Deepavali


मेरे एक मित्र हैं “रँगीले ठाकुर”. एकदम राजा आदमी हैं. इसलिए मैं उन्हें ‘राजा सा’ब’ कहकर ही सम्बोधन करता हूँ. वह क्रिया-योगी भी हैं, संगीतज्ञ भी, और धर्मतत्त्व के ज्ञाता भी.

इस दीपावली पर राजा सा’ब ने सोशल मीडिया पर मेरा अभिवादन तो स्वीकार कर लिया, मगर साथ ही एक प्रश्न भी उठा दिया. उन्होंने कहा, दीवाली की शुभकामनाओं का आदान-प्रदान अब तो एक formality होकर रह गया है. समझना मुश्किल है कि दीपावली को कैसे देखा जाये!

वैसे तो राजा सा’ब! मुझे ज़्यादा कुछ पता-वता है नहीं, मगर थोड़ा सिरफिरा ज़रूर हूँ. आप मेरी छोटी सी ‘समझदानी’ के प्रति प्रेमवश मुझे और-और विचार करने का अवसर प्रदान करते हैं, अतः आभारी होकर कुछ कहने का प्रयास करता हूँ.

एक दीपावली ही क्या, पूरे का पूरा हमारा जीवन-धर्म ही एक formality बनाकर रख दिया गया है! यह सिलसिला आठवीं शताब्दी के बाद से शुरु हुआ जब यवन और म्लेच्छों के आक्रमण बहुत बढ़ गये और हमारे इतिहास को केवल कुरीतियों वाले समाज की गाथा के रूप में लिख दिया गया. बुद्ध, महावीर, सम्राट् अशोक, चाणक्य-चंद्रगुप्त, वैशाली गणराज्य, मगध, नालंदा, विजयनगरम्, चोल, पालव, चेर और पाण्ड्य राजवंशों वाले भारत में किसी भी प्रकार के दारिद्र्य, अंधविश्वास, कुरीति, अभाव, सामाजिक अन्याय आदि की परिकल्पना कर पायेंगे आप?

आगे बढ़ने के पहले ज़रा ‘कुरीति’ और बाहरी आक्रमणकारियों के इस रिश्ते को समझ लिया जाये.

गाँव में लड़की की शादी पूरे गाँव की बेटी की शादी मानी जाती थी. सभी मिलकर पूरा प्रबंध देख लिया करते थे. मुख्य (कच्ची) सड़क से शादी वाले घर तक बारात के आने के लिए साफ़-सफ़ाई, छिड़काव वगैरह किसी ने संभाल लिया, खाने का बंदोबस्त किसी ने, बारात के ठहरने, सुख-सुविधा का प्रबंध किसी ने. गाँव के ग़रीब से ग़रीब घर में शादी का ख़र्च कैसे निकल आया, पता तक न चलता था. हौले से यह सामुदायिक व्यवस्था कैसे दहेज़-प्रथा बन गई, ख़बर तक न हुई. सामाजिक बुराई का ठप्पा और लग गया! बाहरी प्रभाव में धीरे-धीरे nuclear families जो बन चलीं थीं! यहाँ तक कि न कोई बुलाना चाहे, न कोई जाना चाहे. फिर भी मंहगे-मंहगे गिफ़्ट के पैकेट देना हर individual की सामाजिक ‘शिष्टता’ हो गयी और शादी का पूरा बोझ उठाना उस अकेले परिवार की ज़िम्मेदारी.

ख़ुद ही फैसला कर लीजिये, यह सामाजिक बुराई है, या वह सामुदायिक भाव जिसपर ‘दहेज़’ का लेबल चिपका दिया गया था?

सती. सती? हाँ-भई-हाँ सती!

गोविंद निहलानी की फ़िल्म ‘आक्रोश’ याद है? 1980 में बनी इस फ़िल्म में ग़रीब किसान (ओम पुरी) की पत्नी (स्मिता पाटिल) जमींदार के गुर्गे द्वारा रेप का शिकार होकर आत्महत्या करती है, लेकिन हत्या के इल्ज़ाम में फँसा दिया जाता है ख़ुद ग़रीब किसान को. किसान के पिता की मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार के लिए पुलिस किसान को लाती है. जवानी की दहलीज़ में कदम रख रही अपनी बहन पर जमींदार के उसी गुर्गे की लोलुप नज़र देखकर वह किसान कुल्हाड़ी उठाकर अपनी बहन की हत्या कर देता है.

इस फ़िल्म को ‘गोल्डन ग्लोब’ पुरस्कार दिया गया.

बाहरी आततायियों और उनके उनके गुर्गों की लोलुपता की आए दिन होती घटनाओं के कारण उनसे अपने घर की युवा विधवा को बचाने के लिए कुछ परिवारों ने जब यही ‘आक्रोश’ अपनाया तो उसे ‘सती-प्रथा’ का ‘कीचड़-ग्लोब’ दे दिया गया! अलाउद्दीन खिलजी के सामने यही आक्रोश देवी पद्मावती ने दिखाया था! केवल सती-प्रथा के उदाहरण लें तो भी इतिहास साक्षी है कि करोड़ों के समाज में सती की नौ सौ के लगभग घटनायें हुई नहीं कि हिन्दू समाज ने इस बुराई के विरुद्ध कानून के आने का रास्ता खाली कर दिया था!

मुद्दा यह है कि सामाजिक बुराई का ठप्पा हिन्दू-समाज पर लगाना आसान था इसलिए ‘कर्त्तव्य’ की इतिश्री कर ली गई. क्योंकि यही ‘बाहरी’, ‘आततायी’, ‘आक्रांता’, ‘म्लेच्छ’ जैसे शब्दों से आँख चुराने का भी रास्ता था! ये सब शब्द-सत्य बोलने पड़ेंगे इस से तो अच्छा है कि हिन्दू-समाज को ही कुरीतियों वाली क़ौम घोषित कर दिया जाये! इन तथ्यों को बुहार फेंकना भारत को पद-दलित करते चले जाने के लिए ज़रूरी भी था.

सामाजिक बुराई या षड्यंत्र? स्वयं तौल लीजिये.

‘महाभारत’ के द्रोण के जीवन में था कि पुत्र अश्वत्थामा को पिलाने के लिए उनके पास दूध तक नहीं होता था. आचार्य की पत्नी को दूध के नाम पर आटा घोलकर पुत्र को बहलाना पड़ता था. यह स्थिति एकलव्य के जीवन में नहीं थी.

जैसाकि मैंने पहले भी निवेदन किया था, मुझे संयोगवश यह सौभाग्य मिला जो मैं आदिवासी जीवन के बीच जा पाया. अधिक नहीं, बहुत थोड़ा. फिर भी इतना कि पढ़ने योग्य पाठ पढ़ आऊँ. मैंने पाया कि आज भी किसी आदिवासी के यहाँ दस लोग मेहमान बनकर चले जायें तो वह परिवार आग्रहपूर्वक उन्हें भोजन करवाएगा, तभी जाने देगा. इससे उस परिवार पर कोई आर्थिक बोझ भी नहीं पड़ता. इधर हम पढ़े-लिखों को कभी एक बार चार लोगों को खाने पर बुलाना पड़े तो हमारा महीने भर का बजट गड़बड़ा जाता है. यहाँ यह नहीं कहा जा रहा कि आदिवासी समस्याओं से मुक्त जीवन जी रहे हैं. मगर ध्यान रहे कि जितनी गड़बड़ समस्याओं की मौजूदगी में है, उससे कहीं ज़्यादा घोटाला समस्या को मापने के पैमाने में है.

रह जाती है बात कि द्रोणाचार्य ने क्यों एकलव्य को धनुर्विद्या नहीं सिखलायी.

सिखलाने-न सिखलाने से क्या होता? एकलव्य तो द्रोण की मिट्टी की मूर्त्ति मात्र के सामने अभ्यास करके निपुण हो गया था. बात थी हस्तिनापुर के राजपरिवार को द्रोण द्वारा दिये गए वचन की रक्षा की. इसका जाति से क्या संबंध था?

गुरु-दक्षिणा में आचार्य ने एकलव्य से जो माँगा वह और भी विचित्र है; और उसका प्रचलित narrative उससे कहीं बढ़कर अजीब!

गुरु द्रोण ने कहा गुरु-दक्षिणा में मुझे केवल एक चीज़ चाहिये — यह वचन कि तुम राज्य की किसी स्पर्धा में भाग नहीं लोगे. न ही युद्ध होने पर किसी भी पक्ष की ओर से लड़ोगे.

परीक्षाओं में से सफलता पूर्वक गुज़रने के बाद हर युवक का स्वप्न होता है स्पर्धा में उतरे और स्वयं को सिद्ध करे. बात तीरन्दाज़ी की हो तो अपनी धाक जमाने का अवसर युद्ध से बढ़कर और कहाँ मिलेगा?

एकलव्य को लगा इस दक्षिणा में तो आचार्य ने जैसे मेरा अँगूठा ही माँग लिया है!

महाभारत में यह प्रसंग इस तरह है. मगर उसका प्रचार जिस तरह है, हम सबको उसी तरह मालूम है!

एकलव्य के प्रसंग को कैसे-कैसे हमें शर्मिंदा करने के लिए इस्तेमाल किया गया है!

फिर सोचिये, सामाजिक बुराई या षड्यंत्र?

उस डॉक्टर का किस्सा सुना है जिसके पास से पेट-दर्द ठीक करने की दवा ले जाते हुए मरीज़ ने आश्वस्त होना चाहा, “पेटदर्द ठीक तो हो जाएगा न डॉक्टर साहब?”

डॉक्टर ने कहा, “ पेटदर्द का तो पता नहीं, सिरदर्द ज़रूर शुरू हो जाएगा. तब मेरे पास आना.”

मरीज़ चकराया. “सिरदर्द क्यों?”

डॉक्टर साहब ने बताया, “क्योंकि मैं सिर्फ़ सिरदर्द का इलाज जानता हूँ.”

‘सामाजिक बुराइयाँ’ वास्तव में हैं या केवल इसलिए कि बाहर से आए विजेता बस ऐसे ही ‘सिरदर्द’ से परिचित थे! इतिहास की तोड़-मरोड़ academic dishonesty और धंधा नहीं तो और क्या थी?

जबकि सच यह साक्षात दीख पड़ रहा है कि भारत एक उत्सव-प्रिय देश है. ‘उत्सव’ का अर्थ केवल festivities नहीं है. ‘उत्सव’ यानी निरंतर अभ्युदय और उन्नति!

अरब देशों में एक लोक-विश्वास प्रचलित है कि जब भी कोई बच्चा पैदा होता है तो अल्लाह आकर उसके कान में कहता है, “मैंने तेरे जैसा एक तू ही बनाया है”.

पूरी पश्चिमी सभ्यता का यह आधारभूत विचार है. सब तरह के अभावों में जीने वालों को इसी से आत्मविश्वास मिलता है. ‘मैं श्रेष्ठतम हूँ’ के आचरण की यह psychological background है!

यहाँ से शुरु होती है ‘happy birthday’ वाली formality-संस्कृति! आठवीं सदी के बाद का भारत निरंतर पतन की कहानी इसलिए है कि formality में श्रेष्ठ होने वालों को वास्तविक श्रेष्ठता का कुछ भी आभास नहीं था. वे लूट और हत्या के दानवी बल को ‘श्रेष्ठता’ का पर्याय मानते रहे.

अत्यंत संवेदनशील भारतीय जीवन शैली प्रकृति की हर नज़ाकत से identify करने के कारण कभी विश्वास न कर पायी कि ‘मनुष्य’ जैसे दिखने वाले ये आततायी ‘संस्कृति-विहीन’ हैं. इसलिए हमारा-उनका interaction कुछ ऐसा हुआ जैसे अभी-अभी उगी दूब के ऊपर से फ़ौजी बूट गुज़र गये हों! यही interaction हमारी पराजयों की कहानी हो गया.

तभी मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि तलवार आत्मा को नहीं काट सकती, मगर गर्दन आत्मा नहीं है, इसलिए उसे काटती आ रही है!

इस हिंसा से बढ़कर formality-culture ने हमारा नुकसान यह कर दिया कि हमारी उत्सव-प्रियता जो अहंकार के समर्पण का अवसर हुआ करती थी, अहंकार को पुष्ट करने वाली औपचारिकता होकर रह गयी! आज हर भारतीय यह सिद्ध करने में लगा है कि मैं तुमसे श्रेष्ठ हूँ, क्योंकि मैं ज़्यादा मँहगा दीवाली-गिफ़्ट दे रहा हूँ! मैं तुमसे श्रेष्ठ हूँ क्योंकि देखो, मैंने कितना intelligent ‘Happy Birthday’ भेजा है. मैं तुमसे श्रेष्ठ हूँ क्योंकि मैं हर तरह का दिखावा तुमसे ज़्यादा होशियारी और चालाकी से कर लेता हूँ!

इस formality-संस्कृति को ठीक से समझने के बाद हमें दीपावली पर बात करना आसान हो जाता है.

उत्सव-प्रिय अर्थात् अभ्युदय-प्रिय हम लोग वे हैं जो बचपन से ही ‘ईश्वर’ के साथ खेलकर बड़े होते हैं. हमने (ऋषि भृगु ने) इस ईश्वर की छाती पर लात मार दी तो भगवान् विष्णु उसका निशान आज तक वक्ष पर सँजोये घूम रहे हैं! हमने बैठने को एक ईंट विट्ठल के सामने डाल दी (पुंडलीक ने) तो नारायण आज तक उस ईंट पर एक पाँव से खड़े हैं! हमने अपने इस खिलंदड़े साथी ‘ईश्वर’ का हाथ छोड़ देने के बजाय विष का प्याला पी लिया (मीराँ ने) तो उसका ‘विषैलापन’ पतली गली से निकल लिया!

ऐसी सब घटनायें गिनाने लगेंगे तो और चार ‘वेद’ लिख दिए जायेंगे!

हमारी जीवन शैली में कुछ भी formal नहीं, है तो बस real है! ख़ुदा को आकर हमारे कान में कहना नहीं पड़ता ‘तेरे जैसा एक ही बनाया’. उसे मालूम है कि हम हाथ ही उस ख़ुदा का पकड़ते हैं जो बस ‘एक’ है!

दीपावली को हम प्रायः वैष्णव त्योहार मानते हैं और इस दिन श्रीराम के अयोध्या लौट आने को celebrate करते हैं.

श्रीराम अयोध्या से इसलिए निकले थे ताकि महाराज दशरथ को श्रवण-वध का कर्म हो जाने से पुत्र-वियोग में देह-मुक्त होने को मिले. उधर रावण को ब्राह्मणों का माँस ऋषियों को खिला देने के ‘कर्म’ से केवल नारायण ही मुक्त कर सकते थे, इसलिए तमाम खटकर्म हुए. श्रीराम का अयोध्या लौट आना कर्म-चक्र के निरंतर घूमते रहने का सबक है, इसलिए दीपावली है. इससे कर्म-गति याद रहती है, हम अहंकार का विसर्जन करते हैं और formality- संस्कृति से खुद को बचाकर ego को solidify नहीं होने देते.

एक बार भगवान् शिव के एक गण ने, जिसका नाम था प्रमथ, भगवान् केदारेश्वर की प्रदक्षिणा की जिसमें माता पार्वती को छोड़ दिया. देवी अप्रसन्न हुईं और भगवान् शिव से इस उपेक्षा का कारण जानना चाहा. भोलेनाथ ने बताया कि हे देवी! तुम्हारे पास वह शक्ति नहीं है जो ‘आशुतोष’ होने से मिलती है. इस कारण ऐसा हुआ.

देवी का समाधान नहीं हुआ और उन्होंने ऋषि गौतम से निदान पूछा. ऋषिवर ने उन्हें केदारेश्वर व्रत करने का परामर्श दिया. इस अनुष्ठान से प्राप्त होने वाले वरदान के रूप में माता पार्वती ने भगवान् शिव के वामांग में उनके शरीर का आधा भाग हो जाना माँगा. इस प्रकार भगवान् केदार ‘अर्धनारीश्वर’ हुए, जिन्हें तंत्र में ‘सदाशिव’ कहा गया है.

दक्षिण भारत में यह त्योहार ‘केदार-गौरी’ व्रत के रूप में मनाया जाता है जिसे ‘दीपावली’ कहते हैं. गाय की पूजा इस व्रत का प्रमुख अंग है.

आप किसी भी तरह देखिये, गोमाता भारत की राष्ट्रीय अस्मिता का आधार ठहरती है.

दीपावली एक शैव त्योहार भी है.

हमारे शरीर का जो हिस्सा मेरुदंड का सबसे ऊपरी हिस्सा है, ब्रह्मरंध्र के ठीक नीचे, जिसे medulla oblongata कहा जाता है शिव-धनुष है. हमारी कुंडलिनी जब इसे भेदकर ब्रह्मरंध्र तक पहुँचती है तो ‘शिवधनुष’ टूटता है. केवल परमहंस योगी साक्षी हैं कि ‘शिवधनुष’ के ‘भंग’ होने से जो ‘ध्वनि’ होती है वह तीनों लोक गुँजा देती है. यह क्षण हमारे पूरे अस्तित्व के आमूल-चूल कायाकल्प का जो है!

इस प्रकार दीपावली योग-विद्या का भी त्योहार है. यह पर्व Law of Karma, योग-विद्या और नित्य-नैमित्तिक जीवन के निरंतर अभ्युदय का समन्वय करता है.

एक ओर हम दीप प्रज्ज्वलित करके घोषणा करते हैं – “दीपज्योतिः परंब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः ; दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते” (वाग्भूषण) — दीपक का प्रकाश सर्वोच्च ब्रह्म का प्रतिनिधित्व करता है; (ब्रह्मांड के स्वामी) जनार्दन का भी प्रतिनिधित्व करता है; (प्रार्थना है कि) इस दीपक का प्रकाश हमारे पापों का हरण करे! मैं इस प्रकाश (जीवनदाता) को अभिवादन करता हूँ.”

दूसरी ओर, इस दिन हम जीवन को सम्पन्न बनाने के लिए विनय भी करते हैं – “चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह” (श्रीसूक्त) — हे जातवेद (सर्वज्ञ अग्निदेव) चन्द्रवत् प्रसन्नकान्ति, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवी को मेरे लिये आवाहन करो!

दीपावली इसलिए हमारा सबसे बड़ा उत्सव है.

भ्रामक आधुनिकता के फेर में हमने क्या-क्या गँवा दिया है, यह उसका एक छोटा-सा reminder है.

शुभमस्तु!

07-11-2018

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We, the People


लोकतंत्र के तीन स्तंभ हैं — Legislature (विधायिका), Executive (कार्यपालिका) और Judiciary (न्यायपालिका). मीडिया चौथा स्तंभ कहा गया है.

इनके अतिरिक्त भारत के राष्ट्रपति की ओर से कार्य करने वाले अनेक संवैधानिक पद व संस्थाएं हैं – उप-राष्ट्रपति हैं, चुनाव आयोग है, रिज़र्व बैंक, सी.बी.आई., महालेखाकार आदि हैं जो हमारे देश की शासन-व्यवस्था को चलाने का काम करने के लिए हैं.

इनमें से विधायिका का हिसाब हम हर पाँच साल में लिया करते हैं. कुछ इस तरह जैसे चौपड़ खेल रहे हों. पहले जब पाँसे फेंके थे तो सामने वाला जीत गया था. इस बार ऐसे पाँसे फेंकेंगे कि बगल वाला जीते! फिर पीठ पीछे वाले को भी मौका मिलना चाहिए! इस तरह खेल में सब कुछ मनमाना होकर रह जाता है और अपने पीछे अनुशासनहीनता की एक लंबी लकीर बनाता चलता है!

चौथे स्तम्भ यानी मीडिया के लिए इतना कहना पर्याप्त है कि इसे अब तक का सबसे अच्छा कॉम्प्लीमेन्ट किसी ने दिया है तो यह कहने वाले ने कि अगर सब मीडिया, टी.वी., रेडियो, अख़बार वगैरह बंद कर दिये जाएं तो हमारी 50% समस्याएं अपने आप समाप्त हो जाएंगी! टी.वी. के रूप में visual media के छा जाने को देखते हुए क्या यह उचित समय नहीं कि ‘चौथे स्तम्भ’ का तमगा अब पत्रकारिता की यूनिफ़ार्म से उतारकर, सिनेमा को दे दिया जाये? न्यूज़ मीडिया जिन मुद्दों को गुड़ की तरह पीट-पीटकर रेवड़ियाँ बनाता रहता है, सिनेमा ने उन्हीं बातों को अधिक प्रभावी ढंग से जन-सामान्य तक पहुंचाने का काम कर दिखाया है.

अब आते हैं कार्यपालिका अर्थात् Civil Services पर. इनमें प्रमुख सेवायें हैं IAS, IFS (विदेश सेवा), IPS और IRS (इन्कम टैक्स आदि).

IAS-IFS के अधिकारी क्या-क्या करते हैं, कैसे प्रशासन में भयंकर ज़मींदारी चलाते हैं, हर तरह के corruption के मूल लिपिक होते हैं, सब जानते हैं.

IPS वाले पुलिस अधिकारी भी क्या नहीं कर गुज़रते, थोड़ा बहुत हम जानते ही हैं.

किसी ने खोज-बीन की थी कि CRPF आदि सुरक्षा फ़ोर्स के जवान नक्सलियों के हाथ क्यों बड़ी संख्या में मरते हैं? पता चला, क्योंकि उनके DG आदि अधिकारी IPS cadre से आते हैं!

पूछे कोई कि सेना या मिलिटरी इंटेलिजेंस से क्यों नहीं?

CBI के अंदरूनी झगड़े का सारा किस्सा Civil Services की पड़ताल करने का अवसर है.

इन IPS और IAS अधिकारियों को कंगारू की तरह छलाँगें लगाती महत्वाकांक्षा किसने थमायी है और क्यों? इन्हें रिटायर होने की उम्र तक झेलने और खेलने देने के बाद CRPF में, सीबीआई में; IAS है तो CAT या UPSC में या कहीं भी नियुक्त करने की आख़िर क्या मजबूरी है? रिटायरमेंट के बाद पेंशन पकड़ाने के अलावा पूरी ‘नमस्ते’ क्यों नहीं? महत्त्वाकांक्षा की मेंढक-कूद बंद होगी तो ताज़िंदगी मूँछ पर ताव देने का इनका अंदाज़ भी बदल जाएगा!

देश के सचिव नहीं जानते देश क्या है. विदेश सचिव नहीं जानते हमारी राष्ट्रीय अस्मिता क्या है और दूसरे देश में कैसा भारत project करना है. IPS अधिकारी नहीं जानते देश के अलग-अलग हिस्सों में ज़मीनी हकीकत क्या है.

पर देश को चलाते हैं!

राम-मन्दिर पर चर्चा – फ़ैसला नहीं, केवल चर्चा – को टालने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से न्यायपालिका पर भी थोड़ी बात होनी चाहिए.

साथ ही कुछ और बातें भी जो सवालों के घेरे में हैं. मसलन सरदार पटेल.

इसलिए आर.के. लक्ष्मण की कार्टून-माला ‘You Said It’ के बाबूजी की तरफ़ से आज दो-टूक हो ही जाये!

किसी का अपमान करने या बुरा लगाने के लिए नहीं. बन गए Perception की थाली को हिला-हिलाकर सही pattern बनाने के लिए. कितनी भी कड़वी लगें, नीम की पत्तियाँ चबाने-चबवाने का अवसर है. पेट की व्यर्थ खुद-बुद बंद हो जाएगी!

सबसे पहले यह निवेदन कि देश कोरी क्लर्क-बुद्धि से नहीं चलता. अधिकांश में ऋषि-चेतना से चलता है, चलना चाहिये.

कुछ लोग बुरा मान जाते हैं. तब उन्हें याद दिलाना पड़ता है कि ‘क्लर्क’ किसी नौकरी या पोस्ट या बाबूगीरी का नाम नहीं है. बड़े-बड़े वकील, IAS अधिकारी, कोर्ट के जज, पत्रकार आदि क्लर्क-बुद्धि से काम चलाते हैं. नियमों से ही अनुशासन है.

नियमों के लिए आग्रह (और अकड़ भी) क्लर्क-बुद्धि है.

क्लर्क-बुद्धि एक स्वभाव है.

ऋषि-चेतना इस देश का lifestyle है.

जीवन — राष्ट्रों का भी जीवन — aerodrome की airstrip की तरह सीधा-सपाट न होकर zig zag होता है. आड़ा-तिरछा चलता है. नियम की किताब देख-देखकर कार चलाने वाले का किसी तिरछे मोड़ पर एक्सिडेंट पक्का है!

एक नौजवान को किसी क्लब में दरबान की नौकरी मिल गई. इसके पहले वह कोर्ट में चपरासी था. लिहाज़ा नौकरी पर आने के पहले पूछ लिया क्लब के क्या-क्या नियम हैं. उन्होंने उसे Rules & Regulations की किताब पकड़ा दी. रात भर बैठकर उसने पूरी पढ़ डाली और अपनी नौकरी करने में चाक-चौबंद हो गया. ऐसा हो गया जिसे कहते हैं — ‘very competent’!

दूसरे दिन डूयूटी पर जा पहुँचा.

क्लब में प्रवेश के लिए जो सज्जन आये उन्हें सलाम ठोंका, कार्ड देखा और बताया, “ठीक है, आप अंदर जा सकते हैं. मगर अपना छाता कृपया बाहर ही छोड़ जाइये.”

आगन्तुक ने कहा, “मगर मेरे पास तो छाता है ही नहीं.”

दरबान ने बताया, “तब तो आप वापिस जाइये, छाता लेकर आइये, बाहर छोड़िये, और अन्दर प्रवेश कीजिए. हमारे कानून में ‘Other Priorities’ के नीचे साफ़ लिखा है कि मेम्बरान को छाता बाहर छोड़ कर ही अन्दर जाना मिलेगा.”

चीफ़ जस्टिस ने साफ़ कह दिया कि राम-मंदिर पर सुनवाई में कोई जल्दी नहीं. We have other priorities.

बात और ढाई-तीन महीने की होती तब भी असह्य और अनादर-भरी थी. मगर ढाई महीने बाद तो यह तय होगा कि कैसे सुनवाई होगी, कौन करेगा और कब-कब करेगा. मतलब कि चार-छह साल और निकाले जा सकते हैं!

इतना तिरस्कार!

यह भी मतलब साफ़ है कि सुप्रीम कोर्ट के वचन का भरोसा करना व्यर्थ है. पहले रोज़ सुनवाई का निर्णय दिया था जो अकारथ था! क्योंकि अब मुकर गये हैं.

इस फ़ैसले से देश के करोड़ों लोग ख़ुश हो गये. साथ ही इन करोड़ों से कहीं ज़्यादा करोड़ों की संख्या में लोग अप्रसन्न हो गये.

एक चीफ़ जस्टिस आते हैं, चन्द मिनट भी बात नहीं सुनते, पहले से जो मन बनाकर आये हैं उसके अनुसार कह देते हैं ‘We have other priorities’.

मध्यमा उँगली को अँगूठे पर रखा और करोड़ों-करोड़ भारतीयों को कंधे पर आ बैठे झींगुर की तरह एकबारगी झाड़ दिया!

यह दंभ की पराकाष्ठा थी या पहले वाले चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा के प्रति घृणा की?

सुना है कि बड़े-बड़े जज निजी रुचि-अरुचि, जानकारी और मनोभावों से फ़ैसले नहीं लिया करते.

क्या यह बात सही है?

यह भी सुना है कि सुप्रीम कोर्ट संविधान के अधीन है. स्वयं संविधान Preamble से परिचालित है. Preamble भी आरंभिक वाक्यांश — ‘We, the People….’ के अधीन है.

क्या यह बात सही है?

क्योंकि We, the People तो कंधे पर आ बैठा झींगुर सिद्ध हो रहे हैं!

श्रीराम हम ‘झींगुरों’ के हृदय पर जो एकच्छत्र राज करते आ रहे हैं उन्हें यह ‘छाता’ छोड़ देना पड़ेगा.

‘Other Priorities’ का नियम है!

इधर भूतपूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने एक नया शोशा छोड़ा, जिससे बहुत से मुस्लिम प्रवक्ता गला-फाड़ आवाज़ में सहमत हो रहे हैं.

अंसारी के अनुसार 1947 में देश के विभाजन के लिए हिंदू समान रूप से ज़िम्मेदार हैं. इसके लिए अंसारी ने सरदार पटेल के ऐसे वक्तव्य quote किये हैं जिनका लुब्बेलुबाब यह है कि मैं (पटेल) सब तरह विचार करने के बाद इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि देश का बँटवारा करना ही पड़ेगा.

अब ‘धर्मनिरपेक्षता’ के सिर पर क्रेप की पट्टी लपेटकर इस पर बात करना चाहेंगे तो नहीं होगी, क्योंकि Secular का मतलब ही यह है कि सच कहने की छूट नहीं है!

विचारणीय है कि सरदार पटेल ने कितने ही वक्तव्य दिये हों, किसी भी वक्तव्य का यह अर्थ कहाँ निकलता है कि हिंदुओं का अलग देश बना दिया जाये? मुसलमानों का अलग देश तो मुसलमानों को ही चाहिये रहा था!

कांग्रेस के partition struggle में (गांधीजी को छोड़ कांग्रेस का कोई freedom struggle था ही नहीं! आज़ादी लाने में उसका कोई असर भी नहीं था!) पटेल के कहने का ज़्यादा से ज़्यादा मतलब यह निकलता है कि ये जिन्नाह-वादी जो गुर्राये चले जा रहे हैं उनके सामने टुकड़ा डालना ही पड़ेगा! सच तो यही है कि पाकिस्तान फेंका गया टुकड़ा ही था! कोई भी भारतीय, विशेषतः हिंदू, अपने ही देश के विभाजन के लिए राज़ी और ज़िम्मेदार नहीं होगा. बस टुकड़ा फेंक कर मुँह झौंसने भर को राज़ी हो तो हो!

3 जनवरी, 1948 को कोलकाता की जनसभा को संबोधित करते हुए सरदार पटेल ने अपने भाषण में जो बातें कही थीं उनमें से दो यहाँ उल्लेखनीय हैं. एक तो यह कहा था कि जाओ, राज़ी-खुशी आपको पाकिस्तान दिया. अब बनाओ अपना पाकिस्तान. दूसरी बात यह कही कि अब हिंदुस्तान में जो 4 करोड़ मुसलमान रह गए हैं, उनमें बहुत ऐसे हैं जिन्होंने पाकिस्तान के बनने में मदद की थी.

आज 4 करोड़ से बढ़कर आप बीस करोड़ हो गए हैं. इनमें वे लोग भी तो बढ़कर कम से कम 5 करोड़ हो गए होंगे, जिन्होंने पाकिस्तान के बनने में मदद की थी! हामिद अंसारी 10 वर्ष तक संवैधानिक पद पर रहने के बावजूद ऐसे ही किसी परिवार के वंशज साबित हो रहे हैं!

सच यह भी है कि RSS एकमात्र संगठन था जो देश तोड़ने का घोर विरोधी था. पटेल ने जो ban वगैरह लगाये वे कांग्रेसी होने की वजह से. इस तरह के ban लगा दिये जाने से RSS बुरा नहीं, अच्छा ही सिद्ध होता है!

अंसारी का यह कहना कि बँटवारे के लिए किसी को तो ज़िम्मेदार ठहराना था, इसलिए मुसलमानों को ठहरा दिया, एक typical वक्तव्य है. इस बयान का अभिप्राय साफ़ है कि आजकल जो बहुत ‘हिंदू-हिंदू’ सुनायी पड़ रहा है तो मौक़ा है कि फिर अपना अलग देश मांग लो. ये हिंदू जो पहले भी ‘बराबर के ज़िम्मेदार’ थे, फिर बँटवारे को ‘राज़ी’ (मजबूर?) हो जायेंगे!

एक सच यह भी है कि उस हालत में हिंदू विभाजन के लिए बराबर के ज़िम्मेदार ठहराये जा सकते थे अगर सरदार पटेल ने 1947 में यहाँ रह गये मुसलमानों से यह कह दिया होता:

“चलिये, अब यह हिंदुस्तान हिंदुओं का और उधर मोमनिस्तान मुसलमानों का. आपने हमारा देश चुना, पाकिस्तान नहीं, बड़ी अच्छी बात है. आप सब मुसलमान यहाँ आराम से रहें, भले ही आप में से बहुत लोगों ने अलग पाकिस्तान के बनने में मदद की थी. यहाँ आपको सब civil rights मिलेंगे, हिंदुओं के बराबर. मगर आपको अब यहाँ कोई Political right नहीं होगा. आप न चुनाव लड़ सकेंगे, न आपको वोट डालने का हक होगा. अगर आपमें से किसी को लगता है कि देश के प्रशासन में मुसलमानों की भी say होनी चाहिये, तो आपने पाकिस्तान आपकी say के ही लिए माँगा था. आपको वहाँ जाकर अपने ढंग से प्रशासन चलाने की छूट है.”

ऐसा तो किसी ने स्पष्ट नहीं किया था. तो हिंदू विभाजन के लिए बराबर के ज़िम्मेदार कैसे हो गये? कहीं अंतर्राष्ट्रीय धरातल पर कही जाती वही बात तो सच नहीं कि मुसलमान पहले एक देश में जाते हैं, फिर वहाँ अपनी संख्या बढ़ाते हैं, फिर शरीयत की मांग करते हैं, और अंत में अपना अलग देश मांग लेते हैं! इनका गुर्राना किसी तरह कम नहीं होता.

ठहरिये जनाब, बुरा मानने की इतनी जल्दी क्या है? अभी सच और भी है! मगर पहले उस आम मुसलमान की तरफ़ भी देख लीजिए जो सच्चे अर्थ में, पूरी नेकनीयत और ईमानदारी से ‘We, the People….’ का हिस्सा है और जो आप जैसों की नादानियों से सबसे ज़्यादा भुगत जाता है. यह वह हिन्दुस्तानी मुसलमान है जो सबके साथ मिलकर गणेशोत्सव, दुर्गा-पूजा, विजयदशमी के लिए मूर्त्तियाँ बनाता है, दीपावली के लिए दीये बनाता है, इस देश के ऋतुचक्र के अनुसार फ़सलें उगाता है, रसखान की कलम से कृष्ण-भक्ति का काव्य रचता है, दारा शिकोह बनकर फलों के राजा आम को संस्कृत में नाम देता है – ‘रसाल’, बड़े ग़ुलाम अली खाँ साहब के गले से गाता है – ‘हरि ओं तत्सत’, अब्दुल हमीद बनकर पाकिस्तान के टैंक नष्ट करता है और ‘परमवीर चक्र’ से सज्जित होता है!

आप कहते हैं कि अब्दुल हमीद जैसे मुसलमान गिनाकर भी आप हिन्दू लोग हम मुसलमानों पर शक करते हैं! सो जनाब, आप तो अब्दुल हमीद नहीं हैं. आप अब्दुर्रहीम खानखाना भी नहीं, रसखान, दारा शिकोह, उस्ताद हाफिज़ अली खाँ या उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खाँ या उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ या उस्ताद अमजद अली खाँ भी नहीं हैं! ये सब तो बिना कहे हर हिन्दुस्तानी के लिए उतने आदरणीय और पूजनीय हो गए जितना घर का कोई बड़ा-बुज़ुर्ग होता है. अगर हिन्दू कहें ‘ईश्वर-अल्ला’ कहने वाला एक गाँधी हो तो गया, और क्या चाहिए, तो क्या आपके लिए काफ़ी होगा?

कौन कहता है कि हिंदुस्तान में मुसलमान नहीं चाहिएं? जो नहीं चाहिए वह है पाकिस्तान-मानसिकता! महत्त्व उन 15 करोड़ मुसलमानों का है जो सच्चे हिन्दुस्तानी हैं. आप 5 करोड़ (या इससे कम या इससे ज़्यादा) पाकिस्तान-मानसिकता वाले मुसलमानों का नहीं!

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपनी पुस्तक ‘Nationalism’ (1917) में पश्चिमी सभ्यता से आ रहे ‘बाज़ार’ मनोवृत्ति वाले ‘राष्ट्रवाद’ की निंदा करते हुए लिखा है कि (तुर्क-मुग़ल-पठान आदि) के आक्रमणों के लम्बे दौर और शासन के बावजूद हमने अपने पाँवों के तलुवों को चुभने वाले कंकरों वाली ज़मीन पर चलने की आदत डाल ली थी. मगर अब (इस यूरोपीय ‘राष्ट्र’-वादी सरकार के कारण) लगता है जैसे कंकड़ जूते में घुस गया हो!

तलुवों को कंकरीली ज़मीन की आदत डाल लेने में कोई योगदान पाकिस्तान-मानसिकता वाले मुसलमानों का नहीं है. उन का है जो ‘हरि ओं तत्सत’ गाते हैं, जो गाने या साज़ छेड़ने से पहले माँ सरस्वती को प्रणाम करते हैं – बिना कुफ़्र कमाये, फिर भी हंड्रेड परसेंट मुसलमान हैं, और जो सबके साथ मिलकर दीपावली के दीये बनाते हैं. योगदान उनका है जो किताब में पढ़े बिना समझ जाते हैं कि यह हिंदुत्व जीवन-शैली है, कोई धर्म नहीं. उनका है जो जान गए हैं कि यह जीवन-पद्धति एक अर्थव्यवस्था का नाम है जो कृषि-आधारित है. ये वे मुसलमान हैं जो सदियों पहले इस सत्य को भाँप गए थे, जबकि आधुनिक विश्व अब कहीं जाकर माना है कि कृषि ही एकमात्र उत्पादक आर्थिक चेष्टा है, अन्य सभी consume करने वाली गतिविधियाँ हैं! योगदान उनका है जो जान गए हैं कि यह ऐसी अर्थव्यवस्था है जो गाय से शुरु होती है और होली-दीवाली के आसपास लगने वाले मेलों में पूरी होती है, जब फ़सलें आ जाती हैं. योगदान उनका है जिन्होंने देख लिया है कि इन मेलों में लाखों-करोड़ों रुपयों का व्यापार हो जाता है! धर्म कहें कि अर्थव्यवस्था – बस कुल मिलाकर एक जीवन-शैली है जिससे दुश्मनी पालने का कोई मतलब नहीं है.

और आप हैं कि निंदा करने के लिए कहते हैं, ये हिन्दू तो बाँटते हैं – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — पूरे समाज को चार में बाँट दिया! हम मुसलमान बस एक ख़ुदा को लेकर चलते हैं. मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्य महमूद पराचा ने एक टी.वी. बहस में कहा था.

चार? और — एक?

तो गिनिए ज़रा, यह क्या है — शिया , सुन्नी, अहमदिया, बरेलवी. अल हदीसी, हयाती, पठान, मुग़ल, धुनिया, कुरैशी, सैय्यद , सिद्दीकी, ममाती, देवबंदी, वहाबी?

गिनने में तो चार से ज़्यादा लग रहे हैं!

कुल मिलाकर कुछ नहीं रखा इन बातों में. बहुत सी बातें इसलिए नहीं कही जाती रहीं कि उन्हें बकुरना अशिष्टता होकर रह जाती है. फिर भी, होठों पर उँगले रखे बैठा सच भी सच ही होता है! आप चंद लोगों की गुस्ताखियाँ जो हिंदुस्तान के मूल lifestyle के खिलाफ़ बढ़ती जाती हैं यह केवल उनका प्रतिबिंब है. आपने कुएं में झाँका तो जो नीचे दिखा वह आप ही थे!

होगा इससे भी कुछ नहीं. हर संवैधानिक संस्था और पद को यह अच्छी तरह समझा दिये जाने से होगा कि आप ‘We, the People’ का दिया खा रहे हैं. ज़रा तुलना कीजिये अपनी दिन भर की मेहनत की और किसान के दिन भर के परिश्रम की. अब तुलना कीजिये महीने भर की अपनी लाखों की पगार की जो आप अकसर कुछ किये बिना भी घर ले जाते हैं, और आपके जीवनाधार उस किसान की जिसे किसी-किसी महीने कुछ भी नहीं!

अब आपको यह जान रखना होगा कि जब-जब आपको दिये जा रहे भत्तों में दो-अढ़ाई प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है, तब हर बार किसान को भी उसके लिए निर्धारित MSP का उतने प्रतिशत महँगाई भत्ता दिया जाना ज़रूरी है! (इसे ठीक से regularise किया जाये). भले ही इसके लिए आपका वेतन कम करना पड़े! इसका justification क्लर्क-बुद्धि के शाब्दिक “twenty-twenty” में नहीं, ऋषि-चेतना के न्याय में मिलेगा. यदि नहीं तो यह ‘We, the People’ से घनघोर द्रोह है और संविधान की अवहेलना है जो दंडनीय होनी चाहिए. जिस तरह contempt of Court ग़लत है, उसी तरह मूल lifestyle से affront होना सौ गुना बड़ा अपराध है. ऐसा करते ही ‘We, the People’ से छल हो जाता है. आप चारों स्तंभों के होने मात्र का अर्थ समाप्त हो जाता है. संविधान की किताब को तकिये के नीचे दबाकर सोये पड़े रहने का क्या मतलब है? खाली-पीली पगार लेने के लिए?

आख़िर एक विशिष्ट भारतीय जीवन-शैली का जो मूल है यह उसी का पसीना है जो आपकी पगार के हरे-हरे नोटों में बदलता है. यह उसी का श्रम है जो हरी-भरी फ़सलों का रूप लेकर लहलहाता है और ‘शस्य श्यामलां मातरं, वन्देमातरम’ गुनगुनाता है! और अंतत: भारत के अर्थचक्र के घूमने की शुरुआत होती है मंदिरों के इर्द-गिर्द लगने वाले लोक-मेलों से और जा पहुँचती है वित्त मंत्रालय के सेंट्रल कम्प्यूटर तक!

नज़र आता है कि ‘other priorities’ कोई परिश्रम भरा काम हैं या राजनैतिक महत्त्वकांक्षाओं की कंगारू-कूद!

जो भी होगा वह केवल लोकतंत्र के चारों स्तंभों के ‘We, the People’ के प्रति नतमस्तक commitment से होगा, उन्हें झींगुर मानकर नहीं. यदि आपको लगता है कि मूल भारतीय जीवन-शैली से प्रतिबद्धता ‘भगवाकरण’ है तो लगने दीजिये. रोज़ सुबह जो सूरज उगता है, वह न हरा होता है, न सफ़ेद. वह भगवा होता है!

यह lifestyle सदा ऐसा खूँटा रहा है हम जिससे बँधी गाय की तरह थे. कितना भी दूर निकल जायें, दिशाहीन कभी नहीं हुए. इस खूँटे को उखाड़ फेंकने के बाद से हम खो गई हुई गाय हो गये हैं. कोई भी आता है, हमारी दुम उमेठने में लग जाता है!

सोचिये मत. यह देश उत्सव-प्रिय है, उत्सव-प्रिय ही रहेगा. मुहर्रम-प्रिय कभी नहीं बनेगा!

न ही कभी एक और पाकिस्तान बनेगा!

अब भारतवर्ष का अपना एक मज़बूत संविधान है. अब तो जो भी होगा इसी संविधान के अनुसार होगा.

कुंभकर्ण के कान चाहे घड़े जितने बड़े-बड़े हों, जब वह सोया रहता है किसी की नहीं सुनता. लोकतंत्र के ये चारों स्तंभ इस मुगालते में हैं कि वे हमारे भाग्य-विधाता हैं, नौकर नहीं. कुंभकर्णी निद्रा में बड़बड़ा-बड़बड़ाकर जाने हमें क्या-क्या पढ़ाये चले जा रहे हैं!

वे कृपया स्वयं ध्यान से पढ़ लें, यह संविधान जहां से शुरू होता है, वहाँ लिखा है –

“We, the People………..

02-11-2018

Sabrimala


[नोट: ये बहुत मूलभूत बातें है. कृपया बहुत ध्यान से पढ़ें. चूक गये तो कुछ हाथ नहीं आयेगा. डांवांडोल विचार वालों को छूट है.]

संजय लीला भंसाली ने अपनी फ़िल्म ‘देवदास’ में शाहरुख़ खान से एक संवाद बुलवाया था: “अगर किसी चीज़ को पूरी शिद्दत से चाहो तो पूरी कायनात उसे आपसे मिलवाने पर मजबूर हो जाती है.”

आजकल इसी डायलॉग का इस्तेमाल रिलायंस जिओ के दीपिका पादुकोण वाले विज्ञापन में किया जा रहा है.

दरअसल सबसे पहले यह विचार ब्राज़ील के लेखक पाऊलो कोहेलो ने अपने लोकप्रिय उपन्यास ‘द अलकेमिस्ट’ में इन शब्दों में व्यक्त किया था — “When you want something; all the universe conspires in helping you to achieve it.”

यह सब इसलिए ध्यान में आया कि यदि सिनेमा में हम इन शब्दों को सुनते-देखते हैं, फ़िल्मी सितारों के श्रीमुख से सुनते हैं, या किसी यूरोपीय-अमेरिकी-लातीनी अमेरिकी व्यक्ति का लिखा पढ़ते हैं तो बड़े सहज ढंग से ‘कायनात’ या ‘universe’ जैसे शब्दों से रिश्ता बना लेते हैं. मन में कोई सवाल नहीं उठता. किन्तु जैसे ही कोई कहे – ब्रह्मांड, सृष्टि, परम पिता, परमात्मा, मंदिर, धर्म, पूजा-पाठ, मंत्र, संस्कृत, हिन्दू, ब्राह्मण – हम तुरंत तिरस्कार से भर जाते हैं मानो अंधविश्वास और पोंगापंथ के बीसियों बिच्छू हमारे ऊपर से रेंग गए हों.

यदि कुछ दिखावे के तामझाम में लिपटा है या विदेश का है तो ‘प्रोग्रेसिव’ है. वही यदि भारतीय या ‘हिन्दू’ है तो पिछड़ेपन की निशानी है. अर्थात् ‘हिन्दू’ तो है ही भर्त्स्ना-योग्य!

ग़ज़ब तो यह है कि पाकिस्तान भी इसलिए तेवर दिखाता रहता है कि धर्म के आधार पर बने उस देश के हर बाशिंदे को पक्का है, हिन्दू पिटने योग्य होते हैं, इन्हें जब-तब ठोकते रहना चाहिए. इस ‘सबाब’ के लिए वे बाबर से लेकर अहमदशाह अब्दाली तक को याद करते रहते हैं. यह झूठी बात है कि आम पाकिस्तानी को हिंदुस्तान के नागरिकों से बैर नहीं है. एक सिरे से सबको बैर है. हिन्दू ‘काफ़िर’ जो ठहरा! इस सबाब-यज्ञ में मुट्ठी भर-भर सरहद के इस पार से भी लगातार आहुतियाँ दी जाती रहती हैं. अकेले मुसलमानों पर लांछन लगाना ग़लत होगा. हिंदुओं द्वारा भी योगदान दिया जाता है. पाकिस्तान यह भूल जाता है कि बाहरी आक्रांताओं से भारत की विभिन्न सेनायें अगर पराजित होती रहीं तो इस कारण कि राजपूत आदि जातियाँ अपनी नैतिकता को भी तलवार की बराबरी का धन मानकर लड़ा करती थीं. और सबाब-यज्ञ के आहुति-दाता हिन्दू तो तब भी थे ही. आज देश पर मर मिटने वाले करोड़ों मुसलमान और दूसरे ग़ैर-हिन्दू भी यहाँ हैं और अब फ़ौज की आधुनिक रणनीति बाबरों-अब्दालियों के ज़माने की तरह नहीं बनती.

पाकिस्तान एक मच्छर बराबर भी नहीं.

मगर, सैन्य-बल के कारण नहीं, अन्यथा भी पाकिस्तान के साथ-साथ हर किसी को यह भूल जाना चाहिये कि हिन्दू तिरस्कार के योग्य हैं.

इस बात को सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले और अब चल रहे झंझट की रोशनी में समझना होगा.

पूरा ज़ोर इस बात पर है कि there is a ‘right’ to worship. क्या कभी किसी ने यह सोचा कि to worship एक right नहीं, duty है? कम से कम सुप्रीम कोर्ट से यह तवक़्क़ो थी कि वह too much right-conscious समाज को थोड़ा duty-conscious होने की राह दिखाएगा.

जब हम अपनी ड्यूटी, अपने करणीय कर्त्तव्य के लिए ईमानदार होते हैं तो जानते हैं कि ड्यूटी अपने स्थान और स्थिति से की जाती है. यथा, सुप्रीम कोर्ट में चपरासी की ड्यूटी करने वाला यह नहीं कह सकता कि मेरे समान अधिकार हैं इसलिए जजमेंट पर मेरे भी हस्ताक्षर होने चाहियें. वेतनमान में सुधार, भत्तों में बढ़ोतरी, मेडिकल बिल की सुविधा आदि में अधिकार समान हैं, तथापि लागू तो उसी अनुपात में होंगे जो चीफ़ जस्टिस और चपरासी की स्थिति और स्थान का अनुपात है. आप समान अधिकारों और अपनी-अपनी ड्यूटी को गड्डमड्ड कैसे करेंगे?

यह उदाहरण मैंने दे तो दिया, मगर कुतर्क यह किया जाएगा कि क्या महिलाएं चपरासी हैं? या ड्यूटी भी करनी हो तो क्या पुरुषों से कमतर हैं?

जी नहीं. हिंदुत्त्व में महिलाएं पुरुषों से श्रेष्ठतर हैं!

हमारी intensity – शिद्दत — और ईमानदारी को देखकर, तौलकर पूरी कायनात के जो तत्त्व हमारी मदद में जुट जाते हैं, वे स्वयं को जब ‘पुरुष’ शरीर के रूप में अभिव्यक्त करते हैं तो उनका उद्देश्य जीवन के रक्षण का होता है. जब कायनात के वही elements अपने आप को ‘स्त्री’ शरीर के रूप में प्रकट करते हैं तो उद्देश्य जीवन की सुरक्षित संरचना का रहता है. यह भूमिका ज़्यादा बड़ी है.

जब एक फूल दूसरे फूल पर अपने पराग-कण फेंक रहा होता है और मधुरिमा-युक्त नए जीवन की सृष्टि हो रही होती है तो ये फूल स्त्री-पुरुष की ही भूमिका में होते हैं.

जीवन-रक्षण के लिए कायनात ने पुरुष को ‘बल’ दिया. संरचना हेतु स्त्री को ‘शक्ति’ दी. साथ ही दिया धैर्य, जो पुरुष को नहीं दिया. और दिया मातृत्व का पोषक वात्सल्य! शिशु के प्रति वात्सल्य पिता में भी रहता है. पिता का वात्सल्य संतान को ‘शिक्षा’ देता है. माता का वात्सल्य उसी शिक्षा को ‘विद्या’ में तबदील कर देता है.

हमारे ऋषि-मुनि पुरुष हैं, मगर उनमें भरी हुई अध्यात्म-विद्या का उत्स स्त्री है!

पुरुष का ‘बल’ जैसे घी. स्त्री का माधुर्य जैसे शहद.

स्त्री को पुरुष के साथ समानता पर लाकर एक तो हम उसे उसकी श्रेष्ठता से नीचे लाते हैं. दूसरे, शहद और घी को समान भाग में मिलाने से जो हलाहल विष बनता है वह कोब्रा के ज़हर से भी अधिक मारक होता है. प्रकृति का नियम है.

स्त्री को पुरुष से श्रेष्ठ कहा तो मक्खन लगाने के लिए नहीं कहा, संक्षेप में कहे गए ये अतिरिक्त गुण उसे देने के कायनात के निर्णय के कारण कहा.

जब मैं गुजरात में था तो कायनात ने चाहा और दैव मुझपर प्रसन्न हो गया. वैसे मैं कभी मंदिर-वंदिर जाता नहीं था. छोटा-मोटा नास्तिक था और इस डर से कि कहीं सचमुच कोई ईश्वर हुआ माँ जिसकी आरती करती थी, उसने गुस्से में कोई श्राप जैसा कुछ दे दिया तो मुश्किल हो जाएगी. इस कारण दूसरों की आँख बचाकर कभी-कभी आस्तिक भी हो लिया करता था. अब वही मैं भुज (कच्छ) के द्विधामेश्वर महादेव के मंदिर में जाने लगा. धीरे-धीरे नित्य ऑफ़िस जाने के पहले मंदिर से हो लेने का नियम बन गया. फिर हौले से कभी कुछ साधु-संतों से भेंट हुई. फिर और ऊंचे सिद्धों और गुरुओं की संगति और आशीर्वाद मिला. इसी प्रक्रिया में कुछ मंत्र मिले. मंत्र की परिभाषा मिली. ‘मननात त्रायते इति: मंत्र:’ — मन की जो आदत हर समय मनन-चिंतन और चिंता करने की होती है, उससे जो त्राण दिलाये वह मंत्र! मैं तो नास्तिक की तरह रटा-रटाया मंत्र बोल दिया करता था. इसी प्रक्रिया में मैंने पाया कि हम कुछ नहीं करते, जो भी करता है मंत्र करता है. उसकी शक्ति कुछ अलग ही चीज़ है!

ऐसे में मैंने एक बार अपनी एक अनुभूति महात्मा गुरुओं के सामने व्यक्त की. मुझ मूर्ख को लग रहा था कि यदि मैं एक चवन्नी कसकर मुट्ठी में बंद कर लूँ और मन-ही-मन मंत्र पर concentrate करूँ तो वह चवन्नी थोड़ी देर के लिए स्वर्ण की हो जाएगी!

क्या ऐसा संभव था?

गुरुओं ने समझाया कि पहले तो ऐसी कोई अनुभूति होती नहीं. किन्तु चलिये मान लेते हैं कि मंत्र के कारण आपको ऐसा लगने लगा, तो क्या आप स्वयं को भृगु, वसिष्ठ, दुर्वासा या याज्ञवल्क्य समझने लगे कि जहां-तहां श्राप या वरदान बांटने लगेंगे? इन ऋषि-मुनियों के पास तप की अखूट संपदा रहती है. वे कुछ भी कर सकते हैं. जितना सोना आप बाज़ार से चार-छह हज़ार रुपये में खरीद सकते हैं उसके लिए जो थोड़ी बहुत ‘शक्ति’ आपके पास जमा हुई होगी, उसे यों ‘ख़र्च’ कर लेंगे तो हो चुका अध्यात्म! जाइए, अपना काम कीजिए.

समझ में आ गया कि मंत्र क्या कर सकता है, कब कर सकता है और कैसे कर सकता है. समझ में आ गया कि बहुत कठिन है डगर पनघट की!

मंत्र दो तरह के हैं – वैदिक और शाबर. बहु-प्रचलित गायत्री आदि मंत्र वैदिक मंत्र हैं. लोक-भाषा मिश्रित मंत्र शाबर मंत्र हैं; जैसे ‘ॐ नमो हनुमंताय ब्रज्ज का कोठा, जिसमें पिंड हमारा पेठा’ आदि. चार पंक्तियों का यह हनुमान-मंत्र एक शाबर मंत्र है. (यहाँ सावधानीवश पूरा मंत्र नहीं दिया जा रहा). इस मंत्र का जाप स्त्रियों को वर्जित है. जपेंगी तो उनके दाढ़ी-मूँछ निकलने लगेंगी!

जिन्हें हम आदिवासी कहते हैं शाबर मंत्र उनसे आए हैं. जब मैं कहता हूँ कि दैव मुझ पर प्रसन्न हुआ तो साधु-संतों की संगति से ज़्यादा बड़ा वरदान मुझे यह मिला कि आदिवासियों के बीच जाते रहने का संयोग हुआ. जिन आदिवासियों को हम अपने से पीछे मानकर छोटा समझते आए हैं, वे हमसे दसियों साल आगे हैं. ये वे लोग हैं जो कभी शबरी, सीता, मंदोदरी, जांबवान, हनुमान, अंगद, मेघनाद हुआ करते थे, जिनके बीच नारायण ने राम का तो कभी कृष्ण का अवतार लिया, जो कभी भीष्म, युधिष्ठिर, द्रोण, अर्जुन, भीम, सुयोधन, सुशासन, द्रौपदी, कुंती हुआ करते थे. जिन लोगों को कभी पहले-पहल वेद ‘ज्ञात’ हुए थे.

ये आदिवासी हमारे पूर्वज हैं!

इन्हीं पूर्वजों की जीवन-पद्धति भारतवर्ष की जीवन-शैली है जिसे हिन्दुत्व कहकर तिरस्कार करने की कोशिश होती रहती है. इन्हीं पूर्वजों की जीवन-पद्धति से ‘रामायण’ निकली जिसने हमें हमारे जीवन-मूल्य और आदर्श दिये. इन्हीं को देखकर मेरे ध्यान में आ गया कि शास्त्र ‘लोक’ से निकलता है और लोक से बड़ा नहीं होता. आगे चलकर यही शास्त्र लोक का मार्गदर्शक बनता है. यह कुछ-कुछ इस्लाम की ‘हदीस’ की तरह हो जाता है. तब जनसामान्य के लिए ‘परम्परा’ या ‘आस्था’ भले ही पर्याप्त हो मगर जनसामान्य के conscience keeper बुद्धिजीवी वर्ग के लिए ‘आस्था’ काफ़ी नहीं होनी चाहिये. हमारे लिए ‘जानना’ लोकधर्म है.

इन पूर्वजों के बीच जाकर जाना कि इस तरह हमें मिला ‘लोक’, हमें मिले मंत्र और अध्यात्म, हमारे बीच ‘स्त्री’ लहराई, ‘पुरुष’ खिलखिलाया. यह सब हमने हासिल किया अपनी इसी कायनात से जिसके हम बाशिंदे हैं.

यह कायनात कोई रहस्य-कथा नहीं, एक जीती जागती entity है. इसमें निरंतर एक मूवमेंट है. पृथ्वी भी हर समय घूमती रहती है. इस निरंतर churning में कभी भूकंपों में ज़मीन के अंदर दब गई चट्टान का कोई टुकड़ा धरती की परत फोड़कर बाहर झाँकने लगता है तो वह हमारा ‘स्वयंभू’ शिवलिंग हो जाता है. कायनात के किसी वरदान का अपमान करना हम हिंदुस्तानियों ने नहीं सीखा. Universe ने इसीलिये सदा हमारे पक्ष में conspire किया.

इस पूरी प्रक्रिया में प्रकृति अपने आप को maintain भी करती रहती है. जैसे किसी शेर के पंजे में चोट लग जाये तो वह ख़ुद ही उसे जीभ से चाट-चाट कर ठीक कर लेता है, प्रकृति भी अपने आप को निरंतर ‘ठीक’ करती रहती है. जीवन-चक्र धीरगति से चलता रह सके यह उसका सहज विज्ञान है.

घर को ठीक-ठाक रखने के लिए रोज़ सफाई करनी पड़ती है. दीवाली के पहले बड़ी सफ़ाई भी की जाती है. यह सब कुदरत की प्रक्रियाओं का ही छोटा रूप है.

माँ के गर्भ में पल रहा बालक नाभि-रज्जु से जुड़ा होता है. उसी से उसे श्वास मिलती है, आहार मिलता है, विचार मिलते हैं, संस्कार ट्रांसफ़र होते हैं.

कायनात जो हमारी मदद में जुटी रहती है, सो इसलिए कि हम ब्रह्मांड में पल रहा वह शिशु हैं जो एक अदृश्य नाभि-रज्जु से कायनात से जुड़ा हुआ है. सब वरदान, सब विचार, सब अच्छा-बुरा, हित-अनहित हमें वहीं से मिलता है. इसको मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा है: “आते हैं ग़ैब से ही मज़ामीं ख़याल में!” सब विचार, संस्कार, विषय-वस्तु हमें उस परोक्ष से आते हैं!

इन ‘मज़ामीं’ का नाज़ुक काँच ग़ज़ल बनने के पहले किसी चश्मेबद की ठेस से बिखरने न पाये, पूरी शिद्दत से इस चाहत का रूप है मंदिर में दुष्प्रभावों को ‘कील’ देना. ऐसा मंत्रों की शक्ति को तांत्रिक प्रक्रिया से सक्रिय करके संभव होता है.

यही कारण है कि तिरुवनंतपुरम के मंदिर में जो सात कक्ष तालाबंद मिले थे, उन्हें खोलने से मना किया गया था. फिर भी कोर्ट ने छह दरवाज़े खुलवा दिये. सातवाँ खोलने की हिम्मत अभी तक नहीं हुई. क्योंकि घोर अनर्थ की चेतावनी है. ये भी मेरी तरह के नास्तिक मालूम पड़ते हैं जो कायनात के डर के मारे आस्तिक भी हो लेते हैं! जिन विषयों का ज्ञान क़ानून की किताबों से नहीं मिलता उनमें भी चंचुपात करते हैं! यही हाल लोकतन्त्र के ‘चौथे स्तम्भ’ न्यूज़ मीडिया का भी है. जो विषय इन्हें पढ़ाने-सिखाने वाली एकेडमियों की समझ के परे हैं, न्यूज़ मीडिया उनका भी विद्वान् है!

केरल में क्या हुआ? ऐसी बाढ़ देखी न सुनी. और केरल में ही क्यों? वह तो ‘एपिसेंटर’ था, जहां ताले खुलते ही मंत्र शक्ति जो चश्मेबद से बचा रही थी छू हो गई! विश्व के किस कोने में जल-प्रलय नहीं हुआ? आख़िर धरती का पूरा ग्लोब इसी कायनात का एक छोटा-सा हिस्सा है.

और तो और, उस बेचारी सुकन्या पायल रोहतगी ने कह क्या दिया कि यह बाढ़ इसलिए आई कि खुली सड़क पर गाय काटकर खाई गई थी, सब उसकी निंदा में जुट गए. सिनेमा की कलाकार होना यहाँ रक्षा न कर सका क्योंकि हिंदुओं की ठुकाई का अवसर मिल गया था. लोग यह भी भूल गए कि कायनात में घटी हर घटना आपस में जुड़ी हुई है और हमारी मदद की उसकी नीयत को प्रभावित करती है.

धरती पर जिस स्त्री-शरीर में कायनात ने स्वयं को प्रकट किया, स्वच्छ होने की प्रक्रिया में वह स्त्री रजस्वला होती है. यह अपवित्र नहीं है, पवित्रता की प्रक्रिया है. उसे बड़े काम के लिए तैयार होते रहने के प्रोसेस का हिस्सा है.

घर की सफ़ाई में अगर फ़र्श-धुलाई का पानी गठरी में एक कोने में बंधे रखे साफ़ कपड़ों को भिगो जाये तो सफ़ाई के काम में एक काम और बढ़ जाता है.

मंत्र से संकलित शक्ति न तो चवन्नी को सोना बनाने में गँवाने के लिये है, न मंदिर में किए गए ‘कीलन’ के प्रभाव को कम करके काम और बढ़ा देने के लिए है.

यह कारण है कि रजस्वला स्त्री के शरीर के माध्यम से कायनात की चल रही पवित्रता की प्रक्रिया के समय उसका सिद्ध मंदिरों में प्रवेश वर्जित किया गया. उसे किसी तरह हेय मानकर नहीं किया गया. यह समय कायनात के स्त्री-शरीर को आराम देने का है, उससे ड्यूटी करवाने का नहीं. उसे श्रेष्ठता मिली है बड़े काम के लिए, क्षुद्र झंझटों में पड़ने के लिए नहीं.

आपके पास अब भृगु, वसिष्ठ, दुर्वासा या याज्ञवल्क्य तो हैं नहीं जो कम हो गये या छूमंतर हुए ‘सत्व’ को पुनः प्रतिष्ठित कर देंगे! सृष्टि की प्रक्रियाएं चलती रहेंगी. वे बाढ़ होंगी, सूखा होंगी या हरियाली कौन जाने? हमारे पास बस कायनात से वह संवाद नहीं होगा जो उसकी अनुकूलता बनाये रखता था!

अब कुतर्क यह होगा कि विज्ञान इस तर्क को नहीं मानता. यह अवैज्ञानिक बात है.

पहले यह तो तय कर लीजिये कि कायनात विज्ञान का विषय है या अध्यात्म का, या दोनों का? आपका अधिक झुकाव विज्ञान की ओर होगा. क्योंकि यदि अध्यात्म की बात की तो इस क्षेत्र में विश्व-अग्रणी भारत बड़ी आसानी से अमिताभ बच्चन का यह डायलॉग बोल देगा: “रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं; नाम है हिंदुत्व!”

स्थिति तो यह है कि हमारे यहाँ के मौलवी लोग भी मानते हैं कि संसार में पहला वचन वेद है. और आख़िरी वचन क़ुरान है. यह बात अब से पाँच-छह सदी पहले तक ठीक थी. पहला वचन तो अब भी वेद ही है. मगर अब आख़िरी वचन श्री गुरु ग्रंथ साहब है. आप हमारे यहाँ के सिख पंथ को एक स्वतंत्र और पूर्ण धर्म मानने से कतरा क्यों रहे हैं?

यह हिंदुस्तान है जनाब. अध्यात्म में हमेशा नम्बर वन!

चलिये, अमिताभ बच्चन का संवाद नहीं बोलते. आप सबको बुरा लग जाएगा.

इसी तरह आप भी ध्यान रखिये कि आप ऐसी कोई बात न कहें, न ऐसा काम करें जिससे हमको बुरा लगे.

अब कोई यह भी कहेगा कि तीन तलाक़ में भी तो कोर्ट आया था.

सो बंधुओ, तीन तलाक़ सामाजिक बुराई है. स्त्री का रजस्वला होना सामाजिक बुराई नहीं है.

आपकी मदद के लिए एक छोटी सी कहानी.

उस छोटे से कस्बे के घरों में काम करके गुज़ारा करने वाली वह बुढ़िया गाँव के बाहर थोड़ी दूर एक झोंपड़ी में रहती थी. भली औरत थी इसलिए सभी उसका ध्यान रखते थे और इज़्ज़त करते थे.

एक दिन सुबह-सुबह उस बुढ़िया की झोंपड़ी से चिल्लाने की आवाज़ आई – “बचाओ, बचाओ. मदद करो. आग लग गई.”

सुनकर सब मदद के लिए दौड़े. पानी के बर्त्तन लिये हुए. जिसके हाथ में जो आया – बाल्टी, डोल, पतीला, घड़ा, वह वही पानी से भरकर दौड़ा.

जब बस्ती के लोग झोंपड़ी पर पहुंचे तो देखा कहीं कोई आग नहीं लगी है.

सबको बड़ा बुरा लगा कि काम वाली बाई ने सुबह-सवेरे अच्छा मज़ाक नहीं किया. बुढ़िया से पूछा कि अम्माँ, आग कहाँ लगी है?

बुढ़िया ने कहा, “आग तो अंदर लगी है, मन में.”

यह कहानी कहती है कि जब हम अंदर की आग बुझाने का इंतज़ाम करते हैं तो अध्यात्म के मार्ग पर होते हैं. और जब बाहर की आग बुझाने को तत्पर होते हैं तो विज्ञान हमारी उँगली थामे होता है.

यह है भारतवर्ष! विज्ञान और अध्यात्म को लेकर इतनी साफ़-संतुलित दृष्टि और कहाँ मिलेगी?

सबरीमला पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अंदर की आग को बुझाने में बाहर की आग वाली कार्बन डाइऑक्साइड स्प्रे हो गई है.

फैसले पर पुनर्विचार करना ही उचित है. चिंता न करें, पूरी कायनात आपकी मदद में जुट जाएगी.

16-10-2018

Me Too!


मैं एक अत्यंत सामान्य व्यक्ति हूँ. आचार-विचार, जीवन शैली, रुपये-पैसे, शारीरिक व्यक्तित्त्व – सभी दृष्टियों से. शारीरिक व्यक्तित्त्व आकर्षक नहीं है, मगर अरुचिकर भी नहीं है. अपने चेहरे पर सदा सबका स्वागत करती-सी मुस्कान लिये हुए है. सन 1981-82 में 32-34 साल के युवा में जो शारीरिक त्वरा रहती है, मुझ में भी थी. व्यक्तित्व के बालपन को छिपाता-सा प्लेन ग्लासेस वाला बड़े फ़्रेम का चश्मा कुछ vulnerability ढाँपने के लिए, कुछ थोड़ी maturity दिखाने के लिए आँखों पर रहता था. आजकल जो चश्मा है, नज़र का है. तब नज़रिये का था.

1977 में एक बार चुनाव हारने के बाद कुछ ही साल में श्रीमती इंदिरा गांधी 1980 में वापिस सत्तारूढ़ हो चुकीं थीं. 1981-82 में कभी उन्हें अजमेर और ब्यावर के बीच कहीं किसी गाँव में एक स्कूल का दौरा करना था और उसके पहले एक जनसभा को संबोधित करना था.

उन दिनों प्रधानमंत्री की रिकॉर्डिंग आर्काईव्ज़ में भेजने की ज़िम्मेदारी आकाशवाणी की हुआ करती थी. (अब क्या व्यवस्था है, नहीं मालूम). उसी रात रेडियो-रिपोर्ट भी प्रसारित करनी होती थी. आकाशवाणी, जयपुर की ओर से इस कवरेज के लिए मुझे लगाया गया और जयपुर केंद्र के कार्य-दक्ष प्रोडक्शन असिस्टेंट मदन शर्मा के साथ इंजीनियरों की टीम देकर हमें रवाना कर दिया गया.

कार्यक्रम दूसरे दिन सुबह-सुबह था. खुले मैदान की रेतीली ज़मीन ओस से गीली थी और ठंडी भी. अपने टेप रिकॉर्डर जमाने के लिये इंजीनियरों को एक टेबल की ज़रूरत थी. मैंने इधर-उधर देखा कि टेबल का जुगाड़ कैसे किया जाये. पास में एक तरफ़ एक पुलिस दल बहुत सी टेबलें जमाकर उनपर सफ़ेद चादरें बिछाये कुछ व्यवस्था करने में व्यस्त था. मैं उनके पास गया और अपना परिचय देकर मैंने उन्हें बताया कि मुझे इंदिरा जी की रिकॉर्डिंग करनी है. इसलिए इक्विपमेंट रखने को एक टेबल चाहिए.

पुलिस वालों ने अपने राजस्थानी लहज़े में जो टका-सा जवाब दिया वह कुछ इस तरह था कि भाई, इंदिरा तेरा जब जो करेगी, तब करेगी. हमारे डीआईजी साहब तो हमारा अभी का अभी बना-बिगाड़ जावेंगे. इसलिए टेबल तो नहीं मिलेगी.

लिहाज़ा मैंने फिर इधर-उधर नज़र दौड़ाई कि कोई उपयुक्त अधिकारी दिख जाये तो उससे कहूँ. ऐसा व्यक्ति तो कोई नहीं मिला मगर कुछ दूर एक टेन्ट लगा दिखा. मैंने आव देखा न ताव उसमें घुस गया. वह प्रधानमंत्री के आराम करने के लिए अस्थायी व्यवस्था थी जहां टॉयलेट आदि का भी इंतज़ाम था. सोफ़े बिछे हुए थे और उनके सामने एक सेंट्रल टेबल रखी हुई थी.

तब सेक्योरिटी आदि के इतने लफ़ड़े नहीं थे. मैंने लपक कर सेंट्रल टेबल उठाई और लाकर अपनी टीम के सामने धर दी.

इंजीनियर अपना इक्विपमेंट जमाने में लग गये और मैं पैंट की जेबों में दोनों हाथ डाले टहलते-टहलाते पास के स्कूल की बिल्डिंग से मालूम कर लाया कि वहाँ प्रधानमंत्री का क्या प्रोग्राम था.

हमारी टीम के दाहिनी ओर कुछ गज़ के फ़ासले पर ऊंची मचान बनाकर मंच तैयार किया गया था जहां से इंदिराजी को जन-सम्बोधन करना था.

प्रधानमंत्री समय से कुछ पहले ही वहाँ पहुँच गईं और सीधे मंच पर जा खड़ी हुईं. उन्होंने सब तरफ का जायज़ा लिया. हमारी टीम सेंट्रल टेबल पर झुकी हुई थी. मैं ही था जो निठल्ला जेबों में हाथ ठूँसे तन कर खड़ा था.

थोड़ी देर में प्रधानमंत्री ने मेरी ओर देखा. मुझे इतमीनान हुआ कि चलो, प्रधानमंत्री ने नोटिस लिया है कि उनके देशवासी मुस्तैदी से ड्यूटी कर रहे हैं. थोड़े समय के बाद उन्होंने फिर देखा. कुछ ज़्यादा समय के लिये. तीसरी बार फिर देर तक देखा, गोया अपनी दिमागी मशीन में मेरी पहचान का ज़िरॉक्स निकाल रही हों!

एक अलर्ट प्रधानमंत्री!

भाषण शुरु हुआ और समयानुसार पूरा भी हुआ.

उन दिनों सोनी के बैटरी-ओपेरेटेड अल्ट्रा-पोर्टेबल टेप रिकॉर्डर हुआ करते थे, लंबे-से माईक के साथ. मैंने वह रिकॉर्डर कंधे पर लटकाया, माईक हाथ में थामा और स्कूल के मुख्य द्वार पर जा खड़ा हुआ, जहाँ से प्रधानमंत्री को प्रवेश करना था.

इंदिराजी आयीं और स्कूल में चल दीं. लोगों के झुंड झुक-झुक कर उनके पाँव छूकर आशीर्वाद ले रहे थे. वहाँ उन्हें इंस्पेक्शन मात्र करना था और लोगों से कुछ-कुछ पूछना था. मेरा काम था उस बातचीत को रेकॉर्ड करना ताकि उसे रेडियो रिपोर्ट में शामिल किया जा सके. मैं उनके साथ हो लिया और माईक इंदिराजी के मुख के सामने करके पकड़े रहा ताकि उनका बोला हुआ रेकॉर्ड हो सके.

मैं नहीं जानता इंदिराजी के इतना निकट और कौन जा सका होगा, उनका कोई मंत्री भी! सिवा उन लोगों के जो उनके पाँव छू रहे थे. या सिवा एम.ओ. मथाई के, जिन्होंने अपनी पुस्तक ‘Reminiscences of the Nehru Age’ में ‘मैमूना बेगम’ को याद रखा है.

ऐसे में कभी अचानक मेरा कंधा इंदिराजी के कंधे से टकराया. पर मैं बिना लड़खड़ाये पूरी चुस्ती से अपना काम करता रहा.

ज़रा आगे चले तो इंदिराजी का कंधा एक बार फिर मेरे कंधे से टकराया.

अब मैं चौकन्ना हुआ. मुझे लगा इंदिराजी जानबूझकर ऐसा हो लेने दे रहीं हैं!

कहाँ वह सत्ता पर आरूढ़ विश्व की सर्वाधिक शक्तिशाली महिलाओं में से एक, और कहाँ मैं आकाशवाणी का मामूली सा प्रोग्राम एग्ज़ीक्यूटिव! सारी कायनात उन दिनों जिस महिला की मदद में जुटी हुई थी वह इंदिरा गाँधी!

उस भारी भीड़ में सरेआम वे कुछ क्षण इंदिराजी के साथ मेरे नितांत निजी पल थे! पलक झपकने की गति से आये वे पल उतनी ही तेज़ी से फिसल गये!

Perhaps my own ‘Me-Too’ moments!

अद्भुत और असंभव!!

उस समय का कोई फ़ोटोग्राफ़ यदि कहीं हो तो बस वही साक्षी होगा कि कैमरे ने उन पलों को आँख-भर देखा था!

आगे की बात मैं स्वर्गीय इंदिराजी की आत्मा से क्षमा-याचना के साथ ही कह पाऊँगा. आख़िर वह मेरी माँ के समान थीं.

एम जे अकबर तो कैबिनेट मिनिस्टर भी नहीं. इंदिराजी तो प्राइम मिनिस्टर थीं. एम जे को लेकर कांग्रेस गिरी हुई राजनीति कर रही है ताकि चुनी हुई सरकार को परेशानी में डाला जा सके. क्या खेल नहीं किया गया? अवाॅर्ड वापसी, कैम्ब्रिज अनालिटिका, गुजरात चुनाव, केरल, कर्णाटक, पुणे कोरेगांव, और सबसे बढ़कर वहाबी इस्लामी आतंकवाद के साथ नियो-नाज़ीवाद के लिए काम!

और अब ‘Me Too’ को औज़ार बनाना!

फिर भी, मेरा उद्देश्य राजनीतिक उत्तर देना नहीं है. इससे बात भटक जाएगी. समाज में आ रहे आचरण-गत बदलाव में स्त्री और पुरुष दोनों की स्थिति का जायज़ा लेने के लक्ष्य पर आने के पहले इतना ज़रूर कहूँगा कि मोतीलाल नेहरू के इस परिवार का चरित्र क्या रहा है, किसी से छुपा नहीं है. शेख़ अब्दुल्ला की बात तो बहुतों ने की, फिर करना बंद कर दी. मगर इससे कौन इंकार करेगा कि सिनेमा की गायिका और संगीतकार जद्दनबाई (अभिनेत्री नरगिस की माँ) मोतीलालजी की बेटी थी. औलाद हो जाने के बाद राखी बंधवाकर डोली में बैठा देना मोतीलाल नेहरू की ख़ास अदा थी. जद्दन की माँ की शादी हुई और जद्दनबाई को हिन्दू पिता होने के बावजूद एक मुसलमान की ही तरह पाला गया, जिसमें ऐतराज़ की कोई बात नहीं.

अकबर इलाहाबादी शायर तो थे ही, आई.सी.एस. ऑफिसर भी थे. कांग्रेस को अंग्रेजों और भारतीयों के बीच संवाद के लिये शुरु किया गया था. भारतीयों के लीडर होकर मोतीलाल नेहरू कांग्रेस में जाते थे. हम हिंदुस्तानियों के ‘कष्टों’ पर उनके सब लच्छन बहुत नज़दीक से देखकर अकबर इलाहाबादी ने यह शे’र लिखा था:

क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ ।

रंज लीडर को बहुत है, मगर आराम के साथ।।

नरगिस का पुत्र संजय दत्त अपने रक्त में मोतीलालजी के जीवाणु लिये क्या-क्या गुल नहीं खिलाता रहा! कभी ए.के. 47 तो कभी ड्रग्स! अच्छा खासा भावुक व्यक्ति और अभिनेता कैसा बर्बाद हुआ!

लेडी माऊन्टबेटन ने जवाहर लाल से क्या नहीं करवा लिया? भारत का विभाजन भी, और सुभाषचंद्र बोस को ‘युद्ध-अपराधी’ की तरह पकड़कर अंग्रेजों के हवाले करने का आश्वासन लिखित में ले लेना भी!

स्वयं इंदिराजी का फ़ीरोज़ गांधी से संबंध, फिर हिन्दुओं में तलाक़ का क़ानून लाने का कारण बनना. मनोविज्ञान कहता है सत्ता का नशा किये स्त्री या पुरुष को vulnerable-सा पुरुष या स्त्री दिखे तो सबसे पहली गुदगुदी उसके मन के अहंकार में और तन के सेक्स-सेंटर में होती है. कहना न होगा कि इस सब हिस्ट्री के बीच अगर कंधा टकराने में एक मातृतुल्य स्त्री में ‘ईडीपस कॉम्प्लेक्स’ कहीं सक्रिय रहा हो तो क्या आश्चर्य? मैं ज़रूर उसके बाद दो दिन तक नहाया नहीं था, न कपड़े बदले थे.

राजीव-सोनिया ने देश का क्या किया वह सब बताने का यह मौक़ा नहीं है, पर जानते सब हैं. संजय गांधी का तो नाम ही लेना काफ़ी है. और अब राहुल पप्पू के तो कहने ही क्या? दिल्ली के बाहर के किस फ़ार्म हाऊस से नशे में धुत उठाकर कब-कब गाड़ी में डाले गए, किस से छिपा है? मुंबई में भले ही 26/11 हो रहा हो! पप्पू इस वंशवृक्ष पर उगा ऐसा फल है जो हमेशा याद दिलाता रहेगा कि मूल बीज ही में भयंकर गड़बड़ थी! इतने लंबे वक़्त तक इस परिवार को माथे पर बैठाये रखने की ही सज़ा है कि हमें जब-तब पप्पू की अनाप-शनाप प्रेस कॉन्फ्रेंस झेलनी पड़ती हैं!

हम हिन्दुस्तानी भले लोग रहे हैं, इसलिए आँख बचाकर निकल लेते हैं, ज़्यादा कुछ बोलते नहीं.

मगर अब ‘MeToo’ में बहुत बोला है!

राजनीति की इतनी बात भी इसलिए करनी पड़ी कि इस पूरे ‘MeToo’ प्रकरण को जिस आचरण-गत बदलाव – transition in behavioural pattern के परीक्षण का अवसर देख रहा हूँ, हमारे उस behaviour को इस नेहरू-परिवार के इर्द-गिर्द चली सही-ग़लत, अच्छी-बुरी राजनीति ने अपनी उँगलियों पर बहुत घुमाया है!!

पहले हम आचरण में बदलाव के उस पहलू को लेते हैं जिसकी भूमिका समस्या के वास्तविक मनोविज्ञान में अधिक है. यह पक्ष है money power – धन की शक्ति. कुछ लोग यहाँ सत्ता को धन से अधिक बताना चाहेंगे. मगर मैं सत्ता को धन के ही अंतर्गत मानता हूँ.

हमारे समाज में (शिक्षित सभ्य समाज में अधिक) धन और सत्ता के बल पर हो रहे आचरण को कोई भी आसानी से पहचान सकता है. ये विशेष लक्षण पुरुषों के behaviour में अधिक दिखाई देते हैं. अब समानता के दौर में आप इन लक्षणों को स्त्रियों में भी देख सकते हैं.

उदाहरण के तौर पर, धनवान अथवा सत्ताधीश व्यक्ति (पुरुष हो या स्त्री) दूसरों के कल्याण-कार्यों में रुचि कम लेगा, दिखावा ज़्यादा करेगा. वह हमेशा दूसरों को एक ख़ास ‘टाईप’ की परिभाषा से आँकेगा. आपसे बात करेगा तो आँख मिलाकर बात करने में अपनी हेठी समझेगा. अपने बारे में उसे हमेशा यही लगेगा कि जो वह चाहे वह मिलना उसका जन्मजात अधिकार है. दूसरा कोई भी सामने हो तो वह सवाल किये बिना उसकी हर ज़रूरत को पूरा करने के लिए है. क्योंकि व्यवहार के जो नियम दूसरों के लिए हैं, वे उसपर लागू नहीं होते. गुस्सा तो जैसे उसकी नाक पर ही रखा रहता है और पलटवार के अंदाज़ में जवाब देने में ही उसकी श्रेष्ठता है! क़ानून कोई सा भी हो उसे तोड़ने में उसकी शान है! उसे तो कोई हाथ तक नहीं लगा सकता. वह क़ानून के ऊपर की सत्ता है. उसके ग़ैरक़ानूनी व्यवहार और धंधों में उसे वैसे ही दूसरे लोगों का साथ और समर्थन भी मिल जाता है.

पैसे और सत्ता वालों के बच्चे बचपन से ही ये सब लक्षण अपने माँ-बाप से सीखते रहते हैं. सत्ता बहुत लुभावनी होती है और बलपूर्वक अपनी ओर आकर्षित करती है. हिन्दू शास्त्रों ने तो सत्ता के जाल के फैलने को बताया ही इन शब्दों में है : “बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति”! इसीलिये power आदत डालने वाली चीज़ है. ज़्यादातर यह आदत नशों की होती है.

सबसे ख़ास बात तो यह है कि सत्ता की स्थिति में आने को प्रयत्नशील व्यक्ति हर तरह की सामाजिक हैसियत का इस्तेमाल करके वहाँ पहुंचता है और पहुँचते ही भूल जाता है कि अब उसे समाज के दूसरे व्यक्तियों के साथ कैसा व्यवहार करना उचित है. इस प्रक्रिया में उसने अगर कभी किसी का अहसान लिया होता है तो उसकी खिसियाहट मिटाने के लिए वह दुर्व्यवहार को नॉर्मल मानता है. कभी अहसान का बदला चुकाने के लिए अहसानकर्त्ता को उसकी ज़रूरत भी पड़ सकती है. ऐसे में उसे ऐसे काम भी करने पड़ते हैं जो वह नहीं करना चाहता!

जिस किसी ने अपने को किसी भी पावर की हैसियत में माना – पैसा, अधिकार और अफ़सरी, लेखक,बुद्धिजीवी, पत्रकार की हैसियत, कलाकार का दर्ज़ा, चर्च-मस्जिद-मंदिर का मठाधीश, आध्यात्मिक गुरु या बाबा, अत्यंत रूपवती स्त्री — समझ लीजिये कि उसके हाथों अपराध होने ही वाला है!

‘MeToo’ में जितने नाम सामने आए उनमें से क्या एक भी ऐसा है जो ऊपर दी गई शास्त्रीय परिभाषा से बाहर हो? लगता है एक भी पुरुष ‘चरित्रवान’ नहीं है! उन सबके आचरण के एक-एक detail विस्तार में बताकर क्या हासिल होगा? पैसे वाली और सत्ता में बैठी स्त्रियाँ क्या गुल खिलाती हैं, क्या उनके भी MeToo सामने लाये जाएँ? तब उससे क्या होगा? ‘घर की इज्ज़त’ पर हाथ डालने वाला तो मरा समझो! पकड़े जाने पर पुरुष की सम्पत्ति हो जाना इन स्त्रियों को स्वीकार हो जाता है ! पुरुषों के साथ-साथ white collar class की स्त्रियों का भी वही चरित्र है.

हम सब मिलकर स्वयं समाज को इस ‘गर्व करने योग्य’ स्थिति में ले गए थे. अब भी इरादा समाज को सही दिशा में ले जाने का है या नहीं?

जब तक पुरुष स्वयं को मालिक और स्त्री को संपत्ति मानने की गफ़लत में पड़ा रहेगा और सत्ता अथवा पैसे में खेल रही स्त्रियाँ पुरुष को कामना-पूर्ति का खिलौना बनाए रहेंगी, यह खेल ऐसे ही चलता रहेगा.

दूसरे को अपनी संपत्ति समझना बंद करो!

Behavioural pattern में परिवर्तन देखे जाने के लिए दूसरा क्षेत्र है सेक्स!

पैसा (सत्ता) और सेक्स ऐसी दो driving force हैं जो जीवन को चलाती हैं.

सेक्स के विषय में यह जान रखना काफी होगा कि यह जीवनदायिनी शक्ति भी है और जानलेवा बीमारी भी. इसीलिये सेक्स संबंधी तमाम विश्लेषण अक्सर एड्स व अन्य यौन-रोगों, contraceptive के उपयोग व सावधानियों आदि तक सिमट कर रह जाते हैं. दुर्भाग्य से इसके बारे में कोई सर्वमान्य-सार्वजनिक अध्ययन अथवा नियमावलि उपलब्ध नहीं है. यह कमोबेश एक व्यक्तिगत मामला ही समझा जाता रहा है. तथापि, 1980 के बाद के भारत को लेकर कुछ अध्ययन हुए हैं जिनके अनुसार लोगों की मानसिकता में sexuality को लेकर एक बड़ा बदलाव यह देखा जा रहा है कि जिन बातों को पहले ‘स्कैंडल’ का कारक माना जाता था, और जिन्हें दबा-छुपा देना ही ‘सामाजिक आचरण’ माना जाता था ताकि स्थापित चारित्रिक मानदंडों की अनुपालना होती रह सके, उन बातों को अब सहज-सामान्य की तरह स्वीकार किया जाने लगा है. वे सब बातें अब वर्जना नहीं रहीं. ले-देकर एक ‘Hite Report on Female Sexuality’ अवश्य उपलब्ध है, और 1975 से उपलब्ध है! 1981 में इन्हीं जर्मन मनोचिकित्सक महिला शेरे हाईट ने ‘Hite Report on Male Sexuality’ भी उपलब्ध कराई. ये दोनों रिपोर्ट हज़ारों-हज़ार स्त्री-पुरुषों को प्रश्नावली भेजकर और लिखित उत्तर प्राप्त करके तैयार की गईं और अब तक का सर्वाधिक ग्राह्य अध्ययन मानी गईं.

मगर भारतीय महिलाएं शायद इस परिवर्तन से भी अस्पर्शित ही रह गईं. या शायद किसी ने उनकी सुध नहीं ली. साहित्य, कला और सिनेमा ने उनके बारे में सोचा ज़रूर मगर वह नाकाफ़ी रहा. महेश भट्ट ने ‘आश्रम’ नाम की फिल्म बनाई जिसमें देवी हेमा मालिनी ने एक साध्वी की भूमिका निभाई थी. इस फ़िल्म में साध्वी के प्रेम (सेक्स?)-जीवन पर विचार किया गया. कुछ साल पहले “मारग्रेटा विद ए स्ट्रॉ’ अनुराग कश्यप कैंप से आई जिसमें सेरेब्रल पाल्सी का शिकार लड़की की सेक्स-लाईफ़ की चिंता की गई. ये दोनों हिन्दी फिल्में बेअसर रहीं क्योंकि इनकी नीयत साफ़ नहीं थी. 2010 के आसपास ‘थैंक्स माँ’ नाम की हिन्दी फ़िल्म आई थी जिसके बारे में शायद ज़्यादा लोग जानते तक नहीं. इसे कोरियोग्राफ़र कमाल के पुत्र इरफ़ान कमाल ने बनाया था. यह एक फ़िल्म मेरी राय में पूरी ईमानदारी से बनी फ़िल्म थी जिसने सेक्स के विषय में व्हाईट कॉलर क्लास और उच्च मध्यम वर्ग की दोगली मानसिकता को बुरी तरह उधेड़कर रख दिया था.

ये ‘MeToo’ ऐसी ही किसी मानसिकता में से निकलकर आ रहे हैं जिसे उधेड़कर ही हम किसी वास्तविक behavioural परिवर्तन का द्वार खोल पायेंगे.

महिलाओं को बुरा तो लगेगा, मगर अब यह कहना आवश्यक है कि वे चाह तो रही हैं कि अपने बारे में, अपनी ज़रूरतों के बारे में, और स्वयं को खुलकर अभिव्यक्त करें, मगर अब भी हिचकिचा रही हैं, डर रही हैं. अपने को असहाय और शोषित सिद्ध करने तक सीमित हो रही हैं.

दूसरी बात, जो महिलाएं अपना विवाहित जीवन व्यतीत करती दिख रही हैं, यदि उनके विवाहोपरांत परिवार के अंदर के ‘MeToo’ सामने लाये जाएं तो ये सुप्रकाशित ‘MeToo’ पीले पड़ जाएंगे! यदि वास्तव में स्त्री की ज़रूरतों को समझना है तो विवाहित सम्बन्धों में सच तलाश कीजिये. पड़ाव-दर-पड़ाव समस्या आपको वहाँ तम्बू गाड़े मिलेगी. पुरुष जो स्वयं को सत्ता का केन्द्र माने बैठा है, उसकी बेचारगी भी उजागर हो जाएगी. यह एक-पक्षीय ‘MeToo’ नौटंकी क्यों खुक्खल है, यह भी पता चल जाएगा.

इसमें संदेह नहीं कि स्त्रियाँ हर समाज का सर्वाधिक शोषित-उपेक्षित वर्ग रही हैं. हमेशा taken for granted! पुरुष अब भी ऐसे आचरण किये चला जा रहा है जैसे वही सत्ता है. वही है जो औरत को कुछ ‘देनेवाला’ है और स्त्री को उसका ‘दिया हुआ’ thankful होकर स्वीकार करते रहना चाहिए.

तो जनाब, सभी समझ लें, न तो पुरुष कुछ देने की हैसियत में है, न स्त्री उस दीनावस्था में है कि वह कुछ भी स्वीकार कर लेगी!

स्त्री की पूर्ण स्वतंत्र सत्ता तभी स्थापित होगी जब वह सब डर छोड़ देगी. सेक्स-predator कहलाने वाले पुरुष को उसे तत्काल ज़न्नाटेदार थप्पड़ से ‘कैश पेमेंट’ करना होगा. इसके अतिरिक्त दूसरा उपाय नहीं है. इन ‘MeToo’ विवरणों में केवल अपनी असहाय अवस्था की स्वीकृति है. महिलाओं को ऊपर इंगित किये गए सत्ताधारी के लक्षणों से बचकर दिखाना होगा और अपनी प्रत्येक संभावना को शिखर तक ले जाकर पूरे समाज में — स्त्री और पुरुष दोनों में — behavioural परिवर्त्तन को आने के लिए force करना होगा.

अभी तो बस धुआँ उठ रहा है!

महिलाएं छोड़ें यह धुआँ-धुआँ ज़िंदगी. पैसा (सत्ता) और किसी भी तरह का behavioural pattern वह दहकता अंगारा है जिसमें से धुआँ नहीं निकला करता. वहाँ केवल सुलगती आँच होती है! उस आँच से हाथ सेंकना-न सेंकना पूरी तरह से स्त्री की अपनी स्वतंत्रता है!

चलते-चलते मैं स्वर्गीय इंदिराजी से पुनः क्षमा-याचना करूंगा. वह जो भी थीं, जैसी भी थीं – अच्छी या बुरी – इस या ऐसे अन्य प्रसंगों के बिना भी वैसी थीं.

और यह सत्य एक सिरे से सब पर लागू होता है!

15-10-2018

Dissent


सुना है भारतीय सुप्रीम कोर्ट के असहमति के लोकतन्त्र का सेफ़्टी वाल्व होने वाली बात को बी बी सी भी ले उड़ा है.
असहमति और सेफ़्टी वाल्व की भी ख़ूब कही! जब मैं किसी को सोशल मीडिया पर वन्देमातरम् या भारत माता की जय भेजता हूँ तो मुझे घनघोर गँवार, पिछड़ी सोच वाले कट्टर की पदवी अता फ़रमाई जाती है.
वंदेमातरम् से असहमति सेफ़्टी वाल्व है या यह असहमति सेफ़्टी वाल्व को ही फोड़े डाल रही है?
हज़रत मुहम्मद कहा करते थे मुझे पूरब से (तब अरबी-फ़ारसी में हिंदशब्द नहीं चला होगा) ठंडी हवाएं मिलती हैं.
मलयज शीतलां!
इससे असहमति सेफ़्टी वाल्व है या ईश-निंदा है?
असहमति क्या है, इसे मैं ऐसे समझ पाया हूँ:
कथा इस प्रकार है कि किसी समय वाजश्रवा ऋषि के पुत्र वाजश्रवस उद्दालक मुनि ने विश्वजित यज्ञ करके अपना सम्पूर्ण धन और गौएं दान कर दीं. जिस समय ऋत्विजों द्वारा दक्षिणा में प्राप्त वे गौएं ले जाई जा रही थीं, तब उन्हें देखकर उद्दालक मुनि का पुत्र नचिकेता सोच में पड़ गया; क्योंकि वे गौएं अत्यधिक जर्जर हो चुकी थीं. वे न तो दूध देने योग्य थीं, न प्रजनन के लिए उपयुक्त थीं. उसने सोचा कि इस प्रकार की गौओं को दान करना दूसरों पर भार लादना है. इससे तो पाप ही लगेगा.
ऐसा विचार कर नचिकेता ने अपने पिता से कहा-हे तात! इससे अच्छा तो था कि आप मुझे ही दान में दे देते.
बार-बार उसके ऐसा कहने पर पिता ने क्रोधित होकर कह दिया-मैं तुझे मृत्यु को देता हूं.
पुत्र के इस असहमति-कथन से कठोपनिषद्का जन्म हुआ.
उपनिषद् अपनी जगह. बात निकलती है तो हमेशा दूर तलक जाती है.
पिता ने क्रोध में भरकर ऐसा धौल जमाया होगा कि गिरकर बेटा मर गया! मृत्यु को दे दिया गया.
अब से अस्सी-सौ साल पहले की बात है, या शायद उसके भी पहले की, राजस्थान के टोंक ज़िले के एक मौलवी साहब थे. अरबी-फ़ारसी पढ़ाते थे. बेहद चरित्रवान् और कठोर अनुशासन का पालन करने-कराने वाले. गुस्सैल भी एकदम परले दर्ज़े के. आस-पास के सब गाँवों के हिंदू हों कि मुसलमान उन्हें बहुत मानते थे. इज़्ज़त किये जाने योग्य लोग कैसे होते हैं, उसका साक्षात् रूप थे वह मौलवी साहब.
एक बार कुछ ऐसा हुआ कि अनेक बार सिखाने पर भी एक लड़के ने नहीं ही सीखकर दिया. क्रुद्ध ऋषि-तुल्य मौलवी साहब ने ऐसा धौल जमाया कि लड़का गिरा और सिर की चोट से पट से मर गया.
एक बार फिर पिताने पुत्र को मृत्यु को दे दिया!
लड़के के माँ-बाप के होठों पर शिकायत का एक लफ़्ज़ नहीं. गाँव वालों की ज़ुबान पर जो हुआ उसके लिए कोई असहमति नहीं. मौलवी साहब उन क़दों में से थे जो असहमतियों से कहीं ऊँचे होते हैं. उनकी ख़ुद की नम आँखें किसी उपनिषद् से कम न थीं.
फिर आता है 1947. उस समय के ब्रिटिश प्रधान मंत्री ऐटली से पत्रकारों ने पूछा कि अभी 5 वर्ष पहले ही गाँधी का भारत छोड़ोफ़ेल हुआ है और आप 1948 में भारत को सत्ता हस्तांतरण का फ़ैसला ले रहे हैं. कारण?
ऐटली ने कहा, भारत की आज़ादी में गाँधी और कॉंग्रेस का रोल minimal है. (यह ‘minimal’ शब्द ऐटली का है.)
तो फिर?
ऐटली ने खुलासा किया कि हिटलर के साथ युद्ध में हमारी कमर टूट चुकी है. हिंदुस्तान पर कब्ज़ा बनाये रखने के लिए हम अपने सैनिक वहाँ रखने में असमर्थ हो चुके हैं. हमें हिंदुस्तान की ही फ़ौज से काम लेना होगा. मगर हिंदुस्तानियों की सेना में सुभाषचंद्र बोस ने कुछ ऐसी चिंगारी भर दी है कि वह अब हमारे भरोसे की नहीं रही.
इस अवसर पर अगर गाँधीजी कह देते कि नहीं चाहिये हमें आज़ादी. मगर बँटवारा किसी हाल में मंज़ूर नहींआज़ादी हमें तब भी मिलने ही वाली थी!
मगर नहीं. जवाहर लाल ने कहने नहीं दिया. जवाहर को प्रधानमंत्री बनने और भाईशेख़ अब्दुल्ला को कश्मीर का प्रधान मंत्रीबनाने की जल्दी थी.
जवाहर-माऊंटबेटन की सिफ़ारिश पर 1948 की जगह उसके एक साल पहले 1947 में इंशा अल्ला, भारत तेरे टुकड़े होंगेगाते हुए देश का विभाजन यानी ‘ग़ज़वा-ए-हिन्द’ हुआ.
कराची की अपनी प्रेस कांफ्रेंस में जिन्नाह ने कहा: “मुझे कल्पना नहीं थी कि अलग पाकिस्तान बनने का मेरा सपना कभी पूरा होगा.
जवाहर ने अंगरेज़ों को वचन दिया कि सुभाषचंद्र को पकड़कर युद्ध अपराधीके तौर पर उनके हवाले कर दिया जायेगा!
कांग्रेस का पूरा इतिहास freedom struggle का नहीं, Partition Struggle का है. जो थोड़ा-बहुत नोटिस लिया जा सकता है सो गाँधीजी के कारण.
गांधीजी नि:संदेह एक महान् व्यक्ति थे. किन्तु 1947 के बाद से ही वह अवांछित पाये जाने लगे थे. उन्होंने कहा कांग्रेस को समेट दो. नहीं माना. उन्होंने कहा देश का झंडा तिरंगा मत बनाओ. बीच के सफ़ेद पर कांग्रेस के चरखे से संभ्रम पैदा होगा. नहीं माना. जिस किसी ने तिरंगा फहराने से इनकार किया वह यही चरखे वाला तिरंगा था!
गांधी जी कभी कुछ कहना चाहते तो जवाहर से दो-टूक जवाब मिलता — मुझे मेरा काम करने दीजिये!
या तो जवाहर से गांधी जी की कोई नस दबती थी, या फिर वह जानते थे कि जवाहर ठीक आदमी नहीं है. इसे प्रधानमंत्री न बनाकर पटेल को बनने दिया तो यह अंग्रेजों वाली जाने कौन-कौन सी असहमतियाँ उठाकर आज़ाद हिंदुस्तान का जीना हराम कर देगा. लिहाज़ा उन्होंने पटेल के पक्ष में हुए कांग्रेस कार्यकारिणी के फैसले के बावजूद पटेल से अपना नाम वापिस लेने को कह दिया.
और वीर जवाहर प्रधानमंत्री हुए!

इन ‘पिताजी’ पर सबको बहुत भरोसा था. जो वह कहें सो सच! उन्होंने कहा था बँटवारा मेरी लाश पर होगा. दस लाख या शायद ज़्यादा लाशें बिछ गयीं. देश टूट गया. बँटवारा हो गया. मगर पिताजी की लाश इन लाशों में ढूँढे न मिली! 30 जनवरी, 1948 तक नहीं मिली.
अब यह तो ज़रूरी नहीं कि हर वक्त पिता लोग ही पुत्र को मृत्यु को देते चले जाएंगे.

इस बार एक पुत्र ने पिता को मृत्यु को दे डाला! पिता को मिथ्या कथन के पाप से बचा लिया.
यम-गांधी-संवाद से निकला धर्मनिरपेक्षोपनिषद्‘. टंकलेखन: जवाहर लाल नेहरू.

प्रधानमंत्री मोदीजी ऐसा कहने पर मुझे कभी क्षमा नहीं करेंगे. फिर भी वह मेरे अनादर का लक्ष्य नहीं होंगे. क्योंकि मैंने उनसे क्षमा माँगी ही नहीं है. यों भी, वह देशहित को पूर्णतः समर्पित हैं. उनका काम मुझे दी जाने वाली क्षमा से कहीं अधिक बड़ा है.

जवाहर को हिंदुओं के जीने-मरने से तो कुछ लेना देना था नहीं — साफ़ कह दिया I am Hindu by accident of birth . इतने मुसलमान मारे गये, इस कलंक को ढाँपने के लिए इन्होंने धर्म निरपेक्षता नाम का कंबल बुना. धर्मनिरपेक्षता कोई राजनैतिक सिद्धांत नहीं है. अपनी guilt को पूरने के लिए कांग्रेस द्वारा आचरित act of compensation है.
हम किसानों का देश हैं. हमें नहीं तो किसे मालूम होना चाहिये कि मूल फ़सल के लिए घातक फ़ालतू पौधे (weeds) लाख चिल्लाते रहें कि हम गेहूँ, मकई, बाजरा, ज्वार, चावल, गन्ना, शलजम, गाजर, मूली, टमाटर से असहमत हैं और असहमति लोकतंत्र का सेफ़्टी वाल्व है! फिर भी इन्हें उखाड़ फेंकना ही कृषि का वैज्ञानिक धर्म है.
तवे पर सिकती रोटी देखी है न? फूलती है और एक बारीक पपड़ी बना देती है. यही पपड़ी है असहमति‘ — दूसरा विचार. इसे घी से चुपड़ा जाता है. मूल सहित यह दूसरा विचार पूरी रोटी को स्वादिष्ट और पोषक बना देता है.
वेद से असहमति हुई तो उपनिषद् आये. उपनिषदों से भी आगे चले तो धम्म ने मार्ग दिखाया. और भी आगे पश्चिम में Judaism में जो नया विचार आया उससे हमें जीसस मिले. यीशु धर्म में मूर्त्ति का इस्तेमाल कर शोषण होने लगा और असहमति की ज़रूरत लगी तो इस्लाम आया. ईसाइयत के मुकाबले इस्लाम कहीं ज़्यादा क्रांतिकारी कदम था जिसे कठमुल्ले बर्बाद करने पर तुले हुए हैं.
ये कुछ वे असहमतियाँ हैं जिन्होंने मूल को सदा समृद्ध किया और पूरी मानवता का सेफ़्टी वाल्व बनीं.
हमारी असहमतियों की विकास-गाथा बहुत भोंडी और पिटने योग्य है.
नेहरू के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वाले शख़्स का नाम था लोहिया. नेहरू क्या कहता था या करता था और लोहिया को क्या कष्ट था, ये दो बातें आज तक किसी को नहीं मालूम.
मुझे मालूम हैं.
दो बातें.
एक- नेहरू की अंतिम यात्रा पर अशोक वाजपेयी (news reader) द्वारा रो-रोकर रेडियो पर रनिंग कमेंट्री किये जाने तक हम हिंदुस्तानी पूरे-पूरे नेहरू-भक्त रहे. प्रधानमंत्री वीर जवाहर का बाल भी बाँका न हुआ.
दूसरी बात- सुविधानुसार बीच-बीच में हम ही थे जो आज़ाद हिंदुस्तान की रेंग निकली नेहरुयाई गाड़ी से उतरे बिना लोहिया-लोहियाभी गुहार लेते थे. नेहरू को तो हिंदुस्तान से कुछ लेना-देना था नहीं. (हमें भी दरअसल है नहीं.) नेहरू आधुनिकथा. लोहिया को हिंदुस्तान से लेना-देना था सो नेहरू की गोद में बैठे-बैठे लोहिया को भज लेने में हम लोग हिंदुस्तानी सरोकार के साथ बस सेल्फ़ी खींच लिया करते थे.
लोहिया को नेहरू के ख़िलाफ़ कष्ट क्या था, नहीं मालूम. असहमति क्या थी, नहीं जानते.
फिर आगे कभी हम समझदारों में से एक और निकला– जे.पी., जिसने उन दिनों भारतीय सेना को विद्रोह के लिए आमंत्रण दिया.
बस हम जेपी-जेपी-जेपीभजने लगे.
जे.पी. को कष्ट क्या था नहीं मालूम. असहमति क्या होती है, नहीं जानते.
हमें यह ज़रूर मालूम है कि कहने वाले कहते हैं इमर्जन्सी में जो कष्ट था, वह आज भी है. इमरजेंसी क्या बुरी थी?
मुर्दा ढोने वालों का कंधा थकने पर वे जैसे कंधा बदलते हैं वैसे हम भी असहमति की शेख़ी बघारते आये हैं. कंधा बदलते आये हैं. नेहरू-लोहिया-इंदिरा-जेपी-मनमोहनसिंह-अण्णा हजारे हमारे कंधों के नाम हैं.
असहमतिकारों को आख़िर कष्ट क्या है? कभी तो हिंदुस्तान की अरथी मरघट तक पहुंचा लेने का हौसला रखें.
अब हम असहमत या सहमत होने के फेर में मोदी-मोदी जप रहे हैं. बस इतना कहने की ईमानदारी नहीं बरत रहे कि हे मोदी! हम इमरजेंसी में और मनमोहन के टाईम में बहुत ख़ुश थे. तू वैसा-वैसा ही कर जैसा-जैसा इंदिरा और मनमोहन किया करते थे!

अगर जवाहरलाल, इंदिरा और मनमोहन सिंह से हमारी असहमति सिर्फ़ शौकिया थी तो यह समय शौक छाँटने का नहीं है.
नदिया किनारे हेराय आयी कंगना!
सच की सूई हेराने के बाद भूसे के ढेर में ढूंढेंगे तो रद्दी अख़बार के सिवा और क्या निकलेगा?
करना-धरना तो हमें कुछ है नहीं सो चलो कंधा ही बदलें!
अब हमारा फ़ैशन ही गला-फाड़ असहमति का हो गया है – बिना कुछ जाने, सोचे, समझे — तो रद्दी अखबार का ढेर और बी बी सी भी क्या करे!
असहमति का विचार केवल वह होता है जो मूल को पोषण और समृद्धि दे पाये. फिर वह चाहे कितना ही अलग अथवा क्रांतिकारी विचार क्यों न हो.
जो ऐसा करने में असमर्थ होने के कारण मूल के विनाश को dissent की संज्ञा देते हों उन फ़ालतू पौधों को खुरपी-दराती से उखाड़ कर नष्ट कर दिये जाने के लिए तैयार रहना चाहिये.

09-10-2018

Food Moms cook


Indian kitchens are the perfect laboratory for health services.

We Indians, when asked what was worth eating, used to promptly tell: ‘पयं पक्वा घृतं पक्वा’ – that which was either cooked in milk or with butter oil (ghee). This penchant for milk and ghee has been so striking that there was a saying – “काम घी का, नाम बड़ी बहू का!”

The खूसट elders were so gourmandised with ghee as not to acknowledge any cooking merit in the daughter-in-law the senior, although happy with the food.

Yet, one thing was certain, confirmed with the burp after food.

They recollected what their mother used to cook for them!

Cooking is a great art of communication.

Nothing but a mother substantiates it.

Mothers, more so Indian mothers, know by each of their instincts what ingredients and spices were required for which food, and in what quantity. Mothers know they cook for their child, the most precious part of her existence that had come out of her. A mother is in unbroken communication with the broth, as if the dish itself whispered in her ears “now DO this!!”

What along with the greatest of spices she puts into the cooking stock is — all her love, every drop of it; all the care, every iota of it; and all the affection, every element of it!.

The flavours and aroma of whatever my mother ever cooked for us — the brothers and the sister, are still part of my being.

I am no great eater but at times I feel a compulsion to try my hand at THAT cooking and with the same art of communication with the solid food which my mother prepared.

I exactly copy what my mother used to give us to eat.

But alas! it still WAS not the same!!

Because I don’t know where from to gather all that love, care and affection which only a mother oozes.

Was that how our father more often missed our grandma’s cooking, and grandpa greatgrandma’s?

यदि हम सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम् भोजन के तृप्तिपूर्वक ग्रहण का मूल्य न समझें तो भगवान् त्र्यंबक भी हमें रोग और मृत्यु से मोक्ष प्रदान कर अमृतत्व कैसे दे पायेंगे?

Jai Ma!

06-10-2018

Bhasha Ki Naak Par Rumaal


प्रभु जोशी निःसन्देह सर्जनात्मक प्रतिभा के धनी हैं. भारत सरकार के ‘स्वच्छता-अभियान’ पर रेडियो-चैनलों के ताबड़तोड़ विज्ञापनों पर खफ़ा होकर उन्हें लगा कि अब यह भाषा की नाक पर रूमाल रखने का समय है. पूरा ठीकरा जोशीजी ने ‘विविध भारती’ के सिर फोड़ा है. उन्हें लगा कि ‘हुज़ूर’ (सरकार) के कहते ही मीडिया के ‘कम-अक्ल कारिंदे’ विज्ञापन बनाते समय ‘सांस्कृतिक भद्रता’ को क्रूरता से कुचल डालते हैं और विज्ञापन की ‘अर्थ-ध्वनि’ शर्मिंदा कर जाती है.

‘विज्ञापनी-बुद्धि’ पर प्रभु जोशी का गुस्सा जायज़ है. मगर जैसे समय पर न्याय न देना न्याय से इनकार है, समय पर गुस्सा न करना भी एक लाचार किस्म की करुणा है.

रेडियो के एफ.एम. चैनलों की स्पर्धा में जब ‘सांस्कृतिक भद्रता’ को कपड़े उतारने को कहा जा रहा था ताकि ‘कमाई’ हो सके, गुस्से की घड़ी तो तब थी. नहीं क्या? अब दिखाई जा रही झुंझलाहट से तो लग रहा है कि देश को स्वच्छ रखने की पूरी सरकारी बात ही गुस्सा होने जैसी है.

यों भी एफ.एम. तकनीक पाश्चात्य symphony और उस तरह के संगीत के विस्तार की अनुकूलता में है जिसमें सैंकड़ों साज़ रहते हैं. मानो कोई तैर कर इंग्लिश चैनल पार कर रहा हो. भारतीय शास्त्रीय अथवा लोक-संगीत में एफ.एम. कहाँ चाहिये? यहाँ तो कुशल गोताखोर को गहरे में डुबकी लगानी होती है!
तैरने वाले को मेडल मिलता है. गोताखोर मोती लाता है.
सोचने जैसा है कि टेक्नोलोजी एक सांस्कृतिक मुद्दा भी है!

ख़ैर.

अब प्रभु, ऐसा लगता नहीं कि यह मसला आज का है. ऐसा भी नहीं लगता कि मसला सरकारी है. बात रेडियो-टी.वी. और विज्ञापनबाज़ी भर की नहीं है. रेडियो में अगर सिर्फ़ आकाशवाणी और टी.वी. में बस दूरदर्शन होता, सो भी सरकारी नियंत्रण में, तो मसला सरकारी हो सकता था. बात है मीडिया के उपयोग-सदुपयोग-दुरुपयोग की. मीडिया यानी माध्यम यानी अभिव्यक्ति. बात है अभिव्यक्ति की आज़ादी की.

अभिव्यक्ति की आज़ादी या अभिव्यक्ति की ज़िम्मेदारी? शायद Freedom of expression जैसा कुछ होता नहीं, जो भी है वह responsibility of expression होता है. इस संदर्भ में कोई कह रहा था कि आज यदि कबीर आ जाये तो क्या उस पर भी रोक लगाने की नौबत नहीं आ जाएगी? फिर संजय लीला भंसाली या श्याम बेनेगल को अभिव्यक्ति की आज़ादी क्यों न हो?

प्रश्न इस रूप में विचारणीय है ही नहीं.

सोचिए, अगर श्याम बेनेगल दाल-रोटी के लिए बिजली कंपनी में बिल-क्लर्क की नौकरी करते हों और अभिव्यक्ति के लिए फ़िल्म बनाते हों तो और बात होगी. कबीर दाल-रोटी के लिए कपड़ा बुनते थे, दोहे लिखकर दाँव पर नहीं लगाते थे. कबीर पर रोक कभी लग ही नहीं सकती. करोड़ों दाँव पर लगे हों तो कभी भी कॉम्प्रोमाइज़ की सिचुएशन आ सकती है (जिसे commitment कहते हैं, वह आज़ादी का इस नाम से कॉम्प्रोमाइज़ है), इसलिए freedom of expression या responsibility of expression का सवाल उठेगा ही उठेगा. मामला माध्यमों के इस्तेमाल का है और इसे चलताऊ, सतही या तात्कालिक प्रतिक्रिया की तरह handle करना अनुचित होगा.

जिन दिनों रेडियो में अनाप-शनाप एफ़ एम चैनलों पर काम चल रहा था, (और टी वी में उसके तमाम चैनलों पर), तब इनके समर्थन में बहुत बातें बनाई जाती थीं. किन्तु तीन तर्क विशेष रूप से दिये जाते थे. एक तो यह कि ढेरों छिपा टेलेंट सामने आयेगा. दूसरे, असंख्य लोगों को रोज़गार मिलेगा. तीसरे, रेवेन्यू लाकर माध्यमों को आर्थिक आत्मनिर्भरता दी जा सकेगी. यह सामने आया टेलेंट ही है जो ‘अब तक फंसी’ हुई जतलाकर साउण्ड इफ़ेक्ट भी देता है. टेलेंट न हुआ मूँगफली हो गई कि ठेले से उठाओ और दाने निकाल लो!

रही बात रोज़गार की, सो इसी देश ने सदियों तक शौच को एक जाति-विशेष के पेट भरने से जोड़े रखा. अब कम से कम शौच का धंधा पेट भरने के लिए वर्णाश्रम से तो बाहर आया!

इतना ही नहीं. एक pathologist काम करते हुए stool test (हिन्दी में लिखने में ‘टेस्ट’ हुआ जा रहा है!) के लिए स्लाइड तैयार कर रहा था और stool को काँच की स्लाइड पर पोत रहा था. पास खड़े देख रहे मित्र ने पूछा, “यह क्या कर रहे हो?” उसने बताया, “यार, हम इसी की तो रोटी खाते हैं”.

नाक पर रूमाल तो ठीक, पर जाने कितनों ही के पेट पर लात क्यों मार रहे हैं?

भाषा की नाक पर रूमाल उसी दिन आ गया था जब गुलाब को खाद का रक्त चूसने वाला ‘कैपिटलिस्ट’ कहकर महामना निरालाजी ने ‘अबे अशिष्ट’ को काव्य की भाषा में शामिल कर लिया था.

यह तो कुछ भी नहीं. आगे चलकर अज्ञेयजी के संपादकत्व में निकलने वाले साप्ताहिक ‘दिनमान’ में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने जो लूप फ़िट कराने वाली औरत की “धागे निकलते हैं” की तकलीफ़ का खुलासा किया था, भाषा की नाक पर रूमाल तो तब भी था. ऐसा नहीं कि केवल विविध भारती के उद्घोषक ही नाक पर रूमाल थोपने के ज़िम्मेदार हैं.

और, रूमाल नहीं, भाषा की नाक पर उस दिन कपड़े का पूरा थान आ गिरा था जब हमने हिन्द पाकेट बुक्स का विज्ञापन देखा था – ‘हिन्दी में पहली बार – किसी उपन्यास की एक साथ पाँच लाख प्रतियाँ’.
वह महान ‘साहित्यिक’ रचना थी ‘झील के उस पार’, लेखक गुलशन नंदा. एकता कपूर के टी वी सीरियल इसका ही अगला कदम होने को थे!

मीडियाकर्मियों, विशेषतः बुद्धिजीवियों को कभी सूझा ही नहीं कि वे आनन्द बक्शी नहीं, जयशंकर प्रसाद या अज्ञेय हैं, वे गुलशन नंदा नहीं, इलाचन्द्र जोशी या वृन्दावन लाल वर्मा हैं! ज़रा सोचिए, भाषा, नाक, संस्कृति, सभ्यता, साहित्य, रचनाधर्मिता, रूमाल, कफ़न सब मीडिया के Mall में उस दिन एक साथ बिराजेंगे जब हिन्दी साहित्य के इतिहास में पंत-प्रसाद-निराला और आनंद बक्शी तथा राजेंद्र यादव और गुलशन नंदा एक साथ बखाने जाएंगे!

लूप से ध्यान में आया, हमारे देश की बहुत निंदा इस बात पर हुई थी कि नाक और रूमाल के रिश्ते के चलते इस देश को परिवार-नियोजन (नाक के इसी चक्कर में इसे परिवार-कल्याण कहना पड़ा) पर — नसबंदी, लूप, कंडोम पर — ‘खुलकर’ बात करने में साठ बरस लग गए! अब एक ‘नीच किस्म के आदमी’ ने शौचालय का मुद्दा उठा ही लिया है तो मणिशंकर अय्यर वाला छद्म-ब्राह्मणवाद भाषा बदलकर क्यों बोल रहा है? इसमें भी आगे और साठ साल? क्यों भई ?

संस्कार की चर्चा किए बिना बात पूरी नहीं होगी. एक वक्त था कि वी. शांताराम की फ़िल्म ‘स्त्री’ में पं. भरत व्यास का गीत था – ‘आज मधु वातास डोले’. इस गीत में दुष्यंत शकुंतला पर मोहित हुआ कह रहा है –“मैं कहूँ कुछ कान में तुम जानकर अनजान कर लो”. दुष्यंत ने शकुंतला के कान में ऐसा क्या कहा जिसे जानकर उसे अनजान करना है? हमारे बुद्धिजीवी, शिक्षक और संस्कार के ठेकेदार स्तर को यहाँ तक घसीट लाये हैं कि इसे समझने के लिए ‘मैनफोर्स’ कंडोम का विज्ञापन देखना पड़ेगा. अगर इस सुसंस्कृत गीत के बल पर कंडोम बेचने की कोशिश करेंगे तो एक भी नहीं बिकेगा! तब इसके लिए भी पं. नरेन्द्र शर्मा वाली विविध भारती ज़िम्मेदार?

दुष्यंत ने शकुंतला से इसी गीत में ‘चिर लजीली लाज का पट’ खोलने को भी कहा है!

कहाँ-कहाँ रूमाल रखेंगे?

विज्ञापन की तो हद यह है कि कोई भी कार छोरी की फोटू के बिना बिकती ही नहीं! जानते हैं क्यों?
आज औरत एक बहुत बड़ी आर्थिक शक्ति बन रही है. परंपरावादी पुरुष मानसिकता को अपनी मुट्ठी ढीली होती दिख रही है. उसकी हरचंद कोशिश है कि अर्थ-शक्ति और आर्थिक निर्णय औरत के हाथ में न जायें. मीडिया, विज्ञापन, प्रचार-प्रसार को सम्मानजनक दुनिया घोषित करके औरत को यों ही अर्थोपार्जन में भटकाये रखो और ख़ुद इस तरह ‘इज्ज़त की रोटी’ खाते रहो!

यह है मीडिया का रूमाल जो भाषा की नाक पर रखा भले दिखाई पड़ता हो, दरअसल कटी नाक छिपा रहा है!

मीडिया को, और शिक्षा को, धंधा बनाने को किसने कहा था?

संस्कृति सिर्फ़ नाक पर रखा रूमाल नहीं, हाथ में उठाया जूता भी होनी चाहिए!

04-10-2018