनाव निश्चय ही lenticular मिरर हैं. इसमें शिवसेना ने आदित्य ठाकरे की छवि को देखकर चलना शुरू किया और किनारा आते ही बाला साहब ठाकरे को देखना शुरू कर दिया. दूसरे छोर पर बी.जे.पी. अपने रथ पर सवार आयी और अजित पवार का हाथ कुछ उस अदा के साथ थाम लिया जो राजा तालध्वज ने नारद मुनि को पाणिग्रहण-योग्य स्त्री जानकर दिखायी थी. अन्य राजनैतिक दल दुर्दांत आक्रांताओं की तरह घात लगाए बैठे रहे कि किस बहाने और कब घमासान छेड़ सकें !

मतदाता अर्थात् हमें लेकर केवल इस बात पर अरण्य-रुदन किया जाता है कि हमारी पूछ पाँच साल में एक बार होती है जब ये नेता लोग पूंछ हिलाते हुए हमारे दर पर मत्था टेकने आते हैं ! अब पता चल रहा है कि बच्चू वोटर ! तुमसे दान लेकर चुनाव-सरोवर में स्नान इसलिए नहीं किया जाता कि प्रजातांत्रिक अनुष्ठान का आग्रह रखना है. इसलिए किया जाता है कि अपना रूप-स्वरूप सब बदला जा सके ! जब अनुकूलता हो तो पूर्व-रूप ग्रहण कर अपनी-अपनी वीणा टंकारने की सुविधा भी उपलब्ध है जिससे ‘हिन्दुत्व’,‘धर्मनिरपेक्षता’, ‘मुसलमान-मुसलमान’, ‘आधुनिक विकास’, ‘राष्ट्रप्रेम’ जैसे मन्त्र आदतन अलापे जा सकें ! ‘नारायण’ इनमें से एक में भी न हों तो न सही!!

सबसे अधिक चिन्ता का विषय इन राजनेताओं के अहंकार का अश्लील खेल है जो ये सब पूरे आत्मविश्वास के साथ खेला करते हैं — होटल, रिज़ोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, प्रेस कोन्फ़्रेंस, आरोप-प्रत्यारोप, बयानबाज़ी. इस खेल से केवल इतना संदेश हम वोटर-भगवान् को दिया जाता है कि हम आपकी इलेक्शन-‘महामाया’ को जीत चुके हैं, अब आप चुप बैठिये और टी.वी. देखिये. हम वोटर यह तक पूछ नहीं पाते कि अगर प्रशासन ही शुरू नहीं करना है तो ये करोड़ों रुपये चुनाव में किस तुफ़ैल में बर्बाद किए थे ? करोड़ों ख़र्च कीजिये, मान लिया, मगर इस तरह बर्बाद करने का हक आपको किसने दिया ? जिस भगवान् (वोटर) की दहलीज़ पर माथा टेकने आये थे उसका कोई डर, कोई चिन्ता, परवाह, इज्ज़त वगैरह है या नहीं ?

हमारे यहाँ (आधुनिक) ‘पौराणिक’ आख्यान बहुत हैं कि चुनाव-सुधार — electoral reform होने चाहियें. एकाध उप-कथा भी मिल जाएगी — मतदान की उम्र घटाकर 21 से 18 वर्ष करने का किस्सा, चुनाव आयोग के अधिकार-क्षेत्र की कथा, ई.वी.एम. से मतदान-व्रत, अपराधी सिद्ध होने पर प्रत्याशी पर रोक की गाथा, चुनाव और परिणाम के दिन शराबबंदी-उपवास आदि-आदि. बस हो गए चुनाव-सुधार !

उसका क्या कि राजनैतिक दल प्रदेश को, नगर को, भाषा, जाति आदि को अपनी बपौती समझते हैं ? “हमने जो कह दिया महाराष्ट्र में वही चलेगा”. “मुंबई में वही चलेगा जो हम बोलेंगे”. “खबरदार जो तमिल के सिवा और कोई भाषा बोली तो”. “मुसलमानों के ज़्यादा से ज़्यादा एम.पी.-एम.एल.ए. होने चाहिएं” — या ऐसा ही कुछ और. प्रांत-नगर-भाषा किसी की निजी संपत्ति हैं क्या ? क़ानून से इजाज़त न होने पर भी अगर चुनाव की मण्डी में इन्हीं सिक्कों में व्यापार होता है तो क़ानून बेहद लचर है. राजनैतिक दलों को तो इस क़ानून की परवाह न करने का पूरा-पूरा अधिकार है, हम वोटरों के मन से भी इसका भय जाता रहे — इसकी इजाज़त कोई देगा क्या ?

यह सवाल इसलिए उठता है कि चुनावों में न तो muscle पॉवर पर प्रभावी रोक लगी, न money पॉवर का इस्तेमाल थमा. राजनीति के अपराधीकरण का चुनाव सुधार भी नहीं हुआ, न अपराधियों का राजनीतिकरण नहीं हो इसके लिए कुछ हुआ. चुने गए प्रत्याशियों को वापिस बुलाने का अधिकार भी अब तक वोटर को नहीं दिया गया है. यह सब तो हुआ नहीं, छोटी-मोटी उप-कथाओं का पुराण बखानने से क्या होगा? नि:सन्देह वही होगा जो महाराष्ट्र में हुआ है.

अब तो चुनाव-सुधारों की लिस्ट में यह भी जोड़ना ज़रूरी हुआ लगता है कि या तो मतदान करना आवश्यक किया जाए या कम से कम 85% मतदान होने पर ही उसे वैध मानने का नियम बने. महाराष्ट्र के अनुभव के बाद यह अत्यावश्यक हो गया है कि जिस परिवार का एक भी व्यक्ति राजनीतिक दल या चुनाव में आ जाता है उस परिवार के किसी अन्य सदस्य को किसी राजनीतिक पार्टी अथवा चुनाव में आने की पूरी मनाही हो. अनुभव, प्रतिभा आदि बहानेबाज़ी है ताकि ऐसा ही चलता रहे. भारतवर्ष में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है. महत्वाकांक्षाओं को खुलकर खेलने की सुविधा प्राप्त होने से ही महाराष्ट्र में व्यापक राष्ट्रीय हित को क़ुर्बान किया जा सका है.

हद तो तब हो गई जब महाराष्ट्र के औसत ‘मराठी माणूस’ को निजी संपत्ति मानने की इस मानसिकता में से एन.सी.पी.-शिवसेना के कुछ ऐसे उद्गार निकले जिनकी पड़ताल ज़रूरी है. इस पूरी उठा-पटक में मौक़ा देखकर अनेक बार ऐसा कहा गया कि ‘यह महाराष्ट्र है. यह दिल्ली के आगे नहीं झुकता’. गोया ‘दिल्ली’ आज भी औरंगज़ेब वाला कोई अलग राष्ट्र है जिसकी टक्कर में छत्रपति शिवाजी का मराठा साम्राज्य कोई दूसरा ही राष्ट्र है. कहने वाले यह भूल गए कि उनसे इतर दलों के चुने हुए विधायक भी उतने ही ‘मराठी माणूस’ हैं जितने वे स्वयं. इतर पार्टी के विधायक कोई पाकिस्तान से आए हुए लोग नहीं हैं. लोगों के एन.सी.पी.-शिवसेना की ‘निजी संपत्ति’ हो जाने का गुमान इतना गाढ़ा हो गया कि ‘यह महाराष्ट्र है’ के व्यक्तियों की छाप कुछ इस तरह छोड़ी जाने लगी कि ये वे लोग हैं जिनपर विश्वास कर लेने में नुकसान-ही-नुकसान है. महाराष्ट्र की प्रतिभा का इससे बढ़कर अपमान और क्या होगा जो सदा भारतीय अस्मिता, धर्म-दर्शन, अध्यात्म, चिंतन, कला और साहित्य में अपने योगदान के कारण मूर्धन्य स्थान पर रही है.

दूसरी बात यह कही गई कि इन्हें कुछ वैसा ही करना है जैसा हिटलर को परास्त करने के लिए ब्रिटेन, अमेरिका, रूस आदि ने मिलकर किया था. उन्हें ध्यान नहीं रहा कि हिटलर मूलतः मार्क्सवादी था. उसका ‘नाज़ी’ — NAZI — शब्द जर्मन भाषा में लिखे गए शब्दों National Sozialist (हिटलर की पार्टी) से Na-zi लेकर बना था. ‘फ़ासिज़्म’ मुसोलिनी का दिया शब्द था जो इटालियन भाषा के ‘फ़ासिज़्मो’ से निकला. Fascio littorio यानी रोमन अथॉरिटी का प्रतीक-चिह्न लकड़ी के हत्थों का वह बण्डल जिससे कुल्हाड़ा बंधा होता था. अथॉरिटी की इस परम्परा में मार्क्सवादी सोशलिज़्म की ज़िद के साथ जातीय श्रेष्ठता का पुट मिलाने से दुनिया को जो मिला वह था हिटलर. चिंता की बात यह है कि ‘यह महाराष्ट्र है’ की जातीय श्रेष्ठता में प्रजा को लामबंद कर उसके निजी सम्पत्ति होने को मिलाकर यह ज़िद कि हमने जो कह दिया यहाँ वही चलेगा हिटलर का काफ़ी कुछ हमशक्ल ठहरता है.

शिवसेना-एन.सी.पी. के फ़ासिज़्म का ही प्रतिरूप होने के दो पुख्ता लक्षण और हैं. एक तो यह कि ये दोनों ही मिथ्या प्रचार में जितने कुशल ठहरते हैं उससे लगता है ये हिटलर के प्रचार मन्त्री गोयबल्ज़ के भी गुरु हैं. एक झूठ को उछालकर उसे इतनी बार और इतने तरीकों से कहने में इनका तोड़ नहीं कि आख़िर वही सच जैसा हो जाए ! अभी हम वोटरों को यह देखना बाक़ी है इनमें से कौन-कौन कितने झूठ कैसे-कैसे और कितनी बार गोयबल्ज़-स्ट्रीट पर सजाता है जिन्हें इनके लामबन्द वफ़ादार हाथों-हाथ लेने ही वाले हैं.

दूसरा यह कि शिवसेना को देवेन्द्र फड़नवीस से पहले ही दिन से एलर्जी इसलिए थी कि वह इनके मराठा-जातीय फ़ासिज़्म की देन न होकर विदर्भ से हैं. “यहाँ हमारा (महा)-राष्ट्रवाद ही चलेगा” के तहत मुख्यमन्त्री इनका न होकर विदर्भ से हो, यह इनकी किसी स्कीम में फ़िट नहीं बैठता था. एक बार जैसे-कैसे पाँच साल निकाल लिए, अब और नहीं. यह ज़्यादा पुरानी बात नहीं जब ऐसे ही फ़ासिज़्म ने बर्लिन की दीवार खड़ी की थी. और यह उतनी भी पुरानी बात नहीं कि महाराष्ट्र में इसी तरह के आचरण के कारण अलग विदर्भ राज्य की माँग उठती रही है.

जब महत्वाकांक्षा येन केन प्रकारेण पॉवर मुट्ठी में रखने की हो और वंश परम्परा में यही बन्द मुट्ठी विरासत बनती हो तो अथॉरिटी का प्रतीक-चिह्न fascio littorio — अर्थात् फ़ासिज़्म सर्वाधिक उपयोगी औज़ार है. इसके लिए परिवार-वाद ज़रूरी है. परिवार-वाद के लिए किसी न किसी ढब कट्टरता ही सुरक्षा का पिंजरा हो सकती है. जैसे कि कांग्रेस का कट्टर हिन्दू-विरोध !

यह चिंता तब दूनी हो जाती है जब इस तरह अक्सर हिटलर को याद करने के पीछे बी.जे.पी. और उसकी पीठ पीछे आर.एस.एस. का होना अगर कहीं ऐसे ही लामबंद किये लोगों में जातीय ‘श्रेष्ठता’ पर आधारित निकले तो ? आर.एस.एस. को अपने काडर के लामबन्द होने को यह हिटलरीय स्वरूप देना होता तो ऐसा बरसों पहले हो गया होता ! मोदीजी चाहकर भी हिटलर नहीं बन सकते, क्योंकि ‘हिन्दू’ कोई एक जाति न होकर सर्व-समावेशी राष्ट्र है. नहीं हुआ तब भी विश्व के सबसे बड़े प्रजातन्त्र के वोटरों का अपनी शक्ति जल्द पा लेना ही श्रेयस्कर है.

मतदाता को यह शक्ति छीन कर लेनी पड़ेगी कि मालिक तो वही है, नियमों, प्रक्रियाओं, संविधान, लोकतन्त्र आदि के सरोवर में डुबकी लगाकर रूप-परिवर्त्तन करने वाले ये राजनेता नहीं. मतदाता जो चाहे वही होना चाहिए. चुनावों का बहिष्कार यह शक्ति हासिल करने का साधन नहीं हो सकता. एक ही उपाय है. जब तक सब चुनाव-सुधार वोटर को पूरी शक्ति प्रदान न कर दें, शत-प्रतिशत वोटर मैदान में उतरे, एक भी व्यक्ति घर पर बैठा न रहे और वोट डालकर किसी को न चुने — ई.वी.एम. पर केवल NOTA का बटन दबाये. याद रहे, एक वोटर भी भूले से किसी को वोट दे आया तो यह उपाय कुछ काम न आयेगा. इस काम के लिए वोटर-जागृति का काम हाथ में लेने वालों को इतनी सावधानी से काम करना होगा कि एक-एक उँगली केवल NOTA पर पड़े. दुर्भाग्य यह है कि इसके लिए किसी के पास समय नहीं निकलेगा — प्रशांत किशोर के पास भी नहीं. इस अनुष्ठान में एक चूक से भी मंत्र-सिद्धि नहीं होती, यह बात जिस तरह राजनैतिक दल जानते हैं, वैसे ही हमें भी समझ रखनी होगी.

जब बरसों-बरस कोई चुना ही नहीं जाएगा तो देखते हैं सत्ताधीशों का पक्षपाती यह क़ानून क्या करता है. चुने जाकर ‘मेरा सी.एम.-तेरा सी.एम.’ आप नहीं खेलेंगे. आप चुने ही नहीं गए उस सूरत में आपकी शक्ल देखने का खेल हम खेलेंगे.

चुनाव-प्रक्रिया और परिणामों को lenticular आर्ट की माया बना दिया जाए, इस खिलवाड़ को अब और इजाज़त नहीं दी जा सकती.

24-11-2019

नुसरत के बहाने से…


एक तरफ़ जब भ्रातृवर पार्थसारथी थपलियाल अपने मित्र रज्जब अली के कुरेदने पर भारतीय दृष्टि में ‘ईश्वर’ के बारे में मूलभूत जानकारी एकत्र संकलित करने का महत्कार्य कर रहे थे, दूसरी तरफ़ बंगाल में हुए देवी के मुस्लिम अवतार नुसरत को लेकर हंगामा बरपा था. तीसरी तरफ़ आरएसएस वाले श्री मोहन भागवत हमेशा की तरह विजयदशमी पर अपना अद्भुत भाषण दे रहे थे. मोदीजी से बेहतर भाषण कोई दे सकता है तो वह निःसन्देह भागवतजी हैं. मोदीजी बोलते हैं तो हम सोच सकते हैं राजा दशरथ कितना उम्दा बोलते होंगे. उन्हें भी शासन-प्रशासन आदि की मर्यादा का ध्यान रखना पड़ता होगा. भागवतजी बोलते हैं तो लगता है मानो मर्यादाओं का निर्धारण करने वाले गुरु वसिष्ठ कुछ कह रहे हैं.

बहरहाल, आरएसएस को लेकर गच्चा खा गए निंदकों का मन-विज्ञान बाद में खंगालेंगे, फ़िलहाल तो यह सोचना होगा कि आख़िर थपलियालजी, नुसरत जहाँ और भागवतजी में कौन से एक सूत्र का संबंध है जो दूसरी तरफ़-तीसरी तरफ़ गिनाना पड़ गया? ईश्वर हिन्दू होता है, अल्लाह मुसलमान, देवी मुसलमान नहीं होती, मुसलमानों में देवियों का अवतार लेना अमान्य है, अल्लाह के सिवा किसी और की पूजा करना कुफ़्र है, और हिंदुस्तान में रहने वाले सब हिन्दू नहीं होते. अतः इन तीनों बातों में किसी तरह कोई रिश्ता नहीं बैठता.

इस तरह के विश्लेषण से क्या पता चला? पता यह चला कि विश्लेषण का काम है तोड़ना जबकि अल्लाह की बनायी इस कायनात में सब कुछ आपस में गूँथा हुआ है, संश्लिष्ट है. विश्लेषण करने के लिए मैं टहनी से एक ताज़ा खिला गुलाब तोड़ता हूँ. उसकी पंखुड़ियाँ खसोटता हूँ. पूरा-पूरा एनालिसिस करने के लिए लेबोरेटरी में ले जाता हूँ. विश्लेषण करके जान लेता हूँ इसमें इतना-इतना क्लोरोफ़िल है – उसे काँच के एक जार में संभाल लेता हूँ; इसमें इतना जल-तत्त्व – water content है – काँच के दूसरे जार में समेट लेता हूँ; इतना color content है – उसे तीसरे जार में बंद कर लेता हूँ; पंखुड़ियों और पत्तियों के तन्तुओं का structure ऐसा-ऐसा है – चौथे और पाँचवे  बर्त्तनों में ढँक कर रख लेता हूँ ! इस तरह काँच के दसियों पारदर्शी बंद बर्त्तनों में गुलाब का पूर्ण विश्लेषण संभाल कर अब मैं गुलाब का सबसे बड़ा एक्स्पर्ट हूँ और उसके बारे में सब जानता हूँ.

मगर एक बात नहीं जानता. उन सभी बंद पात्रों को एक कवि के सम्मुख रख दूँ कि यह रहा गुलाब, ज़रा इस पर एक सुंदर गीत तो लिख दो, वह नहीं लिख पाएगा. गीत ईश्वर के रचे गुलाब पर ही लिखे जा सकते हैं क्योंकि तब वह अपने संश्लिष्ट स्वरूप में है ! विश्लेषण – analysis हमारी जानकारी भले बढ़ाता हो, यह संश्लेषण– synthesis ही है जो हमारे ज्ञान और विवेक को बढ़ाता है.

इसलिए भागवतजी के भाषण में से टीवी बहस का विषय यह नहीं था कि ‘लिंचिंग’ किस देश का शब्द है. विषय था क्या शिक्षा पैसा कमाना और पेट भरना सिखाने मात्र के लिए है? या ऐसा ही कुछ और. उनके भाषण में विचार-विमर्ष करने योग्य विषय भरे पड़े थे. किन्तु तोड़क-एक्स्पर्ट हम लोग संश्लेषण की (जिसमें विश्लेषण स्वतः निहित है) क्षमता गँवा चुके लगते हैं. अन्यथा ‘हिन्दू’ को लेकर निरर्थक-निराधार  प्रश्न न करते. रज्जब अली को भी थपलियाल जी को हिन्दू ईश्वर के बारे में उकसाना न पड़ता. इस सबके बीच पार्थसारथी थपलियाल ने जो जानकारी संकलित की वह संश्लेषण का एक बेहतरीन नमूना है.

इसी से जुड़ा है बंगाल में देवी का मुसलमान अवतार जो वहाँ संश्लेषण ही तो कर रही थी.

पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि नुसरत जहाँ ने जो दुर्गा पूजा की न तो वह क़ुरान-ए-पाक हाथ में लेकर की, न कलमा पढ़ते हुए की, और न इस्लाम से मुँह फेरकर की. अल्लाह के सिवा किसी और की पूजा इस्लाम में मना है, दुर्गा के पंडाल में नहीं. अबू धाबी के मंदिर में अरब शेख़ ने जो आरती की थी उससे न तो इस्लाम का अपमान हुआ, न कोई कुफ़्र हुआ. हाँ, वही अरब शेख़ अगर मस्जिद में जाकर मूर्त्ति बैठायें और आरती करें तो अवश्य कुफ़्र है, और निंदनीय-दण्डनीय भी है. उन शेख़ की तरह नुसरत जहाँ ने भी ऐसा कुछ नहीं किया जो इस्लाम के खिलाफ़ ठहरता हो.

इस्लाम किसी की बपौती नहीं है. न क़ुरान मुसलमानों की निजी संपत्ति है. ऐसा भी नहीं है कि ग़ैर-मुस्लिम को क़ुरान शरीफ़ घर में रखना, उसकी इज़्ज़त करना या पढ़ना, उस पर मनन-चिन्तन करना मना है. ये हिल-हिल कर क़ुरान पढ़ने वाले मुसलमान – विशेषतः हिंदुस्तान-पाकिस्तान में, या फिर और भी कहीं – बेसिर-पैर की सोचते हैं कि चलो, क़ुरान-ए-मजीद के अक्षर बाँच लिये, इसलिए अब उनका बाक़ी दुनिया को हिलाना बनता है ! ऐसे ही लोगों के लिए क़ुरान में बार-बार कहा गया है कि ये लोग समझते नहीं, सब स्तुति अल्लाह के लिए है और ये बातें समझदारों के लिए इशारा हैं. ‘अल्लाह’ अरबी भाषा का शब्द है. इसका यह अर्थ कैसे हो गया कि सब स्तुति God के लिए नहीं है? या राम के लिए नहीं है? आख़िर God या राम अरबी से इतर भाषाओं में अल्लाह को ही कहते हैं.

हम अरबी में नमस्ते करते हैं तो कहते हैं – “अस्सलाम अलैकुम”. ‘अस्सलाम’ अल्लाह के 99 नामों में से एक है. वैसे ही जैसे परमात्मा का एक नाम ‘राम’ है. इसलिए  “अस्सलाम अलैकुम” बोलकर हम एक भाषा में “राम-राम” कह रहे हैं और “राम-राम” बोलकर दूसरी भाषा में “अस्सलाम अलैकुम” बोल रहे हैं. अब कोई कूड़मगज ही ऐसा कहेगा कि ख़बरदार जो संस्कृत, हिन्दी, लैटिन, ग्रीक  या अंग्रेज़ी बोली तो ! सिर्फ़ अरबी बोलो !

क़ुरान ने कहा है हर इंसान को अल्लाह के रास्ते पर लाना मुसलमानों पर फ़र्ज़ है. कोई हिन्दू अगर ईश्वर के रास्ते से भटक जाये और कोई मुसलमान उसे रामायण पढ़ने की प्रेरणा देकर, या किसी ईसाई को बाइबिल के माध्यम से वापिस अल्लाह के रास्ते पर ला दे, तो यह क़ुरान का हुक्म मानना हुआ या नहीं? किसने कहा गर्दन पर तलवार रखकर क़ुरान ही पढ़वाई जाए तभी God पर ईमान लाना माना जाएगा?  

इस्लाम में क़ुरान के इशारे सिर्फ़ समझदारों के लिए हैं, हिंदुस्तान के “हाय मुसलमान” “हाय मुसलमान” वाले नव-जिन्नाहों – neo-Jinnahites — के लिए नहीं. यहाँ इस्लाम की नहीं, सभी मुसलमानों की भी नहीं, केवल नव-जिन्नाह टाईप मुसलमानों की निंदा की जा रही है. हर किसी को करनी चाहिए.

1947 के भारत-विभाजन के बाद लगभग 4 करोड़ मुसलमान ऐसे थे जिन्होंने हिंदुस्तान में रहना चुना था. उनमें तक़रीबन एक करोड़ वे मुसलमान थे जिन्होंने पाकिस्तान के बनने में जी-जान लगाया था. जो चार करोड़ आज बढ़कर 20 करोड़ हो गए हैं, उनमें वे एक करोड़ ‘जिन्नाहवादी’ भी हैं जो आज बढ़कर पाँच करोड़ हो गए हैं. कोलकाता के अपने भाषण में यह तथ्य उस वक़्त के गृह-मन्त्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने देश के सामने रखा था. इन्हीं ‘नव-जिन्नाहों’ को आज भी उसी ‘ग़ज़वा-ए-हिन्द’ का इंतज़ार है, जिसका नमूना कभी नादिरशाह के लश्कर ने दिल्ली में एक लाख लोगों की ‘लिंचिंग’ करके, और ख़ुद इन्होंने 1947 में पेश किया था, क्योंकि इनके मुताबिक समझे बिना भी क़ुरान से बेहतर ‘किताब’ नहीं है. अगर ‘मशरिक़’ में है — मुहम्मद साहब का इस्तेमाल किया शब्द – “मुझे मशरिक़ से ठंडी हवाएं आती हैं” – तो वहाँ ग़ ज़वा-ए-हिन्द कर डालो ! इन्हें मालूम होना चाहिए कि 1947 में हिन्द के पास आज वाला अपना संविधान रहा होता तो जिन्नाह को पाकिस्तान नहीं, फाँसी मिलती ! जिन्नाह को फाँसी न देकर पाकिस्तान देने और एक इस्लामी मुल्क बनाने का नतीजा आज सबके सामने है. ये नव-जिन्नाह पाकिस्तान सहित इस्लाम पर कलंक सिद्ध हुए हैं और ग़ज़वा-ए-हिन्द की परिकल्पना करते-करते दोज़ख़ के आख़िरी खड्डे में जा गिरे हैं.

सच पूछा जाये तो ये मुसलमान हैं ही नहीं. क्योंकि ये इस्लाम और क़ुरान को ज़रा नहीं जानते. हाँ बड़ी-बड़ी इस्लामिक व्याकरण ज़रूर हाँक सकते हैं — फ़तवा यह होता है, ग़ाज़ी उसे कहते हैं, जिहाद का यह नहीं वह मतलब है — वगैरह-वगैरह. जिस तरह चाँद का कलंक चाँद का हिस्सा होते हुए भी चाँद नहीं कहलाता, उसी तरह ये नव-जिन्नाह इस्लाम का हिस्सा हैं ज़रूर पर मुसलमान नहीं कहला सकते. इसलिए दुनिया भर में ये अपने विनाश को नित नूतन न्योता देते रहते हैं और चिल्लाते रहते हैं — “इस्लामोफ़ोबिया, इस्लामोफ़ोबिया” !

थपलियालजी के लेख में ईश्वर को लेकर जो इशारे हैं वे बार-बार क़ुरान-ए-मजीद की भी याद दिलाते हैं —  एको: देव: — अल्लाह एक है; न तस्य प्रतिमा अस्ति – उसकी कोई मूर्त्ति नहीं अर्थात् वैसा दूसरा नहीं है, या उसका कोई साकार रूप नहीं है, उसे किसी ने देखा नहीं है; एकोहं द्वितीयोनास्ति – “मैं केवल एक हूँ, दूसरा कोई नहीं”; एकमेवाद्वितीयम् – एक ही है, अद्वितीय है, अद्भुत है, उस जैसा दूसरा नहीं है; आदि. मगर ये इस्लाम के self-appointed फ़र्माबरदार इशारे समझने जितना समझदार हों तब न !

क्योंकि बक़रीद मनाने की भी कथा कुछ इस तरह है:

हजरत इब्राहीम अपनी पत्नी हाजरा और पुत्र इस्माइल के साथ रहते थे. मान्यता है कि हजरत इब्राहीम ने एक स्वप्न देखा था जिसमें वह अपने पुत्र इस्माइल की – जो उन्हें सबसे प्यारा था — कुर्बानी दे रहे थे. हजरत इब्राहीम इस स्वप्न को अल्लाह का आदेश मानकर अपने दस वर्षीय पुत्र इस्माइल को ईश्वर की राह पर कुर्बान करने के लिए निकल पड़े. पुस्तकों में पढ़ने में आता है कि ईश्वर ने अपने फरिश्तों को भेजकर इस्माइल की जगह एक जानवर की कुर्बानी करने को कहा. दरअसल इब्राहीम से जो असल कुर्बानी मांगी गई थी वह उनकी ख़ुद की थी अर्थात यह कि ख़ुद को भूल जाओ. तब उन्होनें पुत्र इस्माइल और उसकी मां हाजरा को मक्का में बसाने का निर्णय लिया. लेकिन मक्का उस समय रेगिस्तान के सिवा कुछ न था. इस तरह एक रेगिस्तान में बसना उनकी और उनके पूरे परिवार की बहुत बड़ी क़ुर्बानी थी.

ईद-उल-अज़हा अहंकार के विसर्जन का संदेश देने वाली ‘बड़ी ईद’ है. अहंकार ही मनुष्य को सबसे ज़्यादा प्यारा है – उसी की क़ुरबानी. मगर ये इस बात को स्वीकार नहीं करेंगे. इस्लाम इनकी बपौती जो हुआ !

एक पुराना किस्सा है. किस्सा उस अरब सुलतान  का है जिसने रूस पर चढ़ाई की थी और युद्ध में उसे परास्त किया था. कहते हैं कि मस्क्वा (मॉस्को) की लाइब्रेरी इतनी बड़ी थी और उसमें हर भाषा की जानी-मानी पुस्तकें और ग्रन्थ इतनी बड़ी संख्या में उपलब्ध थे कि उन्हें एक के आगे एक रखा जाता तो पृथ्वी से चंद्रमा तक सात चक्कर लग जाते. सुलतान  अपने घोड़े पर सवार लाइब्रेरी के सामने खड़ा था और होठों पर विजेता की मुस्कान लिये उस पुस्तकालय को ताक रहा था. 

अचानक सुलतान ने कहा, “क्या इन किताबों में एक भी किताब ऐसी है जो क़ुरान-ए-मजीद से बेहतर है?”

जवाब कौन देता? थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद सुलतान ने फिर कहा, “है कोई बेहतर किताब? अगर नहीं है तो इन सब के होने का क्या मतलब है? मैं इस लाइब्रेरी को जला दूँगा. और अगर एक भी किताब यहाँ ऐसी रखी है जो क़ुरान से बढ़कर है, तब तो मैं इस लाइब्रेरी को ज़रूर जला डालूँगा.”

और वह महान् ग्रंथालय फूँक डाला गया !

यही मानसिकता है जो नुसरत जहाँ को यह मानकर भी गाली देगी कि उसका किया इस्लाम से बेहतर नहीं था, और तब भी गाली देगी जब लगेगा कि इनकी मुस्लिम ठेकेदारी के बावजूद उसका किया उचित और बेहतर आचरण था, इस्लाम का अपमान किये बिना था और एक सामान्य मुसलमान होकर था !

मेरे बचपन के दिनों की बात है. पिताजी के एक मुस्लिम मित्र तरह-तरह के विषयों पर चर्चा करने हमारे घर आया करते थे. भले आदमी थे और हम बच्चों से भी लाड़-प्यार से पेश आते थे. एक रोज़ वह आये तो कुछ परेशान दिखे. पिताजी ने कुशल-मंगल पूछा तो उन्होंने बताया, “आज हमारा एक आदमी मारा गया.”

हम बच्चों ने भी सोचा, बेचारों का कोई नज़दीकी रिश्तेदार नहीं रहा इसलिए वह दु:खी हैं.

पिताजी ने भी मातमपुर्सी के अंदाज़ में पूछ लिया कि क्या हुआ?

पता चला कि उनका रिश्तेदार साइकिल से कहीं जा रहा था कि अचानक तेज़ दौड़ते एक ट्रक से टकरा गया और मौके पर ही उसकी मौत हो गई.

“आपका क्या लगता था?” पूछने पर उन्होंने बताया, “नहीं-नहीं, रिश्तेदार नहीं था. मैं तो उसे जानता भी नहीं था. वह कोई एक मुसलमान था.”

कोई हिन्दू नाथूराम गोडसे को फाँसी दिये जाने पर कभी ऐसा नहीं कहेगा कि ‘हमारा’ एक आदमी मारा गया. जबकि यह मानसिकता भारतीय संसद् पर आतंकी हमले के षड्यंत्रकारी अफ़ज़ल गुरु को फाँसी होने पर ज़रूर शर्मिंदा रहेगी क्योंकि उसके ‘क़ातिल’ यानी सज़ा देने वाले जज ज़िंदा हैं. नुसरत जहाँ की निंदा तो चीज़ ही क्या है!

कोई भी वह व्यक्ति इस मानसिकता का दुश्मन है जो हर वक़्त छाती पीट-पीटकर असदुद्दीन ओवैसी की तरह “हाय मुसलमान” “हाय मुसलमान” नहीं करता.

ज़ाहिर है न तो इस्लाम बुरा, न क़ुरान में कोई दोष, न सब मुसलमान संकीर्ण विचारधारा में डिब्बा-बन्द अचार की तरह जीने वाले. बस इन नव-जिन्नाहों को यह समझाना होगा कि मियाँ, अपना रास्ता नापो. ग़ज़वा-ए-हिन्द जैसा कुछ होने वाला नहीं.

यही वजह है कि ये नव-जिन्नाह (और उनके सुर में सुर मिलाकर ‘प्रोग्रेसिव’ चोले व झोले वाले) आरएसएस को कोसते रहते हैं. उन्हें लगता है जिस आरएसएस ने एक मोदी दिया कि जिसने ‘ग़ज़वा-ए-हिन्द’ के हमारे प्रोग्राम को चौपट कर दिया, उस आरएसएस में न जाने कितने मोदी और होंगे ! हमारी शैतानी फ़ितरत की दुश्मन आरएसएस – तेरा बेड़ा ग़र्क़ हो !

हिंदुस्तान में एक-से-एक बेहतरीन मुसलमान हैं. यहाँ न तो मुसलमान होने में कुछ बुराई है और न मुसलमान होना कोई गुनाह है. इन पाँच करोड़ neo-Jinnahites के चलते अगर आरएसएस हिन्दू अस्मिता को जाग्रत करता-सा जान भी पड़ता है तो इसे भी इनके वाले कट्टरतावादी इस्लाम की ही जीत मानना चाहिये जो मुद्दआ पूछता नहीं, बस तलवार भाँजने को जिहाद कहता है. आर.एस.एस. हिन्दू की तरफ़ से इतना ही कह रहा है — मैं भी मुँह में ज़ुबान रखता हूँ. नुसरत इस ज़ुबान का ही एक नाम है.

जहाँ तक देवी के मुस्लिम अवतार का प्रश्न है, उसे इस्लामिक सन्दर्भ देना अनुचित होगा. इस बात को केवल आधुनिक विज्ञान और भारतीय (हिन्दू) संदर्भों में ही समझा जा सकता है.

मनुष्यों का ईश्वर केवल इसलिए मनुष्यों जैसा है क्योंकि अगर चींटियों का कोई ईश्वर है तो वह चींटियों जैसा होगा और मच्छरों का मच्छर जैसा. वह निराकार परमात्मा जब स्वयं को मनुष्य रूप में प्रकट करता है तो वह शरीर के गुण-सूत्र – chromosome – से बचकर नहीं करता. एक्स (X) और वाई (Y) दोनों क्रोमोज़ोम का नियंता ईश्वर ही है. यह उसका ख़ुद का निर्णय है कि मनुष्य शरीर में XX क्रोमोज़ोम प्रधान होंगे तो वह मनुष्य-शरीर ‘स्त्री’ कहलाएगा. और जब XY के जोड़ीदार यानी pairing क्रोमोसोम की प्रधानता रहेगी तो मनुष्य-शरीर ‘पुरुष’ होगा. यों दोनों तरह के शरीरों में दोनों तरह के क्रोमोज़ोम मौजूद रहते ही हैं. इस कारण नारायण स्वयं वही हैं जो आदिशक्ति जगदंबिका हैं. और आद्याशक्ति देवी वही हैं जो नारायण हैं ! इस शक्ति के बिना शिव केवल ‘शव’ हैं. जब मनुष्य घोषणा करता है – ‘अनहल हक़’ —  ‘अहं ब्रह्मास्मि’ तो वह XY pairing वाले शरीर तक सीमित घोषणा नहीं है. ‘मैं ही सत्य हूँ, ब्रह्म हूँ’ का यह उद्घोष XX क्रोमोज़ोम-प्रधान शरीर वाली मानुषी के लिए स्वतः सिद्ध है. ‘देवी’ का अर्थ समझने का रहस्य मात्र इतना है. केवल भारत ने ही अल्लाह, ईश्वर या God को — जो भी कहें – स्त्री और पुरुष दोनों रूपों में जाना है और दोनों में कोई अंतर नहीं माना है.

इसी से यह भी स्पष्ट होता है कि भारत ने स्त्री को श्रेष्ठ क्यों माना. क्योंकि यह विज्ञान-सम्मत सत्य है. पुरुष-शरीर के Y गुणसूत्र को पूर्ण होने के लिए X की आवश्यकता है जबकि स्त्री XX के साथ अपने आप में पूर्ण है. विज्ञान भी female species को अधिक मज़बूत – stronger – कहता है.

भारतीय पुराणों में संदर्भ है कि एक बार नारायण ध्यान लगाकर बैठ गए. ब्रह्मा सहित अन्य देवताओं ने जिज्ञासा व्यक्त की कि भगवान् पद्मनाथ तो स्वयं सबका ‘कारण’-तत्त्व हैं, सब उन्हीं का ध्यान करते हैं. उनसे ऊपर तो कोई है नहीं. तब नारायण किसका ध्यान कर रहे हैं ? नारायण ने स्पष्ट किया कि महामाया जगदम्बिका की शक्ति के बिना मैं तो क्या कोई भी कुछ नहीं कर सकता. मैं उन्हीं का ध्यान कर रहा हूँ.

इस मनोविज्ञान की पृष्ठभूमि में देखें तो हम पायेंगे कि भारत में जहाँ कहीं समाज इसलिए ‘पिछड़ा’ माना जाता है कि वह अभी तक भारतीय परम्पराओं में रहता है, वहाँ आज भी स्त्री का सम्मान है. जैसे कि मारवाड़ में. हरियाणा में तो बहन की गाली पर हत्या तक हो जाती है. गुजरात-महाराष्ट्र में अधिकांशतः स्त्रियाँ आधी रात में भी सड़कों पर अकेली आती-जाती देखी जा सकती हैं.

भारतीयता की चूलें तब से हिलने लगीं जब से भारतवासियों ने जिस किसी कारण अपनी वैज्ञानिक श्रेष्ठता को घुटनों के बल बैठा दिया और पश्चिम के ‘आधुनिक’ विज्ञान व जीवन-शैली की श्रेष्ठता स्वीकार कर ली. XX और XY क्रोमोज़ोम के सन्दर्भ में ध्यान देना होगा कि पश्चिम का मनोविकास इस पृष्ठभूमि में हुआ है कि हव्वा को आदम की पसली से बनाया गया. इसलिए जैसे पुरुष मूलतः ईश्वर (की सेवा) के लिए है वैसे ही स्त्री पुरुष (की अधीनता) के लिए है. ये संदर्भ बाइबिल के न्यू टेस्टामेंट में उपलब्ध हैं. स्वर्ग से आदम के पतन की भी वजह स्त्री को ठहराया गया. पश्चिमी मन पूरी तरह इस ‘आदिम पाप’ – archetypal sin – की छाया में पला-पनपा है तथा एक बुनियादी अपराध-बोध में क़ैद है. जिस देश में स्त्री की सहमति-अनुमति के बिना उसे हाथ लगाने तक का साहस करना कठिन था वहाँ आज इस ‘श्रेष्ठता’ के चलते आए दिन के बलात्कार आसान हो चुके हैं, क़ानून कितने भी कठोर बना लीजिये !  बलात्कार का सम्बन्ध क़ानून से है भी नहीं. आपके archetypal value system से है.

 एक सवाल अब भी बाक़ी है. जब वह ब्रह्म निराकार है, उसकी कोई मूर्त्ति नहीं, वह केवल एक है, कोई दूसरा नहीं – तब ऐसा कैसे कि वह अवतार भी ले लेता है, स्वयं को प्रकट भी कर देता है और हम उसे मूर्त्ति बनाने योग्य ‘भगवान्’ भी मान लेते हैं? क़ुरान और पुराण दोनों के विचार से अलग चल देना क्या अनुचित नहीं?

कल्पना कीजिये, जब कोई करुण प्रसंग उपस्थित होता है तब क्या होता है. तब करुणावश पहले हृदय द्रवित होता है. उसके तुरंत बाद वह ‘द्रव’ आँख में अश्रु के रूप में दिखाई भी पड़ता है और टपक कर हथेली पर भी आ सकता है जिसे हम छू सकते हैं. यह क्या है? वह करुणा, हृदय का वह द्रवित होना निराकार है. इस निराकार का आकार में प्रगटीकरण ‘अश्रु’ है. बस उसी तरह अल्लाह वास्तव में है तो निराकार ही, मगर जब उसने यह ज़मीन हमें दी, पानी और हवा बनाये, सूरज-चाँद-तारे बनाये तो उसने स्वयं को ही इन आकारों में प्रकट किया. हम कैसे कह सकते हैं हमने अल्लाह को नहीं देखा?

आप क़ुरान को पुराण से भिन्न सिद्ध करना चाहते हैं जो कि है नहीं. आप “मुसलमान” “मुसलमान” इसलिए करते रहते हैं कि आप ग़ज़वा-ए-हिन्द करना चाहते है जो कि होना नहीं है. क्यों व्यर्थ सबका मगज  ख़राब करते हैं?

पार्थसारथी थपलियाल ने ठीक लिखा, नुसरत जहाँ ने ठीक किया, भागवतजी ने ठीक कहा. दुनिया इनकी है, आपकी नहीं.

14-10-2019   

“Rajneeti Mat Karo”


देश-विदेश की राजनीति पर हर तरह की चुटकी लेते रहने वाले बहुत लोग ऐसे मिलेंगे जो सोशल मीडिया पर कोई ऐसी पोस्ट मिलते ही कहने लगते हैं “No Politics”, या “राजनीति मत करो”. राजनीति को लेकर उनका यह चौकन्नापन अथवा चिंता विशेष रूप से तब बहुत फुर्ती से मुखर होती है जब कोई पोस्ट बीजेपी या मोदीजी के अनुकूल लगती हो. ज़रा गहरे पैठकर देखेंगे तो पाएंगे कि राजनीति न करने की तटस्थता-मूलक सलाह देने वाले ये मित्र प्राय: तथाकथित लिबरल, प्रगतिशील या रेशनलिस्ट टाईप के well educated नागरिक होते हैं. दरअसल इनका न राजनीति से, न मोदीजी से और न बीजेपी या आरएसएस से कुछ अर्थपूर्ण संबंध या ज्ञान होता है. इनकी यह सजगता बस इतने भर तक महदूद है कि कोई इन्हें कहीं हिंदुत्व से न जोड़ बैठे. इनका सब पढ़ा-लिखा जैसे बेकार हो जाएगा !

फिर, इन्हें किसी से ‘हिन्दू’ होने का सर्टिफ़िकेट भी नहीं चाहिये. इनके लिए तो भोजन की थाली के किनारे बैठे रहना काफी है. इतने लोग खा तो रहे हैं. उसी से इनका भी पेट भर जाना चाहिए. इस देश में जो हिन्दू हैं, उनके बीच जन्म लेना भर क्यों न काफ़ी हो ! तिस पर यह तय होना अभी बाक़ी है कि ये लोग सही मायने में लिबरल या प्रोग्रेसिव होने का पैमाना हैं भी या नहीं.

यहाँ मुद्दा यह है कि अपने हिन्दू होने को लेकर self-conscious ये लोग सोशल मीडिया की हर पोस्ट शायद बंद आँख से पढ़ते हैं. 

हिन्दुत्व कहता है पिंड में ब्रह्मांड है. यह तभी सही होना चाहिए जब पिंड अपने ‘अंड’ से बाहर आ गया हो. ‘बन्द आँख’ अंडावस्था की सूचक है जब व्यक्ति को अपने छिलके के आगे कुछ दिखाई नहीं देता. यही कारण है कि आधुनिकता के भरम में भूले इन पढे-लिखे लोगों की पूरी-की-पूरी सुशिक्षा इनके ‘अंडत्व’ को उबाल-उबालकर ठस्स बनाती चली जाती है.

मुझे यह जानने की जिज्ञासा है कि लोकतंत्र में राजनीति क्या लोकमात्र के लिए अनिवार्य नहीं है? अब तक तो माना, भारतीय जाति स्वयं का नाश होते जाने को देखने के लिए विवश थी. मगर संवैधानिक लोकतंत्र में सम्यक् राजनीति से ही भारतीय अस्मिता की रक्षा हो पायेगी. दूसरी ओर भारतीय जीवन-पद्धति से ही राजनीति सम्यक् बनेगी. तुलसीदास कह गए हैं —  ‘बिनु सत्संग बिबेकु न होई। रामकृपा बिनु सुलभ न सोई॥‘ इसी तरह सम्यक् राजनीति भी विवेकपूर्ण आचरण से ही संभव है; और वैसा आचरण सही राजकाज के बिना आयेगा कैसे? विकास तभी सधेगा जब आप विश्वामित्र हों या वसिष्ठ, दशरथ व उनके पुत्रों को अनदेखा नहीं करेंगे. ‘कोई नृप होऊ’ षड्यंत्रकर्त्री मंथरा का कथन है, वसिष्ठ का नहीं.

राजनीति क्यों नहीं करें? इन पढे-लिखों के चलते हिदुस्तानी बस सोये रहें? संविधान के अधीन स्वतंत्र सत्ता रखने वाले राष्ट्र में मतदान की ज़िम्मेदारी से शुरू हो जाने वाली राजनीतिक जाग्रति प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक उत्तदायित्व है या नहीं?

उत्तरदायित्व – sense of responsibility — वह गर्माहट है जो अंड को सेती है. तब पिंड छिलका तोड़कर बाहर निकलता और आँख खोलता है.

हमारे पुराणों में वर्णन है कि नारायण के दो पुलिसवाले थे, जय और विजय. सनकादि मुनि (जिनका नारायण भी सम्मान करते थे) जब नारायण से मिलने गये, तो जय-विजय ने उन्हें द्वार पर ही रोक दिया. 

सनकादि मुनियों के श्राप से उन दोनों ने in line of duty अपने प्राण गँवाये.

 नारायण ने उन्हें duty करते हुए मारे जाने पर, पुरस्कार के रूप में हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के नाम से जन्म दिलवाया, उनका उद्धार किया और वे पुन: वैकुंठ-निवास की अपनी हैसियत में लौट सके.   

हमारी आधुनिक पुलिस के IPS अधिकारी शेर की तरह हैं. Association भेड़ियों की होती है, शेरों की नहीं. इसीलिए प्रचलित idiom है — “A Pack of Wolves”.

साधु-साध्वियों के श्राप की शक्ति पर संदेह करना भले ‘आधुनिकता’ कहलाता हो, लेकिन याद रहे, सेब के पेड़ से फल आधुनिक युग में भी नीचे ही गिरते हैं और न्यूटन के Law of Motion की पुष्टि करते हैं. 

हेमन्त करकरे ने line of duty में जो प्राण गँवाये, उसका सम्मान करने से साध्वी प्रज्ञा ने कब मना किया? 

लेकिन हिंदू आतंकवाद स्थापित करने में जिस किसी से भी ‘जय-विजय-पन’ होगा उसे duty करने और आतंकवाद से लड़ने में जान देने पर सम्मान तो मिलेगा, लेकिन की गई राजनैतिक भूल पर, साध्वी के श्राप से भी गुज़रना पड़ेगा.

 इसमें एक ओर चुनाव आयोग का दख़ल अज्ञान का सूचक लगता है.  दूसरी ओर साध्वी प्रज्ञा के हेमंत करकरे के व्यवहार से अपने ऊपर गुज़री बताने को लेकर IPS association की आपत्ति, शेर की हैसियत से गिरकर, उनका ‘भेड़ियापन’ जैसा हो जाता है.

जिन्हें चिंता यह है कि साध्वी प्रज्ञा अपने  ऊपर torture का वर्णन अब क्यों कर रही हैं, पहले क्यों नहीं किया, उन्हें बहुत पहले ही India TV पर ‘आपकी अदालत’ का साध्वी-एपिसोड देख रखना चाहिये था. 

मेरे विचार से साध्वी प्रज्ञा को पूरा-पूरा समर्थन दिया जाना इसलिए उचित है कि ऐसा करना हेमन्त करकरे का अपमान हरगिज़ नहीं है, बल्कि भगवा या हिंदू आतंकवाद जैसी घोर-शब्दावली को मिले श्राप का नारायणीय निराकरण है.

मित्रवर श्री लोकेन्द्र शर्मा का मीडिया में अनेक दशक का अनुभव है. व्हाट्सऐप पर साध्वी-विषयक मेरे उपर्युक्त मंतव्य पर उन्होंने जो कहा, मैं नीचे ज्यों-का-त्यों शामिल कर रहा हूँ. इससे कितनी ही बातें साफ़ हो रही हैं और ज़्यादा कुछ कहने को रह नहीं जाता.  

“हेमंत करकरे के विषय पर बहुत सारी बातें कही जा रही हैं. चलिये मैं कुछ तथ्य भी रख देता हूं.

“भारतीय सेना के निर्दोष कर्नल पुरोहित को, जो आर्मी इंटेलिजेंस के कार्य में लगे थे और आतंकवादियों के समूह में इनफ़िल्ट्रेट करके जासूसी से जानकारियां एकत्र कर रहे थे. उन कर्नल पुरोहित को फँसाने वाले और फ़र्ज़ी RDX प्लांट करने वाले हेमंत करकरे ही थे. हेमंत करकरे ने ही कर्नल पुरोहित पर झूठा आरोप लगाया था कि उन्होंने सेना का RDX चुराया और इसका बम धमाके में इस्तेमाल किया.

“हेमंत करकरे एक ऐसे आईपीएस अधिकारी थे, जिन्हें पता ही नहीं था कि इंडियन आर्मी आरडीएक्स का इस्तेमाल ही नहीं करती. इसीलिए उनका झूठ पकड़ा गया और कर्नल पुरोहित निर्दोष साबित हुए.

“यह भी खुलासा हुआ कि हेमंत करकरे, सीधे कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के निर्देश पर जांच को आगे बढ़ा रहे थे, जो उनके पक्षपाती होने और कांग्रेसी इशारों पर कार्य करने वाले प्यादे के रूप में स्थापित करता है.

“हेमंत करकरे ने साध्वी ठाकुर और कर्नल पुरोहित को प्रतिदिन प्रताड़ित किया, थर्ड डिग्री दी, कर्नल पुरोहित के मात्र एक पैर में ही, 43 जगह हड्डियाँ टूटी हुई थीं, और साध्वी ठाकुर की तो मार-मार कर रीढ़ की हड्डी ही तोड़ दी गई थी.

“यह सब कुछ केवल इन निर्दोषों से झूठे इक़बालिया बयान दिलवाने के लिए किया गया. कांग्रेस का उद्देश्य था मुस्लिम वोट बैंक को प्रसन्न करने के लिए हिंदुओं के ऊपर आतंकवादी होने का ठप्पा लगा दिया जाए.

“हेमंत करकरे कांग्रेस के इसी उद्देश्य की पूर्ति में लगे हुए थे.

 “विडंबना देखिए कि जिस मुस्लिम समाज को प्रसन्न करने के लिए यह सब कुछ किया जा रहा था, पाकिस्तान से आये उसी मुस्लिम समाज के एक आतंकी ने हेमंत करकरे को गोली मार दी.

“अब यदि 26/11 आतंकी हमले में हेमंत करकरे के मारे जाने की बात करें, तो हेमंत करकरे कॉम्बैट के समय नहीं मरे थे. जीप में बैठकर परिस्थिति का जायज़ा लेने गए हेमंत करकरे, विजय सालस्कर, अशोक काम्पटे पर आतंकवादियों ने AK 47 से फायरिंग कर दी थी. केवल अशोक काम्पटे ही जीप से कूदकर उतर पाये थे और काउंटर फायरिंग की थी. बाकी सब उसी फ़ायरिंग में मारे गए थे. हेमंत करकरे को गले और कंधे पर गोलियां लगी थी जिससे वह मारे गए.

“26/11 कॉम्बैट में असली वीरता का परिचय देने वाले थे, मुंबई पुलिस कांस्टेबल तुकाराम ओंबले, जिन्होंने हाथ में मात्र एक लाठी लेकर एके-47 से गोलियां चलाने वाले अजमल आमिर कसाब को पकड़ा. अपनी छाती पर उन्होंने AK 47 का एक पूरा बर्स्ट फ़ायर झेला, इसके बावजूद अजमल कसाब को नहीं छोड़ा.

“विश्वास मानिए यदि तुकाराम ओम्बले ने कसाब को ज़िंदा नहीं पकड़ा होता, तो कांग्रेस ने 26/11 आतंकी हमले का आरोप हिंदुओं पर मढ़ दिया होता, क्योंकि सभी जेहादी आतंकवादी अपने हाथों में कलावा और गले में हिंदू भगवानों के लॉकेट बांध कर आये थे. तुकाराम ओंबले अपने प्राणों का बलिदान देकर देश के सभी हिंदुओं को आतंकवाद के कलंक से बचा गए.

“कॉम्बैट में वीरगति प्राप्त करने वाले दूसरे व्यक्ति थे, एनएसजी कमांडो मेजर संदीप उन्नीकृष्णन, जिन्होंने अपने साथियों की जान बचाने हेतु, उन्हें ऊपर आने से मना कर कहा था “ऊपर मत आओ मैं संभाल लूंगा.”

“और आज जिन कांग्रेसियों और लिबरलों को शहीदों की चिंता हो रही है, तो उन्हें बता दूं कि दिल्ली के बटला हाउस कांड में मोहन चंद्र शर्मा दिल्ली पुलिस इंस्पेक्टर भी वीरगति को प्राप्त हुए थे, आतंकवादियों से लड़ते हुए; परंतु इन सभी लिबरलों, कांग्रेसियों और कई विपक्षी पार्टियों ने बटला हाउस एनकाउंटर को फ़ेक ही नहीं कहा, मोहन चंद शर्मा के बलिदान का मजाक भी  उड़ाया था. राहुल गांधी की माँ सोनिया गांधी तो फूट-फूट कर उन आतंकवादियों के मरने पर रोई भी थी, इसकी पुष्टि स्वयं कांग्रेस नेता, भूतपूर्व मंत्री सलमान खुर्शीद ने की थी.

“अतः कांग्रेसियों से निवेदन है कि कृपया, आम जनमानस में झूठ फैलाने का कष्ट न करें कि कौन शहीद था और कौन नहीं. तथ्य और सत्य सबके सामने हैं . प्रमाण सहित उपलब्ध हैं. आम जनता को अब सत्य व झूठ में अंतर करने की समझ है,

“और अब यदि IPS एसोसिएशन की बात करें, तो उन्हें भी अधिक उछलने के बदले 14 साल की रुचिका गिरहोत्रा के यौन उत्पीड़न करने वाले IPS एस.पी.एस. राठौर के विषय में याद कर लेना चाहिए. वह भी एक आईपीएस था. और यदि हर IPS अधिकारी बुरा नहीं होता, तो हर IPS अधिकारी दूध का धुला भी नहीं होता”.

22-04-2019

Hoshiyar, Adhyatm Media Ko Tak Raha Hai


Quote me as saying I was misquoted.

– Groucho Marx

(American actor-comedian)

If you don’t read newspapers you are uninformed. If you read newspapers you are misinformed.

— Mark Twain

सूचना या समाचार के नाम से टी.वी. चैनलों पर रोज़ाना मचते हुल्लड़ को देखकर कहना पड़ेगा कि यह शोर अब राक्षसी हो गया है. इधर मित्रवर रँगीले ठाकुर ने मेरा ध्यान इस प्रश्न की ओर खींचा कि क्या मीडिया आज के इन्सानों में आध्यात्मिकता का पुट भरने के लिए थोड़ा भी योगदान दे पा रहा है? इसकी अनुमति भी रँगीले ठाकुर राजा सा’ब ने मुझे दे दी है कि जब मैं उत्तर से दो-चार हो लूँ तो वेब पर उपलब्ध उनके लघु वक्तव्य को भी इस लेख में शामिल कर लूँ.

आम तौर पर हम संगठित धर्मों को आध्यात्मिकता का दर्जा देने की भूल करते हैं. मंदिरों, मस्जिदों, गिरजों में बैठी भीड़ देखकर सोचते हैं, कितने आध्यात्मिक लोग हैं ! जबकि यह भीड़ शायद ही कभी आध्यात्मिक आचरण करती हो!

आध्यात्मिकता हमारे अंतर्लोक में निवास करती है और अस्तित्त्व के एक अलग ही धरातल पर ध्यान केन्द्रित करती है. ब्रह्मांड की समरस ऊर्जा से जुडने का नाम अध्यात्म है. यह ‘समरस ऊर्जा’ उस वाद्यवृंद व्यवस्था की तरह है जिसमें अलग-अलग साज़ होते हुए भी एक ही सुमधुर संगीत-रचना निकल कर आती है. अपनी जीवन यात्रा में मिले तरह-तरह के अनुभवों को बीनते-छानते जब हम विश्व-व्यापी समरस ऊर्जा से ‘स्व’ को संश्लिष्ट कर लेते हैं तब कहीं जाकर ऐसा लगता है कि हम आध्यात्मिकता की दहलीज़ पर जा खड़े हुए हैं. उसके पहले कैसे कहें कि कोई आध्यात्मिक है?

अंतर्लोक से भिन्न बहिर्लोक में आयें तो पायेंगे कि मीडिया इसलिए बना था ताकि वह लोक-समुदाय के बड़े हिस्से के साथ संपर्क व संचार का एक प्रमुख माध्यम बन सके. एक खाके के रूप में अर्थात् शब्द-प्रयोग अथवा हाव-भाव के बिना सम्प्रेषण तो गुफ़ा-युग की पेंटिंग, चित्र-लिपि अथवा नक्शों से ही शुरु हो गया था. किन्तु आज के दौर में इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए सामान्यतः काम में लिये जा रहे जाने कितने आधारभूत साधन हो गए हैं – समाचार-पत्र, पत्रिकायें, रेडियो, टेलिविज़न, सिनेमा, रेकॉर्ड हुआ संगीत (विनाइल रेकॉर्ड, मेगनेटिक टेप, कैसेट, कार्टरिज, सी.डी., डीवीडी), इंटरनेट, मोबाईल हेंडसेट, स्पेस रेडिओ आदि प्लैटफ़ार्म ! लगभग सभी लोग मीडिया की ओर इसलिए तकते हैं कि वे उन्हें सूचित रखेंगे, शिक्षित करेंगे और साथ ही उनका मनोरंजन भी करेंगे क्योंकि उनका लक्ष्य निर्धारित किया गया था — to inform, to educate, to entertain.

इन उद्देश्यों के मद्देनज़र एक साधारण सी पारिभाषिक शब्दावली बनाई गई – जन माध्यम – mass media. इस साधारण लगने वाली शब्दावली में बेशुमार संस्थाएं और व्यक्ति समाये हुए हैं जिनके अपने-अपने लक्ष्य और साध्य हैं, भिन्न-भिन्न कार्य-क्षेत्र हैं, अलग-अलग तौर-तरीके हैं, और तदनुसार हरेक का अपना सांस्कृतिक संदर्भ है जिसके अनुकूल बने रहकर उन्हें mass media का उपयोग करना रहता है. जन-माध्यम में किसी भी तरह की सूचना हो सकती है जो सीमित अथवा विस्तृत जन-समूह तक पहुँचानी होती है – कभी हस्तांकित संकेतों में तो कहीं अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ नेटवर्क के द्वारा ! इसका कोई बना-बनाया माप-तौल या पैमाना नहीं हो सकता कि टारगेट श्रोता-दर्शकों की कितनी संख्या होने के बाद कोई कम्यूनिकेशन mass communication हो जायेगा अन्यथा नहीं हो पायेगा ! इसका भी कोई बंधन नहीं है कि प्रस्तुत की जा रही सामग्री किस तरह की हो ! जींस का एक विज्ञापन भी mass communication का ही उदाहरण है और संयुक्त राष्ट्र के किसी प्रस्ताव का विस्तृत ब्यौरा भी. यही कारण है कि जन माध्यम इतने सब प्लैटफ़ार्म के रूप में हमें उपलब्ध हैं.

इलेक्ट्रोनिक मीडिया में सूचना रेडियो या टेलिविज़न के माध्यम से प्रेषित होती है. इसमें भी लो-पॉवर ट्रांसमीटर (LPT) या Very Low Power ट्रांसमीटर (VLPT) शिक्षा प्रदान करने के काम आते हैं, जैसे कि किसी युनिवर्सिटी के कैम्पस से प्रसारण. कुछ लोग इस लो-पॉवर प्रसारण को narrowcasting मानने की भूल कर बैठते हैं, जबकि यह भी ब्रॉडकास्टिंग ही है. Narrowcasting मनोरंजन व सूचना देने के काम आता है, जैसे कि केबल टीवी.

डिजिटल मीडिया का काम है इंटरनेट और मोबाईल संचार नेटवर्क पर सूचना प्रदान करना. डिजिटल मीडिया में संचार-साधन और सूचना-सम्प्रेषण के लिए वेबसाइट, ब्लॉग, ई-मेल, एस.एम.एस./एम.एम.एस., इंटरनेट रेडियो और टेलीविज़न आदि का इस्तेमाल होता है. डिजिटल मीडिया के अंतर्गत एक अन्य साधन है ‘ऑग्मेंटेड रिएलिटी’ (AR) जो अभी अधिक प्रचलित नहीं है. इसमें स्थूल जगत के परिवेश को उसके ‘वास्तव’ में साक्षात् अथवा परोक्ष रूप से अनुभव करने के लिए कम्प्यूटर से काम लिया जाता है और उस परिवेश को ‘संवेदन’ के साधनों (sensory inputs) जैसे कि ऑडियो, वीडियो या ग्राफ़िक्स का उपयोग करके ‘ऑग्मेंट’ अर्थात् विस्तीर्ण (enlarge) या अभिवृद्ध (enhance) कर लिया जाता है. डिजिटल प्लैटफ़ार्म के रूप में AR दिव्यांगों को सूचना प्रेषित करने के लिये बहुत उपयोगी है.

प्रिंट माध्यम अपनी-अपनी सूचना प्रेषित करने के लिए स्थूल साधनों का प्रयोग करते हैं, जैसे कि अख़बार, पत्रिका, पुस्तक, पैमफ्लेट, कॉमिक्स आदि.

फिर हमें ‘आऊटडोर मीडिया’ भी उपलब्ध है, यथा, संकेत-चिह्न (symbols), प्लैकार्ड, सूचना-पट आदि. इन्हें सड़कों, व्यावसायिक इमारतों, हवाई अड्डों, खेल के स्टेडियमों, बसों, ट्रेनों आदि पर देखा जा सकता है. ‘ब्लिम्प’ अर्थात् लचीला छोटा वायुयान भी (जैसा जेम्स बॉण्ड फ़िल्म ‘A View To A Kill’ में ‘Zorin’ नाम की कम्पनी इस्तेमाल करती थी) ‘आऊटडोर मीडिया’ का अच्छा उदाहरण है. ‘Skywriting’ (उड़ते हुए हवाई जहाज़ से आकाश में विशेष प्रकार के धुएँ से पढ़ी जा सकने योग्य लिखावट) भी खुली हवा में प्रयुक्त संचार-माध्यम का एक अन्य रूप है.

इतनी बड़ी संख्या में प्रभावशाली माध्यमों के बीच मीडिया कोई भी हो, ये सभी किसी न किसी तरह ‘शिक्षा’ का ही विस्तार हैं. ‘शिक्षा’ स्कूल-कॉलेज-युनिवर्सिटी की हो या सूचना-प्रसारण के रूप में हो, उसे इस बात का ध्यान रखना अपरिहार्य है कि धन की कमाई का लोभ उसका अपहरण न कर ले ! न्यूज़-मीडिया तो हरगिज़ इसका अपवाद नहीं है. दोनों ही रूपों में ‘शिक्षा’ में इसके विपरीत होते देखना क्षुब्ध-क्रुद्ध कर देने वाला है. उस समय तो यह बहुत नागवार गुज़रता है जब आपको शीघ्र ही घर से निकलकर कहीं जाना है या किसी दूसरे काम के लिए थोड़ी देर के लिए टी.वी. के आगे से हटना है, और आप चलते-चलते जल्दी से न्यूज़-हेडलाईन से ‘सूचित’ हो लेने का उपक्रम करते हैं. मगर ‘ईडियट बॉक्स’ है कि आपको अनन्त प्रतीक्षा में खड़ा रखकर मज़ा लिये जा रहा है ! दस-दस मिनट तक वही-वही विज्ञापन स्क्रीन से आपको घूरे चले जा रहे हैं ! ये टीवी चैनल सूचना-सम्प्रेषण का अपना धर्म निबाह रहे हैं या आपकी घोर उपेक्षा करके पैसे के पीछे पगला रहे हैं ? अधिकांश विज्ञापनों के स्तर और कथ्य की गुणवत्ता की तो बात ही न करें ! कुछ विज्ञापन तो ऐसे हैं कि उन्हें देखने के बाद आप ब्लू-फ़िल्म देखें तो लगेगा कि यह भी शायद महर्षि वात्स्यायन की कृति का विज्ञापन होगा ! पत्र-पत्रिकाओं को ही देख लीजिये. व्यावहारिक सत्य तो यही है कि महिलाओं की हर पत्रिका महिलाओं के कितना काम आती होगी मालूम नहीं, मगर पुरुषों की आँखों के लिए सुसज्जित भोज अवश्य है, a feast for male eyes! और मज़े की बात यह कि यह सब ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ की आड़ में चलता रहता है. मीडिया इसलिए तो हरगिज़ नहीं था कि इस तरह लोभ का फंदा गले में डालकर आत्म-तुष्टि की राह चल पड़े ! इस तरह कमाये गए धन का कितना अंश नीति-सम्मत है, आप स्वयं फ़ैसला कर लें !

जैसे हम धर्मों को अध्यात्म मान लेते हैं, वैसे ही हम मीडिया को ऐसा ‘गुरु’ मान बैठते हैं जो हमें सही-सही सूचना-मार्ग दिखला रहा है. किसी भी प्रकार का मीडिया – अपने प्रत्येक स्वरूप में – प्रिंट माध्यम से लेकर रेडियो से लेकर टीवी से लगाकर सिनेमा तक, और ट्विटर, फ़ेसबुक या व्हाट्सऐप के सोशल मीडिया तक ऋषि-चेतना युक्त गुरु नहीं, मात्र एक साधन – एक tool है. ये सारे औज़ार मानस से मानस के आपसी सम्पर्क का माध्यम हैं. हम चाहें तो इस tool का इस्तेमाल चतुर्दिश विध्वंस के लिए कर लें और चाहें तो समूचे विश्व को शांति के एक सूत्र में पिरोने के लिए कर लें. अंततः सब कुछ केवल हम पर निर्भर है. जिस तरह के ‘हम’ ये धर्म अपने आप में या सब धर्म मिलकर तैयार कर पाये हैं, क्या हमें उन सब की गंभीरतापूर्वक जांच कर देखना उचित नहीं होगा? आख़िर यही वे लोग हैं जो अंततः ‘मास मीडिया’ का संचालन अपने हाथ में लेते हैं. क्या ये लोग मीडिया के इन अत्यंत शक्तिशाली tools पर हाथ रखने के लिए भरोसेमन्द इंसान हैं? ख़ास तौर से तब जबकि हम मीडिया के डी.एन.ए. में जो पाते हैं उसे लेकर चिंतित होने के कारणों से घिरे हुए हैं?

सूचना-सम्प्रेषण के क्षेत्र में हुए क्रांतिधर्मी विकास ने अब यह संभव कर दिया है कि हम विश्व के किसी भी कोने में बैठे मनुष्यों के साथ तुरत-फुरत सम्पर्क बना सकते हैं. इस कारण वर्त्तमान ‘मास-मीडिया’ में सार्वजनिक कल्याण का साधन बन सकने की भरपूर संभावनाएं निहित हैं. मास मीडिया के माध्यम से हम बहुत अधिक भिन्नता वाले समाजों तथा तरह-तरह की सांस्कृतिक या धार्मिक पृष्ठभूमि वाले मनुष्यों के बीच संवाद स्थापित कर सकते हैं, उनमें पारस्परिक सहभागिता और सहयोग का भाव उपजा सकते हैं, और इस तरह मानव-एकात्मता को मज़बूत बनाने की दिशा में काम कर सकते हैं. इसमें संदेह नहीं कि मीडिया के पास सूचना, शिक्षा और मनोरंजन के वास्तविक-मौलिक साधन के रूप में ऐसी प्रचुर संभावनायें मौजूद हैं जो न केवल सामाजिक मूल्यों की सृष्टि व स्थापना करें, बल्कि उन परिकल्पनाओं को भी अपने स्पर्श से प्रभावित कर लें जिनसे पता चलता है कि हम से नितांत भिन्न चरित्र वाले समुदाय हमारे बारे में क्या धारणा बनाकर चलते आये हैं. मनुष्यों को जोड़ने में इससे बड़ी भूमिका और क्या होगी?

भारत के संदर्भ में देखें तो हम पाएंगे कि इस क्षेत्र में सिनेमा और रेडियो ने अद्भुत भूमिका निभायी है. अब यह श्रेय बड़े परिमाण में रेडियो से हटकर टीवी को प्राप्त है, मगर यह सोच-सोच कर सिर चकरा जाता है कि टीवी के समाचार चैनल आख़िर कर क्या रहे हैं ! उदाहरण के लिए, ये न्यूज़ चैनल कम से कम अपने रोज़ाना प्राइम टाईम शो में देश के नॉर्थ-ईस्ट के विभिन्न राज्यों से एक प्रतिभागी अनिवार्य रूप से शामिल क्यों नहीं करते? ऐसा करना क्या इन चैनलों को आर्थिक रूप से इतना unproductive लगता है कि मोटी कमाई के अनुपात में उन्हें मंहगा पड़ता है? या फिर उत्तर-पूर्व का ध्यान रखना सिर्फ़ सरकार का काम है और देश के लोगों को जोड़ने में मीडिया की कोई भूमिका नहीं है? क्या ये केवल ‘मीडिया-माफ़िया’ बनने और शेख़ी बघारने भर को हैं? अधिकांश न्यूज़-मीडिया दिल्ली में स्थित हैं, इसके बावजूद इन्होंने दिल्ली और उत्तर-पूर्वी भारत के लोगों की दिली दूरी कम करने के लिए अब तक क्या किया?

भारत का न्यूज़ मीडिया शायद यह मुगालता पाले बैठा है कि लोग स्वयं यह निश्चय करके चलते हैं कि क्या देखना, सुनना, सोचना, पढ़ना है. वे मानते हैं कि मीडिया का इस निर्णय को प्रभावित करने में ‘शून्य’ के बराबर रोल है. इसलिए उन्हें तो केवल अपने तुमुल कलह-कोलाहल को प्रसारित भर करते रहना है, दिन भर की कमाई को जेबों में ठूँसना है और बैंक की दिशा में देखकर मुसकुराना भर है !

ये टीवी चैनल इस तथ्य की धज्जियाँ खुले आम उड़ा रहे हैं कि दरअसल वे समाज-निर्माण का बेहद ताक़तवर औज़ार हैं. ये भूल गए हैं कि यह बृहत् शक्ति अपने साथ मीडिया-कर्मियों के लिए उतनी ही भीमकाय ज़िम्मेदारी भी लेकर आती है जिसका संबंध सत्य, न्याय, आपसी भरोसा-विश्वास, शान्ति, अहिंसा और मानवीय एकात्मता जैसे मूल्यों को स्थापित करने से है. मीडिया-कर्मियों और उनके उपभोक्ताओं (दर्शकों) दोनों को एक बात अच्छी तरह जान रखनी चाहिए कि आधुनिक संचार माध्यम – प्रेस, टेलीविज़न, रेडियो, इंटरनेट अपने आप में मनुष्य के अद्भुत आविष्कार हैं, इसलिए इनके माध्यम से प्राप्त समाचार, सूचना, मनोरंजन आदि कुछ भी (मानवीय) मूल्यों से शून्य नहीं हो सकते. हमें यह जानना और न भूलना भी वांछित है कि आधुनिक समाज में सूचना का प्रसारण और मनोरंजन का विकीर्णन किसी न किसी तरह मीडिया को नियंत्रित करने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों के ‘झुकाव’ के मुताबिक सिद्धान्त घड़कर चलता है. हम इस ओर से इतमीनान करके कैसे बैठे रह सकते हैं कि हमें मिल रहे मनोरंजन या संचार के पीछे कोई पूर्व-निर्धारित मान्यता नहीं है, कोई राजनैतिक, सांस्कृतिक, वैचारिक, सैद्धान्तिक या आर्थिक परिकल्पना नहीं है? वे तो बस पूरे-पूरे objective हैं? अपने इस ‘भोलेपन’ का लाभ हम इन चैनलों को क्यों उठाने दें?

यह तथ्य भारतीय मीडिया के इस आचरण से उजागर हो जाता है कि वह इसे नियंत्रित कर रहे अत्यल्प ‘भद्रलोक’ के जीवन-दर्शन मात्र को व्यक्त और पुष्ट करता है. व्यावसायिक घरानों – corporate houses – को चलाने वाले व्यक्ति ही अमूमन मीडिया का संचालन करने वाला भद्रलोक हैं. इन चैनलों को यह चिंता ज़रा भी नहीं है कि जब यह मालकीयत चंद लोगों के पास हो तो जन-साधारण के दिलो-दिमाग़ की धड़कन-धबकन में जोड़-तोड़ करना इन्हीं इने-गिने लोगों के हाथ में चला जाता है. वे निर्धारित करने लगते हैं कि दुनिया क्या देखे, क्या सुने-समझे ! उदाहरण के लिए, ये मालिक लोग उस स्टोरी को बड़ी आसानी से दबा सकते हैं, या उससे आँख चुरा सकते हैं जो एक व्यावसायिक घराने या सरकार के किसी प्रकार के अनैतिक आचरण से संबन्धित रही हो, और इस तरह अपने ख़ुद के आचार-विचार या किसी हरकत के लिए इस या उस व्यावसायिक प्रतिष्ठान अथवा राजनैतिक दल को ज़िम्मेदार सिद्ध कर सकते हैं. इन चैनलों पर रात-दिन किसी न किसी को ‘बेपरदा’ करने या ‘भ्रष्ट’ सिद्ध करने का जो शोर-शराबा मचा रहता है उससे यह सत्य सिद्ध ही नहीं पुष्ट भी होता है. जिस तरह ये चैनल अपनी बहसों की व्यवस्था करते हैं और जिन शब्दों व शैली में सवाल उठाते हैं उससे इनकी नीयत में क्या था, साफ़ पता चल जाता है. ये किसी को इनके ‘कथ्य’ के सत्य पर यकीन तो क्या दिलाएंगे, स्वयं की निष्ठा भी स्थापित नहीं कर पाते क्योंकि इनका पूर्वाग्रह इनके हर शब्द में से झाँक रहा होता है. इनका यह उपक्रम ‘सूचित’ कम करता है, दर्शकों को कुढ़न से भर और जाता है.

यह बात तब खास तौर पर सच साबित होती है जब इन चैनलों की ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ किसी संघर्षपूर्ण ब्यौरे अथवा टकराव की स्थिति पर आधारित होती है. ज़्यादातर चैनलों में मुख्य समाचार अपराध की ताज़ातर सूचना से बनता है – किसी हत्या, गिरफ़्तारी, स्कैंडल आदि से. या फिर कोई विनाशक सुनामी हो, कोई आतंकवादी हमला हो तब बनता है. टकराव, उठा-पटक और आपाधापी से भरी ये ख़बरें, श्रोता, दर्शक अथवा पाठक को मीडिया तक खींच लाती हैं. यह संघर्ष जितना बड़ा होगा, दर्शक और श्रोता उतने ज़्यादा होंगे. श्रोताओं-दर्शकों की भारी संख्या का मतलब है ज़्यादा टी.आर.पी., जो कि मीडिया के बाज़ार की आर्थिक-व्यावसायिक सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक है. इसलिए मीडिया का हित इसमें है कि वह टकराहटों की ख़बरें बताते भी रहें और बढ़ा-चढ़ाकर उन्हें दोहराते भी रहें ताकि कोई घटना जितनी वास्तव में गंभीर थी उससे कहीं अधिक चिंताजनक लगने लगे. निरंतर news-fall चूँकि असंभव है, इसलिए वे अकसर ख़बरें घड़ते भी हैं (fake news), जो कि अपने आप में मीडिया-धर्म का सबसे घोर पाप माना गया है. तथापि, वह ख़बर ही क्या जो बिक न सके !

बड़े से बड़े संघर्ष में भी उसे सुलझाने के प्रयास हमेशा शुरू हो जाते हैं जो दीर्घावधि होने की वजह से बहुत धीमे होते हैं और उनका अंदाज़ भी ‘ड्रामाई’ नहीं होता. समस्या के समाधान की यह प्रक्रिया बहुत बार समझने में मुश्किल भी होती है, रिपोर्टिंग के लिए आसानी से उपलब्ध भी नहीं होती, और प्राय: मीडिया की निगाहों से दूर भी रखी जाती है. इसलिए समाधान वाली ये ख़बरें कितनी भी ‘पॉज़िटिव पब्लिसिटी’ का सामान क्यों न हों ज़्यादातर बुहारकर एक तरफ़ सरका दी जाती हैं और सबसे ताज़ातरीन संघर्ष के अधिक से अधिक चुस्की लेने लायक और घनघोर रूप से दहलाने वाले पहलू को ख़बर बनाकर पेश करने के लिए रास्ता साफ़ किया जाता है. जो मीडिया के इस चलन को समझते हैं वे मीडिया के केंद्र में आना और उसका लाभ लेना जानते हैं. कोई व्यक्ति या संगठन देश-हित और मानव-कल्याण में है ऐसा अकसर तो होता नहीं, ख़बरें ज़्यादातर बुरे लोगों से ही बना करती हैं. यही वह केंद्र-बिन्दु है जो मीडिया की सबसे बड़ी चुनौती है और जो सनसनी उत्पन्न करने के लोभ और लोगों को मूर्ख बना ले जाने या गुमराह करने की वृत्ति के पीछे खड़ी है.

इतने सब के बावजूद मीडिया का साम्राज्य अखण्ड है, क्योंकि इसके बिना दैनंदिन जीवन में लोग अपने पड़ोसी से आगे की किसी घटना के बारे में कैसे जान पाएंगे? अपने परिवार और मित्र-वर्ग के दायरे से कोई व्यक्ति जितना आगे निकलता है घटनाओं से अवगत रह पाना उतना ही समय और धन खपाने वाला होता जाता है. ड्राइंग रूम में रखा टीवी, सुबह घर की दहलीज़ पर पड़ा अख़बार, कार में लगा रेडियो, जेब में रखा स्मार्टफ़ोन और काम की मेज़ पर रखा कम्प्यूटर कुछ ऐसे मीडिया-माध्यम हैं जो हमें दिन-प्रतिदिन की ख़बरों, विज्ञापनों, बन-मिट रही opinions – धारणाओं, अभिमतों – से परिचित करवाते रहते हैं, संगीत सुनाते हैं, तथा मास-मीडिया के अन्य साधनों का भी लाभ लेने को प्रेरित करते हैं.

मीडिया के इन गुणों के संदर्भ में भारतीय चैनलों से यह ध्यान रखना अपेक्षित है कि जिस तरह हमारे यहाँ भरपूर शिक्षा (साक्षरता) मूलतः विचार-पद्धति का पाश्चात्यीकरण है, उसी तरह मीडिया की उपयोगिता के ये अवयव किसी औद्योगीकरण वाले अत्यंत विकसित समाज का चित्र अधिक उकेरते हैं, कृषि-प्रधान जीवन-शैली का कम. निश्चय ही हमारे मीडिया की विश्वसनीयता तब और बढ़ेगी जब भारत जो और जैसा है उसे स्वीकार करके अपने को ढालने में वह रुचि लेगा और देशवासियों को विश्वास में लेने के लिए काम करेगा. पाश्चात्य विकास को आदर्श मानकर किसी न किसी बहाने भारत और भारतीयों को शर्मिंदा किए जाने की आदत मीडिया के प्रति अधिकांश लोगों की अरुचि का बड़ा कारण बन गया है. पश्चिमी जीवन और विचार की ‘श्रेष्ठता’ स्थापित करने के प्रयत्न में भारतीय मीडिया केवल उन ताक़तों के आर्थिक हितों को मज़बूती दिये चला जा रहा है जो इस देश में नहीं देश के बाहर मौजूद हैं, और जिनकी रुचि ‘अस्थिर देश’ में news-fall पैदा करते रहने में है. फलस्वरूप भारत के अधिकांश लोग भले ग़रीबी-रेखा से जूझते रहें, मगर मीडिया को हुक्म देने वाले आक़ाओं की आज्ञानुसार अपने स्वरूप का संचालन करने का भरपूर पारिश्रमिक इन्हें मिलता रहता है.

लगता है भारतीय मीडिया को भारतीय अस्मिता – ‘गोपाल’ अस्मिता की– जो उत्पादकता का मूल है, कृषि-धर्मी पहचान के प्रति अपने उत्तरदायित्त्व की कोई चिंता नहीं है. तिस पर ये भारतीय भाषाओं का जो सत्यानाश करते हैं वह बतलाता है कि इनके ऐंकर साक्षर तो हैं, शिक्षित नहीं !

लुटिएन दिल्ली ने देश की जो लुटिया डुबोई है, उसी लुटिएन दिल्ली और उसके आसपास अंगद का पाँव बना मीडिया भारतीय भाषाओं और भारतीय अस्मिता को लेकर अवश्य आपत्ति उठा सकता है क्योंकि उनके अनुसार ये मात्र उन्मादी देशभक्ति – jingoism के सूचक हैं. उन्हें मीडिया कम्यूनिकेशन का एक सीधा-सा सिद्धान्त ध्यान में रखना ज़रूरी है कि प्रस्तुतीकरण की छोटी सी गलती भी श्रोता या दर्शक को अचकचा सकती है. कोई ऐसा दर्शक हो सकता है जिसे अच्छी भाषा पसंद है, कोई संगीत की खातिर रेडियो या टीवी ऑन करने वाला हो सकता है, बहुत से ऐसे होंगे जो खेल जगत के दीवाने हों, या फिर कोई अकादमिक मिजाज़ का हो सकता है, किसी को चिकित्सा व ओषधि में या विज्ञान में दिलचस्पी हो सकती है जिसके लिए उसने रेडियो या टीवी पर भरोसा किया. ये भले ही इन चैनलों से कभी संपर्क न साधें, मगर हैं ऑडिएंस ही. आपकी तथ्यों में गलती या भाषा के भ्रष्ट उपयोग से क्या इनकी अन्तरात्मा को कष्ट नहीं होता होगा, विशेषतः अगर इनमें कोई जानकार व्यक्ति बैठा हो? एक – मात्र एक भी श्रोता या दर्शक को तकलीफ़ पहुंचाने का किसी मीडिया को कोई अधिकार नहीं है. ज़िम्मेदारी का अहसास उस ‘एक’ से ही शुरू होता है ! वरना निश्चित है कि आप माने बैठे हैं लोग मूर्ख हैं और आप जो भी परोसेंगे वे निगल लेंगे ! आपको किसी भी भाषा का अशुद्ध उच्चारण क्यों माफ़ किया जाये, या शास्त्रीय संगीत में राग का नाम गलत बताना, या किसी आयुर्वैदिक जड़ी-बूटी की अनाप-शनाप जानकारी क्यों माफ़ की जाये? आप कुछ भी घिनौनापन करते रहें और लोग बर्दाश्त करते रहें ! क्यों? आपका साफ़-सुथरा दिखना आपका पाखण्ड नहीं तो और क्या है, जबकि आपकी यह जुर्रत कि ऑडिएंस में से किसी को jingoistic तक कह डालें ? जब तक आप विदेशी टुकड़ों पर पलेंगे आप ऑडिएंस का सम्मान करना नहीं सीखेंगे !

ग़ौर कीजिये, इन तथ्यों के चलते क्या Television Rating Point (TRP) की धारणा वाक्छल या मात्र शाब्दिक खिलवाड़ नहीं रह जाती? क्या मीडिया ने कभी यह जानने की कोशिश की कि उन्हें देख रहे लोगों में से कितने उनपर दुनिया की हर भाषा में उपलब्ध छंटी हुई गालियों की बौछार कर रहे होंगे? गाली खाकर भी TRP? अगर यह सच नहीं तो ये चैनल टीवी स्क्रीन से जितनी उपेक्षा दर्शक-समूह पर बरसाये चले जाते हैं, TRP उसका नाम होता होगा ! और विज्ञापन बेचने वालों को इसकी चिन्ता क्यों नहीं कि देखें, कहीं गुस्से से भरे लोगों में उनके उत्पाद के प्रति विद्रोह तो सिर नहीं उठा रहा? कहीं विज्ञापनकर्त्ता और चैनल ‘मौसेरे भाई’ तो नहीं? कि गाल पर भले जूते की छाप लगा दो, मगर पैसे दे दो !

फिर उन crawlers को क्या कहा जाये जो स्क्रीन के निचले हिस्से में बाएँ-दायें रेंगे चले जाते हैं ? बोला कुछ और जा रहा है और रेंग कुछ और ही रहा है ! ऐंकर बता रहा है, ‘नेता दिल्ली लौटा’, और नीचे रेंग रहा है – ‘दिल्ली में भूकंप के झटके’ ! जिसे समन्वय कहते हैं – coordination – उसके कहीं पते नहीं ! तभी घाव पर नमक छिड़कती एक स्लाईड भी प्रकट हो जाती है जो मूल ‘विंडो’ को आधा कर देती है ! ये ‘Presstitute’ पैसे के लिए कुछ भी करेंगे. ( यह शब्द घड़ा तो था अमेरिकी पूर्वानुमान-कर्त्ता गेराल्ड सेलेंट ने, बदनाम किये गए जनरल वी.के. सिंह !) सौ बात की एक बात, जिस व्यक्ति, समूह या संगठन में पैसे की खातिर कुछ भी कर गुज़रने का माद्दा प्रवेश कर जाए, वह भरोसे के काबिल नहीं रहता ! लगता है, वक्त आ गया है कि हम कह दें — “मिस्टर मीडिया, हमें आपकी ज़रूरत नहीं, क्योंकि आपको बस पैसे की ज़रूरत है.”

मीडिया के उस नीति-वाक्य का क्या हुआ – ‘It is a crime to start an item late, but a sin to start an item early’ ? इस नियम का शीलभंग करने वाले मीडिया को हम अपराध और पाप दोनों करते देख सकते हैं.

मीडिया को लोकतन्त्र का ‘चौथा स्तम्भ’ कहा गया है. दरअसल अठाहरवीं शताब्दी के ब्रिटेन में पहले वकीलों को ‘चौथा स्तम्भ’ कहा जाता था. बाद में किंग की सत्ता से अलग Queen Consort के स्वतंत्र ‘संघ’ को एक बाधा-मुक्त एजेंट की तरह काम करने का ज़िम्मा दिया गया और उसे लोकतन्त्र के हितों की रक्षा करने वाला ‘चौथा स्तम्भ’ माना जाने लगा. इसके बाद बारी आयी वेतनभोगी सर्वहारा — Proletariat — वर्ग की जो ‘चौथा स्तम्भ’ का यह दर्जा पा गए. अंततः हाऊस ऑफ़ कॉमन्स की एक बहस में आयरिश सांसद एडमंड बर्क ने कहा कि लोकतन्त्र का ‘चौथा स्तम्भ सही मायने में कोई है तो वह ‘प्रेस’ है. तभी से पत्रकारिता को, और अब मीडिया को ‘चौथा स्तम्भ’ कहने की परंपरा चली आ रही है. यह परम्परा अब अपने को अंतिम आदर्श मानने — self-idealization – की हद तक जा पहुंची है. इसलिए यह सही समय है जब हमें चौथे स्तम्भ का यह तमगा मीडिया के वक्ष से उतारकर सिनेमा को दे देना चाहिए, क्योंकि यह भूमिका हर तरह से सिनेमा ने कहीं बेहतर ढंग से निभा कर दिखा दी है.

भारतीय समाज के जिस ‘भोलेपन’ की चर्चा पहले भी की गई थी, यह हमारी वही सादगी है कि हम ‘बायस्कोप’ के आकर्षण से अधिक और मीडिया के कथ्य और शैली की हमारी अनुकूलता से कम प्रभावित होकर टीवी देखते हैं. फिर भी टीवी देखते ज़रूर हैं. जिस दिन भारतीय समाज की समझ में बैठ गया कि बहुत हुआ बायस्कोप, उसी दिन यह मीडिया औक़ात पर आ जायेगा.

सूचना का यह भी अर्थ है कि लोकतन्त्र में लोगों की चुनी हुई सरकार जन-साधारण को लोक-कल्याण की अपनी योजनाओं के बारे में बताये, पूरा विवरण दे और अपनी नीतियों को जनता की कसौटी पर कसे. मीडिया को इस प्रक्रिया का वाहक बनना होता है. सरकार और जनता के बीच की महत्त्वपूर्ण कड़ी मीडिया ही है. यहाँ तक कि सरकार की नीतियों की आलोचना में भी मीडिया को जन-संगठन और सरकार दोनों की अंतश्चेतना को जगाकर रखना होता है. Conscience-keeper की तरह काम करना होता है. तभी मीडिया राष्ट्र-निर्माण में अपनी भूमिका को वहन करने वाला कहा जाएगा. ऐसा तो तभी हो सकेगा जब मीडिया सनसनी पैदा करने की वृत्ति से मुक्त होगा. मगर ऐसा होता नहीं.

ऐसा होने के लिए यह भी देखना होगा कि एक सार्थक कड़ी बनने की प्रक्रिया में मीडिया अपने देश के लोगों से कितना जुड़ाव महसूस करता है. उत्तर-पूर्व के भारत की उपेक्षा का जायज़ा तो हमने लिया ही है, कुछ और बातों की परीक्षा भी करके देखते हैं.

2008-09 में तत्कालीन भारत सरकार ने कर-व्यवस्था से अपने व्यय के बराबर धन उगाह पाने में सफल न होने पर ‘उधार’ लेने – market borrowing में बढ़ोतरी कर दी थी. इसमें देश के धनिकों से लेकर वर्ल्ड बैंक तक किसी से भी ऋण लेने का प्रावधान है. इसका परिणाम यह हुआ कि कुछ ही वर्षों में सार्वजनिक ऋण में लगभग ₹3,00,000 करोड़ की वृद्धि हो गई. मार्च 2010 तक यह ऋण बढ़कर ₹3406322 करोड़ का आसमान छू गया. यह 2008 के पहले की घोषित रकम से दोगुना था. औसतन हर हिन्दुस्तानी के दस महीने की आय के बराबर का ऋण उसके सिर पर बताया गया. उस समय की कुल जनसंख्या का औसत निकालने पर यह ऋण इस तरह ब्यान किया गया : “हर हिन्दुस्तानी के खाते में 32871.65 का क़र्ज़ है.”

फ़रवरी 2012 में सीबीआई के डायरेक्टर ने सूचित किया था कि विदेशी बैंकों में भारतीयों का 500 बिलियन डॉलर काला धन जमा है, जो किसी भी अन्य देश से कहीं अधिक है. अगले ही महीने, यानी मार्च 2012 में भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि सीबीआई डायरेक्टर का यह बयान वही था जो हमने जुलाई 2011 में सुप्रीम कोर्ट को बताया था.

बोलचाल की हिन्दी में इस पूरे काले धन की वापसी को कैसे कहा जायेगा? 15-15 लाख हर हिंदुस्तानी के खाते में होगा”. इसमें बैंक खाता कहाँ से घुस गया?

मज़े की, बल्कि हैरतअंगेज़ बात यह है कि न्यूज़ चैनलों के ऐंकरों ने सही-सही बात कहकर मतलब समझना ऑडिएन्स पर न छोड़कर चुनावी सभा के भाषण के बाद से अपने बैंक खाते में 15 लाख का इंतज़ार करना और लोगों को बताना शुरु कर दिया कि मैं इंतज़ार कर रहा हूँ ! शायद प्रधानमंत्री बनने के बाद स्वयं नरेन्द्र मोदी ने इस पर कोई सफ़ाई इसलिये नहीं दी ताकि हम न्यूज़ चैनलों की समझ और नीयत दोनों की परख ख़ुद कर देखें.

जब सरकार ने ‘प्रधानमंत्री बीमा योजना’ घोषित की तो इन्हीं चैनलों ने लोगों को यह बताना शुरू कर दिया कि उनका पैसा बीमा अवधि के बाद कैसे डूबने वाला है ! यदि कोई अपने यहाँ काम करने वाली बाई के जन-धन-अकाऊंट में 12 रुपया हर साल जमा करता है और साल भर तक बाई पर ऐसी कोई आफ़त नहीं आती कि उसे बीमे का लाभ लेना पड़े और 12 रुपया प्रतिवर्ष lapse हो जाता है, तो ग़रीबों के लिए जो करोड़ों रुपया सरकार के पास जमा हुआ और जिन पर आफ़त पड़ी उनके काम आया तो कुछ बुरा हुआ क्या? मगर इस तरह तो वही सोच पायेगा जिसका जुड़ाव देश के आम लोगों से होगा. यह तो सही है कि ज़बरदस्ती सरकार की तारीफ़ करने की बाध्यता किसी चैनल पर नहीं है, मगर जहाँ जन-साधारण के कल्याण का मामला हो, उसकी पुष्टि करना इन चैनलों का नैतिक दायित्व है. लोक कल्याण को लोक की दिशा से देखा जाता है, न कि सरकार के दावों की तरफ़ से. इस मामले में न्यूज़ चैनल फ़ेल सिद्ध हुए.

मीडिया की सेवाओं में लोक-पक्षीय कोण होना ही उन सेवाओं की सिद्धि है, बशर्ते कि मीडिया की वैसी चाहत हो तो सही. हर मामले में डी.ए.वी.पी. का विज्ञापन मिले और कमाई हो, ऐसा इंतज़ार मीडिया के चरित्र को और उजागर करता है, जिनके लिए लोग गए भाड़ में, और उनके काम आने वाला सार्वजनिक कोष गया जहन्नुम में!

मीडिया किसे बता रहा कि वे लोग बहुत सूक्ष्मदर्शी हैं या वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष हैं?

भारतीय मीडिया से मिले अनुभव तो यही बताते हैं कि ‘मायावी’ जगत् में अपने कर्त्तव्य का पालन करने में मीडिया ‘धंधे’ के किसी खड्डे में जा गिरा है. यहाँ तक कि ‘धर्म’ के चैनल चलाने के बावजूद मीडिया धर्म के लिए भी शायद ही कुछ कर पाये, जबकि धर्म स्वयं में एक धंधा है. अध्यात्म की तो बात ही मत कीजिये.

पश्चिम में यह प्रचार ज़ोरों से किया जाता है कि मीडिया ने धर्म को digitalize करने का सुंदर काम किया है जिससे लोगों के जीवन में धर्म की वापसी की संभावनाएं बढ़ गई हैं. इन प्रचारकों के अनुसार इस डिजिटलीकरण ने धार्मिक संस्थाओं को यह चुनौती दे डाली है कि वे लोगों और समुदायों की आध्यात्मिक पहचान के प्रति अपनी धारणा में बदलाव लायें. ऐसा इसलिए कि धर्म का संबंध लोगों में उस अस्तित्त्वगत कामना से है जो उन्हें अपना जीवन सार्थकता और मूल्यों के आधारभूत प्रश्नों के अनुसार ढालने को प्रेरित करती है. (यह प्रचार का उलझाव है). ये ‘मूल्य’ और ‘सार्थकता’ समाज पर संगठनात्मक धर्मों के (धर्म-ग्रन्थों पर आधारित) शिकंजे को और कसने से ज़्यादा कुछ नहीं कर पाते. (क्योंकि वे प्रचार के उलझाव से ज़्यादा कुछ नहीं). इस तरह लोग आध्यात्मिकता से और दूर चले जाते हैं. परिणाम यह हुआ है कि सोशल मीडिया के अनुरूप विभिन्न धार्मिक ग्रुप नये-नये ‘हुक्मनामे’ –commandments – घड़ना शुरू हो गए हैं, ताकि लोग ‘उचित’ आचरण अपना सकें. आचरण का यह ‘औचित्य’ – उचित-पन – अन्ततः इतनी वैरायटी वाला हुआ जा रहा है कि जितनी संख्या में संगठित धर्म और उनकी आस्थाएं हैं, आचरण के उतने ही विकल्प हैं ! ये विविध आस्थाएं और विश्वास अकसर एक-दूसरे से टकराते भी रहते हैं — हमेशा की तरह. लिहाज़ा, डिजिटल मीडिया की बदौलत मनुष्य अब भी उसी सोच में है कि क्या करें, क्या न करें !

मीडिया अपने आन्तरिक चरित्रगत लक्षण से ही ‘भीड़’ के लिए बना है, जबकि अध्यात्म का संबंध भीड़ में मौजूद ‘व्यक्ति’ से है.

मीडिया का अस्तित्व ‘दूसरों’ की बदौलत है, कि दूसरे क्या करते हैं या उन्हें करना चाहिये. अध्यात्म का संबंध ‘स्व’ से है, कि मैं क्या करता हूँ.

औज़ार-जैसे मीडिया का दुरुपयोग किया जा सकता है, इसलिए वह धर्मों के बड़े काम का है. अध्यात्म के दुरुपयोग का कोई उपाय नहीं है, इसलिए मीडिया अध्यात्म में प्रासांगिक या उपयोगी ही नहीं है. ज्यों ही हम उपयोगिता,अथवा दुरुपयोग-सदुपयोग की भाषा में सोचते हैं, हम आध्यात्मिक नहीं रह जाते.

यदि आध्यात्मिक रूप से जाग्रत अथवा सक्रिय मनुष्य उपलब्ध हों तो मीडिया को उसकी अदायगी में अचानक सुधार प्राप्त हो जाता है. जबकि मीडिया के कितने भी प्लैटफ़ार्म उपलब्ध हों, अध्यात्म को कुछ नहीं मिलता! एक बार अध्यात्म उपलब्ध हो जाता है तो मीडिया की मौजूदगी के बावजूद उसका कुछ नहीं बनता-बिगड़ता. दूसरी ओर, अध्यात्म के संस्पर्श के बिना मीडिया कैसा हो जाता है? वैसा जैसा हम उसे आज देख रहे हैं !

मास मीडिया के क्षेत्र में उसके उपयोग को लेकर उच्चस्तरीय प्रशिक्षण की सुविधाएं उपलब्ध हैं. मीडिया की सुदीर्घ परम्परा और उसके निरंतर उपयोग के बल पर यह प्रशिक्षण संभव है. मीडिया के संचालन की निपुणता पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती आयी है.

अध्यात्म में प्रशिक्षण संभव ही नहीं है क्योंकि अध्यात्म परम्परा पर आधारित नहीं है. अंतश्चेतना की जागृति के लिए गुरु शिष्य को मार्ग तो दिखला सकता है, मगर किसी प्रकार का प्रशिक्षण नहीं दे सकता. यह कुछ-कुछ ऐसा है जैसे सूर्य को नित्य उदित होने का कोई प्रशिक्षण उपलब्ध नहीं है. सूर्य का रोज़ उगना भले एक परंपरा है, मगर सूर्योदय में कोई परम्परा नहीं है. जो सूरज कल उगा था, आज वही नहीं उगा है. उगने की परम्परा में रोज़ एक नया ही सूरज उगता है. हर शिष्य का इसी तरह आमूल-चूल नवीन आगमन होता है, तभी अध्यात्म है. हर गुलाब को परंपरा में नहीं, निजी प्रभुता से सम्पन्न होकर खिलना होता है. इसमें मीडिया की कोई भूमिका नहीं हो सकती. केवल गुरु है जो मार्गदर्शक है.

मीडिया हाथों-हाथ उपलब्ध वह साधन है जो युद्ध, अपराध, दुर्घटना, हत्या, भूकंप, महामारी, किसी सामाजिक सेवाकार्य के जमावड़े, कैन्डल मार्च, शेयर बाज़ार आदि के बारे में बताता है. मनोरंजन भी करता है. संक्षेप में कहें तो मीडिया का संबंध हर उस चीज़ से है जो ‘मृत’ है, जिसका अपना कोई जीवन नहीं है. सूचना तो यों भी ज्ञान नहीं है. Information is not knowledge. अतः अध्यात्म सूचना-माध्यमों से कहीं भिन्न है. अध्यात्म का संबंध ‘अ-मृत’ — non-dead से है. इस अंतर के कारण अध्यात्म आसानी से शुभ और अशुभ का निर्णय कर लेता है और सदा तरोताज़ा है. जबकि मीडिया अपने सामान्य कर्त्तव्य की पूर्त्ति करने में ही हाँफने लगा है.

मीडिया के इस विश्लेषण के बाद यही कहा जा सकता है कि अध्यात्म में मीडिया की वही भूमिका है जो शांति-स्थापना में युद्ध की हो सकती है, या जो स्त्री के शील की रक्षा में ‘रेप’ की है.

04-03-2019

Soochanasur


न्यूज़ मीडिया में टी.वी. स्क्रीन पर जिस तरह की बातें होती हैं, और इन बातों के आगे-पीछे जिस तरह की हरकतें चलती हैं, उनकी तरफ़ बहुत लोगों का ध्यान गया है. अनेकानेक सहृदय लोग अब चिंतित हो गए हैं कि आख़िर मीडिया चाहता क्या है ! इन चैनलों के होने का कारण क्या है ! लक्ष्य क्या है !

लोगों को अब लगने लगा है कि ये मीडिया के लोग हमें मूर्ख समझते हैं और सोचते हैं कि वे कितने भी मर्यादाहीन हो जायें, हम उन्हें देखते-सुनते रहेंगे और उनसे प्रभावित भी होते रहेंगे. बहुत से जानकार लोगों ने इनके (कोई-सी भी) भाषा-ज्ञान पर तमाम तरह के प्रश्न उठाए हैं. बहुत लोगों को ऐसा भी लगा है अधिकांश न्यूज़-एंकर आमंत्रित अतिथियों के साथ ‘पुलिसिया थर्ड डिग्री’ व्यवहार करने में अपनी धन्यता समझते हैं और उन्हें ज़रा भी ऐसा नहीं लगता कि वे अपनी हदें तोड़ रहे हैं. देश में विवादों और झगड़ों के सिवा और भी बहुत कुछ होता है जिसे प्राय: ये चैनल न्यूज़ ही नहीं मानते.

मित्रवर रँगीले ठाकुर की तरह एक अन्य सुहृद मित्र हैं पार्थसारथी थपलियाल जो 1982 के आसपास मेरे संपर्क में आए थे. साल भर के ब्रेक के बाद पुनः 1987 में उन्हें जोधपुर में देखा जहाँ वह अच्छी तरह जागरूक खोज-बीन करने के बाद स्क्रिप्ट लिखने में तल्लीन हो जाते थे. मीडिया पर उपरिकथित चिंता की ओर उन्होंने मेरा ध्यान खींचा. अनेक शब्द भी उन्हीं के हैं.

इन सब चिन्ताओं के बावजूद यह भी लगभग निश्चित है कि सूचना माध्यमों के बिना अब दुनिया में न तो किसी को नींद आयेगी, न सोते से जागने को मिलेगा.

मीडिया में दशाधिक आकाशवाणी केन्द्रों में काम करने और लगभग इतने से अधिक केन्द्रों की गतिविधियों से परिचित होने के बल पर मैं अपनी समझ सबके समक्ष रखता हूँ. शायद इस देश के भले लोगों के काम आ जाये.

पहले कुछ ऐसी बातें जो रेडियो में काम कर चुके अथवा कर रहे मित्रों के मतलब की ज़्यादा हैं.

नौकरी के दौरान मुझे अनुभव ने ज्ञान दिया कि सुबह आठ बजे और रात पौने नौ बजे के समाचार पूरे ध्यान से सुन लो तो राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर जो घट रहा है उस पर भारत सरकार की नीति क्या है, वह मालूम हो जाएगा. इस तरह मैं महानिदेशालय से आने वाली instructions पहले से भाँप लिया करता था. तदनुसार कार्यक्रम प्रस्तुत करने में मुझे कभी कोई संभ्रम नहीं हुआ. और, निश्चय ही, ऐसा करने वाला मैं अकेला तो रहा नहीं होऊँगा. आख़िर मैं अपने साथी-समुदाय का ही एक हिस्सा था.

दूसरी तरफ़ मेरी एक बुरी आदत रही कि समस्याओं पर स्पष्टवादी और बोल्ड प्रोग्राम प्रसारित होने चाहियें. सरकारी माध्यम होने और सरकार की नीति के अनुसार प्रसारण करने की रीति होने के बावजूद बोल्ड प्रोग्राम करने में मुझे कभी विरोधाभास का सामना करके संशय का शिकार नहीं होना पड़ा. यहाँ तक कि जोधपुर से दिल्ली जाने के बाद नेशनल प्रोग्राम में मेरे प्रसारणों की boldness पर अक्सर ‘The Statesman’ के दिल्ली संस्करण में हैरानी (और तारीफ़ भी, जो कि महत्वपूर्ण नहीं है) दिखाई पड़ जाया करती थी.

यह सब आत्मश्लाघा में नहीं, गुर क्या था, यह बताने को कह रहा हूँ.

उन्हीं अनुभवों ने मुझे यह भी ज्ञान दिया कि रे मूरख, बस AIR कोड violate नहीं होना चाहिये. कितना भी बोल्ड होने पर यों कोई सरकारी बंधन नहीं है ! मीडिया के सरकारी दुरुपयोग के बाद भी, जैसे कि इमरजेंसी में !

मैं कोई श्रेष्ठतम प्रोग्राम-प्रतिभा था, ऐसा भ्रम मुझे कभी नहीं रहा. मुझ से कहीं बेहतर प्रतिभाएं हमारे पास थीं. फिर भी अक्सर मेरी तरफ़ सबका ध्यान चला जाता था. कारण यह था कि उन्हीं अनुभवों का सम्मान करते हुए मैंने AIR Code और AIR Manual के भेद को कभी गड्डमड्ड नहीं किया और अपनी टीम को भी इस ओर से जागरूक रखा.

Manual और Code को एक समझने वालों की संख्या धीरे-धीरे प्रोग्राम काडर में बढ़ती गयी और हम, by and large, कभी नहीं समझ पाये कि न्यूज़ वालों का खेल आख़िर था क्या. नतीजा यह हुआ कि हम Service Rules, Recruitment Rules और Manual से बँधे होने को सरकारी शिकंजा समझना शुरु हो गये और Code की ज़िम्मेदारी-भरी व्यवस्था को भी उसी का एक रूप मानने लगे. Code बस इतना था कि किसी अंधे-लूले-लंगड़े का मज़ाक मत बनाओ, मित्र-देशों के विरुद्ध कुछ मत बोलो, सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने वाली कोई बात मत कहो आदि. यह AIR Code पूरा बोल्ड होने और freedom of expression में कोई अड़चन नहीं था !

ये उन दिनों की बातें हैं जब electronic media में रेडियो का एकच्छत्र राज्य था और हमें ‘सरकारी भोंपू’ कहकर लांछित किया जाता था.

विभिन्न राजनैतिक दल और नेता लगातार यह शिकायत किया करते थे कि ‘सरकारी भोंपू’ पर उन्हें बराबर का समय नहीं दिया जाता. उनका कोई प्रचार नहीं किया जाता.

किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि ये शिकायतें न्यूज़ बुलेटिन को लेकर थीं. Manual के अनुशासन को बंधन मानने वाले और Code की महिमा न समझने वाले हम हर ऐसी शिकायत को अपने ऊपर झेल लिया करते थे और मुफ़्त बदनाम होने को ‘नाम हुआ’ समझ लिया करते थे. जबकि यह भोंपू-कलंक झेलना चाहिये था न्यूज़ को !

उधर हमारे पास जो थोड़े-बहुत बोल्ड प्रसारण थे भी हमने उनकी महत्ता जमाने में दिलचस्पी नहीं ली. उन्हें लोगों के दिलो-दिमाग़ में जमाते और ख़ुद टिके रहते तो लोग नोटिस लेते, जैसे Statesman ने लिया.

रेडियो में रहते हुए न्यूज़ के लोगों से सीधे साबका पड़ा हो, प्रोग्राम काडर के ऐसे कितने लोग थे या हैं, मैं ठीक-ठीक नहीं जानता. संयोगवशात् यह अवसर मुझे कई बार मिला.

मैंने पाया कि न्यूज़ का चरित्र ही बदमाशी, भ्रष्टाचार और ख़ुराफ़ात का है. इसका सबसे बड़ा कारण था कि इन लोगों को सरकार, पॉवर, मंत्री और राजनेताओं के बहुत निकट रहने को मिलता था. उनका काम ही ऐसा था. भोंपू या चादर (स्क्रीन) पर कौन नहीं आना चाहेगा? और, पॉवर है कि करप्ट करती है. उसके भी आगे कौन नहीं जानता absolute power corrupts absolutely !

एक general-सा बयान दिया जा सकता है कि कुछ अच्छे-सच्चे लोग भी न्यूज़ में हैं. मगर उनकी आड़ में बाक़ी भी बच निकलेंगे. अच्छे लोगों की यही एकमात्र उपयोगिता रह गई है. पाकिस्तान बनाने वाले आख़िर गाँधियों की अच्छाई की आड़ में ही अपना काम कर जाते हैं! इसलिए तारीफ़ का कोई बयान नहीं तो नहीं ! ऐसा कोई कथन नहीं !

मैंने देखा कि रेडियो के पतन का कारण टेक्नोलोजी नहीं, न्यूज़ के लोग थे. ये वे व्यापारी थे, हम प्रोग्राम के लोग जिनके किये को अपनी पीठ पर ढोने का खच्चर बने. कैसे? ऐसे कि हमें केवल यह ज्ञान था कि अपना तबादला कैसे दिल्ली के बाहर नहीं होने देना है!

जिस तरह मैं व्यर्थ अपनी प्रशंसा में नहीं पड़ता, उसी तरह व्यर्थ दोष भी नहीं लेता. इसलिए यहाँ बताना चाहूँगा कि न्यूज़ से साबका पड़ने पर हर बार मैं इनकी ढिबरी टाईट करके चला. इन्हें अपने और अपनी टीम के ऊपर सवारी नहीं करने दी. इसके बावजूद कि news content पर मेरा कभी नियंत्रण नहीं हुआ. वे स्वतंत्र और अलग विभाग/प्रभाग बने रहे.

एक बार माननीय श्री अरुण जेटली ने मुझसे पूछा था (तब वह सूचना व प्रसारण मंत्री थे) — न्यूज़ को अलग चैनल देने की बहुत माँग आ रही है. आप इनसे डील करते हैं, आप क्या कहते हैं.

मैंने निवेदन किया, आप चाहें तो दे दीजिये.

मुझे अच्छी तरह याद है, जेटली जी ने लगभग अप्रसन्न होते हुए कहा था, ऐसे कैसे? आप कोई logic भी तो बताइये.

मैंने कहा था, news-fall तो इतना होता नहीं कि अलग चैनल चलाया जाये, फिर भी स्वतंत्र चैनल एक दिन होगा ही. (जो नहीं कहा वह था कि ऐसा मैं इनके सब लच्छन देख कर कह रहा हूँ.)

और आज टी वी में ही सही, अंधाधुंध न्यूज़ चैनल हैं और ये क्या करते हैं, सब जान रहे हैं. रेडियो पर एफ़ एम चैनल भी समाचार-सूचनाएं देने के अधिकारी हैं.

बस यह कोई नहीं जान रहा कि आकाशवाणी का समाचार सेवा प्रभाग इनका पितामह है. अपनी हदें तोड़ना इनकी घुट्टी में है.

ये कभी .. कभी .. कभी भी नहीं सुधर सकते. इन्हें बाईस्कोप की तरह देखिये और उपेक्षा कर दीजिये. नहीं तो रात सोने के पहले ब्लड प्रेशर की एक गोली सटकना शुरु कर दीजिये!

मगर इतना जान रखना काफ़ी नहीं है.

यह अधिकांशतः उनके लिए उपयोगी जानकारी थी जो कभी मूल्यों पर आधारित मीडिया-कर्म से जुड़े रहे हैं, insider हैं, विशेषतः रेडियो के इनसाडर.

इस पृष्ठभूमि बनाती जानकारी का मेल जन-सामान्य की चिंताओं से बिठाना अभी बाकी है.

इस पृष्ठभूमि के चलते यह ज़रूर पूछा जाना चाहिये कि मीडिया-कर्मी तो ठीक, मगर आम नागरिक का क्या?

शुरू में बयान की गई चिंताएं इसी आम नागरिक की ओर से कही गई हैं, इसलिए अधिक महत्व रखती हैं.

जब मैंने बताया कि मुझे अवसर मिलते ही मैंने न्यूज़-कर्मियों की ढिबरी टाईट कर दी, तो तात्पर्य था कि administrative कंट्रोल मेरे पास था. मेरे द्वारा उसका सही-सही उपयोग करने से अन्य सभी कर्मचारियों को बहुत राहत रहती थी और न्यूज़ के लोग छटपटाकर रह जाते थे क्योंकि उनका वर्चस्व स्थापित नहीं हो पा रहा था.

जब मैंने बताया कि news content मेरे नियंत्रण में नहीं था, केन्द्र के ट्रांसमीटर से जो प्रसारित होता था उसके लिए मैं जवाबदेह था, सिवा समाचार बुलेटिनों के, News content सीधे दिल्ली से परिचालित रहता था, तब content के प्रति यह मेरी चिंता लोगों की प्रमुख चिंता से जा मिलती है और इस तरह मुद्दे को आम श्रोताओं-दर्शकों से जोड़ती है.

आप में से बहुतों को याद होगा चंडीगढ़ के केन्द्र निदेशक श्री राजेन्द्रकुमार तालिब की हत्या पंजाब के आतंकवादियों ने कर दी थी. वह मेरे अत्यंत निकट मित्र थे. पंजाब का न्यूज़ यूनिट चंडीगढ़ में था. यह हत्या ट्रांसमीटर पर हो रहे प्रसारण की ज़िम्मेदारी केंद्राध्यक्ष की होने और news content के अलग से (दिल्ली से) नियंत्रित होने में निहित gap के कारण हुई थी. करे कोई भरे कोई !

एक यही तथ्य इतना बताने को काफ़ी है कि न्यूज़ के होने मात्र और उसके चरित्र में ही ख़ुराफ़ात है. ज़िम्मेदारी का कोई अहसास न रखने से ही ये लोग निज-स्वरूप प्राप्त करते हैं.

न्यूज़ का content-नियंत्रण या तो राजनीति के गलियारे करते हैं, या बड़े-बड़े बिज़नेस हाऊस, या फिर वे अन्तर्राष्ट्रीय ताक़तें जिनको किसी देश के सामान्य नागरिक के कल्याण या समस्या से कुछ लेना-देना नहीं है. इंदिराजी की हत्या को ही देख लें. बी.बी.सी. ने ग्यारह बजे ही बता दिया था के उनका देहांत हो चुका है. आकाशवाणी को बहुत बदनाम किया गया कि शाम को छह बजे बताया. किसी ने नहीं सोचा कि बीबीसी को क्या हिंदुस्तान में क्या आग लगने को थी ! इसका भी ‘दोष’ (जबकि काम न्यूज़ का था) मढ़ा गया प्रोगाम काडर यानी कुल आकाशवाणी के सिर !

अंतर्राष्ट्रीय ताक़तों के लिए सूचना उछालते रहना एक खेल है, एक आसुरी नृत्य ! यह नृत्य कभी न थमे इसके लिए पूरी दुनिया में ऐसी खलबली मचाये रखना न्यूज़ का काम है जिससे news-fall की कमी न होने पाये. आसुरी चरित्र को हम भारतीयों से बेहतर कौन समझता होगा कि जब तक चले अपना धंधा चमकाओ, अन्यथा परिस्थितियों को देवासुर-संग्राम की ओर ले जाओ ताकि विकट विनाश-लीला हो सके. ‘देवासुर-संग्राम’ अर्थात् जहां देखा कि शांति कुछ स्वर्गिक-सी हो रही है वहीं ऐसा करो कि इंद्रासन डोलने लगे, अस्थिरता फैलने लगे!

कहीं भी, किसी भी तरह की न्यूज़-व्यवस्था इसी विनाश-लीला का आश्वासन है, और कुछ नहीं. ये तमाम चैनल वरदान पा गये उस हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु अथवा भस्मासुर आदि दैत्यों की तरह हैं जो किसी से नहीं डरते, सब इनसे आतंकित रहते हैं और जो सब तरह से एक ऐसी स्वतंत्र सत्ता हैं जिस पर उसके मालिकों या जन्मदाताओं का भी नियंत्रण नहीं है!

कलियुग का अंत करने के लिए नारायण के कल्कि अवतार की हमें सूचना है. कलि-कालीन असुर का नाम कहीं लिखा नहीं है, मगर वह पूर्णाकार ग्रहण करने की प्रक्रिया में है.

उसका नाम है ‘सूचनासुर’. चाहें तो कहिये ‘मीडियासुर’!

यह किसी प्रकार का निराशावाद नहीं है. यह भगवद्सम्मत ‘न्यूज़-पुराण’ का संक्षिप्त आख्यान है.

नारायण नारायण.

22-02-2019