ध्रुवीकरण


बीजेपी ने ध्रुवीकरण की हद्द कर दी!

कुछ लोगों का ऐसा कहना है.

बीजेपी के साथ इसे जोड़ना यह स्थापित करने में काम आएगा कि ‘ध्रुवीकरण’ ऐसी गाली है जिसे मोदीजी को दी जाने वाली गालियों के अम्बार में मुट्ठी-भर और डालने के लिए बचाकर रख लिया जाए.

‘ध्रुवीकरण’ गाली इसलिए है कि यह समाज में मौजूद अच्छे-ख़ासे अनेकानेक मतभेदों का कुछ ऐसा पनीर जैसा बना देता है जिससे लोग आसानी से ‘हम’ बनाम ‘वो’ करने-कहने में सक्षम हो जाते हैं! तब इन विभिन्न मत-वादों के लिए चिल्ला-चिल्लाकर कहना पड़ता है कि इनकी मौजूदगी बहुत नॉर्मल-सी बात होनी चाहिए थी, ‘हम-वो’ से दूध फाड़कर पनीर क्यों?

कोई-कोई ध्रुवीकरण के लाभ भी बताता है. सो यों कि किसी एक राजनैतिक दृष्टि का चयन आसान हो जाने से लोकतन्त्र में लोगों की राजनैतिक हिस्सेदारी बढ़ती है और राजनैतिक पार्टियाँ मज़बूत बनती हैं.

इस तरह मुँह में कई-कई ज़ुबान रखने वाले लोग ‘हिन्दू-मुसलमान’-‘हिन्दू-मुसलमान’ करना और निशान बीजेपी के गाल पर लगा देना अपने लिए आसान बना लेते हैं.

बीजेपी की बीजेपी जाने, हमें क्या मतलब? हमें सरोकार है अपने देश और उसके लोगों से. ईमानदारी से ‘राष्ट्र प्रथम’ हो जाये तो ठीक क्या और ग़लत क्या अपने आप हमें मालूम होता चलता है. जो ठीक के पक्ष में होते हैं, ‘ठीक’ ऑटोमेटिकली उनके पाले में चला जाता है, और ‘ग़लत’ ग़लत वालों के पाले में. कसौटी हमेशा यह रहती है कि ‘राष्ट्र प्रथम’ है या नहीं, या फिर मेरे सुने-सुनाये मत-वाद के लिए सोच-समझ के बिना हो रही मेरी बयानबाज़ी महत्त्वपूर्ण है! इस कसौटी को कोई भी कभी भी आज़मा देखे. ‘स्वयं’ से बाहर आए बिना ‘कसौटी’ की स्वीकृति नहीं होती, नहीं हो सकती.

देखा जाए तो ध्रुवीकरण कब और कहाँ नहीं रहा? ‘कम्यूनिज़्म’ और ‘लोकतन्त्र’ दो ध्रुव नहीं थे? या फिर ‘उदारवाद’ और ‘रूढ़िवाद’? ‘समाजवाद’ और ‘पूँजीवाद’ को क्या कहेंगे? या छोड़िए, सीधे-सीधे कहते हैं – ‘ग़रीब’ और ‘अमीर’? ये दो ध्रुव नहीं हैं? मार्क्सवादी शब्दों में ‘सर्वहारा’ और ‘बूर्जुआ’ दो ध्रुव नहीं तो और क्या थे? या ‘मालिक’ और ‘मज़दूर’? और, आज तक जो ‘औद्योगीकरण’ बनाम ‘कृषि-कृषि’ खेला गया, क्या वह ध्रुवीकरण नहीं था? और भारत जिस ‘साम्राज्यवाद’ से जूझते हुए ‘राष्ट्रवाद’ में से गुज़रकर आज़ाद हुआ सो? जिसे ‘तीसरी दुनिया’ कहकर ‘अमेरिकी-सोवियत ब्लॉक’ के मुक़ाबिल खड़ा करने की कोशिश हुई उसे ध्रुवीकरण कहेंगे या नहीं? अस्सी-सौ साल पहले लड़े गए विश्वयुद्धों में ‘मित्र-राष्ट्र’ बनाम ‘धुरी-राष्ट्र’ दो ध्रुव नहीं थे? फिर उसके बाद ‘नाटो’ बनाम ‘सोवियत’?

सच कहें तो मानव-सभ्यता सदा इतने सब ध्रुवों में से गुज़री है तब जाकर किसी या किन्हीं परिणामों पर पहुँची है. 

तब हिन्दू-मुसलमान के ध्रुवीकरण से क्या?

क्षमा कीजिये, ऐसा कोई ध्रुवीकरण है ही नहीं! होता तो किसी परिणाम पर पहुँचने की सोची जा सकती थी! 1947 में मज़हब को एक ध्रुव बताकर ज़बर्दस्ती भारत का जो विभाजन किया गया वह परिणाम पर नहीं, दुष्परिणाम पर पहुँचने जैसा था!! ‘दार-अल-इस्लाम’ (मुसलमानों की ज़मीन) के हासिल को ‘परिणाम पर पहुँचना’ मानने वाले कौन लोग हैं?

अब तक मैं भी ‘धर्मनिरपेक्षता’ वाला एक बौड़म हुआ करता था. मगर लगातार कई महीनों तक चलने वाले दिल्ली  के शाहीनबाग़ वाले कब्ज़े ने बहुत कुछ साफ़-साफ़ दिखा दिया है. यह कब्ज़ा न तो कोई आंदोलन था, न जन-आंदोलन, न प्रदर्शन, न विरोध-प्रदर्शन और न कोई संवैधानिक अधिकार. यह भदेस क़िस्म की मुसलमानी इस्लामिक ताक़त का दिखावा मात्र था, जिसकी न ज़रूरत थी, न औचित्य. यह निरर्थक हड़बोंग अराजक और ग़ैर-संवैधानिक थी जिसने expose कर दिया मुसलमान हमेशा ग़लत क्यों होते हैं.

यदि किसी की अन्तड़ियाँ कुलबुलाने लगी हों कि यह तो मुस्लिम-विरोधी बात होने लगी, वह आगे पढ़ना बन्द करने को स्वतंत्र है. उसे फिर कभी मित्र-भाव से न देखा जा सकेगा. इसके लिए मैं स्वतन्त्र हूँ. मित्र-भाव के लोप का कारण मुसलमानों का पक्ष या विरोध नहीं बल्कि ऐसे लोगों के दिलो-दिमाग़ में ‘राष्ट्र प्रथम’ की कसौटी का न होना है. मुसलमानों को लेकर तो अभी पूरी-पूरी और खुली बात करना बाक़ी है. राष्ट्र-द्रोही जो बोलते हैं, उनके बोलने का क्या?

या तो जो हैं ना-फ़हम वो बोलते हैं इन दिनों,

या जिन्हें ख़ामोश रहने की सज़ा मालूम है.

तय कैसे होगा इन लोगों में राष्ट्र-भाव है या नहीं? उसके लिए रॉकेट-साइंस की कहाँ ज़रूरत है?

देश के लिए जब सही दिशा में काम होता हो तब भी रोड़े अटकाते चले जाना और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के साथ खड़े होने के लिए सौ तरह के जस्टीफ़िकेशन दिये चले जाना क्या इंगित करता है?

कभी सिराजुद्दौला को अंग्रेज़ों से पिटवाकर ख़ुद बंगाल का नवाब बन जाने वाला मीर जाफ़र हुआ था. उसके पहले पृथ्वीराज चौहान को हराने के लिए पिटे हुए मुहम्मद गौरी को न्योतने वाला जयचंद भी हुआ था. उसके भी पहले आम्भीक (आम्भी) — राजा पुरुवास (पोरस) के विरुद्ध सिकंदर की मदद करने वाला — हो ही चुका था. इन सबके पहले विभीषण की भी कथा हम सब जानते हैं जिसे स्वयं राम-भक्तों ने ‘घर का भेदी’ कहा था. इन सभी के पास देश-द्रोह के लिए अपने-अपने justification मौजूद थे. इन्हें किसी और ने नहीं, मार्क्सी इतिहासकारों ने अपने इतिहास-पोथों में ‘देशद्रोही’ की संज्ञा दी थी. ऐसा कैसे कि इन सबके जस्टीफ़िकेशन तब तो ग़लत थे, मगर आज के मार्क्सवादी एक्टिविस्ट रणबाँकुरों की ज़ुबान से उच्चरित होते ही वही सारे देश-विरोधी तर्क सही हो जाते हैं? उन्हें किसी से देशभक्ति के सर्टिफ़िकेट की ज़रूरत नहीं रहती?

तीन तलाक़ से लेकर CAA-NRC तक के तमाम मुसलमानी भड़कावे पर आधारित शाहीनबाग़ का अनाप-शनाप समर्थन इस बात की सूचना दे रहा है या नहीं कि ‘राष्ट्र प्रथम’ का भाव इन लोगों में है ही नहीं? राष्ट्र-भाव की बात करने में हिन्दूपन कहाँ से घुस गया? आपके कहे अनुसार अगर घुस गया तो क्या आप स्वयं नहीं कह रहे राष्ट्र हिंदुओं का है इसलिए वे चिंता कर रहे हैं?

क्या तीन तलाक़ की कुप्रथा समाप्त होना मुसलमान-विरोधी है? क्या कश्मीर का भारत में पूर्ण विलय राष्ट्र-हित नहीं है? तब धारा 370 पर समुचित निर्णय मुसलमान-विरोधी कैसे है? क्या अयोध्या का न्याय राम-मंदिर के मसले को राजनैतिक मुद्दा बनाये रखने की वृत्ति पर प्रहार नहीं है? क्या नागरिकता संशोधन मुसलमानों की नागरिकता छीन लेने के लिए है या अन्याय के शिकार लोगों को नागरिकता देने के लिए है? जिन्हें किसी भी अन्य देश में नागरिकता नहीं मिल सकती उनके लिए है? नागरिकता रजिस्टर (NRC) जब भी आयेगा — आना भी चाहिए — हिन्दू हो या मुसलमान हर घुसपैठिए को निकाल बाहर करेगा या सिर्फ़ मुसलमानों को? इस पर झूठ किस राजनीतिक उद्देश्य की पूर्त्ति के लिए बोला जा रहा है? वर्त्तमान CAA केवल दिसंबर 2014 तक सीमित है, तब उसके लिए यह झूठ क्यों कि आगे आने वाले NRC में इससे हिन्दू को फ़ायदा दिया जाएगा, मुसलमान को नहीं? गृहमंत्री ने लोकसभा में कहा  chronology समझिये, पहले CAA तभी NRC. इस बयान का बहाना लेकर शाहीनबाग़! सच समझे-जाने बिना? जब एक सांसद ने CAA और NCR एक साथ लाने पर आपत्ति की थी तब गृहमंत्री ने समझाया था CAA से जब तक देश के उचित नागरिक तय नहीं हो जाते तब तक नागरिकता रजिस्टर कैसे आ सकता है? दोनों एक साथ हैं ही नहीं. पहले नागरिकता संशोधन फिर नागरिकता रजिस्टर! यह है chronology. इसे समझिये. इस बात में बतंगड़ कहाँ है कि नानी-दादियाँ घर से निकाल बाहर कीं?

और, शाहीनबाग़ की दादी-नानियों ने क्या सुना? कि जब फूफी के मूँछ निकलेगी तब ये काफ़िर मोदी वगैरह ज़बर्दस्ती करेंगे अब फूफी को चचा कहो! दादी तो दादी, पोते-पोती-नाती-नातिन ने भी यही माना और एसिड-पत्थर-पेट्रोल से इस्लाम सुरक्षित करने का बीड़ा उठा लिया!

चलिए, राष्ट्र-भाव की इस ‘हाँ’-‘ना’ के ‘ध्रुवीकरण’ के साथ किसी परिणाम पर पहुँचने की कोशिश करते हैं.

शाहीनबाग़ में महीनों तक भारत सरकार ने कोई पुलिस एक्शन नहीं किया.

क्यों?

16 अगस्त, 1946 को ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ का इतिहास भूलने वाले देशवासी इतिहास दोहराने को अभिशप्त हुए और उस दिन के बिम्ब के रूप में उन्हें शाहीनबाग़ उपलब्ध हुआ. ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की घोषणा हड़ताल के रूप में हुई थी. यह घोषणा मुस्लिम लीग काउंसिल ने पाकिस्तान बनने के समर्थन में ऐसी ही raw मुस्लिम ताक़त का परिचय देने के लिए की थी. इसकी वजह से देश-भर में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए थे जो उस दिन तक के सबसे भयानक दंगे कहे जाते हैं.

शाहीनबाग़ का कब्ज़ा शुरू होते ही मुस्लिम नेताओं-प्रवक्ताओं की 1946 वाली छटपटाहट साफ़ दिखायी पड़ रही थी. कैसे भी पुलिस एक्शन हो जाए और पूरे देश में जगह-जगह दंगे हो जाएं, इस मन्नत पर ‘आमीन’ पूरी शिद्दत के साथ मुसलमानों की ज़रूरत था. पुलिस एक्शन न होने से मुसलमानों की यह हाजत पूरे देश में पूरी न होकर दिल्ली तक सिमटकर रह गई.

दिल्ली भी इसलिए क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प दिल्ली में मौजूद थे. संसार भर में हिंदुस्तान पर लानत भिजवाने का ज़बर्दस्त मौक़ा मुसलमानों के हाथ में था. लिहाज़ा, दिल्ली में खुलकर दिखा दिया गया कि इस्लामीकरण के लिए जारी जिहाद वाली ज़मीन ‘दार-उल-हर्ब’ की शक्ल कैसी होती है. शाहीनबाग़ में जिस जिहादी आतंकवाद ने आँख खोली उसकी शुरुआत जामिया मिलिया के तथाकथित ‘छात्र आंदोलन’ से और अमानतुल्ला खाँ के तीन तलाक़, धारा 370 वगैरह पर ‘हमारी ख़ामोशी को हमारी कमजोरी समझा’ वाले भाषण से हो चुकी थी.

इसके बाद से घट रही हर घटना ने इस सच पर रोशनी डाली है कि वास्तव में मुसलमान चाहते क्या हैं. यह चाहत पुन: चुपचाप अन्दर ही अन्दर सक्रिय रह सके इसके लिए देशद्रोहियों सहित हर मुसलमान नेता-प्रवक्ता-मौलवी बढ़-बढ़कर अनुराग ठाकुर, कपिल मिश्रा और जाने कौन-कौन से हिन्दू नाम गिनवा रहा है ताकि हमेशा की तरह ‘तुम भी दोषी-हम बाद में दोषी’ की चौपड़ बिछायी जा सके और फिर सब वैसे ही चलने लगे जैसे कुछ हुआ ही नहीं. मुसलमानों के मन में हिन्द केवल जिहाद-ज़मीन ‘दार-अल-हर्ब’ है, मानो यह सत्य उजागर हुआ ही नहीं!

जब तक “Fuck Hinduism” कहा जाता रहा, कोई दंगा नहीं भड़का. “सब बुत उठवाये जाएंगे, बस नाम रहेगा अल्ला का” गाया जाता रहा, कोई दंगा नहीं भड़का. सरेआम “Free Kashmir” के पोस्टर लहराये जाते रहे, कोई दंगा नहीं भड़का. “मोदी और शाह को कुत्ते की मौत मारेंगे” घोषित करते जाने से कोई दंगा नहीं भड़का. “भारत का चिकन-नैक् काट दो” वाले भाषण से कोई दंगा नहीं भड़का. “भारत में हर जगह सड़कें ब्लॉक कर दो ताकि यह अंदर ही अंदर आर्थिक रूप से ख़त्म हो जाये” के प्लान से कोई दंगा नहीं भड़का. “हर जगह शाहीनबाग़ बना दो” के भाषणों से कोई दंगा नहीं भड़का. “हिन्दू तेरी क़ब्र खुदेगी” के गान से कोई दंगा नहीं भड़का. “सभी मुसलमान अपनी ख़ातूनों और बच्चों सहित घर से बाहर निकलकर जाम लगा दो”  के आह्वान से कोई दंगा नहीं भड़का. “15 मिनट के लिए पुलिस हटा दो फिर देखो” से कोई दंगा नहीं भड़का. “15 करोड़ 100 करोड़ पर भारी पड़ेंगे” से कोई दंगा नहीं भड़का. “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह” से भी दंगा नहीं भड़का.

जैसे ही कपिल शर्मा ने कहा, हर जगह शाहीनबाग़ नहीं बनने देंगे, तीन दिन में जगह खाली करो — दिल्ली में सीरिया उतार लाये. हिन्दू-मुसलमान बराबर के गुनहगार कैसे हो गए? ‘देश के ग़द्दारों को’ ही तो कहा, ‘मुसलमानों को’ तो नहीं कहा. ओवेसी ने कैसे कह दिया “मुझे मारो गोली”? ख़ुद ही ख़ुद को ग़द्दार कह रहा है और हत्याएं हो रही हैं उनकी जो ग़द्दार हैं नहीं. “पत्थरबाज़ कपड़ों से पहचाने जाते हैं”, इतना ही तो कहा, “मुसलमानों के कपड़ों से” तो नहीं कहा. कैसे कह दिया “मेरे कपड़े आपके कपड़ों से ख़राब हैं क्या”? ख़ुद ही कह रहा है पत्थरबाज़ मुसलमानी कपड़ों में हैं, और मारे जा रहे हैं वे मुसलमान जो मुसलमानी कपड़े नहीं पहनते!

मुसलमान पादते रहें और हिन्दू चुपचाप सूँघते रहें, कोई दंगा नहीं होता. हिन्दू को डकार भी आ गई तो दंगा भड़क जाता है. मुसलमानों के पास दंगा तैयार ही रहता है. तैयारी भी रहती है. 

ग़द्दारों के लिए ‘गोली मारो’ नहीं तो ‘आरती उतारो’ कहा जाएगा? देश के कुछ नागरिकों की दादी-नानियाँ ग़लत-सलत कुछ भी मानकर सड़क रोके बैठी रहें, और कोई अन्य नागरिक ‘अब और सहन नहीं’ भी न कहे? जबकि सिर्फ़ कहा, किया कुछ नहीं. मुसलमान कहते नहीं, बहुत ज़्यादा कर रहे होते हैं. जितना कहते भी हैं, वह ‘तक़ीया’ (कपट, झूठ) के इस्लामी प्रावधान के अधीन कहते हैं ताकि पकड़े जाने पर ख़ुद को बचा सकें!

हिंदुस्तान की ऐसी क्या लाचारी है कि ऐसे मुसलमानों का अनाप-शनाप कुछ भी सहन करता चला जाए? अब भेद खुल रहा है कि आज तक दिल्ली की सरकारें ऐसे मुसलमानों की बदौलत इस्लामाबाद् से चलती आई हैं. अब नहीं चल रही तो तकलीफ़ हो रही है — पाकिस्तान से ज़्यादा यहाँ के मुसलमानों को.

आपका इस्लाम भले कहता है हर काफ़िर को मुसलमान बनाओ, जो न बने उसे मार दो. लेकिन कौन भला आदमी आप जैसा मुसलमान बनना चाहेगा? तब आप क्या करेंगे? वही करेंगे न अंकित शर्मा को जिस तरह 400 बार चाकू से गोदने का काम किया? फिर उसकी अंतड़ियाँ खींचकर बाहर निकाल लीं. इससे तो हमें कारगिल युद्ध के शहीद कैप्टेन कालिया की याद हो आती है. ऐसी ही वहशियाना हरकत तब भी हुई थी और आँखें बाहर निकाल ली गईं थीं. या लांस नायक हेमराज और लांस नायक सुधाकर सिंह का ध्यान आ जाता है जिनके सिर पाकिस्तानी काट कर ले गए थे. आपको तो मौक़ा मिलने भर की देर है, मेरे जिस्म में भी चाकू छेद-छेदकर तृप्ति हासिल की जाएगी, एक-एक उँगली काटी जाएगी, आँखें फोड़ कर उँगली घुसाकर सॉकेट से बाहर खींची जाएंगी, पेट चीरकर आँतें मुट्ठी में भींचकर बाहर घसीटी जाएंगी, दोनों किड्नी चीरी जाएंगी. आप लोग ईद मुबारक कहकर अल्लाहो अक़बर इसीलिए चिल्लाते हैं क्या? हम कैसे मान लें हर बक़रीद पर आप निरीह बकरे को धीरे-धीरे काटते हुए उसे torture करते-करते रक्त बहने और शिकार के छटपटाने का मज़ा लेने की प्रैक्टिस नहीं करते?

क्योंकि आप हर तरह से एक ही बात स्थापित करने और हमें समझाने में लगे हैं –  कि हम ‘जंग रहेगी-जंग रहेगी’ वाले ‘दार-उल-हर्ब’ ( Land of Jehadi War) में रह रहे हैं, जिसे आप ‘दार-उल-इस्लाम’ (मुसलमानों की ज़मीन) बनाने के लिए कुछ भी करेंगे, करते रहेंगे, कभी भी किसी भी हालत में रुकेंगे नहीं. इससे यह सत्य (हक़?) उजागर हो गया है कि पाकिस्तानियों और इस तरह के हिन्दुस्तानी मुसलमानों में कोई फ़र्क नहीं है. दोनों में कैप्टेन कालिया और अंकित शर्मा को हलाल करने का मज़ा लेना बिलकुल एक जैसा है!

दिल्ली के एक हिस्से के लिए कितने गैलन एसिड, कितने टन पत्थर, कितने पेट्रोल-बम, कितनी गुलेलें, कितनी बोतलें, कितनी थैलियाँ, चुपचाप चलती कितनी प्लानिंग और ‘इस्लाम’ में कितनी गहरी आस्था!

इस्लाम के विश्वासियों के लिए कुछ होता होगा ‘दारुल-इस्लाम’. हमें क्या मतलब? देख तो लिया ‘दारुल-इस्लाम’ पाकिस्तान! वक़्त आ गया है जब इस पाकिस्तान को पूरी तरह तबाहो-बर्बाद कर दिया जाए. इसके साथ बांग्लादेश को भी रहना मुश्किल हो गया था, जो कि ख़ुद दारुल-इस्लाम है! जिन्नाह की इस्लामी महत्वाकांक्षा की औक़ात पश्चिम पंजाब जितने टुकड़े से ज़्यादा की नहीं थी. सिंध, बलूचिस्तान, पख्तूनिस्तान का स्वतन्त्र सार्वभौम देश हो जाना ही ठीक है. रहेंगे ये भी बांग्लादेश की तरह दारुल-इस्लाम ही. ऐसा कर देने से मुसलमानों के मज़हबी विश्वास पर चोट पहुंचाने का काम होगा नहीं, मगर ये हिन्दी मुसलमान घायल ज़रूर हो जाएंगे, क्योंकि इनके मन में ‘कुछ-कुछ’ चलता रहता है. पाकिस्तान इनकी लंबी प्लानिंग का हिस्सा जो है!

हर वह काम होना चाहिए जिससे कट्टर जिहादी इस्लाम का हौसला पस्त होता हो. यह अब ज़रूरी हो गया है. हर वह काम भी होना चाहिए जिससे हिंदुस्तान के दिल्ली-दंगाई मुसलमानों पर लगाम कसे. ये मुसलमान इस योग्य सिद्ध नहीं हुए हैं कि आगे इनकी और ज़्यादा परवाह की जाये. ‘रजम’ (पत्थरबाज़ी) को भी मज़हबी रस्म तक महदूद कर देना अब लाज़िम है. सिर्फ़ और सिर्फ़ हज के दौरान शैतान के लिए मक्का में ‘रजूम’ (पत्थरबाज़) होने की कोई मनाही नहीं. रवायत है, ठीक है. मगर इज़राइल के सैनिकों के बाद कश्मीर में, फिर हिन्द के अलग-अलग शहरों में, और अंततः दिल्ली-दंगे में इस कदर पत्थरबाज़ी! ऐसी हरकत के लिए देखते ही गोली मारने का अधिकार पुलिस और सेना को दे देना चाहिए.

क़ुरान और इस्लाम की हर शिक्षा की मनमानी व्याख्या करने वाले मुसलमान इसके लिए भी कहेंगे, इज़राइली सैनिकों की तरह भारत के सैनिक और पुलिसवाले भी ‘शैतान’ का ही रूप हैं. इसलिए टीवी चैनलों पर मुस्लिम प्रवक्ता चाहे जितनी ‘च्च्-च्च्’ करें, मन ही मन वे आश्वस्त हैं कि अंकित शर्मा को बर्बर होकर मारने से इस्लाम की सिद्धि हुई है.

शैतान की यह फ़ितरत है कि वह हर शैतानी किस्म के काम के लिए प्रेरित भी करता है और उसी साँस में यह भी कहता है वह अल्लाह का ही काम कर रहा है!

यह जो आए दिन ‘हिन्दू-आतंकवाद’ या ‘भगवा-आतंकवाद’ का हौआ लहराया-फहराया जाने लगा है, उसपर भी स्पष्ट होना ज़रूरी है.

दूसरे-दूसरे देशों में जाकर हिन्दू कोई हरकत नहीं करते. इस्लामाबाद से चलने वाली दिल्ली-सरकारों की बेरुख़ी के चलते अपने देश में छोटा-मोटा अपराध कर लेते हैं, मगर वह है अपराध ही, जिसके खिलाफ़ देश का क़ानून हरकत में आ जाता है. वह आतंकवाद नहीं है. आतंकवाद पर तो मुसलमानों का कॉपीराइट है. लगाके तक़रीबन हज़ार साल से, या शायद इससे भी ज़्यादा, इन लोगों ने आतंकी होने के लिए बहुत मेहनत की है. इनके मुक़ाबले हिन्दू क्या खाकर आतंकवादी होगा?

यह सब सभ्यता और संस्कृति के सरताज देश भारत में इस्लाम के नाम पर किया गया!

लिहाज़ा, ध्रुवीकरण कोई है तो ‘सभ्यता’ और ‘इस्लाम’ के बीच है!!

ग़नीमत है कि भारत में संतुलित बुद्धि वाले मुसलमानों की कमी नहीं है. ये मुसलमान खुलकर पाकी-वृत्ति वाले मुस्लिमों पर सवाल उठाते हैं. इस्लाम को उसके सही स्वरूप में समझते-समझाते हैं. सबके साथ मिलकर देश की विकास-यात्रा के बटोही हैं. बात-बिना बात जिन्नाह अथवा ओवैसी की तरह ‘मुसलमान-चालीसा’ का पाठ नहीं करते रहते.

इन सही केटेगरी के मुसलमानों की रीढ़ तब मज़बूत होगी जब कुछ मिथक तोड़े जाएंगे. जयचंदी भारतीय, उनमें भी विशेषतः हिन्दू, इन मिथकों को अपनी गुल्लक में इसलिए बचाकर रखते हैं कि यह उनकी आदत है. उन्हें पक्का है यह गुल्लक उस दिन काम आएगी जिस दिन आर.एस.एस. और बीजेपी की ‘बेवकूफ़ियों’ के कारण भारत का इस्लामीकरण पूरा हो जाएगा. तब सबसे पहले लपक कर ये लोग कलमा पढ़ेंगे. ‘ईद मुबारक’ कहने के बाद मुहर्रम की भी तैयारी इनकी अभी से है.

कभी-कभार कुछ बातें तब अधिक साफ़ होती हैं जब उन्हें समझाने के लिए थोड़ी अश्लीलता का हल्का-सा तड़का लगाया जाता है. इन जयचंदों की ‘आदत’ के संज्ञान के लिए यह तड़का उपयोगी रहेगा.

हुआ यूँ कि एक सीधा-सादा आदमी बार में अपने स्टूल पर चुपचाप बैठा बीयर के सिप ले रहा था. अभी वहाँ आये उसे ज़्यादा समय नहीं हुआ था.

तभी हॉलीवुड की काऊबॉय मूवीज़ के अंदाज़ में बार के दरवाज़े के स्प्रिंगदार कपाट खुलते हैं. एक हट्टा-कट्टा, लम्बा-चौड़ा हैटधारी प्रवेश करता है, चारों ओर नज़र घुमाकर बार के वातावरण का जायज़ा लेता है और सधे हुए क़दमों से चलकर बीयर चुसक रहे सज्जन के पास आता है. पाँव की ठोकर से एक स्टूल सरकाता है, फिर इधर-उधर देखता है और बीयर वाले इंसान की बग़ल में बैठ जाता है.

अपना ड्रिंक ऑर्डर करने के बाद आगंतुक ने जेब से सिगार निकाला, सामने का हिस्सा दाँतों से काट कर थूका और गिलास का इंतज़ार करते हुए लाइटर को उँगलियों में घुमाने लगा. बारटेंडर जब उसका ड्रिंक रख गया तो उसने दो-एक सिप लिये और संतोष का भाव जतलाया. थोड़ी देर में सिगार पीने की तलब हुई, सो उसने सिगार को बीयर-प्रेमी के पिछवाड़े में डाला, निकाला, सुलगाया और पीने लगा.

यही सिलसिला थोड़ी देर चला. हर बार हैटधारी ने सिगार को बग़लवाले के पिछवाड़े में डालने के बाद सुलगाया.

इसी तरह दो-चार सिगार पीकर उसने अपना बिल चुकाया और चला गया.

दूसरे दिन भी इसी तरह हुआ. आज तो सिगार कुतरने का कटर भी उसके पास था. दाँत से काटना नहीं पड़ेगा.

तीसरे और उसके अगले दिन फिर ड्रिंक और सिगार के दौर इसी मानिंद चले.

इसके बाद काफ़ी दिन बीत गये. वह हैटधारी दिखाई नहीं दिया.

कुछ साल बाद अचानक बार का स्प्रिंगदार दरवाज़ा खुला और उसी हैटवाले ने प्रवेश किया. स्टूल सरकाया और बीयर वाले सज्जन के पास बैठ गया. ड्रिंक आया, उसने चुस्कियाँ लेना शुरु किया, मगर सिगार के कहीं पते नहीं थे.

हैटवाले का दूसरा ड्रिंक भी आ लिया, फिर भी उसने सिगार नहीं निकाला. तीसरे ड्रिंक पर भी जब सिगार नहीं निकला तो बीयरवाले से रहा नहीं गया. उसने पूछ ही लिया, “जनाब, आज आप सिगार नहीं पी रहे?”

जवाब मिला, “यस डीयर, अब देश आज़ाद है. सरकार भी जन-हित की योजनायें चलाती है. मैंने सिगार पीना छोड़ दिया है.”

“यह तो आपने बहुत बड़ी गड़बड़ कर दी”, बीयरप्रेमी बोला.

“क्यों क्या हुआ? धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है”.

बीयर वाले ने कहा, “सो तो ठीक है”, और अपने पिछवाड़े की तरफ़ इशारा करते हुए बताया,  “मगर मुझे जो आदत लग गई है, उसका क्या?”

इन प्रोग्रेसिवों की आदत समझ लेने से पहला मिथक अपने आप टूट जाता है.

धर्म-अध्यात्म-ईश्वर-समाधि-जागृति आदि ऐसे मामले हैं जो आधे-अधूरे रह नहीं पाते. या तो ये बिलकुल नहीं होते – लाख कोशिश कर लो. या जब होते हैं तो पूरे ही होते हैं. सूर्य चमकता है तो पूरा ही चमकता है, मगर भूमण्डल का ऐसा भाग उस समय भी रहता है जहाँ सूरज नहीं चमकता. सूर्य के बावजूद उसे अँधेरा ही मंज़ूर है. मुसलमानों की ज़मीन ‘दारुल-इस्लाम’ का दम भरने वाले जिहादी इस्लाम के रसियाओं का कुछ ऐसा ही आलम है.

क़ुरान-ए-मजीद में अल्लाह के जो 99 नाम आए हैं, जिन्हें हदीस में संकलित किया गया है, वे सब ‘विष्णुसहस्रनाम’ में उन्हीं अर्थों में प्रयुक्त हुए हैं. ये ‘उम्मत-ए-हिन्द’ शीर्षक लेख में देखे जा सकते हैं. सूरज-चाँद सभी तरह की रोशनी जिन्हें पूरी-पूरी उपलब्ध थी, उन हज़रत मुहम्मद ने बर्बर और सब तरह निगेटिव जातियों को उतना ही दिखाया जितना वे अपने अंदर समो सकती थीं, जितनी उनकी क्षमता थी — एक मोबाइल फ़ोन में एस.एम.एस. जितना. जो ‘आदत’ वाले हिन्दू नहीं हैं वे समझ सकेंगे उनके पास पहले से 70 एम.एम. की स्क्रीन पर अध्यात्म उपलब्ध है. वे जब क़ुरान पढ़ेंगे तो 70 एम.एम. के समूचे कैनवस के इशारे वहाँ भी देख पाना उनके लिए मुश्किल नहीं होगा.

वहाबी-सलाफ़ी इस्लाम वाले ये कट्टरपंथी जिहादी मुसलमान 70 एम.एम. को निरंतर मोबाइल के एसएमएस तक सीमित रखने के लिए जो तलवार भाँज रहे हैं और अभी तक उतने ही निगेटिव बने रहने को इस्लाम समझ रहे हैं, वे नबी और उनके माध्यम से उपलब्ध ईश्वर के फ़रमान के घोर अपमान में मुब्तिला हैं. ख़ुद कुफ़्र करके ये आतंकवादी मुसलमान दूसरों को आँख दिखाने की हिमाक़त करते हैं. ये लोग भारत में अरब का रेगिस्तान उतार लाना चाहते हैं और भूल जाते हैं जितना ज़रूरी था उतना रेगिस्तान अल्लाह ने हिन्द को पहले से दे रखा है. इनकी हरकतें यहाँ irrelevant हैं. दिल्ली-दंगा यहाँ इस्लाम के लिहाज़ से भी कोई अर्थ नहीं रखता और ग़ज़वा-ए-हिन्द की आपकी योजनाओं को केवल बेनक़ाब करता है. ग़ज़वा के लिए मुहम्मद साहब के व्यक्तित्व जितनी औक़ात चाहिये. उतनी औक़ात की सोचना भी मत. आप चिन्दीचोर फ़सादी हैं, ग़ाज़ी नहीं.

‘आदत’ वाले जयचंद स्वयं को ‘लेफ़्ट-लिबरल’ कहने में शान समझते हैं. वे मानते हैं वे ‘रेशनलिस्ट’ हैं, प्रोग्रेसिव हैं, मार्क्सवाद से प्रेरित हैं. हिंदुस्तान को बरजते हैं, ‘ख़बरदार जो इतिहास का ‘पुनर्लेखन किया”! उस समय भूल जाते हैं मार्क्स ने इतिहास के पुनर्लेखन को ‘पहला मैदान-ए-जंग’ कहा था! बेचारे करें भी क्या? इतिहास की कचरा-किताबों में ख़ूब ढोलकी बजा चुके हैं, मुसलमानों ने भारत को यह दिया, वह दिया. sms मानो 70 mm को सिनेमा दिखाने ले जा रहा है!

जिन दिनों मुस्लिम आक्रांताओं ने भारत पर चढ़ाई करना शुरु किया था, भले मुसलमान आक्रमण करने नहीं आते थे. बाबर और नादिरशाह-टाईप लोग आते थे. इनके पास ख़ून-ख़राबे से ज़्यादा देने को कुछ होता नहीं था. यह हिन्द के हवा-पानी का असर था जो अनेक आक्रांताओं को लगा यहाँ बसा भी जा सकता है. धीरे-धीरे हिन्द ने मुसलमानों को अवसर दिया, आओ, खुसरो हो जाओ, आओ जायसी, रहीम, रसखान, ग़ालिब हो जाओ, दारा शिकोह हो जाओ, बड़े ग़ुलाम अली खाँ, बिस्मिल्लाह खाँ हो जाओ. अन्तहीन सूची है. जो भी दिया, हिन्द ने दिया जिसे निभाने वालों ने निभाया भी. भारत ने कभी किसी से कुछ लिया नहीं. भारत अवसर न देता तो रह जाते सब के सब तैमूर और चंगेज़! निभाने की नीयत नहीं हो तो दिल्ली में दिखा दिया न अपने मूल स्वरूप में ये लोग क्या हैं!

कहते हैं सरिश्त (प्रकृति, स्वभाव) बदलती नहीं, श्मशान तक साथ जाती है.

बुरी सरिश्त न बदली जगह बदलने से,

चमन में आ के भी काँटा गुलाब हो न सका!

नाम लेते हैं लाल क़िले और ताजमहल का!

चलिये, ताज को देखते हैं.

याद करें, अभिनेत्री श्रीदेवी का शव जब अग्नि-संस्कार के लिए ले जाया जा रहा था तो मेकअप से शव की ख़ूबसूरती कुछ ऐसी कर दी गई थी जैसे ताजमहल! मगर था तो मृत शरीर ही!  

ताज क्या है? है तो वह सजावट किये हुए एक क़ब्रगाह ही! एक ऐसा मुर्दाघाट, जो न सिर्फ़ ग़रीबों की मुहब्बत का मज़ाक उड़ाता है, बल्कि जिन कारीगरों ने बनाया उनके हाथ कटवा दिये जाने की मुसलमानी दास्तान भी कहता है! इसे इनसानों के प्रति ग़ैर-इंसानी नफ़रत का म्यूज़ियम कहने के बजाय मुहब्बत की यादगार कहना प्रेम जैसे काव्यात्मक भाव पर कलंक लगाने जैसा है. गुरुदेव रवीन्द्रनाथ को भी यह काल के गाल पर ठहरा हुआ आँसू ही लगा था. ‘काल’ का अर्थ समय ही नहीं, मृत्यु भी है.

मुहब्बत का वास्तविक स्मारक कोई है तो रामेश्वरम का पुल है, जिसे बनाने में देश के वनवासी नागरिकों का अभिनंदन भी हुआ था और बनाने वालों के हाथ भी नहीं कटवाये गये थे. प्रिय पत्नी के प्रति श्रीराम के उत्कट प्रेम के सात्विक स्मारक के रूप में रामेश्वरम को याद किया जाना चाहिए या क़ब्रगाह को?

यह तो वही बात हुई, असदुद्दीन ओवेसी औरंगज़ेब को ‘मर्द-ए-मुजाहिद’ कहकर बखानता है. आज़ाद हिंदुस्तान में औरंगज़ेब को लेकर गुरु गोबिन्द सिंह और छत्रपति शिवाजी के अनुभवों को तरजीह दी जाएगी या ओवेसी के जिहादी नज़रिये को?

और ये कहते हैं इतिहास का पुनर्लेखन मत करो! राष्ट्रप्रेम का सर्टिफ़िकेट मत बाँटो!!

“आदत” !!!  

ऐसी ‘आदत’ या तो लोभवश डाली जाती है, या भयवश. 1947 के बाद से जिहादी मुसलमान का भय इन लोगों के मन में जो इतना गहरा बैठ गया है, उसका तिलिस्म छिपा है क़ुरान में लिखी हर बात को मक्खी पर मक्खी मारकर समझने-समझाने की बेईमानी में. इसलिए, अगर कहा है जिहाद मुसलमानों पर फर्ज़ है तो उनकी व्यर्थ मार-काट को चुपचाप मान लो, क्योंकि यह उनका ‘धर्म’ है. कोई नहीं पूछेगा क्यों झूठ बोलते हो? अपने ऊपर हुए अन्याय का प्रतिकार करने के लिए किया जाने वाला संघर्ष जिहाद है, निरर्थक मारामारी नहीं. क़ुरान में कहा गया सब तारीफ़ अल्लाह के लिए है, अल्लाह पर ईमान लाना फर्ज़ है. कोई नहीं पूछेगा ‘अल्लाह’ अरबी भाषा का शब्द है. और सब अनुवाद किया, ‘अल्लाह’ का अनुवाद क्यों नहीं किया? अल्लाह का अर्थ किसी भाषा में God है तो किसी में ‘नारायण’. जो अल्लाह पर ईमान नहीं लाते उनपर ज़बरदस्ती करो. यानी नास्तिकों पर. God या नारायण को मान रहे लोग तो अल्लाह पर ईमान लाये हुए ही हैं. ना भाई, इस्लाम में तो क़ुरान का कोमा-फुलस्टौप भी छेड़ना मौत को बुलावा देना है. ‘भय’ कहेगा, यह उनका धर्म है, वे जो कहें चुपचाप मान लो. क़ुरान में किन्हीं परिस्थितियों में झूठ बोल देना जायज़ है, कभी तो यह फर्ज़ भी है. इस झूठ का नाम है ‘तक़ीया’. ‘किन्हीं परिस्थितियों में’ को बड़े आराम से छिटक दिया और अपने अर्थ वाला जिहाद कर-करके पूरे देश को दारुल-इस्लाम बनाने के लिए तक़ीया, बस तक़ीया, सिर्फ़ तक़ीया!!

शाहीनबाग़ के कब्ज़े के बाद से हर मुल्ला, प्रवक्ता, मुस्लिम नेता अपने ढब का इस्लाम सिर्फ़ ‘तक़ीया’ से धकेलने में लगा है. लाचार बने कसमसाते रहो क्योंकि यह उनका धर्म है. क्या तक़ीया वाले ये मुसलमान विश्वास-योग्य हैं?

“आज़ादी-आज़ादी” चिल्लाकर हम ग़रीबी, बेरोज़गारी से आज़ादी माँग रहे हैं – तक़ीया.

हमने जिन्नाहवाली आज़ादी नहीं कहा, ‘जीनेवाली आज़ादी’ कहा – तक़ीया.

अच्छा हुआ, शरजील इमाम का पता चल गया, हम हैरान थे हमारे बीच कौन ग़द्दार है – तक़ीया.

कपिल मिश्रा के कारण दंगा भड़का – तक़ीया.

जो भी गुनहगार है उसे सज़ा दो – तक़ीया.

बहस में हमें हरा दो, दिल्ली को मत हारने दो – तक़ीया.

अभी नहीं बोले तो तुम्हारे जनाज़े उठेंगे – तक़ीया.

और, जो ये दम भरते हैं ‘मुसलमान अल्लाह के सिवा किसी के आगे नहीं झुकता’, तब क्या हुआ था जब अली-बन्धु बीमार पड़े गाँधीजी के पाँव चूम रहे थे – मुहावरे में नहीं, सचमुच झुककर चूम रहे थे? क्योंकि तब उन्हें गाँधीजी को किसी भी तरह खिलाफ़त आंदोलन के पक्ष में लाना था! – तक़ीया! ‘अल्लाह के सिवा नहीं झुकते’ कहना भी ‘तक़ीया’, और पाँव चूमना भी ‘तक़ीया’, क्योंकि जैसे ही उल्लू सीधा हो गया अली-बंधुओं का बयान था – गिरे-से-गिरा मुसलमान भी गाँधी से अच्छा है! मतलब होगा तो पाँव चूमेंगे, नहीं तो आपको अंकित शर्मा बनाएंगे!

1947 में हमने भारत में रहना चुना था, पाकिस्तान नहीं! –तक़ीया.

1946 के विशेष चुनाव में पाकिस्तान बने या न बने इस पर 75% से अधिक मुसलमानों ने पार्टीशन के पक्ष में वोट दिया  था, मगर विभाजन के बाद गये केवल 2% ही! अब समझ में आया इनकी पाकी वृत्ति का पेंच? ये इसलिए यहाँ रुके थे कि अब इस हिस्से को भी ‘दारुल-इस्लाम’ बनाने के लिए काम करना है! शाहीनबाग़ और दिल्ली-दंगे तक इस लक्ष्य का काफ़ी रास्ता पार कर लिया है. रहा-सहा अगले दस-बीस वर्ष में पूरा करने का विश्वास है.  

धर्मनिरपेक्षता है कि कहती है, यह उनका धर्म है!

वह आदमी मिठाई की दूकान के सामने खड़ा भरे-भरे थाल ताक रहा था. थोड़ी देर तक कुछ बोला नहीं तो हलवाई ने पूछा, “क्या चाहिए?”

उसने कहा, “वह बर्फ़ी क्या भाव है?”

हलवाई – “साढ़े छ्ह सौ रुपये किलो”.

वह – “एक किलो तौल दो”.

हलवाई ने तौल दी. “और कुछ?”

वह – “वह इमरती क्या भाव?”

हलवाई – “छ्ह सौ की एक किलो”.

वह – “इमरती भी एक किलो तौल दो. एक किलो बालूशाही, एक किलो घेवर, एक किलो कलाकंद, एक-एक किलो लड्डू और पेड़ा. और एक डिब्बा यह काला गुलाबजामुन.”

हलवाई ने बड़ी तत्परता से सब तौल दिया. ऐसा गाहक कभी-कभार ही आता है.

वह – “अब इन सबको एक बड़ी कढ़ाही में डालकर अच्छे से मिक्स कर दो.”

हलवाई ने अचकचाकर ग्राहक की तरफ़ देखा.

वह – “सोच क्या रहे हो? सबको मिक्स कर दो. एकदम आटे की माफ़िक गूँध दो.”  

हलवाई हैरान-परेशान तो हुआ, मगर क्या करता? ग्राहक तो भगवान् होता है. गूँध दिया.

वह – “अब इस मिक्स्चर में से एक पुड़िया में चवन्नी की मिठाई मेरे लिए बाँध दो.”

वह आदमी जानता था वह मिठाई ख़रीदने में अक्षम है.

‘आदत’ वालों की अक्षमता के चलते चवन्नी की पुड़िया का नाम है धर्म-निरपेक्षता!

काश! ‘धर्म-निरपेक्षता’ यथार्थ में सबके लिए समान रूप से लागू हो सकने वाला सामाजिक-राजनैतिक सिद्धान्त होता! कौन सी मजबूरी है जो कोई बोलता नहीं, दूसरे सबसे बड़े बहुसंख्यकों को जैसे ही आप धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक घोषित करते हैं, आप धर्म-निरपेक्ष न रहकर धर्म-सापेक्ष हो जाते हैं. बहुसंख्यक भी धर्म के ही आधार पर नहीं हैं क्या? कहाँ है धर्म-निरपेक्षता? यह चवन्नी की पुड़िया नहीं तो और क्या है?

इसलिए, जैसे ही कोई कहे, ‘मैं मुसलमान हूँ’, उससे कहा जाए, ‘हमें तो हिन्दुस्तानी नज़र आते हो. 1947 में अंतिम रूप से तय हो चुका है, मुसलमान कहाँ रहेंगे, और हिन्दुस्तानी कहाँ – उनका धर्म कुछ भी हो. मुसलमान हो तो वहीं रहो जहाँ के लिए तय हो चुका है.’ या, ‘मुसलमान हो तो अपने घर में हो. हम पर क्या अहसान है?’

मुसलमानों के औसाफ़ (गुण) बहुत सुने, मगर वे सब सद्गुण हैं कहाँ?

सुनते रहे हैं आप के औसाफ़ सबसे हम,

मिलने का आप से कभी मौक़ा नहीं मिला.

मुस्लिम पर्सनल लॉं बोर्ड का होना, अल्पसंख्यक के रूप में अतिरिक्त सुविधा-सहायता उपलब्ध होना, देवबंद में दारुल-उलूम का इस्लामी दर्शन पर विचार और अध्ययन करने से बढ़कर सामाजिक-राष्ट्रीय क्षेत्र में मुसलमानों की भूमिका और उसके स्वरूप पर नियंत्रण करना, सामान्य संपत्ति क़ानून से अलग वक़्फ़ बोर्ड का होना, मुसलमान के रूप में राजनीतिक पार्टियों का होना और क़ुरान के मुताबिक राजनीति को नियंत्रित करने की कोशिश करना – सब के सब धर्म-निरपेक्षता के विपरीत और ग़ैर-संवैधानिक नहीं हैं तो क्या हैं? भारतीय संसद् और संविधान हर तरह से भारत को ‘इस्लामी’ राष्ट्र बनाने के हर इंतज़ाम को समर्थन देते जान पड़ते हैं?     

मालूम नहीं यह कौन सी गंगा-जमनी तहज़ीब है कि जिसमें गंगा भी हिन्द की, जमना भी हिन्द की, मगर पाकिस्तान बना नहीं कि गंगा-जमना दोनों ग़ायब और आब-ए-ज़मज़म हाज़िर! पीछे बचे दारुल-हर्ब हिन्द में फिर वही ‘गंगा-जमनी तहज़ीब’ का नारा!!  — तक़ीया? बेशक़ तक़ीया!

कहते हैं हिंदुस्तान हमारा देश है, हमें इससे मुहब्बत है. आप तो मुसलमान हैं, और हिंदुस्तान ‘दारुल-इस्लाम’ है नहीं. फिर भी मुहब्बत है? – तक़ीया!

दिल्ली में दंगा नहीं होता तो क्या होता?

जिस तेज़ी से मुसलमान अपनी जनसंख्या बढ़ाते हैं उसका भी रहस्य अब रहस्य नहीं रहा. कश्मीर में जो इन्होंने कहा था, “हमें कश्मीर चाहिए, हिंदुओं के बिना, मगर हिंदुओं की औरतों के साथ”, तो वह कोई बलात्कारी घोषणा-मात्र नहीं थी. औरत इनके लिए और ज़्यादा मुसलमान पैदा करने की मशीन है, इसलिए कहा था. जितनी तेज़ी से इनकी संख्या बढ़ेगी, चाहे घुसपैठिए और रोहिङ्ग्या लाकर बढ़ानी पड़े, भारत उतनी जल्दी दारुल-इस्लाम बन सकेगा. हार्वर्ड के एक अध्ययन ने तो घोषित कर भी दिया है, आने वाले 20 वर्ष में (2040 तक) भारत में हिन्दू और मुसलमान बराबर की संख्या में हो जाएंगे. तब इस्लामी सरकार बनाने और भारत को इस्लामी देश घोषित करने की माँग ज़ोरों से उठेगी, और पूरी भी होगी.

अध्ययन, अफ़वाह, प्रचार, fake news आदि एक तरफ़. इन्हें छोड़कर सिर्फ़ इतना देखें कब-कब क्या-क्या होता रहा है तब भी इन जिहादी मुसलमानों के लिए कहा जा सकता है — तक़ीया पर आधारित राजनीतिक लक्ष्य, क़ुरान पर आधारित आध्यात्मिक उद्देश्य नहीं!!

1947 से 2020 तक संख्या बढ़ाने की  दिशा में मुसलमानों की प्रगति उनके लिए संतोषकारक है. शाहीनबाग़ और दिल्ली-दंगे ने यह भी रेखांकित कर दिया है कि इस्लामी सन्तोष के साथ और क्या-क्या आता है.   

धर्म-निरपेक्षता की चवन्नी की पुड़िया के चलते यह भुला दिया जा रहा है कि हिन्द की पहचान क़ुरान कभी नहीं बन सकती, वेद-पुराण-गीता-रामायण ही रहेंगे. ज़मज़म यहाँ नहीं बह सकती. यहाँ गंगा ही बहेगी. मक्का यहाँ नहीं आ सकता. यहाँ इक्यावन शक्ति-पीठ और बारह ज्योतिर्लिंग ही रहेंगे. यहाँ मुहर्रम नहीं होगी, कुम्भ का मेला ही लगेगा.  

शक्ति-पीठ से याद आया, इक्यावन नहीं, भारत में अब पैंतालीस शक्ति-पीठ हैं. एक पाकिस्तान (बलूचिस्तान) में चला गया – हिंगलाज में ‘हिंगुलादेवी’. पाँच बांग्लादेश में गए – श्रीशैल, अपर्णा, यशोरेश्वरी, चट्टल भवानी, और जयंती.

दो बातें.

मुसलमान 1947 से पहले भी और आज भी हज के लिए जाते हैं तो उन्हें वीज़ा लेना होता था और लेना होता है. 1947 से पहले हिंदुओं को इन छहों शक्तिपीठ की यात्रा के लिए वीज़ा नहीं लेना पड़ता था. पार्टीशन के कारण आज वीज़ा लगता है.

दूसरी बात यह कि दारुल-इस्लाम बनकर भी पाकिस्तान की पहचान मक्का या इस्लाम न होकर हिंगलाज माता ही रहीं. या कराची, सिंध के पंचमुखी हनुमान्! यक़ीन न हो तो पूछ देखिए वहाँ के लोगों से. बांग्लादेश की भी पहचान ये पाँच शक्तिपीठ और आर्य भाषा परिवार की बाँगला हैं.

जैसे अफ़गानिस्तान की पहचान बामीयान की बौद्ध मूर्त्तियाँ हुआ करती थीं. तालिबानी तोपों के धुएँ में धुंधलाने के बावजूद अब भी हैं. मूर्त्ति तोप से उड़ सकती है, पहचान नहीं. 

भारत इस्लामी राष्ट्र हो भी गया तो आप कुछ हासिल करेंगे या कुछ गँवाएंगे?

तमाम ग्रन्थों, साहित्य, संगीत, नृत्य, मन्दिरों, मूर्त्तियों – के साथ जो होगा, नहीं दीखता? बामीयान के बाद भी?

और जीती-जागती औरतों के साथ जो होगा?

कला, शिल्प, रचनाधर्मिता का दम भरने वाले लेफ़्ट-लिबरलों को मंज़ूर है?

चवन्नी की पुड़िया ‘आदत’ को तरजीह देगी, सबको दीखता है.     

इस्लाम 124000 पैग़म्बरों का होना मानता है. हज़रत मुहम्मद आख़िरी थे. इसलिए क़ुरान आख़िरी ‘वचन’ हुआ. मुसलमान भी स्वीकार करते हैं पहला वचन वेद है, और आख़िरी क़ुरान. (बशर्त्ते वेद-सम्बन्धी कथन इनका ‘तक़ीया’ न हो.)

मगर कुदरत तो मुल्ला की नहीं अल्लाह की है. अध्यात्म के 70 mm इस भारत देश में उसने लगभग 600 वर्ष पूर्व गुरु नानक की परम्परा में दस पैग़ंबर और भेज दिए. गुरु गोबिन्दसिंह अब आख़िरी पैग़ंबर हो गए और आख़िरी वचन अब क़ुरान नहीं रहा, श्री गुरुग्रंथ साहब हो गया. अलबत्ता, पहला वचन अब भी वेद ही है और क़ुरान की महत्ता भी कुछ कम नहीं हो गई.

हम देख सकते हैं कितने मिथकों के सिर पर पाँव रखकर इन जिहादी मुसलमानों का एजेंडा आगे बढ़ता है. ‘आदत’ वाले प्रोग्रेसिव’ लिबरल इनकी इस तीर्थयात्रा में इनके जूतों पर गुलाबजल छिड़कते हैं. सच्ची बात के लिए इन लोगों पर नहीं, संतुलित विचार वाले मुसलमानों पर भरोसा किया जाना चाहिए. मुसलमानों पर इतनी सब बातें कहने की ज़रूरत इन संतुलित मुसलमानों की तरफ़ देखकर नहीं पड़ती रही है.

सच पूछें तो, यह भी इन्हीं अच्छे मुसलमानों का काम है कि तीन तलाक़ समाप्त करने, कश्मीर समस्या हल करने और ‘CAA से हिंदुस्तान के किसी मुसलमान की नागरिकता नहीं जा रही’ जैसी बातों पर टीवी तक महदूद न रहें. अपने जैसे और मुसलमानों को इकट्ठा करें और शाहीनबाग़ की दादी-नानियों के सामने मोर्चा जमायें. वहाँ सच बात रखें, इन ग़लत क़िस्म के जिहादियों को बेनक़ाब करें और कपिल मिश्रा जैसों का सड़क पर आना ग़ैर-ज़रूरी है, यह साबित करें.

क्या ये भारत में मुसलमानों की मेनस्ट्रीम बनना पसंद करेंगे, ताकि मुसलमान पर उल्टे-सीधे सवाल उठना बंद हो? ताकि ‘हिन्दू-मुसलमान’-‘हिन्दू-मुसलमान’ करते रहने की ज़रूरत न रहे?

ये अच्छे लोग हैं. इनसे भी यह सवाल करना बनता है कि यदि पूरा हिंदुस्तान पूरी तरह इस्लामी राष्ट्र हो जाए, सब केवल क़ुरान पढ़ें, नमाज़ अदा करें, देव-वाणी संस्कृत और तमिल को भुलाकर अल्लाह की ज़ुबान अरबी का अभ्यास करें तो इन अच्छे मुसलमानों का क्या बिगड़ेगा? कुछ बिगड़ेगा भी नहीं, पर ये ऐसा हो जाने के लिए काम भी नहीं करते. ये वे मुसलमान हैं जो इस्लाम के आध्यात्मिक पक्ष से उसे धर्म की श्रेणी में लाते हैं, न कि ज़बान की तलवार चमकाने वालों की तरह रक्त-रंजित राजनीतिक आकांक्षा को अध्यात्म कहते हैं. 

हिन्द के असली मुसलमान हम हैं, वो नहीं, क्या ये ऐसा स्थापित करने में सफल होंगे?

क्या ये कह सकेंगे ? –-

मुझे दिल की ख़ता पर ‘यास’ शरमाना नहीं आता,

पराया जुर्म अपने नाम लिखवाना नहीं आता.

हिन्द में कोई ध्रुवीकरण है तो दरअसल अच्छे और बुरे मुसलमानों के इस ‘हम’ और ‘वो’ के बीच है.   

यदि अच्छे मुसलमान इस्लामी मेनस्ट्रीम नहीं बन पाते और मुसलमानों के बीच का यह ध्रुवीकरण ढह जाता है तो सदा के लिए बात पूरी हो जाएगी. तय हो जाएगा जैसे अच्छा आतंकवाद और बुरा आतंकवाद कुछ नहीं होता, आतंकवाद आतंकवाद होता है, वैसे ही अच्छा मुसलमान और बुरा मुसलमान भी कुछ नहीं होता. मुसलमान मुसलमान होता है.

केवल हिंदुओं में हिन्दू नहीं होता. उनमें ‘आदत’ वाले भी होते हैं.

ऐसा स्पष्ट हो जाने के बाद भारत को जो फ़ैसला करना होगा, बेहतर है अभी से कर रखे.

तथास्तु!

05-03-2020   

तालकटोरा स्टेडियम — एक फ़ेंटेसी ….?


नवम्बर 2018 में 3 और 4 तारीख को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में अयोध्या के राम-मंदिर के निर्माण को लेकर करीब तीन हजार साधु-संत ‘धर्मादेश सम्मेलन’ में शामिल हुए. ‘फ़तवा’ जारी करने का चलन संत-समाज में है नहीं, इसलिए ‘धर्मादेश’ शायद ही कभी दिया गया हो. अयोध्या में मौजूद श्रीराम के मंदिर को भव्य स्वरूप देने में सुप्रीम कोर्ट की टालमटोल ने इस विषय में चल रही राजनीति को ICU में डाल दिये जाने से बचा लिया. इस राजनीति पर लगाम लगाने के लिए ये सब संत ‘इमाम-ए-हिन्द’ श्रीराम की सेवा में उपस्थित हुए.

इस ‘धर्मादेश सम्मेलन’ ने धर्मनिरपेक्षता के साये में पले-बढ़े और पढ़े आम हिन्दुस्तानी को कुछ अचरज में डाला. एक तो यह तय हुआ कि मुग़लों के बनाये तालकटोरा गार्डन की बग़ल में स्थित स्टेडियम में बैठने में संतों को कोई उज्र नहीं था. हिन्दू-मुसलमान में विरोध निराधार प्रचार है. दूसरे, राजनीति की रैलियों और सभाओं के लिए काम में आने वाला यह स्टेडियम शायद पहली बार किसी भले काम के लिए उपयोग किया गया. तीसरे यह कि धर्मादेश दे रहे साधु-संतों ने पहली बार हर भारतीय को यह बताया कि आने वाले चुनाव में किसे प्रधानमंत्री चुनना है! चौथी बात यह कि साधु-संतों के एक छोटे वर्ग ने राजनैतिक निर्णय देने का विरोध भी किया.

आधुनिकता के फेर में हम सामान्य भारतीय नागरिक साधु-संतों के बारे में कुछ ज़रूरी जानकारी भुला बैठे हैं.

पहली और सबसे महत्त्व की बात यह कि हमारे मन में आदतन संतों का सम्मान होना चाहिए. आजकल के भीड़-भाड़ वाले नगरों में अव्वल तो कोई साधु सड़कों पर आता-जाता दिखता नहीं. कभी कोई नज़र आ भी जाए तो या तो हम तिरस्कार से भर जायेंगे या फिर इस उलझन में पड़ेंगे कि इस साधु ने हमसे भिक्षा मांग ली तो दें या दुत्कार कर भगा दें?

मेरे विचार से हमें जो भी गेरुआ धारण किये हुए दिखे उसे दान देना ही चाहिए.

आप पूछ सकते हैं, हमें कैसे मालूम कि वह पाखण्डी नहीं है?

निवेदन है कि बात गेरुआ वस्त्रों के प्रति हमारे भाव की है, व्यक्ति की नहीं. हमें दान देना है, वोट नहीं. यदि साधु-वेश में जो हमारे सामने है, वह पाखण्डी है तो ऐसा होना-न होना उसका अपना सिरदर्द है, हमारा चरित्र नहीं. आप क्या समझते हैं, लक्ष्मण-रेखा लाँघने में असफल जो ‘साधु’ भिक्षा मांग रहा था वह कौन है, सीता जी नहीं जानती थीं? फिर भी उन्होंने वही किया जो उन्हें करना बनता था! ‘कर्म’ के क़ानून से भी हमारे संविधान के क़ानून की तरह कोई नहीं बचता!

साथ ही यह भी समझना होगा कि भारतवर्ष के – या यों कहें कि हिन्दुओं के — ये साधु-सन्त, ये धूनी रमाये बैठे वैरागी दरअसल हैं कौन.

संभवतः भर्तृहरि के ‘वैराग्य-शतक’ ने दो पंक्तियों में पूरी व्याख्या कर दी है : “अशीमहि वयं भिक्षामाशावासो वसीमहि ;  शयीमहि महीपृष्ठे कुर्वीमहि किमीश्वरैः?” — हम भिक्षा में मिले अन्न का आहार करें, आकाश को अपना वस्त्र बनाएं, धरती की सतह पर शयन करें, (दौलत पर आधारित) ऐश्वर्य का क्या करेंगे?

जिन्होंने अत्यल्प साधनों में जीवन जीने का यह मार्ग व्याख्यायित किया वह भर्तृहरि किसी झोंपड़-पट्टी में रहने वाला सामान्य व्यक्ति नहीं, राजा थे! फिर भी, हर समय घबराए रहने वाले हम आधुनिक बुद्धि के लोग इन साधुओं को ऐसे परिभाषित करना चाहेंगे कि इनमें से कोई भग्न-हृदय होगा जो प्रेम में असफल रहने से दुनिया से भाग गया, या कोई शेयर मार्केट में घाटा उठाते-उठाते डर गया होगा, पढ़ाई-लिखाई में निकम्मा रहा होगा, कानून के शिकंजे से बचता फिरता कोई मुजरिम होगा, वगैरह-वगैरह. अपनी जानकारी और अनुभवों का आरोपण इन संतों पर करने से कतई आगे नहीं जा पाएंगे. ठीक वैसे जैसे अपने सीमित-संकुचित दृष्टिकोण का आरोपण पश्चिम ने भारत और हिन्दुत्व पर किया.

हमारी कल्पना में नहीं बैठेगा कि यह किसी भी तरह के पिंजरे से मुक्त पंछी की परिभाषा है!

एक बार मैंने अपने एक मित्र से गुरुओं की महिमा बखान की तो उन्होंने अविश्वास का वही ‘वैज्ञानिक’ राग अलाप दिया – “मुझे तो ऐसा एक भी नहीं मिला”. जबकि मेरा अनुभव बहुत बड़े सिद्धों के साथ न होकर बहुत सीमित और कम था, एकदम मामूली.  अब पूछे कोई कि आप हैं कौन कि आपको ये मिलें? आप भारत के प्रधानमन्त्री हों या अमेरिका के राष्ट्रपति, इन संतों को क्या मतलब? आप ही का क्या प्रयत्न अथवा उद्यम था कि आप किसी सच्चे साधु तक पहुँच पायें?

इन्हें ढूँढना और पाना असंभव है. कुम्भ के मेले में या शिवरात्रि पर ये सब जाने कहाँ से लाखों की संख्या में प्रकट हो जाते हैं और उसके बाद फिर ग़ायब!

हिन्दुत्व का कहना है कि संसार में हर किसी का एक गुरु, एक देवता, और एक मंत्र नियत है. टी.वी., कंप्यूटर और गूगल वाले ‘महाज्ञानी’ हम हरगिज़ नहीं जानते कि मेरा गुरु कौन है. सामने आकर खड़ा हो जाये हम तब भी कैसे पहचानेंगे? जिस दिन हमारी पात्रता बन जाती है ये अपने आप सामने आकर खड़े हो जाते हैं. हम नहीं जानते गुरु कौन है, मगर ये जानते हैं कि शिष्यता किसमें उपज आयी है.   

जिस तरह हमारे UPSC वगैरह के सेलेक्शन बोर्ड होते हैं, या सरकार का मंत्रिमंडल होता है, वैसे ही इन परम सिद्ध गुरुओं का ‘गुरुमंडल’ है!

यहाँ आपको लगेगा कि क्या दिमाग़ की ख़राबी है और यह नीचे, इसके आगे किस Shangri-La अथवा ‘वंडरलैंड’ का वर्णन होने जा रहा है! बहुत फ़िल्में देख ली हैं, या अंग्रेज़ी के बहुत फ़ेंटेसी नॉवेल पढ़ लिए हैं, या फिर एलएसडी का सेवन कर लिया है?

ऐसा कुछ नहीं. मैं तो उन लोगों में से एक हूँ जिन्होंने तालकटोरा स्टेडियम का ‘धर्मादेश-सम्मेलन’ भी बस टी.वी. पर देखा था.

हिमालय में रोहतांग से आगे ब्यास नदी के उद्गम के निकट चंद्रा नदी है. इसकी घाटियों में कहीं ‘चंद्र-घाटी’ है. इसी ‘चंद्र-घाटी’ की गुफाओं में से किसी एक में हल्की नीली आभा लिए प्रकाश रहता है जहाँ गुरु-मण्डल आपस में मिलता है. इनमें जो सबसे सीनियर है वह हिमालय की ‘चंद्र-घाटी’ से पूरे जगत का कारोबार चलाता है!

सीनियर और जूनियर?

जी हाँ. Law of Karma से ये साधु-संत-सिद्ध भी मुक्त नहीं. इसलिए सीनियर-पद से च्युत होकर कभी भी जूनियर हो जाते हैं.

कल्पना कीजिये कि किसी समय महर्षि वेदव्यास senior-most हैं.

महर्षि के लिये कहा जाता है कि वह हर समय विद्याध्ययन में डूबे रहते थे. कहते हैं, उनकी पत्नी भी बड़ी तपस्विनी थीं. वह पति के लिए पीने का पानी नदी से अपने आँचल में भरकर लाती थीं और एक भी बूँद पानी टपकता नहीं था!

एक बार उन्होंने नदी में एक गंधर्व-युगल को जल-क्रीड़ा करते देखा. उनके मन में संस्कार उदय हुआ कि काश कभी मेरे पति भी अध्ययन तज कर यहाँ आते और हम भी ऐसे ही क्रीड़ा करते.

बस, यहीं उस महासती से ‘कर्म’ हो गया!

उस दिन लाख प्रयत्न करने पर भी पानी आँचल में नहीं ठहरा और एक-एक बूंद टपक गई. हारकर उन्हें उस दिन जल मटके में ले जाना पड़ा.

महर्षि ने जल पिया तो उसके स्वाद में बहुत अंतर पाया. उन्होंने कारण जानना चाहा तो उनकी पत्नी ने सब बात कह सुनाई.

सुनकर महर्षि वेदव्यास को हल्का-सा क्रोध हो आया. उन्होंने पत्नी को डाँटते हुए कहा, “ऐसा विचार मन में आया ही क्यों? मालूम है अब तुम्हें वही शक्ति प्राप्त करने के लिए कितनी तपस्या फिर करनी पड़ेगी?”

अब महर्षि की बारी थी! क्रोध करते ही ‘कर्म’ हो गया!

लिहाज़ा उन्हें भी फिर एक लंबी तपस्या करने के लिए निकल जाना पड़ा.

उधर ‘चंद्र-घाटी’ में जगत का व्यापार चलाने का दायित्व अब जो सीनियर मुनि थे उनपर आन पड़ा.

बहुत कठिन है डगर पनघट की…!

चंद्रघाटी के ये सिद्ध चाहें तो पानी को पेट्रोल कर दें, पत्थर के टुकड़े को उँगली के इशारे से सोना बना दें, बोतल-बन्द शराब शरबत में बदल जाये, हाथ उठाकर मूसलाधार बरसता पानी रोक दें – सिनेमा का कोई सीन फ़्रीज़ हो जाने की तरह, फिर वहीं से आगे बरसात शुरू कर दें, एटम बम को फटने से रोक दें, चलती ट्रेन रुक जाये और टस से मस होने से इनकार कर दे!

प्रकृति का हर नियम इन सिद्धों के अधीन है! या यों कहें कि सिद्ध है.  

भारत-भूमि अध्यात्म व धर्म (‘Religion’ नहीं) की धरती होने से इन महासिद्धों को विशेष प्रिय है. तथापि पूरा विश्व इनके लिए समान है. जहाँ की प्रजा जैसा चाहती है, उस देश को ये वैसा हो जाने देते हैं. विश्व में हिंसक जातियाँ व देश प्रकृति के नियम से हैं. उद्यमशील धनी देश हैं तो प्रकृति की अनुमति से. मनुष्य-संस्कृति की सर्वोच्चता वाले लोग कहीं हैं तो divine intervention से. मनुष्यों के लिए यही  (ईश्वरीय) आदेश व न्याय है. भारत भूमि के मनुष्य यदि अध्यात्म के शिखर और भौतिक समृद्धि के चरम में समन्वय नहीं करते तो जान रखिये, वे ईश्वरीय न्याय के विपरीत आचरण कर रहे हैं!

सिद्ध-गुरुओं के अनुशासन की आवश्यकता इसलिए है!    

तालकटोरा स्टेडियम में धर्मादेश के लिए एकत्र संतों के वचनों पर कुछ कहने के पहले इतना जानना और ज़रूरी है :–

कहते हैं कि पाँचवीं-छठी शताब्दी के महाज्ञानी मण्डन मिश्र के घर के तोते भी संस्कृत जानते थे. पं. मण्डन मिश्र से शास्त्रार्थ करने के पूर्व किसी को भी पहले इन तोतों को हराना पड़ता था!

उधर पंडित जी की पत्नी उभय भारती जी भी परम विदुषी थीं. जब आदि शंकराचार्य से पं. मण्डन मिश्र का शास्त्रार्थ हुआ तो निर्णय देने के लिए किसे बैठाया जाये यह समस्या उत्पन्न हुई. पूर्व मीमांसा और अद्वैत वेदान्त का इन दोनों से बड़ा और कोई भी विद्वान् दार्शनिक उपलब्ध नहीं था. तब संत-समाज ने न्याय दिया कि केवल उभय भारती ही ऐसी विदुषी हैं जो इस शास्त्रार्थ पर निर्णय सुना सकती हैं.

आदि शंकराचार्य ने भी यह न्याय स्वीकार किया. प्रतिद्वंद्वी की पत्नी के जज होने से उन्हें कोई चिंता नहीं हुई.

भारती जी ने यह शर्त्त रख दी कि मैं तभी निर्णायक बनूँगी जब दोनों के गले में ताज़े फूलों की माला डाल दी जाएगी.

शास्त्रार्थ शुरू हुआ और कई दिन चला. पूरी विद्वद्सभा को विस्मय था कि दोनों में से विजयी कौन होगा. शास्त्रार्थ के सम्पन्न होने के दिन उभय भारती जी ने निर्णय सुनाया कि शंकराचार्य विजेता हैं.

अन्य विद्वानों ने निर्णय का आधार जानना चाहा क्योंकि मिश्र जी के भी सब तर्क पूरी तरह ठीक थे.

भारती जी ने स्पष्ट किया कि तर्क करते हुए अनेक बार ऐसा हुआ कि मेरे पति ने बल दिया, मैं जो कह रहा हूँ, यही सत्य है. शंकर केवल वही कहते रहे जो सत्य है. पराजय को निकट जान मेरे पति बार-बार अहंकार से भरे और इस कारण उनसे क्रोध का ‘कर्म’ हुआ. आप देख सकते हैं कि क्रोध के ताप से उनके गले की माला के फूल कुम्हला गए हैं. जबकि आचार्य शंकर की माला के फूल ज्यों के त्यों ताज़े बने हुए हैं. शंकराचार्य ही विजेता हैं.

कंप्यूटर और ई-मेल तो अब आए हैं. हम भारत के लोग सृष्टि के आरंभ से ही ईश्वर के साथ ई-मेल पर वार्त्तालाप करते आ रहे हैं.

ईश्वर का e-mail address है – अहं@कर्म.कॉम ; अंग्रेज़ी में me@act.com !

तालकटोरा स्टेडियम में जो संत-समाज एकत्र हुआ, मलिक मुहम्मद जायसी के ‘पद्मावत’ से अभिव्यक्ति उधार लें तो वे गुरु हीरामन हैं, जिन्हें पराजित करना या जिनके आदेश का उल्लंघन करना असंभव जितना कठिन है. पहले इनसे शास्त्रार्थ करें, पात्रता हासिल करें, तब सिद्धों के दर्शन की सोचें! इनका आशीष पाकर इनके ही भावोद्रेक से हम ‘चंद्रघाटी’ के सिद्धों का आह्वान करने की उम्मीद बाँध सकते हैं.

इन गुरुओं में जो राजनीति से दूर रहने का विचार रखने वाले संत हैं उनसे मेरा विनयपूर्वक निवेदन है कि अब किसी भी ‘राजधर्म’ का पालन ‘धर्मादेश’ के बिना नहीं किया जा सकता. आज वह समय नहीं है कि कोई सम्राट्  विक्रमादित्य शासन करता है और समाज अपनी मूल राष्ट्रीय अस्मिता की सुरक्षा की ओर से निश्चिंत रह सकता है. वह समय गया जब कहावत थी ‘यथा राजा तथा प्रजा’. अब प्रजातन्त्र है इसलिए कहना होगा  ‘यथा प्रजा तथा राजा’. यदि साधु-सन्त प्रजा को मार्ग नहीं दिखाएंगे कि किसे वोट देना चाहिये तो सामान्य जन के पास भटकने के बहुत कारण रहते हैं. संवैधानिक पद पर बैठे प्रधानमंत्री के लिए आपके ‘धर्मादेश’ का पालन करना तभी संभव होगा जब प्रजा भी किसी के बहकावे में न आकर आपके वचन का मान रखती हो. 

राम-मंदिर के निर्माण को लेकर आपने जो धर्मादेश दिया है, उस से हमारे देश का एक वर्ग सीधे-सीधे प्रभावित होता है. ये वे लोग हैं जो अपने को ‘मुसलमान’ कहते हैं. इनमें से चंद पाकिस्तान-मानसिकता वाले मुसलमानों की चिंता नहीं, मगर हमारे जो दूसरे मुसलमान भाई हैं, उन्हें लेकर बहुत तरह की राजनीति की जाती है.

आप सब ज्ञानवान गुरुओं के संज्ञान में यह लाना उचित रहेगा कि इस राजनीति के चलते हम सामान्य-जन किस-किस तरह की समस्याओं का सामना करते हैं.

होता क्या है कि एक मार्क्सवादी महाशय आरोप लगा देते हैं, हिन्दुओं को मुसलमानों जैसा बनाया जा रहा है, जबकि होना इसका उलटा चाहिये!

इसका क्या मतलब हुआ?

साफ़ है कि मार्क्सवादी हों या अन्य ‘धर्मनिरपेक्ष’, ये लोग मुसलमानों को बिलकुल approve नहीं करते और नहीं चाहते कि कोई उनके जैसा बने! यानी मुसलमान को देखते ही साँस खींचेंगे और बोलेंगे ‘तलाक़-तलाक़-तलाक़’. जब उनसे पिटेंगे तो साँस छोड़ेंगे और बोलेंगे ‘कुबूल है -कुबूल है -कुबूल है’! कहलाएंगे ‘प्रगतिशील’!

मैंने उन महोदय से जानना चाहा, हिंदू अगर मुसलमानों जैसे हो जायें तो बुरा क्या है? कृपया स्पष्ट करें कि मुसलमानों जैसे होकर हिंदू आपकी नज़र में कैसे-कैसे हो जायेंगे. 

मैंने उन्हें यह भी बताया कि मेरे पास इस विषय पर कुछ नोट्स हैं. आपकी विद्वत्ता से उनकी तुलना करके मुझे कुछ सीखने को मिलेगा.

इस पर वह कुछ कहने को तैयार नहीं. 

मेरी समझ में हम हिन्दू कहाँ गड़बड़ करते हैं, कहता हूँ. हो सकता है मैं ग़लत होऊँ. फैसला ख़ुद कर लें.

काम, क्रोध आदि षड्-रिपु हैं. मगर अध्यात्म के मार्ग पर. लीला-रूप  संसार-धर्म निभाने में नहीं. समुद्र किसी तरह रास्ता न दे, माने ही नहीं तो उठा लो धनुष! क्रोध करो. यह क्रोध रिपु-वर्ग में नहीं होगा, सात्त्विक होगा. रिपुवर्ग में होता तो रिपुदमन श्रीराम क्रोध करते ही नहीं. 

करणीय सांसारिक कर्त्तव्य को पूरा करने में ये सभी  षड्-रिपु समयानुसार साधन हैं. कर्त्तव्य सामने हो और हाथ काँपने लगें, मुँह सूखने लगे, पसीना निकल आये और हम ‘नहीं मारूँगा’ कहकर धम् से बैठ जायें तो नारायण कहेंगे : “उत्तिष्ठ भारत!”

इसके उलट, यदि हम सोचें कि बैंक में चैक जमा कराते रहने से सांसारिक कर्तव्य पूरा हो जाएगा, या ‘छोड़ो, कौन नाश्ता बनाये’ कहकर भूखे रह जाने से अध्यात्म सध जायेगा तो हम गड़बड़ कर रहे हैं. 

यह तो ठीक कि आत्मा तलवार से नहीं कटेगा. मगर गर्दन तो आत्मा नहीं है. वह कटती आ रही है. इसे नहीं  देखकर हम गड़बड़ कर रहे हैं. 

इसलिए हमें मुसलमानों जैसा हो जाना चाहिये. 

यह साम्प्रदायिकता-भरा कथन नहीं है.  मुसलमान जैसा होकर हम धर्म पर दृढ़ सत्पुरुष ही बनेंगे. 

राजपूत राजा अपना खज़ाना मुसलमान के हाथ में रखते थे, हिंदू के पास नहीं, क्योंकि सच्चा मुसलमान ईमान का पक्का और भरोसेमंद होता है. 

मुसलमान जैसा धर्म-दृढ़ होकर हिंदू और भी ईमान के पक्के और भरोसेमंद हो जायेंगे. कम्युनिस्टों और कांग्रेसियों जैसे लिज्ज-बिज्ज नहीं रहेंगे.

एक अच्छा मुसलमान ज़बान का पक्का होता है. हिंदू इतना आज़ाद-ख्याल होता है कि सभी इतना स्वतंत्र हैं कि आत्मानुशासन-भर काफी है (वह भी अगर हो, वरना उसके बिना भी ‘हम भी हिन्दू!!). इन ‘हिंदुओं’ में समाजोन्मुख अनुशासन अभिव्यक्ति की आज़ादी के खिलाफ़ है! इसे वी. एस. नायपॉल ने (स्वर्गस्थ हुए भारतीय मूल के नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार) एक स्तर पर  ‘a million mutinies’ कहकर बयान किया है.

मुसलमान जैसा होकर हिंदू एक अनुशासन से बँधने की आदत डालेंगे. 

इन बातों से ये लोग कन्नी काटकर निकाल जाने कि कोशिश करते हैं. कम-से-कम अब तो हम यह जानें कि ‘कुफ़्र’ करने वाले को सज़ा दी ही जानी चाहिये. उसे कन्नी काट कर निकल जाना मना है. भले ही सज़ा देने के लिए हमें हाथ में पत्थर उठाना पड़े! 

मुसलमान जैसा होकर हिंदू भी आधुनिक रीति से – अपनी पारंपरिक रीति छोड़, दृढ़-प्रतिज्ञ होना सीखेंगे और हर दुष्ट को उसके ही सिक्के में भुगतान करना जानेंगे.

अगर ऐसा करना ग़लत आचरण की श्रेणी में गिना जाता है — संविधान के विपरीत — तो हिंदू-मुसलमान दोनों कम से कम इस सहमति पर आ सकेंगे कि चलो, अब इस सिक्के में व्यापार बंद करें!

मार्क्सवादी मक्कारी के चलते ऐसा नहीं हो पा रहा.

तथाकथित प्रोग्रेसिवों को समझना होगा कि मुसलमान का मतलब सिर्फ़ मार-काट नहीं है, और भी बहुत कुछ होना सम्भव है.

हिंदुओं का मुसलमानों जैसा हो जाना  शुभ है!

‘एकता’ और ‘समानता’ की इस नयी प्रक्रिया को न तो आर.एस.एस. ने शुरु किया न धर्मादेश ने. इस प्रक्रिया को अब कहीं जाकर आरंभ किया है भारत-भूमि पर मनुष्यों के लिए निर्धारित ‘ईश्वरीय आदेश’ के senseless destruction ने!

भारतीय अस्मिता की इस अनाप-शनाप बरबादी को सामने देखकर भी हम जाने किस दबाव में देखते नहीं.

रद्दी अख़बार तौल-तौल कर ले जाने वाला याद है? आजकल तो डिजिटल काँटा लेकर आता है. कहीं-कहीं अभी भी उसी दो पलड़ों वाली तराज़ू से तौलता है.

एक पलड़े में एक किलो का बाट रखता है. एक किलो रद्दी तौलकर बाट वाले पलड़े में शिफ़्ट कर देता है ताकि दो किलो तौल सके. अब और दो किलो रद्दी बाट वाले पलड़े में जमा देता है. दोनों पलड़ों की चार-चार किलो रद्दी एक साथ उठा नहीं पाता तो एक किलो का बाट सरका कर अलग रख देता है. और, चल पड़ता है रद्दी से रद्दी तौलने का सिलसिला!

1947 में आज़ाद होने के बाद जब हमें अपना देश ख़ुद चलाने का अवसर आया तो वह समय था आधुनिक-बोध के साथ भारतीय जीवन-मूल्यों को समन्वित करके हम देश को आगे ले जाएं. हमारा value-system कुछ भी मापने-तौलने के लिए एक किलो वाला original बाट था. सबसे पहले हमने तौला जवाहर लाल को और भारतीयता वाले पलड़े में जगह दे दी. जल्दी ही अपनी जीवन-शैली वाला बाट हमें सरका कर अलग कर देना पड़ा.

और, चल पड़ा रद्दी से रद्दी तुलने का सिलसिला!

आधुनिकता और भारतीय परंपरा में कोई विरोध होता तो आज मोदीजी कैसे दोनों को साध पा रहे हैं? जो काम 1947 में होना चाहिए था वह अब हो रहा है! किसने सोचा था जवाहर लाल की तरफ से अंग्रेज़ निश्चिंत थे कि राज तो उनका ही चलता रहेगा. बस एक दिन भारतीय किसान को आत्महत्या करनी होगी!        

हमारे पास आज आधुनिक रीति-नीति है, एक समृद्ध संविधान है, एक मज़बूत लोकतंत्र है. देखना तो यह है कि इस देश का हर नागरिक – किसी भी पंथ-संप्रदाय, जाति, हैसियत या मिजाज़ का हो, मन में कैसा संस्कार लाये, और किस विधि लाये, ताकि प्रजातांत्रिक व्यवस्था पर हर संवैधानिक नियम के अनुसार आचरण होता रह सके, प्रजा के संस्कार के अनुरूप राजनीति चल सके, मूल भारतीय जीवन-शैली और कृषक-अर्थव्यवस्था हमारे उत्थान की व्यवस्था बनी रह सके.

कौन तय करेगा कि एक किलो वाला हमारा original बाट कौन सा है? मुहम्मद अली जिन्नाह तो कर नहीं पाये. जवाहर को भी जो खेल करना था कर गए. आज हालत यहाँ तक आ गई है जिनके लिए भारत  ‘भारतमाता’ नहीं, सिर्फ ज़मीन का टुकड़ा है, वे कहने की तैयारी में हैं “और चाहिये”. ऐसे में कौन बताएगा भारतीय जीवन-मूल्य क्या हैं? राष्ट्रपति-भवन? प्रधानमंत्री कार्यालय? ‘Other Priorities’ वाला सुप्रीम कोर्ट? JNU? फ़िल्म सेंसर बोर्ड? स्टॉक एक्सचेंज? या फिर टी.वी. चैनल?

भारतीय मूल्य तय करना अकादमियों का काम नहीं है. न ही ऐसा कर पाना इन संस्थाओं के बस में है. उसके लिए साधु-संतों के ही अनुशासन की आवश्यकता रहेगी. इसलिए वे कृपया ‘प्रजा’ को संभालने से इनकार न करें. ‘तंत्र’ और ‘राजनीति’ केवल प्रजा का extension हैं, प्रजा के राजा नहीं.

तालकटोरा स्टेडियम में घटी ‘धर्मादेश-सम्मेलन’ की पूरी फ़ेंटेसी वक़्त का तक़ाज़ा है, reality है!

10-11-2018

उम्मत-ए-हिंद


अब यह तो मालूम नहीं कि अरबी और फ़ारसी भाषाओं के व्याकरण के अनुसार यह शब्दावली — ‘उम्मत-ए-हिंद’ — सही है या नहीं. यदि समय रहते विश्व की ये दोनों शास्त्रीय भाषाएं – classical languages — सीखने को मिली होतीं तो मैं अपनी बात और अधिक आत्मविश्वास के साथ कह रहा होता. ‘जश्न-ए-रेख्ता’ के एक अधिवेशन में परम पूज्य श्री जावेद अख़्तर से पता चला था बादशाह अकबर कैसे एक मामूली इंसान था, तहमद (लुंगी) बांधकर घूमता था, कहीं भी खड़े होकर लोगों से बतियाता था, और चूँकि उस वक़्त उर्दू ने भाषा के रूप में शक्ल अख़्तियार नहीं की थी पंजाबी में बतियाता था. जब ऐसा अकबर ‘मुग़ल-ए-आज़म’ हो सकता है तो जिस राष्ट्र ‘हिन्द’ के लोग ‘हिंदू’ कहलाए, वहाँ की ‘उम्मत’ को अवश्य ‘उम्मत-ए-हिंद’ कहा जा सकता होगा.

अरबी भाषा के इस शब्द ‘उम्मत’ का अर्थ है किसी पैगम्बरी धर्म के तमाम अनुयायियों का समुदाय. इसे समूह और गिरोह के भी अर्थ में प्रयोग किया जाता है.

इस्लाम की यह प्रतिबद्धता प्रशंसनीय है कि ‘उम्मत’ के चलते दुनिया के किसी एक कोने में रहने वाला मुसलमान किसी दूसरे कोने में रह रहे अपरिचित मुसलमान से भी सबसे पहले जुड़ाव रखेगा और उसके लिए फ़िक्रमंद रहेगा. अपने लोगों को आपस में बाँधकर रखने के लिए यह भाव अत्यन्त सहायक है.

संसार के किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों को इस्लाम के प्रशंसनीय पक्षों को कलंकित करने वालों का समूह देखना हो तो उन्हें पाकिस्तान अथवा उससे भी बढ़कर हिंदुस्तान का वीज़ा लेना चाहिए. हिंदुस्तान में तो ‘मुसलमान-मुसलमान’ करते हुए रात-दिन मुहर्रम-mode में बने रहने वालों की अच्छी-ख़ासी भीड़ देखने-सुनने को मिलेगी. पाकिस्तान को भी और कहीं के नहीं, हिंदुस्तान के ही मुसलमानों की इतनी चिंता है कि वहाँ की स-फ़ौज सरकार को नींद न आने की बीमारी हुई रहती है.

इस तरह की बेमतलब बीमारियों का इलाज हो नहीं पा रहा. ‘उम्मत-ए-हिन्द’ की सही-सही समझ के बिना होगा भी कैसे?

दरअसल ‘उम्मत-ए-हिन्द’ की तरफ़ उस समय बेसाख्ता ध्यान चला गया जब भारतीय संसद् ने दोनों सदनों में नागरिकता संशोधन बिल को स्वीकार कर लिया और असम सुलग गया. उसके बाद देश के और हिस्से भी भभके –  विशेषतः जहाँ-जहाँ ‘हिन्दू-राष्ट्र की प्रतीक’ बी.जे.पी. सरकार थी.

संशोधित अधिनियम का हिन्दुत्व से कुछ लेना-देना न होते हुए भी पहली लपट असम के आसमान में लपकी, इसलिए पहले असम की बात.

अंग्रेज़ी के पत्रकार अर्नब गोस्वामी ने असम का होने के बूते अपने कार्यक्रम में असम के लोगों को भी बहस में शामिल किया और स्पष्ट किया यद्यपि वह स्वयं भी नागरिकता संशोधन का समर्थक नहीं, मगर देख रहा है कि देश के अन्य हिस्सों में भ्रम फैलाकर हिंसा करवाई जा रही है. अर्नब ने बताया आप हिन्दू हैं या मुसलमान, असम में मायने नहीं रखता.

और जगह रखता है?

यह भी बताया भारत रत्न भूपेन हज़ारिका क़व्वाली गा लेते थे, परवीन सुलताना भजन.

कोई अहसान करते थे क्या?

शिव कृष्ण बिस्सा ने शीन काफ़ निज़ाम नाम से और रघुपति सहाय ने ‘फ़िराक’ नाम से उर्दू में शायरी की तो कोई अहसान किया क्या? जायसी, रहीम, रसखान ने और राही मासूम रज़ा ने हिन्दी में लिखा तो पूरी ‘हिन्दू’ क़ौम पर परोपकार कर दिया क्या? या ऐसा होना यों ही भारतीय (हिन्दू) संस्कृति की रवायत है? एक सामान्य जीवन-शैली मात्र है?   

दूसरे असमिया बंधुओं ने बताया वे पहले असमी हैं, तभी तो भारतीय हैं. उनके अनुसार बी.जे.पी. और कुछ नहीं, भगवा कांग्रेस है और हम उसे भी निकाल बाहर करेंगे. 1985 के असम समझौते का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं किया जा सकता? असम-अस्मिता का प्रश्न है.

अर्नब के चैनल के Nation First No Compromise का क्या हुआ? हमें तो ‘असम फ़र्स्ट’ सुनाई दिया. असम में आंदोलन करने वाले लोगों और इन असमिया बांधवों ने एक बार को नहीं सोचा राजनैतिक दल और मुसलिम नेता देश में अस्थिरता लाने के लिए बस एक बहाना ढूँढ रहे थे. वह बहाना हाथ में आया नहीं कि शुरु! असम किसी रिले रेस की तरह baton इन्हें थमाकर हरी घास पर बैठ धूप सेकने लगा और ये भारत-माता की सिकाई करने के अपने पुश्तैनी धंधे में लग गए. ‘हिन्दू राष्ट्र’ की इतनी हिम्मत कि मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक़ से छुटकारा दिला दे और शांति बनी रहे! कश्मीर पर इस्लामी नियंत्रण न रहकर वह ‘हिन्दू-राष्ट्र’ का हिस्सा हो जाये और कहीं पत्थरबाज़ी न हो? चलो, बनाओ सब जगह कश्मीर! हद तो तब हो गई जब सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में मंदिर के पक्ष में फ़ैसला दे दिया और कहीं मुंबई के बम-ब्लास्ट या 26/11 जैसा कुछ हुआ नहीं! ऐसा कैसे चलेगा?

असम-समझौता के हिमायतियों ने बता दिया कि ‘असम’ एक उम्मत-ए-हिन्द है!

हमारी एक और उम्मत है बंगाल, एक है मराठा, एक उम्मत है तमिल – हमारे राष्ट्र-गान में हमारी अधिकांश उम्मतें गिना दी गई हैं – पंजाब, सिंध (?), गुजरात, मराठा, द्राविड़, उत्कल, बंग! और भी हैं जो गिनायी भले नहीं गयीं मगर हैं – जाट, गुज्जर, पटेल, राजपूत, ब्राह्मण, बनिया! हम किस मुँह से मुसलमानों की निंदा करते हैं जिनकी तो एक नबी की उम्मत है, मगर यहाँ तो उम्मतों का अंबार लगा हुआ है? उम्मतें ही उम्मतें!!

किसी को यह चिंता कि लालू यादव को जेल से कैसे निकालें? किसी को फ़िक्र कहीं उनके हुक्काम चिदम्बरम के जैसे तिहाड़-वास न करने लगें. कोई इसलिए दाहिनेहुं बायें (बिनु काज एक्को नाहीं, बेचारे परले दर्जे के संत जो ठहरे!) कि दाऊद को पाकिस्तान भगा देने में अपने मददगार नेता की मदद कैसे की जाये! इसलिए दे पत्थर, दे आग, दे तोड़-फोड़, दे छात्र, दे बुद्धिजीवी! आख़िर, इस ढेर-ए-उम्मत-ए-हिन्द का दम घुटा जा रहा था! देश को साँसत में डाल अब साँस में साँस आयी!

और, बात कुछ नहीं! सिर्फ़ इतनी कि उन ग़ैर-मुस्लिमों को नागरिकता देकर बात ख़त्म करो जो क़ानूनी कागज़ात लेकर आए थे, बरसों से यहाँ रह रहे थे, धार्मिक प्रताड़ना के कारण जाने से इनकार कर रहे थे! मुसलमानों के अतिरिक्त ग़ैर-मुस्लिमों के प्रति अगर सरकार अपना कोई भी दायित्व निभाती है तो देश ‘हिन्दू-राष्ट्र’ हुआ जा रहा है! लगाओ आग!!

इसलिए क्या कोई यह बताने का कष्ट करेगा, हम तब इनमें से कौन सी उम्मत में से गर्दन उचका कर कह रहे होते हैं – “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई” –  जब हमारे मेहमाने-ख़ास कह रहे होते हैं – “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्ला, इंशा अल्ला”? अल्ला ने तो इंशा कर ही रखी है — होंगे नहीं, टुकड़े हुए रखे हैं! इस बात को कहने के लिए हिम्मत की नहीं, इस सत्य को जान रखने भर की ज़रूरत है.  

पाकिस्तान के बाशिंदे और हिन्दुस्तान के मुस्लिम नेता-प्रवक्ता-मौलवी हमारे इस सत्य को अच्छी तरह जानते हैं, इसलिए संभालकर रखे हुए हैं. जब-तब पानदान में से निकालते भी रहते हैं. इन सबका हर बयान इसी सत्य की तश्तरी में रखकर पेश किया जाता है. तश्तरी दिखाई नहीं देती क्योंकि ‘यह हमारा भी देश है’ के रूमाल से ढँकी होती है, जिसमें ‘वन्दे मातरम् नहीं बोलेंगे’ की गाँठ भी लगी रहती है.

यह शायद क़ुदरत का इंसाफ़ है कि इन कठमुल्लों की बातों में न आकर भारत के अनेक शिक्षित मुसलमान खुलकर सामने आना शुरु हुए हैं जो इस्लाम की अच्छाइयों से जुड़े रहते हैं. इस तरह वे अपने धर्म और देश-धर्म में संतुलन बनाकर इनकी बातों को निरर्थक सिद्ध करने का भी काम करते हैं. जबकि ये कठमुल्ले अधिकांश मुसलमानों को शिक्षा से दूर रखते हैं और उस हालत में रखते हैं जिसमें हमने गोल टोपी लगाए मुसलिम युवाओं को पत्थरबाज़ी करते पाया था. यह भीड़ इन मुस्लिम नेताओं की ‘वर्क-फ़ोर्स’ है, इसलिए उन्हें समुचित शिक्षा से दूर रखना इनके लिए ज़रूरी है.

पत्थरबाज़ी को अभी तक हम अपने न्यूज़ चैनलों पर देख-देख कर ‘लॉ एण्ड ऑर्डर’ से आगे और कुछ नहीं समझ रहे. कश्मीर में बरसों-बरस चली पत्थरबाज़ी को कैसे और क्यों हिन्द के हर उस शहर में लाया गया, बोरियों में भर-भरकर पत्थर क्यों इकट्ठे किए गए, क्यों गाड़ियों-ऑटोरिक्शाओं में ढोये गए और कैसे पूरी प्लानिंग की गई इसकी गंभीरता हम तब तक नहीं जान पाएंगे जब तक हम इस्लाम में ‘रज्म’ (रजम) का महत्व नहीं जानेंगे. अपनी बेशुमार उम्मतों में उलझे हुए हिन्द को इतमीनान है पत्थर और इस्लाम-कनेक्शन जैसा कुछ होता नहीं. चाहे तस्लीम रहमानी हो, चाहे महमूद पराचा और चाहे असदुद्दीन ओवेसी, इन सबके बयानों और गतिविधियों को हम रज्म, हिज्राह, शिर्क-अल-अकबर, दारुल इस्लाम आदि को जाने बिना समझ नहीं पाएंगे. ये लोग इन्हीं को घिस-घिस कर अपनी ‘वर्क-फ़ोर्स’ को काम में लगाते हैं, जैसे पहले कश्मीर में और अब हिन्द के बड़े हिस्से में लगाया.

‘रज्म’ का सीधा-सा मतलब है पत्थर मारना. हज के दौरान शैतान को सात पत्थर मारना भी यही है. ‘हुदूद’ की सज़ाओं के लिए भी शरीयत में ‘रज्म’ prescribe किया गया है. ‘हुदूद’ को हम हिन्द के उम्मती इस तरह समझें कि जिसने लक्ष्मण-रेखा पार कर दी, हद से आगे चला गया. उसे ‘रजीम’ करना ही पड़ेगा. ‘रजीम’ यानी जिसे पत्थरों से मारा जाए. ‘रजीम’ के लिए ‘रजूम’ हो जाना – पत्थरबाज़ बनना — मोमिनों पर फर्ज़ है.

हिन्दी हिंदुओं से बढ़कर ‘रजीम’ और कौन होगा जो अल्लाह के बराबर बहुत-से देवी-देवता लाकर, ईश्वर की मूर्त्ति बनाकर, और भी बहुत सी मूर्त्तियाँ – जैसे बुद्ध आदि की मूर्त्ति बनाकर हद पार कर गए हैं. यह ‘शिर्क-अल-अकबर’ है – बहुत बड़ा कुफ़्र. हिन्दू तो अल्लाह के सिवा दूसरे की भी कसम खा लेते हैं, जैसे ‘राम-कसम’. यह थोड़ा छोटा कुफ़्र है – ‘शिर्क-अल-असग़र’. इसलिए इनके ऊपर पत्थरबाज़ी मुसलमानों पर फर्ज़ है.

यह कारण है कि ये मुसलिम-नेता ‘पत्थरबाज़ी’ की निंदा करते कभी दिखाई नहीं देते. इसी पत्थरबाज़ी – रज्म – के वीडियो और फ़ोटो दिखाकर आतंकवाद से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े इन मुस्लिम लीडरान को विदेश से और पैसा मिलेगा. ‘दार-अल-हर्ब’ हिन्द को ‘दार-अल-इस्लाम’ बनाने के इस नमूने से मिले पैसे को ‘काम पूरा करने’ के लिए लगाया जाएगा.

नागरिकता संशोधन क़ानून किसी की भी नागरिकता लेने के लिए नहीं, बहुत समय से अटके पड़े कुछ ग़ैर-मुस्लिमों को नागरिकता देने का अधिनियम है. तब यह मुसलमानों के विरुद्ध कैसे हो गया?

जो बात ये मुसलिम नेता असलीयत सामने आ जाने से बचने के लिए बोलेंगे नहीं मगर जिस कारण इन्होंने इस अधिनियम के सामने मुसलमानों को ‘रजूम’ अर्थात् पत्थरबाज़ हो जाने को सबाब और फर्ज़ कहकर उकसाया उसका आधार है ‘हिज्राह’.

‘हिज्राह’ यानी अपनी जगह से दूसरी जगह जाना. हज़रत मुहम्मद साहब जब मक्का से मदीना गए थे तो वह ‘हिजरत’ थी. अनावश्यक युद्ध टालने के लिए ऐसे ही कभी भगवान् श्रीकृष्ण भी मथुरा से द्वारका जाकर ‘रणछोड़राय’ हुए थे. हिंदुओं में भी कोई ओवेसी हो और चाहे तो वह भी श्रीकृष्ण के ‘हिज्राह’ को तोड़-मरोड़कर उलटा-सीधा भड़काने के लिए काम में ला सकता है.

बहरहाल, ‘हिज्राह’ को मस्जिदों और मदरसों में जिस तरह समझाया जाता है उसे देखते लगता है यह पत्थरबाज़ी तो बहुत कम रही!

एक मुसलिम देश से जाकर दूसरे मुसलिम देश में पनाह लेने को सऊदी अरब जैसे देश बढ़ावा नहीं देते. उन्हें मालूम है मुसलमानों को ग़ैर-मुसलिम देशों में जाकर बसना चाहिए. इसके लिए ये देश बहुत पैसा भी ख़र्च करते हैं.  क्योंकि इनके मुताबिक़ इस्लाम ने दुनिया को एकदम साफ़-साफ़ बाँट रखा है.

अल्लाह की बनाई इस ज़मीन का वह हिस्सा जहाँ के लोग इस्लाम पर ईमान लाते हैं ‘दारुल-इस्लाम’ है. सभी घोषित इस्लामी देश ‘दारुल-इस्लाम’ हैं. कुछ जगहें ऐसी हो सकती हैं जहां सब तो मुसलमान नहीं हो गए, मगर उन देशों के पड़ोस में जो ‘दारुल-इस्लाम’ है उसके साथ अगर यह समझौता हो गया है कि हम अपने मुसलमानों का पूरा-पूरा ध्यान रखेंगे तो ऐसे देश ‘दारुल-सुलह’ या ‘दारुल-अहद’ हुए. अर्थ हुआ ‘संधि-प्रदेश’. ऐसे देशों के इस्लामीकरण की प्रक्रिया जारी रहती है.

मगर जो देश जब तक पूरी तरह इस्लामी नहीं बन जाते उन्हें ‘दारुल-हर्ब’ कहा जाता है. ‘दारुल-हर्ब’ – युद्ध क्षेत्र. 1947 में पाकिस्तान बना तो वह हुआ ‘दारुल-इस्लाम’. भारत जो रह गया वह हुआ ‘दारुल-हर्ब’. अतः, टुकड़े-टुकड़े गैंग का एक और इंशा अल्ला नारा है – “भारत तेरी बरबादी तक जंग रहेगी, जंग रहेगी”. ‘दारुल-हर्ब’ में जिहाद हमेशा जारी रहता है. हिन्द है तो जब तक ‘ग़ज़वा-ए-हिन्द’ करके ईंट से ईंट न बजा दी जाए, तब तक जिहाद होता रहेगा. बचना है तो इस्लाम क़बूल कर लो.

राजनीति में शौकिया लिप्त हमारी बुद्धि आज तक यही माने बैठी है पाकिस्तान का बनना एक राजनैतिक घटना थी. ये जो ‘रज्म’ के पत्थर आज नज़र आ रहे हैं हमारी अक्ल पर पड़े रहे हैं जो हमें मार्क्स की उक्ति कभी ठीक नहीं लगी – धर्म अफ़ीम है. दारुल-इस्लाम पाकिस्तान इसी अफ़ीम की लहलहाती खेती था, है और रहेगा.   

नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की, इन तमाम काफ़िर हिंदुओं की इतनी हिम्मत कि ‘दारुल-इस्लाम’ पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान और बांग्ला देश से ‘दारुल-हर्ब’ हिन्द में आ रहे मुसलमानों को आने वालों में नहीं गिनेंगे! अल्पसंख्यक वहाँ रह नहीं सकेंगे, और हिन्द के मुसलमान उन्हें यहाँ रहने नहीं देंगे. मुसलमानों को भी आने दो क्योंकि उनका कैसे भी वहाँ से यहाँ आना ‘हिज्राह’ नामक इस्लामी फर्ज़ है, ताकि वे दारुल-हर्ब को दारुल-इस्लाम बनाने के काम में जुट सकें. उन्हें न आने देना इस्लाम से दुश्मनी है जिसकी सज़ा है पत्थरबाज़ी – रज्म!

यह कारण था जो इन नेताओं के लिए बहुत ज़रूरी हो गया कि बोरियाँ और गाड़ियाँ भर-भर पत्थरों का इंतज़ाम करें और दिखा दें ‘रज्म’ का इस्लामी हुक्म कैसे बजाया जाता है.

मुझे पक्का विश्वास है क़ुर’आन-ए-पाक में ये सब बातें इस रूप में और इस उद्देश्य से नहीं कही गई होंगी. ये शैतान आई.एस.आई.एस.-मानसिकता के समर्थन में क़ुर’आन की आयतें उद्धृत करते हैं और यदि कोई नेक मुसलमान दुनिया के किसी कोने से उठकर इन्हें ग़लत कहता भी है तो ये उसे काफ़िर घोषित करके उसकी जान तक लेने पर उतारू हो जाते हैं. जितना मेरी समझ में आया है हज़रत मुहम्मद इतनी बड़ी हस्ती थे कि ज़रा से में उनका अपमान या ‘ईश-निन्दा’ – blasphemy – हो ही नहीं सकती. संभव ही नहीं है.

इस एक उदाहरण से यह बात समझ में आ सकेगी.

अल्लाह के जो 99 नाम इस्लाम में बताए गए हैं और जो क़ुर’आन के पाठ में से संकलित हैं, वे सभी ‘विष्णुसहस्रनाम’ में आ गए हैं.

आप स्वयं देख लीजिए

1  अर रहमान   — बहुत मेहरबान  — प्रियकृत्

2  अर रहीम    — निहायत रहम वाला   — प्रीतिवर्धन:

3  अल मलिक  — बादशाह  — लोकनाथ:

4  अल कुद्दुस  —  पाक ज़ात  — पूतात्मा

5   अस सलाम — सलामती वाला  — शरणं शर्म

6   अल मु अमिन — अमन देने वाला — शांतिद:

7   अल मुहयमिन — निगरानी करने वाला  — रक्षण:

8   अल अजीज़ – ग़ालिब — जेता

9   अल जब्बार   — ज़बरदस्त — महाबल:

10  अल मुतकब्बिर — बड़ाई वाला  – महाशक्ति:

11  अल खालिक — पैदा करने वाला — स्रष्टा

12  अल बारी — जान डालने वाला — विधाता

13  अल मुसव्विर — सूरतें बनाने वाला — विश्वकर्म्मा

14  अल गफ़्फ़ार — बख्शने वाला   — क्षमिणावर:

15  अल क़हहार — सब को अपने काबू में रखने वाला —

— दारुण:

16  अल वहहाब — बहुत अता करने वाला — वरद:

17  अर रज़्ज़ाक —  रिज़क देने वाला — वाजसन:

18  अल फतताह  — खोलने वाला — योगविदांनेता

19  अल अलीम  — खूब जानने वाला — सर्वज्ञ:

20  अल काबिज़ — नपी तुली रोज़ी देने वाला — प्रग्रह:

21  अल बासित — रोज़ी को फराख देने वाला — उदारधी:

22  अल खाफ़िज़ — पस्त करने वाला — दमयिता

23  अर राफ़ी — बुलंद करने वाला — उत्तारण:

24  अल मुईज़ — इज्ज़त देने वाला — मानद:

25  अल मुज़िल — ज़िल्लत देने वाला — दर्पहा

26  अस समी — सब कुछ सुनने वाला — विश्रुतात्मा

27  अल बसीर — सब कुछ देखने वाला — सर्वदृक्

28  अल हकम – फ़ैसला करने वाला — नियन्ता

29  अल अदल — अदल (न्याय) करने वाला — समात्मा

30  अल लतीफ़ — बारीक बीं — सूक्ष्म:

31  अल खबीर — सब से बाख़बर — विद्वत्तम:

32  अल हलीम — निहायत सहनशील — सहिष्णु:

33  अल अज़ीम  — बुज़ुर्ग — महान्

34  अल गफ़ूर — गुनाहों को बख्शने वाला — सर्वसह:

35  अश शकूर – कदरदान — कृतज्ञ:

36  अल अली — बहुत बुलंद, बरतर — प्रांशु:

37  अल कबीर — बहुत बड़ा — श्रेष्ठ:

38  अल हफ़ीज  — निगेहबान — गोप्ता

39  अल मुक़ीत  — सबको रोज़ी, तवानाई (बल) देने वाला    —                     

                                                            — भूतभृत

40  अल हसीब   — काफ़ी — पुष्ट:

41  अल जलील — बुज़ुर्ग  — प्रतिष्ठित:

42  अल करीम   — बेइंतिहा करम करने वाला — भक्तवत्सल:

43  अर रक़ीब – निगेहबान — प्रजागर:

44  अल मुजीब  — दुआएं सुनने और कुबूल करने वाला

— अनुकूल: 

45  अल वासिऊ — फराखी देने वाला — व्यापी

46  अल हकीम  — हिकमत वाला — वैद्य:

47  अल वदूद — मुहब्बत करने वाला — सुहृत्

48  अल मजीद — बड़ी शान वाला — गुरुतम:

49  अल बाईस — उठाने वाला — बीजमव्ययम्

50  अश शहीद — हाज़िर — साक्षी

51  अल हक़ —   सच्चा मालिक — सत्य:

52  अल वकील  — काम बनाने वाला — आधारनिलय:

53  अल क़वी – ज़ोरावर — शक्तिमताम्श्रेष्ठ:

54  अल मतीन — कुव्वत वाला — महावीर्यः

55  अल वली — हिमायत करने वाला — लोकबंधु:

56  अल हमीद   — ख़ूबियों वाला  — स्तव्य:

57  अल मुह्सी   — गिनने वाला — कालः

58  अल मुब्दी    — पहली बार पैदा करने वाला — उद्भवः

59  अल मुईद — दोबारा पैदा करने वाला — समावर्त:

60  अल मुह्यी — ज़िंदा करने वाला — प्राणद:

61  अल मुमीत   — मारने वाला — शर्व:

62  अल हय्युल — ज़िंदा  — जीवन:

63  अल क़य्यूम  — सबको क़ायम रखने,निभाने वाला — शाश्वतः

64  अल वाजिद — हर चीज़ को पाने वाला — संग्रह:

65  अल माजिद — बुज़ुर्गी और बड़ाई वाला — शुचिश्रवा:

66  अल वाहिद  — एक अकेला — एकः

67  अल अहद — एक अकेला — एकात्मा

68  अस समद — बेनियाज़ (निस्पृह) — विविक्त:

69  अल क़ादिर  — कुदरत रखने वाला — विक्रमी

70  अल मुक्तदिर — पूरी कुदरत रखने वाला — क्षम:

71  अल मुक़द्दम — आगे करने वाला — भूतादि:

72  अल मुअख्खर — पीछे और बाद में रखने वाला — अंतक:

73  अल अव्वल — सब से पहले — सर्वादि:

74  अल आख़िर — सब के बाद — विक्षर:

75  अज ज़ाहिर  — ज़ाहिर व आशकार — व्यक्तरूप:

76  अल बातिन — पोशीदा व पिन्हा — अव्यक्त:

77  अल वाली –मुतवल्ली (देखरेख करने वाला) — शास्ता

78  अल मुताआली — सब से बुलंद व बरतर — उदीर्ण:

79  अल बर — बड़ा अच्छा सुलूक करने वाला — पुरुसत्तम:

80  अत तव्वाब — सब से ज्यादा कुबूल करने वाला  — पापनाशन:

81  अल मुन्ताक़िम — बदला लेने वाला — शत्रुतापन:

82  अल अफ़ुव्व — बहुत ज्यादा माफ़ करने वाला — सह:

83  अर रऊफ़ — बहुत बड़ा मुश्फ़िक (कृपालु) — सुंद:

84  मालिकुल मुल्क — मुल्कों का मालिक — लोकस्वामी 

85  अजजुल जलाली वल इकराम —- अज़मतो जलाल और इकराम वाला  

— महातेजा: मान्य:

86  अल मुक्सित — अदलो इन्साफ कायम  करने वाला —                            

                                                            — न्याय:

87  अल जामिऊ — सब को जमा करने वाला — श्रीनिधि:

88  अल गनी — बड़ा बेनियाज़ व बेपरवा    — निधिरव्यय:

89  अल मुग्नी — बेनियाज़ व गनी बना देने वाला — धनेश्वर:

90  अल मानिऊ — रोक देने वाला — दुरारिहा

91  अज ज़ार्र — ज़रर (आघात)  पहुँचाने वाला — प्रतर्दन:

92  अन नाफ़िऊ — नफ़ा पहुँचाने वाला — सिद्धिद:

93  अन नूर —    सर से पैर तक नूर बख्शने वाला —            

                                                — प्रकाशात्मा

94  अल हादी — सीधा रास्ता दिखाने व चलाने वाला —                             

                                                            — नेता

95  अल बदी — बेमिसाल चीज़ को ईजाद करने वाला — सर्गः

96  अल बाक़ी — हमेशा रहने वाला — सनात्

97  अल वारिस  — सब के बाद मौजूद रहने वाला — वंशवर्धन:

98  अर रशीद — बहुत रहनुमाई करने वाला — गुरु:

99  अस सबूर — बड़े तहम्मुल(सहिष्णुता)वाला — धृतात्मा

अल्लाह अनन्त है. उसे न 99 नामों में समेटा जा सकता, न एक हज़ार नामों में. इसका यह अर्थ नहीं कि हज़रत मुहम्मद को 99 से आगे मालूम नहीं था. अनादि, अनन्त, असीम, अरूप, अविकार अल्लाह को वह पूरा-पूरा जानकर ही कुछ कहते-करते थे. इसलिए उन्होंने प्रकट रूप से उतना ही कहा जितना अरबिस्तान की तात्कालिक परिस्थितियों में ज़रूरी था. बर्बर जीवन के लिए अभिशप्त वहाँ की मनुष्य-श्रेणी के अन्तर्मन में अध्यात्म और अल्लाह के प्रति समर्पण का फूल खिलाने के लिए जितना और जो कुछ ज़रूरी था, वह सब उन्होंने कहा और 99 नामों में समेटकर रख दिया.

हमारे शैतान दोस्त इसी सब को तोड़-मरोड़ कर अपनी कट्टरता के लिए इस्तेमाल करते हैं. अपनी इस तोड़-मरोड़ और संकीर्णता को यह डेढ़ हज़ार वर्ष पहले के अरबिस्तान पर रुका हुआ देखना चाहते हैं. इनकी साम्प्रदायिकता का विरोध करो तो उसे अपना नहीं इस्लाम का विरोध सिद्ध करने में लग जाते हैं. इनके तिलिस्म के शिकार, शिक्षा से दूर, अल्लाह के नहीं मुल्ला के इस्लाम पर ईमान लाने वाले मुसलमान हाथ में पत्थर उठा भी लेते हैं.

बहुत लोगों को एक बात पर हैरानी होती होगी. ये मुसलिम नेता और प्रवक्ता इतनी वफ़ादारी से अपने मज़हब के लिए ज़ोर देकर कैसे बोल लेते हैं कि हिन्द का मुसलमान वास्तव में बहुत परेशान जान पड़ता है?

दरअसल ये क़ुरान-ए-पाक और इस्लाम की बहुत सी शब्दावली और सिद्धांतों-अवधारणाओं से हमारे-आपके अपरिचय का लाभ उठाकर साफ़-साफ़ झूठ बोल रहे होते हैं. जिस तरह पत्थरबाज़ी इस्लाम की एक धार्मिक गतिविधि है – रज्म, उसी तरह एक अन्य इस्लामिक सिद्धान्त है – ‘तक़ीया’. यों तो ‘तक़ीया’ का सामान्य सा अर्थ है-  दुराव, छिपाव. अपने प्राण बचाने के लिए बोला गया झूठ ‘तक़ीया’ है. सुन्नियों से अपने प्राण बचाने के शिया मुसलमान ‘तक़ीया’ को अमल में लाते थे. काफ़िरों और ग़ैर-मुस्लिमों के बीच सच का दुराव करते हुए, झूठ को घुमावदार ढंग से सच की तरह कह डालना इस्लाम में जायज़ है. इस्लाम में धैर्य, साहस और आत्मोत्सर्ग जैसे जो आदर्श कहे गए हैं, ‘तक़ीया’ को उनसे भी ऊपर रखा गया है, ख़ास तौर से तब जब कि मोमिनों के सामने दीन के लिए एक बड़ा मक़सद मौजूद हो. भारत में इनके सामने ‘ग़ज़वा-ए-हिन्द’ अथवा एक बार और पार्टीशन की माँग या पूरे भारत का इस्लामीकरण आदि इतने बड़े मक़सद उपस्थित हैं कि ये कभी भी सच बोलने के फेर में न पड़कर हमेशा ‘तक़ीया’ से काम लिया करते हैं. यह मानसिक-वाचिक ‘तक़ीया’ उस समय स्थूल शारीरिक स्वरूप में लागू किया जाता है जब जिहाद को समर्पित मुसलमान के लिए मुँह पर नक़ाब लगाकर पत्थरबाज़ी, आगज़नी या अन्य हिंसा करना अनुकूल रहता है. ऐसे नक़ाबपोश जिहादी जब छात्रों के बीच जाकर सक्रिय होते हैं तब उस राजनैतिक दल को बदनाम करने में बहुत कारगर सिद्ध होते हैं जो सत्तारूढ़ होता है. इस्लाम-समर्थित इस ‘रज्म’ (पत्थरबाज़ी) अथवा ‘तक़ीया’ (झूठ) से ये कोई पाप नहीं कर रहे होते, इनकी समझ में स्वयं को पक्का मुसलमान सिद्ध कर रहे होते हैं.  

नागरिकता संशोधन के बहाने ‘रज्म’ की पत्थरबाज़ी से हिन्द को ‘दारुल-इस्लाम’ बनाने की दिशा में जो क़दम बढ़ाया गया है उसे, और इनके लगातार चलते ‘तक़ीया’ को देखते हुए अब समय आ गया है कि इन सब तथ्यों को लेकर इन मुसलमानों की आँख में आँख डालकर देखा जाए, इनसे बेखौफ़ सवाल किया जाए. इन्हें बेधड़क दण्डित किया जाए और इनकी परवाह करना छोड़ दिया जाए. पाकिस्तानी मानसिकता के ये लोग ‘हिन्दू-राष्ट्र’-‘हिन्दू-राष्ट्र’ क्यों चिल्लाते हैं, अब यह समझ में आ जाना चाहिए. यह वक़्त है कि पूरा ध्यान उन मुसलमानों पर लगाया जाए जो राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़े हुए हैं. सौभाग्य से हिन्द के कुल मुसलमानों का दो तिहाई राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़ा हुआ है. सब औरंगज़ेब नहीं, दारा शिकोह भी हैं और इस बार वे सुरक्षित रहने चाहिएं, उनका सिर कटना नहीं चाहिए. ये ही सबको यह बताकर मदद कर सकते हैं कि रज्म, शिर्क, हिज्राह, तक़ीया आदि इस्लामी अवधारणाओं का देश को अस्थिर बनाने के लिए राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा है. दीन के इस राजनैतिक इस्तेमाल को बेनक़ाब करना हर हिन्दुस्तानी का फ़र्ज़ है. 

इन शैतानों को सबसे बड़ी मदद मिलती है हिन्द में उम्मतों के अंबार से जो कि राजनीति चलाने का भी आधार है. जिसे हम ‘अनेकता में एकता’ कहते आ रहे हैं वह दरअसल इन उम्मतों के ढेर का आधार सिद्ध हुई है – अनेकता विभिन्न अस्मिताओं की अलग-अलग ललक में बदलती चली गई है और एकता मजबूरी में बोला गया एक नारा लगने लगी है.

क्या हुआ उस एक उम्मत-ए-हिन्द का जिसे हम राष्ट्र-भारती, भारत माता, जननी जन्मभूमि जैसे सम्बोधन देते आये हैं और जिसके लिए ‘वन्देमातरम्’ उच्चारते आये हैं? यदि यह ‘हिन्दुत्व’ है और इससे देश बच जाता  है – दारुल-हर्ब – युद्ध-क्षेत्र — कहलाने से, या रज्म से – पत्थरबाज़ी से, तब भी यह इस्लाम-विरोधी नहीं है. ‘विष्णुसहस्रनाम’ के उपरिकथित उदाहरण से स्पष्ट है हिन्दुत्व इस्लाम को आग़ोश में लेकर ही चलता है.

यह हिन्दुत्व ‘उम्मत-ए-हिन्द’ है.  

25-12-2019  

मौलाना गाँधी


चौंक गए ?

मत चौंकिए.

यह शीर्षक मेरा दिया हुआ नहीं है, कांग्रेसियों का है. मैं इन शब्दों को प्रयोग करने वाला (शायद) तीसरा व्यक्ति हूँ. मुझ से पहले दो बड़े कांग्रेसी नेता यह नेक काम कर गये हैं.

सन् 1942 में महात्मा गाँधी ने वर्धा में ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ की स्थापना की. डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, पंडित जवाहरलाल नेहरु, डॉ. ज़ाकिर हुसैन, आचार्य काकासाहेब कालेलकर, श्री बाला साहेब खेर, डॉ. ताराचंद, डॉ. जाफ़र हसन, प्रो. नजीब अशरफ नदवी, श्री श्रीमन्नारायण, पंडित सुन्दरलाल, पंडित सुदर्शन, श्री सीताराम सेक्सरिया, श्री अमृतलाल नानावटी, श्री वेदप्रकाश नायर जैसे अग्रगण्य कांग्रेसी नेताओं ने इस ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ के माध्यम से गाँधीजी के ‘उसूलों’ के प्रचार के लिए योगदान दिया.

इनमें श्री श्रीमन्नारायण (जिनका पूरा नाम श्रीमन्नारायण अग्रवाल था, और जो श्री जमनालाल बजाज के दामाद थे) इस सभा के संस्थापकों में थे और वर्धा के ही बजाज कॉलेज के प्रिंसिपल भी थे. (सब कुछ अपने परिवार का है — यह कांग्रेस के डी.एन.ए. में है!) अपने अंतिम दिनों में श्रीमन्नारायणजी गुजरात के राज्यपाल भी रहे. यही श्री श्रीमन्नारायण 1946 में हिन्दुस्तानी प्रचार सभा, वर्धा के प्रधानमन्त्री बने.

1946 में प्रकाशित ‘विशाल भारत’ का एप्रिल अंक और 19 मई, 1946 का ‘देशदूत’ यदि किसी ग्रंथालय-संग्रहालय में देखने को मिल जाए तो हम पायेंगे कि इन दोनों में श्री श्रीमन्नारायण का एक लेख प्रकाशित हुआ था. शीर्षक था “मौलाना गाँधी”. इस लेख में श्रीमन्नारायणजी ने गाँधीजी के ‘उसूलों’ को स्थापित करते हुए कहा था कि हिन्दी जैसी भाषा के स्थान पर हमें हिन्दुस्तानी का इस्तेमाल करना चाहिए. इस ‘उसूल’ के चलते हिन्दू नाम के पहले भले ‘श्री’ कहें, मगर अन्य धर्मों के लोगों का लिहाज़ रखते हुए ‘जनाब’ कहना चाहिए. ‘हिन्दी पत्र-पत्रिका’ मगर ‘उर्दू रिसाले’, ‘शब्द’ के बजाय ‘लफ़्ज़’, ‘संस्कृति’ के बजाय ‘तहज़ीब’, ‘साहित्य’ को ‘अदब’, ‘कविता’ को ‘नज़्म’, ‘विद्वान्’ को ‘माहिर’ आदि कहना राष्ट्रीय और भावनात्मक एकता के अनुकूल रहेगा.

उन दिनों रेडियो के लिए ‘आकाशवाणी’ शब्द प्रचलित नहीं हुआ था अतः ब्रिटिश हुकूमत होते हुए भी गाँधीजी के ‘उसूल’ के मुताबिक उसे ‘ऑल इंडिया रेडियो’ कहकर बोला जाता था. अतः वहाँ भी ‘हिदुस्तानी’ का प्रचलन हुआ और यह ध्यान रखा जाने लगा कि किसी हिन्दू के लिए ‘स्वागत’ बोलें तो मुसलमान-ईसाई आदि के लिए ‘इस्तक़बाल’ कहा जाए. हिन्दू के बारे में बताना हो तो ‘सुरगबास हो गए’ और अन्य के लिए ‘इंतक़ाल फ़रमा गए’ अनाऊंस किया जाए. यह भी तय कर दिया गया कि जिस तरह अंग्रेज़ी भाषा की संस्कृति-धर्म ‘ईसाइयत’ है वैसे ही ‘हिन्दुस्तानी’ भाषा की धर्म-संस्कृति ‘इस्लाम’ निर्धारित कर दी जाए. इसलिए ऑल इंडिया रेडियो पर गॉड का अनुवाद हमेशा ‘ख़ुदा’, रिलीजन का ‘मज़हब’, फ़्राईडे का ‘जुम्मा’, ‘प्रे’ (pray) का ‘दुआ’ और ‘हिज़ एक्सेलैन्सी’ का ‘हुज़ूर वायसराय’ बोलकर प्रसारण किया जाने लगा. यह तो तब था जबकि अभी गाँधीजी ने हमको ‘बिना खड्ग-बिना ढाल’ वाली आज़ादी नहीं ले दी थी.

और इस तरह गाँधीजी के उसूलों ने शुद्ध भारतीय भाषा उर्दू को एक धर्म दे दिया. बैठे-ठाले उसे मुसलमानों की भाषा बना दिया !

इसलिए अपने लेख में श्री श्रीमन्नारायण अग्रवालजी ने बताया कि ‘मौलाना’ शब्द ‘महात्मा’ के ही अर्थ में है, इसलिए हमें अब से ‘महात्मा गाँधी’ को ‘मौलाना गाँधी’ कहना चाहिए ताकि ‘हिन्दुस्तानी’ ज़ुबान को बढ़ावा मिल सके !

एक अन्य कांग्रेसी नेता थे पण्डित रविशंकर शुक्ल, श्री विद्याचरण शुक्ल के पिता, जो उस समय के ‘सेंट्रल प्रोविंस’ और स्वातंत्र्योत्तर मध्य प्रदेश के पहले मुख्य मंत्री बने. रविशंकर शुक्लजी निष्ठावान् हिन्दी-सेवी थे और हिन्दी को बढ़ावा देने वालों में गिने जाते थे. आप गांधीजी का विरोध तो नहीं करते थे, मगर हिन्दी के मामले में स्पष्टोक्ति कर दिया करते थे. शुक्लजी मानते थे कि भाषा और साहित्य की परम्पराएं हमें वाल्मीकि, व्यास, कालिदास और तुलसी से मिली हैं; अशोक, समुद्रगुप्त, अकबर और बाजीराव से नहीं. इसलिए न तो गाँधीजी हिन्दी के भाग्य का निर्णय कर सकते, न कांग्रेसी यह बता सकते कि इस लिपि में लिखो और ऐसी भाषा में बोलो.

यह पूरा प्रकरण इतिहास-वृक्ष का वह पत्ता है जिसे जान-बूझकर सूख जाने दिया गया क्योंकि यह हवा के हर झोंके के साथ सरसरा रहा था कि गाँधीजी के नेतृत्त्व में कांग्रेस बेतरह देश को गुमराह करने में लगी है. ये सब कांग्रेसी कर क्या रहे थे ? एक ओर गाँधीजी स्वयं ‘हरिजन’ की बात करते हुए डॉ. भीमराव अंबेडकर को आगे बढ़ा रहे थे, (जिन्होंने आगे चलकर बी.बी.सी. के अपने इंटरव्यू में कह दिया कि गाँधीजी ‘महात्मा’ कहलाने लायक व्यक्ति नहीं थे !), दूसरी ओर डॉ. सम्पूर्णान्द (जो गोविंदवल्लभ पंत के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे) किताब लिख रहे थे — ‘ब्राह्मण, सावधान’ ! एक ओर गाँधीजी ‘यूनाइटेड प्रोविंस’ (आज का यू.पी.) में ‘हिन्दी’ और ‘गाय’ की रक्षा करने की बात करने वाली कांग्रेसी सरकार बनवा रहे थे (जिससे जिन्नाह व अन्य मुसलमान और ‘असुरक्षित’ हो गए — “मुझे इस देश में डर लगता है” का मनोविज्ञान तभी से काम कर रहा है), दूसरी तरफ़ वही गाँधीजी वर्धा की ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ के माध्यम से हिन्दी की लुटिया डुबो रहे थे !

लिहाज़ा, पण्डित रविशंकर शुक्ल ने एक किताब लिखी — “हिन्दी वालो, सावधान”. उन्होंने इसकी भूमिका में स्वीकार किया कि शीर्षक की प्रेरणा उन्हें डॉ. संपूर्णानन्द की पुस्तक “ब्राह्मण, सावधान” से मिली है ! ‘हिन्दी वालो, सावधान’ में शुक्लजी ने एक पूरा प्रकरण रखा — “हिन्दुस्तानी की बला” — हिन्दुस्तानी अर्थात् गाँधीजी के ‘उसूलों’ वाली भाषा ! इस प्रकरण के तीन चेप्टर भी दिलचस्प हैं — हिन्दुस्तानी आंदोलन का एकतरफ़ा स्वरूप, हिन्दुस्तानी वालों की कारगुज़ारी, और हिन्दुस्तानी वालों के हथकण्डे !!!

‘हिंदुस्तानीवाले’ ‘हिंदीवाले’ — यानी अख़बारवाले, रद्दीवाले, दूधवाले, सब्ज़ीवाले, कपड़े इस्तरी करने वाले, बोझा ढोने वाले, वगैरह- वगैरह — समाज का अलग ही वर्ग — ऐसे ही हिंदी’वाले’ !!

वाह री कांग्रेस ! और वाह वाह हमारे राष्ट्रपिता !!

आँख पूरी-पूरी खोलने के लिए यह देखना-जानना शायद मददगार हो कि श्री श्रीमन्नारायण के लेख ‘मौलाना गाँधी’ को पं. रविशंकर शुक्ल ने क्या जवाब दिया. उन्होंने इसके उत्तर में एक सुदीर्घ लेख लिखा जो लगभग सौ पृष्ठ की एक लघु पुस्तिका बन गया. इस पुस्तिका को शुक्लजी ने भी शीर्षक दिया — ‘मौलाना गाँधी’ !

इस तरह मैं शायद “मौलाना गाँधी” — इन शब्दों को प्रयोग करने वाला तीसरा व्यक्ति रहा होऊँ !

श्रीमन्नारायणजी ने अपने लेख ‘मौलाना गाँधी’ में चिंता व्यक्त की — “उर्दू अख़बार और रिसाले यह कहकर गाँधीजी को दोष देते रहते हैं कि वह हिन्दुस्तानी की ओट में उर्दू का नाश कर हिन्दी का प्रचार करना चाहते हैं.”

पं. रविशंकर शुक्ल ने अपनी पुस्तिका ‘मौलाना गाँधी’ में इस चिंता का निवारण यों किया — “गाँधीजी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन छोड़ते हुए अपने मुँह से कहा है कि ‘सम्मेलन छोड़कर हिन्दी की और सेवा हो सकेगी’. ठीक भी है. सम्मेलन में रहते तो सेवा प्रत्यक्ष थी. ‘और सेवा’ करनी हो तो ओट से ही हो सकती है. ‘हिन्दुस्तानी’ ही तो वह ‘ओट’ है जिससे चाहे हिन्दी का नाश कर दो — (रेडियो की तरह), चाहे उर्दू का”.

गाँधीजी हिन्दू और मुसलमान को एक करने के नाम पर कैसे साफ़-साफ़ बाँट रहे थे उसकी झलक श्री श्रीमन्नारायण के ‘मौलाना गाँधी’ में इस तरह मिलती है — “अभी तक तो गाँधीजी क़ौमी ज़बान को ‘हिन्दी’ नाम से पुकारते रहे. लेकिन जब उन्होंने देखा कि ‘हिन्दी’ और ‘उर्दू’ धीरे-धीरे दो अलग-अलग धारायें हो रही हैं तो उन्हें मिलाने के लिए ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ की नींव डाली गई”.

शुक्लजी के ‘मौलाना गाँधी’ में इसके जवाब में लिखा है — “जब गाँधीजी ने ‘क़ौमी ज़बान’ को ‘हिन्दी’ नाम से पुकारना शुरू किया था, उस समय क्या ‘उर्दू’ भाषा और उस भाषा के इस नाम ‘उर्दू’ का अस्तित्त्व था या नहीं ? या उस समय हिन्दी और उर्दू एक ही चीज़ थीं ? और गाँधीजी वाली हिन्दी वही थी जो उर्दू थी ? हिन्दी और उर्दू की धारायें कब से ‘धीरे-धीरे’ अलग होना शुरु हुईं ? आज की ‘अलग-अलग धारा’ हिन्दी और उर्दू की तुलना में क्या तुलसी का ‘मानस’ और ग़ालिब का ‘दीवान’ एक-दूसरे के अधिक निकट हैं जो आज हिन्दुस्तानी की ज़रूरत आन पड़ी ? अब क्या देवनागरी और फ़ारसी लिपियाँ भी ‘धीरे-धीरे’ दो अलग धारायें होना शुरु हो गई हैं या जब गाँधीजी ने ‘क़ौमी ज़बान’ को ‘हिन्दी’ कहना शुरु किया था उस समय सब हिंदियाँ देवनागरी में ही लिखी जातीं थीं? फिर, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा तो गाँधीजी के ही हाथ में थी. तभी उन्होंने वहीं से ‘दोनों लिपियाँ’ का प्रचार शुरु क्यों नहीं किया ? 1946 तक क्यों रुके रहे ? ‘हिन्दुस्तानी’ का प्रस्ताव तो 1925 में ही पास हो गया था. तब से 1946 तक क्यों गाँधीजी ‘राष्ट्र-लिपि देवनागरी’ के प्रचार में बराबर सहयोग देते रहे ? या फिर क्या वह देवनागरी को फ़ारसी लिपि का पर्याय मानने की भूल करते रहे थे ? ”

कहना न होगा कि गाँधीजी के ‘उसूल’ वर्धा की ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ की बदौलत पूरे-पूरे लागू हो गए होते तो आज तमिलनाडु को दो भाषाओं और दो लिपियों का विरोध करना पड़ रहा होता – हिन्दी का भी और उर्दू का भी! क्योंकि उन्हें तीन भाषाएं — तमिल, अंग्रेज़ी, और ‘हिन्दुस्तानी’ तथा चार लिपियाँ — अंग्रेज़ी की रोमन, तमिल, और ‘हिंदुस्तानी’ की ‘दो लिपियाँ’ — देवनागरी और उर्दू-लिपि सीखनी पड़तीं !

‘हिन्दुस्तानी’ भाषा और गाँधीजी के परम भक्त डॉ. ताराचंद ‘रेडियो कमेटी’ के सदस्य थे. सम्बन्धित बैठक में उन्होंने हिन्दी में और उर्दू में भी ख़बरें प्रसारित करने का विरोध यह कहकर किया कि इससे ‘हिन्दुस्तानी’ का एक्सपेरिमेंट सफल नहीं होगा. शुक्लजी पूछते हैं कि क्या यह हिन्दी और उर्दू दोनों को एक साथ हलाल करना नहीं हुआ ? मगर दूसरे ‘हिन्दुस्तानी’-स्टार और गाँधी-वादी पं. सुंदरलाल ने यहाँ तक कह डाला कि इस तरह हिन्दी और उर्दू में ख़बरों की मांग ‘टू नेशन थ्योरी विद ए वेंजिएन्स’ है !

उर्दू को उर्दू की और हिन्दी को हिन्दी की तरह सम्मान देने की हिमायत करते हुए शुक्लजी ने याद दिलाया है कि ‘मैं बड़ा होता हूँ तो अपनी शक्तियों से’. गाँधीजी के ‘उसूलों’ वाली ‘हिन्दुस्तानी’ और उसे लिखी जाने वाली दोनों लिपियों की स्वीकृति (देवनागरी और फ़ारसी) से भारतवर्ष का जो होगा उसकी ओर भी उन्होंने ध्यान आकर्षित किया है.

“हमारे पूर्वजों ने हमें सिखाया कि शब्द का अशुद्ध उच्चारण करने से पाप होता है. मन्त्र का अशुद्ध उच्चारण करने से उसका फल नहीं होता. और उन्होंने हमें एक ऐसी लिपि भी दी जिसमें दस हज़ार वर्ष पुराने उच्चारण सुरक्षित हैं. आज भी हम अपने एक शब्द का उच्चारण वैसा कर सकते हैं जैसा हमारे पूर्वज करते थे. ‘हिन्दुस्तानी’ और उसकी उर्दू-लिपि के कारण अब हमें सीखना होगा — साहित्या, वरत, रामायन, गनेश, बरहमन, सभापती, आचारिया नरेंदर देओ. अगर किसी को संदेह हो तो सुन ले रेडियो के हिन्दुस्तानी माहिरों का उच्चारण !”

बात यहाँ तक नहीं रुकी. गाँधीजी ने इस नियम को स्वीकृति दी कि ‘हिन्दुस्तानी’ अपनाने में उर्दू-बहुल क्षेत्रों पर यह बाध्यता नहीं होगी कि वे दोनों लिपियों का सिद्धान्त अपनाएं. वे नहीं चाहेंगे तो उन्हें देवनागरी सीखनी नहीं पड़ेगी. मगर हिन्दी-बहुल इलाक़ों में नागरी और उर्दू दोनों लिपियाँ सीखना ज़रूरी होगा. इसी तरह उर्दू-बहुल क्षेत्रों में उनका ‘मतरूकवाद’ भी मंज़ूर होगा — यानी उनके हिन्दी-अज्ञान और हिन्दी न सीखने की उनकी दृढ़-प्रतिज्ञा का भी सम्मान रखा जाएगा.

ये उर्दू-बहुल क्षेत्र थे कौन से, यह जानना बहुत ज़रूरी है. ये थे पंजाब, सिंध और सीमा-प्रान्त !

मतलब साफ़ है. ‘हिन्दुस्तानी’ भाषा पाकिस्तान बनाये जाने की रिहर्सल सिद्ध हुई. और बापू कह रहे थे पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा ! यह लाश 30 जनवरी, 1948 तक कहीं नज़र नहीं आई जबकि पाकिस्तान 14 अगस्त, 1947 को ही वजूद में आ चुका था — लाखों लोगों के रक्त की बाढ़ में तैरते पनीर के टुकड़े की तरह !!

भाषा केवल एक उदाहरण है जिसमें ‘महात्मा’ के स्थान पर ‘मौलाना गाँधी’ कहने की इस पुरज़ोर सिफ़ारिश के बाद गाँधीजी की और पड़ताल करना कुछ और भी सरल हो जाता है.

1915 में गाँधीजी दक्षिण अफ़्रीका से भारत लौटे तो सर ए. ओ. ह्यूम, दादाभाई नौरोजी और दिनशा वाचा द्वारा स्थापित कांग्रेस अङ्गरेज़ों और भारतीयों के बीच संवाद स्थापित करने के उद्देश्य को लेकर सक्रिय थी. इसमें दो तरह के मिजाज़ काम कर रहे थे. एक वे जो शांति के साथ अंग्रेज़ों से बात करने के विश्वासी थे ताकि उनके साथ मिलकर सरकार बनाई जा सके. इनमें गोपालकृष्ण गोखले और मोतीलाल नेहरू जैसे लोग थे. इन्हें कांग्रेस का ‘नरम दल’ कहा जाता था.

दूसरे वे लोग थे जो शुद्ध रूप से अंग्रेज़ों से मुक्त होकर अपनी सरकार बनाना चाहते थे. इनमें बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिनचन्द्र पाल प्रमुख थे जो ‘लाल-बाल-पाल’ के नाम से जाने जाते थे. इन्हें ‘गरम दल’ के ख़िताब से नवाज़ा गया था क्योंकि ये कहते थे ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा’.

गाँधीजी ने कांग्रेस की बैठकों में हिस्सा लेना शुरू किया और शीघ्र ही उनके विचारों, अनुभवों व जानकारी ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया. अब यह कल्पना करना हमारे लिए कठिन नहीं है कि यह प्रभाव नरम दल के लिए अधिक अनुकूल सिद्ध हुआ. गोखलेजी को गाँधीजी ने अपना राजनैतिक गुरु माना और आगे चलकर उनका अर्थव्यवस्था-सम्बन्धी ज्ञान गाँधीजी के बहुत काम आया. गरम दल धीरे-धीरे कांग्रेस से विदा हो गया. 1915 में ही गोखलेजी के देहान्त के बाद कांग्रेस पर मोतीलाल नेहरू और गाँधीजी का वर्चस्व स्थापित हो गया.

गाँधीजी के ये विचार और अनुभव क्या थे ?

अमेरिकी गृह युद्ध के बाद के विचारकों में एक प्रमुख नाम था हेनरी डेविड थोरो जिन्हें सँवारा था राल्फ़ इमर्सन नामक बड़े विचारक ने. थोरो चाहते थे कि वह जीवन के केवल बेहद ज़रूरी तथ्यों से सरोकार रखने वाला जीवन जीयें. ऐसा न हो कि मृत्यु की घड़ी में उन्हें आभास हो कि जीवन तो उन्होंने जीया ही नहीं. उनकी इस चिंता का समाधान दिया उन्हें इमर्सन ने. मेसाशुशेट के कोंकोर्ड में जंगलों की अपार शांति के बीच इमर्सन की जो संपत्ति थी वहाँ ‘वॉल्डन’ नामक तालाब के किनारे थोरो एक छोटी-सी कुटिया छाकर रहने लगे. यहाँ से उनका ‘सादा जीवन’-सिद्धान्त निकला.

कुछ समय बाद थोरो से सैम स्टेपल्स नाम का सरकारी अधिकारी टकरा गया जिसका काम था लोगों से टैक्स वसूलना. स्टेपल्स ने थोरो को बताया कि उन्होंने पिछले छः वर्ष से ‘चुनाव-टैक्स’ (प्रतिव्यक्ति कर) नहीं भरा है क्योंकि वह अपने स्थान से ग़ायब रहे हैं. वह टैक्स उन्हें अब देना पड़ेगा.

थोरो ने यह टैक्स देने से इनकार कर दिया. लिहाज़ा उन्हें एक रात के लिए हवालात में बन्द कर दिया गया. यहाँ से निकला थोरो का ‘सविनय अवज्ञा’-सिद्धान्त जिसके अनुसार व्यक्ति अपने तईं अन्याय करने वाली सरकार के नियम मानने से इनकार करने का हौसला दिखाये.

महान् रूसी लेखक लियो तोल्स्तोय ने ‘सादा जीवन’ और ‘सविनय अवज्ञा’ के ये दोनों सिद्धान्त थोरो से ग्रहण किए. दक्षिण अफ़्रीका में अपने ‘तोल्स्तोय फ़ार्म’ पर रहते हुए गाँधीजी ने ये दोनों सिद्धान्त तोल्स्तोय से प्राप्त किए. गाँधीजी का ‘सादा जीवन उच्च विचार’ का सन्देश यहीं से आरम्भ हुआ.

भारत में इन सिद्धान्तों ने लोगों के मन पर गहरी छाप छोड़ी. थोरो की ‘सविनय अवज्ञा’ व्यक्तिगत स्तर पर थी जबकि एक कुशल वकील होने के नाते गाँधीजी यह जानते थे कि क़ानून की हद में रहकर ही सरकार से भिड़ा जाना चाहिए. इस तरह उन्होंने सरकार की तरफ़ मुँह करके ख़ुद को सुरक्षित कर लिया. बहुत सोच-समझकर ‘सविनय अवज्ञा’ को ‘जन-आन्दोलन’ बनाने की प्रेरणा उन्होंने मार्क्सवाद से ग्रहण कर ली और पीठ की तरफ़ से भी सुरक्षित हो लिये.

इस सब में गाँधीजी का अपना क्या था ? एक चतुर भ्रमर की भाँति विभिन्न पुष्पों से अपने काम का तत्त्व ग्रहण करने की कला उनकी अपनी थी ! इस तरह कुछ ऐसा हुआ कि ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध बड़े-से-बड़ा जन-आन्दोलन गाँधीजी ने छेड़ा, महात्मा कहलाये, राष्ट्र-पिता बने, सरकार को चुनौती देने का साहस दिखाया, सब कुछ किया — मगर अपने को बचा-बचाकर किया. उनके ख़ासमख़ास मोतीलाल नेहरू — एक और कुशल वकील — यों भी सरकार के दुलारे थे ही — ‘क़ौम के ग़म में खाते हैं डिनर हुक्काम के साथ’ ! किसी भगतसिंह या सुभाषचन्द्र बोस की तरह गाँधीजी ने अपने को कभी किसी बड़े संकट में नहीं डाला. अंग्रेजों की सुरक्षित जेल में उनकी ‘अवज्ञा’ को सुभीता था. क़ानूनन उन्हें आग़ाखाँ महल वगैरह में ऐसी जेल ही दी जा सकती थी. गाँधी और नेहरू अगर वीर सावरकर से ज़्यादा बड़े देशभक्त थे तो उन्हें क्यों नहीं सर आग़ाखाँ पैलेस की जगह कभी काला पानी मिला?

वकील किस तरह राजनीति को पथभ्रष्ट करते हैं, कर सकते हैं, गाँधीजी का सिद्ध किया वह आदर्श हमारे देश में आज अडिग परम्परा बनकर स्थापित हो चुका है !

‘गरम दल’ कांग्रेस से विदा हुआ तो गाँधीजी को कोई कष्ट नहीं हुआ. जब भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दी गई तो गाँधीजी को बुरा नहीं लगा. ये क्रान्तिकारी देश का ‘ब्रिटिश’ क़ानून जो तोड़ रहे थे ! केशव बलिराम हेडगेवार ने कांग्रेसी नेता के रूप में 1921 के असहयोग आन्दोलन में गिरफ़्तारी दी और 1925 में कांग्रेस छोड़कर ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना करने के बावजूद गाँधीजी के 1930 के नमक-आंदोलन में शामिल हुए, उनके कांग्रेस का त्याग कर देने पर भी गाँधीजी को तकलीफ़ नहीं हुई. नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने कांग्रेस से निकलने का फ़ैसला किया तो शायद बापू ख़ुश ही हुए होंगे. हाँ, दोनों विश्वयुद्धों में ‘सरकार’ को सहयोग देकर, ब्रिटिश फ़ौजों के लिए भर्ती करवाकर अपने ‘अहिंसा’ के ‘उसूल’ पर प्रश्नचिह्न लगवाकर भी राष्ट्रपिता को कुछ फ़र्क नहीं पड़ा. लेकिन जब मुहम्मद अली जिन्नाह कांग्रेस से अलग हुए गाँधीजी की रातों की नींद ख़राब हो गई. एक बार बकरा खा ही चुके थे जो रात भर पेट में मिमियाता रहा था, तब भी नींद ख़राब हुई थी.

मौलाना गाँधी के हिंदुई मुसलमानों से इस रिश्ते को भी भली भाँति खंगालना बनता है.

मुहम्मद अली जिन्नाह कांग्रेस के ‘नरम-दल’ का हिस्सा थे. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के शिक्षा-जगत् से सर सैय्यद अहमद ख़ान की सरपरस्ती में पैदा हुई ‘मुस्लिम लीग’ में जिन्नाह को कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी. उनकी ज़्यादा रुचि थी अपनी वक़ालत में और अंग्रेजों से आज़ादी हासिल करने की नरम-दल कांग्रेसी कोशिशों में. लीग द्वारा प्रचारित मुसलमानों के अलग निर्वाचन-क्षेत्र के भी वह पक्षधर नहीं थे.

पहले विश्वयुद्ध में इंग्लैंड की जीत के बाद जर्मनी का साथ देने वाले उस्मान ख़लीफ़ा वाले तुर्की के लिए मुश्किल पैदा हो गई थी. दुनिया भर के मुसलमानों की तरह हिंदुस्तान के मुस्लिमों को भी तुर्की की ‘खिलाफ़त’ को सुरक्षित रखने की चिंता हुई और भारत में खिलाफ़त-आन्दोलन शुरू हुआ. जिन्नाह ने इस आंदोलन में भी दिलचस्पी नहीं ली, हालांकि अब वह मुस्लिम लीग में आ चुके थे. उनका कहना था हमें भारतीय मुसलमानों पर ध्यान देना चाहिए, तुर्की की ‘खिलाफ़त’ से हमें क्या लेना-देना.

इधर मौलाना गाँधी के क़ानूनी मन में एक पत्थर फेंक कर दो चिड़ियों को एक साथ चौंका देने का विचार आया. भारत का खिलाफ़त-आन्दोलन एक तरफ़ अंग्रेज़ों पर दबाव बनाने का अच्छा मौक़ा हो सकता था, तो दूसरी ओर यही अवसर था कि लीग के मुक़ाबले में हिंदुई मुसलमानों का दिल जीत लिया जाए. मुसलमानों का भी नेता बन जाया जाए.

गाँधीजी ने खिलाफ़त-आन्दोलन को कांग्रेस के समर्थन की घोषणा कर दी. जल्दी ही जिन्नाह को भी गाँधीजी को यह मौक़ा बख़्शने की भूल का अहसास हो गया. इस तरह कांग्रेस का नरम दल छोड़ने वाले जिन्नाह मुसलमानों के ‘गरम-दल’ में तब्दील हो गए !

जिन्नाह और मौलाना गाँधी की उड़ती नींदों ने यहीं सात फेरे ले लिए !

वह दिन और आज का दिन, हिंदुस्तान का मुसलमान अपना नेता किसे कहे इसी संभ्रम में चकराया बैठा है.

मौलाना गाँधी तो मुसलमानों के नेता नहीं बन पाये, जिन्नाह की भी इकलौती मुस्लिम-लीडरी स्थापित नहीं हो सकी. जिन्नाह और दूसरे मुसलमानों से गाँधीजी की यह लालसा छिपी न रही कि देश को अंग्रेज़ों से आज़ाद करवाते समय मुग़ल पकड़ से भी छुटकारा दिलाना है. वह दिल से चाहते थे कि स्वतन्त्र भारत मुसलमानों सहित एक आदर्श लोकतान्त्रिक राज्य बने — जो राम-राज्य हो ! उस समय तक यह स्पष्ट नहीं था कि स्वातंत्र्योत्तर भारत में उन पाँच-सात सौ राजे-रजवाड़ों का क्या स्वरूप होगा जो तब ब्रिटिश राज के झंडे तले अनुस्यूत थे. गाँधीजी को डर था ऐसा न हो अंग्रेजों से छूटें और एक केंद्रीय सत्ता के रूप में फिर मुसलमानों की बादशाहत के चंगुल में आ जाएं और हिन्दू हमेशा की तरह बिखरा-बिखरा ही रह जाए !

गाँधीजी को अपने वकीली कौशल पर इतना भरोसा था कि जैसे वह अंग्रेज़ों के सामने क़ानूनन डटे रह सके, वैसे ही प्रार्थना सभा, ईश्वर-अल्ला तेरो नाम और हिन्दुस्तानी भाषा जैसी ‘उदारता’ से मुसलमानों को भी समझा लेंगे. ऐसा हो न सका. हिन्दी, देवनागरी, गाय, राम-राज्य जैसे गाँधी-उद्गारों के सामने जिन्नाह जैसे मोहभंग से गुज़रे मुस्लिम-नेता एक आम मुसलमान का यह अहसास ज़िन्दा रखने में कामयाब रहे कि हिन्द के बादशाह तो मुसलमान ही हैं. अगर नहीं तो अलग मुस्लिम देश ही एक रास्ता है ताकि हिन्दू लोग मुसलमानों को परेशान न कर सकें. वे कैसे कहते कि लोभ या भयवश धर्म-परिवर्त्तन कर लेने वाला हर आदमी शाही-खानदान का नहीं हो जाता ! मौलाना गाँधी की ऐसा कहने की हिम्मत न हुई क्योंकि मुसलमानों को लेकर साफ़-साफ़ कुछ कहने की अनुमति उनकी वकीली अक्ल देती नहीं थी.

किसी एक महानायक के होने से समाज को बहुत से लाभ रहते हैं. हम भारतीयों के स्वभाव में विशेष रूप से ऐसा है कि कोई करने वाला मिल जाए तो हम जी-जान से उसके पीछे हो लेते हैं. महाभारत-युग में हमने श्रीकृष्ण को ऐसे ही महानायक के रूप में देखा था. इस बात को कैसे भुलाया जा सकता है कि श्रीकृष्ण के एक अवतारी पुरुष के रूप में स्थापित होने में उनके गुण जितने ज़िम्मेदार थे, जन-साधारण का जी-जान से अपने नायक के पीछे चल देने का गुण भी श्रेय का कम अधिकारी नहीं था. श्रीकृष्ण को श्रीकृष्ण बनाना ईश्वर का काम था या नहीं, मालूम नहीं, मगर भारतीय जन-जन का काम ज़रूर था. श्रीकृष्ण हों कि गाँधी, या फिर भले आज के मोदी, हम ‘We, the people’ को कभी न भूलें!

गाँधी की आँधी जो बीसवीं सदी में चली उसका हश्र यह हुआ कि हमारे मौलाना गाँधी हिन्दू और मुसलमान दोनों से मिले श्राप के कारण उस दिन कोलकाता (तब का कलकत्ता) में अनशन करते हुए खटिया पर पड़े थे जिस दिन उनका प्रिय जवाहरलाल अंग्रेज़ों से भी बढ़िया अङ्ग्रेज़ी में Tryst With Destiny वाला अपना भाषण दे रहा था और ‘बापू के बिना तिरंगा नहीं फहरेगा’ कहने की जिसके पास फ़ुरसत नहीं थी. परिणाम यह हुआ कि गाँधीजी इस देश को हमेशा के लिए एक नायक-विहीन समाज दे गए. नायक-विहीन समाज के सामने बहुत-से ख़तरे रहते हैं और आज का भारत उन्हीं ख़तरों के थपेड़ों में हाथ-पाँव मारता हुआ जैसे-तैसे तैर ले रहा है.

माँ-बाप के लाड़-प्यार से बिगड़े बच्चों को सबने देखा है. मगर राष्ट्र-पिता को जन-जन के लाड़-दुलार-विश्वास से बिगड़ते केवल बीसवीं सदी के भारत ने देखा है. सबने जिस बेतरह महात्माजी के हर आदेश को माना उसके नतीजे में जब कोई न माने तो अनशन की ज़बरदस्ती से मनवाने का हथियार इन बिगड़े हुए पिता के पास था. उन्हें भरोसा था कि मौलाना गाँधी होने में कोई अड़चन आएगी तो इस हथियार का इस्तेमाल कर लूँगा और देश का बँटवारा नहीं होने दूँगा. राष्ट्रपिता का वह हथियार अब बात-बिना बात के सत्याग्रहों और हड़तालों के रूप में हमारे सिरों के ऊपर मण्डराया करता है.

अफ़सोस कि गाँधीजी जीवनभर सत्य के प्रयोग करते रह गए और जिस दिन सत्य तक पहुँचे भी तो बहुत देर हो चुकी थी. जिन्नाह को अविभाजित भारत का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, उनका यह प्रस्ताव भी किसी काम न आया. अनेक इतिहासकारों ने इसे एक पराजित ‘बूढ़े फ़कीर’ की गाथा की तरह देखने की कोशिश की है. शायद इसीलिए 1960 का दशक आते-आते एक कहावत चल पड़ी थी — “मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी”.

1982-83 में कभी रिचर्ड एटनबोरो की फ़िल्म ‘गाँधी’ के आने के साथ ही गाँधी-गो लोगों ने फिर करवट ले ली और सब तरफ़ एक बार फिर ‘गाँधी-गाँधी’ होने लगा. यह आज तक पता नहीं चल पाया ये ‘गाँधी-गाँधी’ कर रहे लोग गाँधीजी से प्रभावित हैं या रिचर्ड एटनबोरो से ! कहावत के आसमान से गिरे तो एटनबोरो के खजूर में अटके!!

कुछ भी हो, आने वाले किसी भी युग में भारत की जब भी बात होगी गाँधीजी को छोड़ हो न सकेगी. सत्य के प्रयोग करते-करते सो जाने वाला यह बूढ़ा फ़कीर एक काम तो हम लोगों के लिए कर ही गया है. जिस तरह कुशल गृहिणियाँ जानती हैं कच्चे आम का मौसम हमेशा नहीं रहता. वे केरी के अचार से मर्त्तबान भर-भर कर रख लेती हैं ताकि आने वाले वक़्तों में काम आए. उसी तरह गाँधीजी ने भारत-राष्ट्र को लेकर शायद ही कोई चिंता हो जिस पर अपना चिन्तन मुखर न किया हो — स्वराज्य और अहिंसा से लेकर राष्ट्र, राम-राज्य, और पंचायत तक; जाति-व्यवस्था और धर्म से लेकर स्वच्छता, दलित, महिलाएं और प्रशासन तक. उन्हें लगता रहा सत्य के प्रयोगों का यह मौसम कभी-न-कभी तो बीतेगा. तब प्राप्त सत्य के मर्त्तबान काम आएंगे. वह सब किताबों में है पर एक भी बात किताबी नहीं है. ‘महात्मा’ से मौलाना’ के बीच का सफ़र गाँधीजी ने जितना सोचा था उतने से कहीं ज़्यादा लम्बा निकला — और अन्ततः निरर्थक भी. इसने ख़ुद गाँधीजी को अपने पाये सत्य को जी पाने का समय नहीं दिया. फिर भी वे सत्य हमारे लिए pre-cooked tinned food की तरह उपलब्ध हैं. बेईमान गाँधीवादी हमें उनका आस्वादन नहीं करने देंगे.

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और तकनीकी विज्ञानवाद के इस युग में एक बात तो तय है. हमारा साबिका अब सूक्ष्म से नहीं स्थूल से पड़ता है. बन्द tin को खोलने में स्थूल ही काम आयेगा. यहाँ इस्लाम हमारे लिए सहायक सिद्ध हो सकता है. अरबिस्तान की बर्बर जातियों के मनों में कभी ‘अल्लाहो-अकबर’ की स्थूल हुंकार ने अध्यात्म जैसे सूक्ष्म का ताला खोल डाला था. गाँधीजी के उपलब्ध सत्य का बन्द डिब्बा खोलने और देश के काम में लाने के लिए एक ठोस किस्म का ‘राष्ट्रवाद’ अपनी पूरी कट्टरता के साथ एकमात्र सटीक औज़ार है. आज बहुत लोग कहते हैं कि हमें किसी से देशभक्त होने का सर्टिफ़िकेट नहीं चाहिए. मगर सच यह है कि गाँधीजी निश्चित रूप से सही अर्थ में ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें किसी से राष्ट्र-भक्ति के सर्टिफ़िकेट की ज़रूरत नहीं. राष्ट्र-भावना की स्थूल तीव्रता के बिना महात्मा गाँधी 15 अगस्त, 1947 के पहले वाले मौलाना गाँधी होने पर ही रुक कर रह जाएंगे.

कोई क्योंकर भूले कि इन मौलाना गाँधी को दुलत्ती खाकर देश-विभाजन भी देखना पड़ा और स्वातंत्र्य के प्रथम ग्रास में अपने हाथों जवाहरलाल नामक मक्षिका-पात कर वह ग्रास निगलना भी पड़ा.

व्यक्ति-पूजा वाला यह ‘आँख-बन्द’ गाँधीवाद किस काम का?

केवल इस काम का कि सरकार का मतलब ‘गोरा साहब’ (जवाहरलाल) और गाँधी यानी अवज्ञा! आज़ादी है तो अब ‘अविनय’-अवज्ञा — फ़्रीडम ऑफ़ एक्स्प्रेशन!!

गाँधीजी के मर्त्तबान में यह नहीं मिलेगा!

हम राष्ट्र से जुड़कर चखें तो सही!!

गाँधीजी की क्या किसी की भी हत्या करने में नाथूराम गोडसे क़ानूनन उतना ही अपराधी होता. क़ानून ने उसे दण्डित भी किया. वह हर हाल में एक भावुक और कट्टर देशप्रेमी तो था ही. उसका अपराध हत्या का था, ‘महात्मा’ की ‘मौलाना’-असफलता को रिजेक्ट कर देने का नहीं. मौलाना गाँधी को नकार तो कांग्रेसियों ने ही दिया था !

अर्थहीन गाँधी-भक्तों की सुनने के पहले उन्हें ठोक-बजाकर परख लेना चाहिए. जो बहुत ‘गाँधी-गाँधी’ करे उसके गाल पर ज़न्नाटेदार थप्पड़ जड़ देना चाहिए. वह दूसरा गाल आगे करे तो समझ लीजिए गाँधीवादी है. पलटकर जवाब देने चले तो जान रखिए गोडसे-वादी है !

गाँधी-गाँधी सब करें, गाँधी बने न कोय.

थप्पड़ पड़े जो गाल पर, तुरत गोडसे होय.

अल्लाहो-अकबर !!!

11-12-2019

राजा तालध्वज और महाराष्ट्र सरकार


सोशल मीडिया पर एक छोटी सी क्लिप चली थी जिसे lenticular आर्ट का नमूना कहा गया था. Lenticular यानी ऐसी सतह जो आगे-पीछे दोनों तरफ़ से convex हो — Bi-convex, जिसमें हल्का-सा एक गोल उभार हो. जैसे कि काली मसूर की साबुत दाल का एक दाना. इस तरह के lenticular काँच पर एक छोटी लड़की का चित्र बना हुआ था. बाएँ से दायीं ओर चलते हुए हम देखते हैं कि उस लड़की की उम्र बढ़ती जाती है और अन्तिम छोर पर पहुँचते तक वह एक बुढ़िया में तब्दील हो जाती है ! यदि हम दायें से देखना शुरू करेंगे तो एक बूढ़ी औरत का चित्र मिलेगा जो बायें चलते-चलते आख़िर में एक कम-उम्र लड़की के चित्र में बदल जाएगा. ऐसे चित्र और भी देखे गए हैं जिनमें एक आदमी हौले-हौले शेर में बदल जाता है, या एक औरत आदमी बन जाती है. इस तरह के आर्ट को optic illusion कहकर भी वर्णन किया गया है.

लेकिन उस दिन हमारे अपने ब्रह्मापुत्र मुनिवर नारदजी के साथ जो हुआ वह न जाने किसी तरह का कोई आर्ट था, या फिर कोई optical illusion ! देवर्षि को स्वयं को बहुत बाद में समझ में आया कि हुआ क्या था, जबकि सब कुछ हो लिया था !

हुआ यूँ कि नारदजी सुर और तान से विभूषित अपनी वीणा बजाते-बजाते साम-गान करते हुए भगवान विष्णु के दर्शनार्थ श्वेतद्वीप पहुँचे. उस समय श्रीविष्णु लक्ष्मीजी के साथ विराजमान थे. उन्हें आया देखकर सर्वलक्षण-सम्पन्ना, सर्वभूषण-भूषिता, रूपवती नारियों में सर्वश्रेष्ठ भगवती लक्ष्मीजी अन्त:पुर में चली गयीं.

नारदजी ने पूछा, “हे पद्मनाभ भगवन् ! मैं कोई धूर्त्त या दुष्ट व्यक्ति तो हूँ नहीं. मैं तो इंद्रियों को, क्रोधादि को और सबसे बढ़कर माया को जीत लेने वाला तपस्वी हूँ. फिर माता लक्ष्मी मुझे आया देख इस तरह चली क्यों गयीं ?”

विष्णुजी ने कहा, “देवर्षि ! बात तो मात्र सामान्य शिष्टाचार की है कि दो मित्रों को बातचीत करने के लिए एकान्त दिया जाए. मगर चूँकि आपने माया की बात की है, तो बता दूँ कि माया उन लोगों के लिए भी अति दुर्जय है जो श्वास को जीत लेने वाले योगी हैं, सांख्य के ज्ञाता हैं, निराहार रहने वाले तपस्वी हैं, जितेन्द्रिय पुरुष हैं अथवा देव-जाति के हैं. स्वयं मैं, शिव और ब्रह्मा भी अजन्मा माया को जीत नहीं सके हैं. क्या आपको ऐसा बोलना उचित है कि ‘मैंने माया पर विजय प्राप्त कर ली है’ ?”

नारदजी को कुछ कहना नहीं पड़ा क्योंकि अभिमान की उस घड़ी में उनका अविश्वास और संशय उनके चेहरे और हाव-भाव से बोल रहा था.

यह देखकर विष्णुजी ने कहा, “नारदजी, छोड़िये इन बातों को. चलिये, कहीं घूमकर आते हैं.”

भगवान् विष्णु ने अपने वाहन विनतापुत्र गरुड़ को याद किया और गरुड़जी तुरन्त हाज़िर !

दोनों सवारियों को लेकर गरुड़जी उड़े और बहुत से विशाल वनों, दिव्य सरोवरों, नदियों, ग्राम-नगरों, पर्वत्तों, ऋषियों के आश्रमों, कमलों से सुवासित छोटे-बड़े तालाबों को पार करते हुए एक गहन-मनोहर वन में जा पहुँचे. वहाँ विष्णुजी ने नारदजी को एक अत्यंत रमणीय सरोवर दिखाया और मुस्कुराते हुए उनका हाथ पकड़कर उस सरोवर के किनारे ले गए.

सुंदर वन-प्रान्तर, सरोवर का स्वच्छ जल, अनेक कमलों की सुगंध, चहचहाती चिड़ियाँ, ढलती दोपहर. यात्रा की थकान ऊपर से.

भगवान् बोले, “मुनिश्रेष्ठ ! स्नान करना चाहेंगे ? थकान दूर हो जाएगी और आप एकदम फ़्रेश हो जाएंगे?”

नारदजी को आइडिया जंच गया. शिखा बाँध उतर गये सरोवर में.

तैरते-तैरते दूसरे किनारे पर पहुँचे तो एक अत्यन्त रूपवती स्त्री तालाब से निकलकर उस सुनसान जंगल में चारों ओर चकित-भीत नेत्रों से देख रही थी. नारदजी स्त्री-रूप में बदलने के बाद सब कुछ भूल चुके थे. उन्हें यह भी ध्यान नहीं आया कि विष्णुजी उनकी वीणा और मृगचर्म आदि लेकर सामने वाले किनारे से ग़ायब हो चुके हैं.

हो-न-हो, वह तालाब lenticular गुण-धर्म वाली कला का नमूना रहा होगा.

उस एकांत में वह अकेली मोहिनी बैठी सोच रही थी कि अब उसे क्या करना होगा. तभी सुसज्जित हाथियों से घिरा हुआ एक रथ वहाँ आ निकला. उस रथ में आभूषणों से सज्जित एक सुंदर युवक विराजमान था मानो शरीर धारण करके अनंग कामदेव स्वयं वहाँ बैठे हों.

रथ से उतरकर उस युवक ने स्त्री से पूछा, “पूर्णिमा के चन्द्र जैसे मुख वाली कल्याणि ! आप कौन हैं ? क्या आप किसी देवता, मनुष्य, गंधर्व अथवा नाग की पुत्री हैं? रूप और यौवन से सम्पन्न, दिव्य आभूषणों से मण्डित युवती होते हुए भी आप यहाँ इस सुनसान वन में अकेली क्यों हैं?”

उस कन्या ने उत्तर दिया, “मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकती मैं किसकी कन्या हूँ, मेरे माता-पिता कौन हैं और इस सरोवर पर मुझे कौन लाया है. किन्तु, आप कौन हैं?”

उस युवक ने बताया, “मैं राजा तालध्वज हूँ.”

वह बोली, “राजन् ! यहाँ कोई मेरा रक्षक नहीं है, न पिता हैं, न माता, न बंधु-बान्धव, और न ही मेरा कोई ठौर-ठिकाना है. मेरा कल्याण कैसे होगा इसका निर्णय मुझे अपनी प्रजा जान आप ही कीजिये.”

राजा तालध्वज उस युवती के लावण्य पर आसक्त हो चुके थे. उन्होंने अपने सेवकों को एक आरामदेह पालकी की व्यवस्था करने का आदेश दिया और उस स्त्री को आश्वासन दिया कि वह उसके साथ विवाह करेंगे जिससे वह रानी बनकर सभी मनोवांछित सुख पा सकेगी.

इस प्रकार वे पति-पत्नी हुए और विभिन्न राजसी भोग, विलास, मधुपान और क्रीड़ाओं में जीवन व्यतीत करने लगे. उन्हें समय बीतने का बोध तक नहीं रहता था. नारदजी को अपने पहले के पुरुष-शरीर और मुनि-जन्म का कुछ भी स्मरण नहीं था. इसलिए वह इस स्त्री-शरीर से अनेक पुत्रों को जन्म देने वाले बने. समयानुसार उन सभी पुत्रों का विवाह भी हुआ. इस तरह राजा तालध्वज और उनकी पत्नी का एक बड़ा परिवार हो गया. कभी-कभार उनके पुत्र और वधुओं में मन-मुटाव हो जाया करता था. रानी का कुछ समय उस खिन्नता में बीत जाता था. पराक्रमी पुत्रों, उत्तम कुल की वधुओं और पौत्रों को देख-देखकर वह अक्सर अभिमान से भी भर जाया करती थी. संक्षेप में, नारदजी को केवल इतना अहसास था कि वह एक पतिव्रता राजमहिषी हैं जिसका उत्तम आचरण है, बड़ा परिवार है, राजा तालध्वज जैसा प्रतापी पति है और वह इस संसार की धन्य स्त्री हैं.

समय बीतते-न-बीतते दुर्दैव हुआ और दूर देश के एक आक्रान्ता के साथ राजा तालध्वज और उसके पुत्र-पौत्रों का तुमुल युद्ध हुआ. उस युद्ध में पुत्र-पौत्र सभी काम आ गए. राजा पराजित हुआ और किसी तरह जीवित रह गया. सन्तानों की मृत्यु का समाचार पाकर रानी विलाप करती हुई युद्धभूमि में जा पहुँची और पुत्र-पौत्रों को भूमि पर गिरा देख शोक-सागर में डूब गई.

उसी समय एक कांतिमान् वृद्ध ब्राह्मण का रूप धरकर भगवान् विष्णु वहाँ आ पहुँचे और उस विषादग्रस्त स्त्री से कहने लगे, “लगता है पति-पुत्रादि से सम्पन्न गृहस्थी में अत्यधिक मोहवश आप विचार नहीं कर पा रहीं आप कौन हैं, ये किसके पुत्र हैं तथा ये कौन हैं. यह आपके लिए शोक छोड़कर परम आत्मगति पर विचार करने का अवसर है. मर्यादा की रक्षा हेतु अब आप परलोक गए पुत्रों के निमित्त तिलदान आदि कीजिये. धर्म्मशास्त्र का निर्णय है कि मृत नातेदारों के निमित्त तीर्थ में स्नान करना चाहिए. ”

वृद्ध ब्राह्मण के सांत्वना देने वाले वचन सुनकर रानी उठी और उसी वृद्ध से उचित तीर्थ पर ले चलने की विनय की.

वह ब्राह्मण कृपापूर्वक शोकसंतप्त रानी को उसके पति सहित ‘पुंतीर्थ’ सरोवर पर ले गए और कहा, “देवी ! इस पवित्र सरोवर में स्नान कीजिए और निरर्थक शोक का त्याग करके पुत्रों की सद्गति के लिए आवश्यक (तिलांजलि आदि) क्रियाएँ पूरी कीजिए.”

सरोवर में स्नान करते ही वह स्त्री मूल स्वरूप को प्राप्त कर पुन: देवर्षि नारद बन गयी. मुनिवर ने देखा कि भगवान् विष्णु उनकी वीणा थामे अपने स्वाभाविक रूप में सरोवर के तट पर बैठे मुस्कुरा रहे हैं. भगवान् का दर्शन करते ही नारद मुनि को एक-एक बात का स्मरण हो आया.

उधर राजा तालध्वज इस आश्चर्य में पड़ गए कि मेरी पत्नी कहाँ चली गई और ये मुनिश्रेष्ठ कहाँ से आ गए ? पत्नी को पुकारते हुए राजा विलाप करने लगे.

श्रीभगवान् ने अब राजा को समझाया, “ राजेन्द्र ! क्यों विलाप करते हो ? तुम कौन और तुम्हारी वह भार्या कौन ? कैसा संयोग और कैसा वियोग ? उस सुंदर स्त्री के साथ जो भोग करना था वह आप कर चुके. उसके साथ संयोग का समय अब समाप्त हुआ. एक सरोवर के किनारे वह आपको मिली थी. तब आपको उसके माता-पिता कहाँ दिखाई पड़े थे? वह अवसर जैसे आया था वैसे ही चला गया.”

राजा को भी बात समझ में आई और नारदजी ने भी हाथ जोड़े, “हे देव ! महामाया की शक्ति को मैं जान गया. हम सभी अन्ततः उनके अधीन हैं.”

उस समय के सबसे बड़े और सबसे ज़्यादा टी.आर.पी. वाले न्यूज़ चैनल के स्वामी वेदव्यास नाम के महर्षि ने अपने प्राइम टाईम शो ‘देवी भागवत महापुराण’ में यह प्रकरण प्रकट किया था. न्यूज़ यानी इतिवृत्त>सूचना>विवरण>घटना का इतिहास>पुराना (इतिहास)>पुराण.

देवर्षि नारद क्या जान गये, क्या नहीं वह हम भले जानें न जानें, इतना ज़रूर जान गए हैं कि इस महाराष्ट्र सरकार के गठन की घटना को भारतीय लोकतन्त्र के पुराण (इतिहास) में सदा उल्लिखित किया जाएगा.

महाराष्ट्र में सरकार बनाने का यह पोलिटिकल थ्रिलर सिद्ध कर रहा है कि हमारे चुनाव निश्चय ही lenticular मिरर हैं. इसमें शिवसेना ने आदित्य ठाकरे की छवि को देखकर चलना शुरू किया और किनारा आते ही बाला साहब ठाकरे को देखना शुरू कर दिया. दूसरे छोर पर बी.जे.पी. अपने रथ पर सवार आयी और अजित पवार का हाथ कुछ उस अदा के साथ थाम लिया जो राजा तालध्वज ने नारद मुनि को पाणिग्रहण-योग्य स्त्री जानकर दिखायी थी. अन्य राजनैतिक दल दुर्दांत आक्रांताओं की तरह घात लगाए बैठे रहे कि किस बहाने और कब घमासान छेड़ सकें !

मतदाता अर्थात् हमें लेकर केवल इस बात पर अरण्य-रुदन किया जाता है कि हमारी पूछ पाँच साल में एक बार होती है जब ये नेता लोग पूंछ हिलाते हुए हमारे दर पर मत्था टेकने आते हैं ! अब पता चल रहा है कि बच्चू वोटर ! तुमसे दान लेकर चुनाव-सरोवर में स्नान इसलिए नहीं किया जाता कि प्रजातांत्रिक अनुष्ठान का आग्रह रखना है. इसलिए किया जाता है कि अपना रूप-स्वरूप सब बदला जा सके ! जब अनुकूलता हो तो पूर्व-रूप ग्रहण कर अपनी-अपनी वीणा टंकारने की सुविधा भी उपलब्ध है जिससे ‘हिन्दुत्व’,‘धर्मनिरपेक्षता’, ‘मुसलमान-मुसलमान’, ‘आधुनिक विकास’, ‘राष्ट्रप्रेम’ जैसे मन्त्र आदतन अलापे जा सकें ! ‘नारायण’ इनमें से एक में भी न हों तो न सही!!

सबसे अधिक चिन्ता का विषय इन राजनेताओं के अहंकार का अश्लील खेल है जो ये सब पूरे आत्मविश्वास के साथ खेला करते हैं — होटल, रिज़ोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, प्रेस कोन्फ़्रेंस, आरोप-प्रत्यारोप, बयानबाज़ी. इस खेल से केवल इतना संदेश हम वोटर-भगवान् को दिया जाता है कि हम आपकी इलेक्शन-‘महामाया’ को जीत चुके हैं, अब आप चुप बैठिये और टी.वी. देखिये. हम वोटर यह तक पूछ नहीं पाते कि अगर प्रशासन ही शुरू नहीं करना है तो ये करोड़ों रुपये चुनाव में किस तुफ़ैल में बर्बाद किए थे ? करोड़ों ख़र्च कीजिये, मान लिया, मगर इस तरह बर्बाद करने का हक आपको किसने दिया ? जिस भगवान् (वोटर) की दहलीज़ पर माथा टेकने आये थे उसका कोई डर, कोई चिन्ता, परवाह, इज्ज़त वगैरह है या नहीं ?

हमारे यहाँ (आधुनिक) ‘पौराणिक’ आख्यान बहुत हैं कि चुनाव-सुधार — electoral reform होने चाहियें. एकाध उप-कथा भी मिल जाएगी — मतदान की उम्र घटाकर 21 से 18 वर्ष करने का किस्सा, चुनाव आयोग के अधिकार-क्षेत्र की कथा, ई.वी.एम. से मतदान-व्रत, अपराधी सिद्ध होने पर प्रत्याशी पर रोक की गाथा, चुनाव और परिणाम के दिन शराबबंदी-उपवास आदि-आदि. बस हो गए चुनाव-सुधार !

उसका क्या कि राजनैतिक दल प्रदेश को, नगर को, भाषा, जाति आदि को अपनी बपौती समझते हैं ? “हमने जो कह दिया महाराष्ट्र में वही चलेगा”. “मुंबई में वही चलेगा जो हम बोलेंगे”. “खबरदार जो तमिल के सिवा और कोई भाषा बोली तो”. “मुसलमानों के ज़्यादा से ज़्यादा एम.पी.-एम.एल.ए. होने चाहिएं” — या ऐसा ही कुछ और. प्रांत-नगर-भाषा किसी की निजी संपत्ति हैं क्या ? क़ानून से इजाज़त न होने पर भी अगर चुनाव की मण्डी में इन्हीं सिक्कों में व्यापार होता है तो क़ानून बेहद लचर है. राजनैतिक दलों को तो इस क़ानून की परवाह न करने का पूरा-पूरा अधिकार है, हम वोटरों के मन से भी इसका भय जाता रहे — इसकी इजाज़त कोई देगा क्या ?

यह सवाल इसलिए उठता है कि चुनावों में न तो muscle पॉवर पर प्रभावी रोक लगी, न money पॉवर का इस्तेमाल थमा. राजनीति के अपराधीकरण का चुनाव सुधार भी नहीं हुआ, न अपराधियों का राजनीतिकरण नहीं हो इसके लिए कुछ हुआ. चुने गए प्रत्याशियों को वापिस बुलाने का अधिकार भी अब तक वोटर को नहीं दिया गया है. यह सब तो हुआ नहीं, छोटी-मोटी उप-कथाओं का पुराण बखानने से क्या होगा? नि:सन्देह वही होगा जो महाराष्ट्र में हुआ है.

अब तो चुनाव-सुधारों की लिस्ट में यह भी जोड़ना ज़रूरी हुआ लगता है कि या तो मतदान करना आवश्यक किया जाए या कम से कम 85% मतदान होने पर ही उसे वैध मानने का नियम बने. महाराष्ट्र के अनुभव के बाद यह अत्यावश्यक हो गया है कि जिस परिवार का एक भी व्यक्ति राजनीतिक दल या चुनाव में आ जाता है उस परिवार के किसी अन्य सदस्य को किसी राजनीतिक पार्टी अथवा चुनाव में आने की पूरी मनाही हो. अनुभव, प्रतिभा आदि बहानेबाज़ी है ताकि ऐसा ही चलता रहे. भारतवर्ष में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है. महत्वाकांक्षाओं को खुलकर खेलने की सुविधा प्राप्त होने से ही महाराष्ट्र में व्यापक राष्ट्रीय हित को क़ुर्बान किया जा सका है.

हद तो तब हो गई जब महाराष्ट्र के औसत ‘मराठी माणूस’ को निजी संपत्ति मानने की इस मानसिकता में से एन.सी.पी.-शिवसेना के कुछ ऐसे उद्गार निकले जिनकी पड़ताल ज़रूरी है. इस पूरी उठा-पटक में मौक़ा देखकर अनेक बार ऐसा कहा गया कि ‘यह महाराष्ट्र है. यह दिल्ली के आगे नहीं झुकता’. गोया ‘दिल्ली’ आज भी औरंगज़ेब वाला कोई अलग राष्ट्र है जिसकी टक्कर में छत्रपति शिवाजी का मराठा साम्राज्य कोई दूसरा ही राष्ट्र है. कहने वाले यह भूल गए कि उनसे इतर दलों के चुने हुए विधायक भी उतने ही ‘मराठी माणूस’ हैं जितने वे स्वयं. इतर पार्टी के विधायक कोई पाकिस्तान से आए हुए लोग नहीं हैं. लोगों के एन.सी.पी.-शिवसेना की ‘निजी संपत्ति’ हो जाने का गुमान इतना गाढ़ा हो गया कि ‘यह महाराष्ट्र है’ के व्यक्तियों की छाप कुछ इस तरह छोड़ी जाने लगी कि ये वे लोग हैं जिनपर विश्वास कर लेने में नुकसान-ही-नुकसान है. महाराष्ट्र की प्रतिभा का इससे बढ़कर अपमान और क्या होगा जो सदा भारतीय अस्मिता, धर्म-दर्शन, अध्यात्म, चिंतन, कला और साहित्य में अपने योगदान के कारण मूर्धन्य स्थान पर रही है.

दूसरी बात यह कही गई कि इन्हें कुछ वैसा ही करना है जैसा हिटलर को परास्त करने के लिए ब्रिटेन, अमेरिका, रूस आदि ने मिलकर किया था. उन्हें ध्यान नहीं रहा कि हिटलर मूलतः मार्क्सवादी था. उसका ‘नाज़ी’ — NAZI — शब्द जर्मन भाषा में लिखे गए शब्दों National Sozialist (हिटलर की पार्टी) से Na-zi लेकर बना था. ‘फ़ासिज़्म’ मुसोलिनी का दिया शब्द था जो इटालियन भाषा के ‘फ़ासिज़्मो’ से निकला. Fascio littorio यानी रोमन अथॉरिटी का प्रतीक-चिह्न लकड़ी के हत्थों का वह बण्डल जिससे कुल्हाड़ा बंधा होता था. अथॉरिटी की इस परम्परा में मार्क्सवादी सोशलिज़्म की ज़िद के साथ जातीय श्रेष्ठता का पुट मिलाने से दुनिया को जो मिला वह था हिटलर. चिंता की बात यह है कि ‘यह महाराष्ट्र है’ की जातीय श्रेष्ठता में प्रजा को लामबंद कर उसके निजी सम्पत्ति होने को मिलाकर यह ज़िद कि हमने जो कह दिया यहाँ वही चलेगा हिटलर का काफ़ी कुछ हमशक्ल ठहरता है.

शिवसेना-एन.सी.पी. के फ़ासिज़्म का ही प्रतिरूप होने के दो पुख्ता लक्षण और हैं. एक तो यह कि ये दोनों ही मिथ्या प्रचार में जितने कुशल ठहरते हैं उससे लगता है ये हिटलर के प्रचार मन्त्री गोयबल्ज़ के भी गुरु हैं. एक झूठ को उछालकर उसे इतनी बार और इतने तरीकों से कहने में इनका तोड़ नहीं कि आख़िर वही सच जैसा हो जाए ! अभी हम वोटरों को यह देखना बाक़ी है इनमें से कौन-कौन कितने झूठ कैसे-कैसे और कितनी बार गोयबल्ज़-स्ट्रीट पर सजाता है जिन्हें इनके लामबन्द वफ़ादार हाथों-हाथ लेने ही वाले हैं.

दूसरा यह कि शिवसेना को देवेन्द्र फड़नवीस से पहले ही दिन से एलर्जी इसलिए थी कि वह इनके मराठा-जातीय फ़ासिज़्म की देन न होकर विदर्भ से हैं. “यहाँ हमारा (महा)-राष्ट्रवाद ही चलेगा” के तहत मुख्यमन्त्री इनका न होकर विदर्भ से हो, यह इनकी किसी स्कीम में फ़िट नहीं बैठता था. एक बार जैसे-कैसे पाँच साल निकाल लिए, अब और नहीं. यह ज़्यादा पुरानी बात नहीं जब ऐसे ही फ़ासिज़्म ने बर्लिन की दीवार खड़ी की थी. और यह उतनी भी पुरानी बात नहीं कि महाराष्ट्र में इसी तरह के आचरण के कारण अलग विदर्भ राज्य की माँग उठती रही है.

जब महत्वाकांक्षा येन केन प्रकारेण पॉवर मुट्ठी में रखने की हो और वंश परम्परा में यही बन्द मुट्ठी विरासत बनती हो तो अथॉरिटी का प्रतीक-चिह्न fascio littorio — अर्थात् फ़ासिज़्म सर्वाधिक उपयोगी औज़ार है. इसके लिए परिवार-वाद ज़रूरी है. परिवार-वाद के लिए किसी न किसी ढब कट्टरता ही सुरक्षा का पिंजरा हो सकती है. जैसे कि कांग्रेस का कट्टर हिन्दू-विरोध !

यह चिंता तब दूनी हो जाती है जब इस तरह अक्सर हिटलर को याद करने के पीछे बी.जे.पी. और उसकी पीठ पीछे आर.एस.एस. का होना अगर कहीं ऐसे ही लामबंद किये लोगों में जातीय ‘श्रेष्ठता’ पर आधारित निकले तो ? आर.एस.एस. को अपने काडर के लामबन्द होने को यह हिटलरीय स्वरूप देना होता तो ऐसा बरसों पहले हो गया होता ! मोदीजी चाहकर भी हिटलर नहीं बन सकते, क्योंकि ‘हिन्दू’ कोई एक जाति न होकर सर्व-समावेशी राष्ट्र है. नहीं हुआ तब भी विश्व के सबसे बड़े प्रजातन्त्र के वोटरों का अपनी शक्ति जल्द पा लेना ही श्रेयस्कर है.

मतदाता को यह शक्ति छीन कर लेनी पड़ेगी कि मालिक तो वही है, नियमों, प्रक्रियाओं, संविधान, लोकतन्त्र आदि के सरोवर में डुबकी लगाकर रूप-परिवर्त्तन करने वाले ये राजनेता नहीं. मतदाता जो चाहे वही होना चाहिए. चुनावों का बहिष्कार यह शक्ति हासिल करने का साधन नहीं हो सकता. एक ही उपाय है. जब तक सब चुनाव-सुधार वोटर को पूरी शक्ति प्रदान न कर दें, शत-प्रतिशत वोटर मैदान में उतरे, एक भी व्यक्ति घर पर बैठा न रहे और वोट डालकर किसी को न चुने — ई.वी.एम. पर केवल NOTA का बटन दबाये. याद रहे, एक वोटर भी भूले से किसी को वोट दे आया तो यह उपाय कुछ काम न आयेगा. इस काम के लिए वोटर-जागृति का काम हाथ में लेने वालों को इतनी सावधानी से काम करना होगा कि एक-एक उँगली केवल NOTA पर पड़े. दुर्भाग्य यह है कि इसके लिए किसी के पास समय नहीं निकलेगा — प्रशांत किशोर के पास भी नहीं. इस अनुष्ठान में एक चूक से भी मंत्र-सिद्धि नहीं होती, यह बात जिस तरह राजनैतिक दल जानते हैं, वैसे ही हमें भी समझ रखनी होगी.

जब बरसों-बरस कोई चुना ही नहीं जाएगा तो देखते हैं सत्ताधीशों का पक्षपाती यह क़ानून क्या करता है. चुने जाकर ‘मेरा सी.एम.-तेरा सी.एम.’ आप नहीं खेलेंगे. आप चुने ही नहीं गए उस सूरत में आपकी शक्ल देखने का खेल हम खेलेंगे.

चुनाव-प्रक्रिया और परिणामों को lenticular आर्ट की माया बना दिया जाए, इस खिलवाड़ को अब और इजाज़त नहीं दी जा सकती.

24-11-2019

नुसरत के बहाने से…


एक तरफ़ जब भ्रातृवर पार्थसारथी थपलियाल अपने मित्र रज्जब अली के कुरेदने पर भारतीय दृष्टि में ‘ईश्वर’ के बारे में मूलभूत जानकारी एकत्र संकलित करने का महत्कार्य कर रहे थे, दूसरी तरफ़ बंगाल में हुए देवी के मुस्लिम अवतार नुसरत को लेकर हंगामा बरपा था. तीसरी तरफ़ आरएसएस वाले श्री मोहन भागवत हमेशा की तरह विजयदशमी पर अपना अद्भुत भाषण दे रहे थे. मोदीजी से बेहतर भाषण कोई दे सकता है तो वह निःसन्देह भागवतजी हैं. मोदीजी बोलते हैं तो हम सोच सकते हैं राजा दशरथ कितना उम्दा बोलते होंगे. उन्हें भी शासन-प्रशासन आदि की मर्यादा का ध्यान रखना पड़ता होगा. भागवतजी बोलते हैं तो लगता है मानो मर्यादाओं का निर्धारण करने वाले गुरु वसिष्ठ कुछ कह रहे हैं.

बहरहाल, आरएसएस को लेकर गच्चा खा गए निंदकों का मन-विज्ञान बाद में खंगालेंगे, फ़िलहाल तो यह सोचना होगा कि आख़िर थपलियालजी, नुसरत जहाँ और भागवतजी में कौन से एक सूत्र का संबंध है जो दूसरी तरफ़-तीसरी तरफ़ गिनाना पड़ गया? ईश्वर हिन्दू होता है, अल्लाह मुसलमान, देवी मुसलमान नहीं होती, मुसलमानों में देवियों का अवतार लेना अमान्य है, अल्लाह के सिवा किसी और की पूजा करना कुफ़्र है, और हिंदुस्तान में रहने वाले सब हिन्दू नहीं होते. अतः इन तीनों बातों में किसी तरह कोई रिश्ता नहीं बैठता.

इस तरह के विश्लेषण से क्या पता चला? पता यह चला कि विश्लेषण का काम है तोड़ना जबकि अल्लाह की बनायी इस कायनात में सब कुछ आपस में गूँथा हुआ है, संश्लिष्ट है. विश्लेषण करने के लिए मैं टहनी से एक ताज़ा खिला गुलाब तोड़ता हूँ. उसकी पंखुड़ियाँ खसोटता हूँ. पूरा-पूरा एनालिसिस करने के लिए लेबोरेटरी में ले जाता हूँ. विश्लेषण करके जान लेता हूँ इसमें इतना-इतना क्लोरोफ़िल है – उसे काँच के एक जार में संभाल लेता हूँ; इसमें इतना जल-तत्त्व – water content है – काँच के दूसरे जार में समेट लेता हूँ; इतना color content है – उसे तीसरे जार में बंद कर लेता हूँ; पंखुड़ियों और पत्तियों के तन्तुओं का structure ऐसा-ऐसा है – चौथे और पाँचवे  बर्त्तनों में ढँक कर रख लेता हूँ ! इस तरह काँच के दसियों पारदर्शी बंद बर्त्तनों में गुलाब का पूर्ण विश्लेषण संभाल कर अब मैं गुलाब का सबसे बड़ा एक्स्पर्ट हूँ और उसके बारे में सब जानता हूँ.

मगर एक बात नहीं जानता. उन सभी बंद पात्रों को एक कवि के सम्मुख रख दूँ कि यह रहा गुलाब, ज़रा इस पर एक सुंदर गीत तो लिख दो, वह नहीं लिख पाएगा. गीत ईश्वर के रचे गुलाब पर ही लिखे जा सकते हैं क्योंकि तब वह अपने संश्लिष्ट स्वरूप में है ! विश्लेषण – analysis हमारी जानकारी भले बढ़ाता हो, यह संश्लेषण– synthesis ही है जो हमारे ज्ञान और विवेक को बढ़ाता है.

इसलिए भागवतजी के भाषण में से टीवी बहस का विषय यह नहीं था कि ‘लिंचिंग’ किस देश का शब्द है. विषय था क्या शिक्षा पैसा कमाना और पेट भरना सिखाने मात्र के लिए है? या ऐसा ही कुछ और. उनके भाषण में विचार-विमर्ष करने योग्य विषय भरे पड़े थे. किन्तु तोड़क-एक्स्पर्ट हम लोग संश्लेषण की (जिसमें विश्लेषण स्वतः निहित है) क्षमता गँवा चुके लगते हैं. अन्यथा ‘हिन्दू’ को लेकर निरर्थक-निराधार  प्रश्न न करते. रज्जब अली को भी थपलियाल जी को हिन्दू ईश्वर के बारे में उकसाना न पड़ता. इस सबके बीच पार्थसारथी थपलियाल ने जो जानकारी संकलित की वह संश्लेषण का एक बेहतरीन नमूना है.

इसी से जुड़ा है बंगाल में देवी का मुसलमान अवतार जो वहाँ संश्लेषण ही तो कर रही थी.

पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि नुसरत जहाँ ने जो दुर्गा पूजा की न तो वह क़ुरान-ए-पाक हाथ में लेकर की, न कलमा पढ़ते हुए की, और न इस्लाम से मुँह फेरकर की. अल्लाह के सिवा किसी और की पूजा इस्लाम में मना है, दुर्गा के पंडाल में नहीं. अबू धाबी के मंदिर में अरब शेख़ ने जो आरती की थी उससे न तो इस्लाम का अपमान हुआ, न कोई कुफ़्र हुआ. हाँ, वही अरब शेख़ अगर मस्जिद में जाकर मूर्त्ति बैठायें और आरती करें तो अवश्य कुफ़्र है, और निंदनीय-दण्डनीय भी है. उन शेख़ की तरह नुसरत जहाँ ने भी ऐसा कुछ नहीं किया जो इस्लाम के खिलाफ़ ठहरता हो.

इस्लाम किसी की बपौती नहीं है. न क़ुरान मुसलमानों की निजी संपत्ति है. ऐसा भी नहीं है कि ग़ैर-मुस्लिम को क़ुरान शरीफ़ घर में रखना, उसकी इज़्ज़त करना या पढ़ना, उस पर मनन-चिन्तन करना मना है. ये हिल-हिल कर क़ुरान पढ़ने वाले मुसलमान – विशेषतः हिंदुस्तान-पाकिस्तान में, या फिर और भी कहीं – बेसिर-पैर की सोचते हैं कि चलो, क़ुरान-ए-मजीद के अक्षर बाँच लिये, इसलिए अब उनका बाक़ी दुनिया को हिलाना बनता है ! ऐसे ही लोगों के लिए क़ुरान में बार-बार कहा गया है कि ये लोग समझते नहीं, सब स्तुति अल्लाह के लिए है और ये बातें समझदारों के लिए इशारा हैं. ‘अल्लाह’ अरबी भाषा का शब्द है. इसका यह अर्थ कैसे हो गया कि सब स्तुति God के लिए नहीं है? या राम के लिए नहीं है? आख़िर God या राम अरबी से इतर भाषाओं में अल्लाह को ही कहते हैं.

हम अरबी में नमस्ते करते हैं तो कहते हैं – “अस्सलाम अलैकुम”. ‘अस्सलाम’ अल्लाह के 99 नामों में से एक है. वैसे ही जैसे परमात्मा का एक नाम ‘राम’ है. इसलिए  “अस्सलाम अलैकुम” बोलकर हम एक भाषा में “राम-राम” कह रहे हैं और “राम-राम” बोलकर दूसरी भाषा में “अस्सलाम अलैकुम” बोल रहे हैं. अब कोई कूड़मगज ही ऐसा कहेगा कि ख़बरदार जो संस्कृत, हिन्दी, लैटिन, ग्रीक  या अंग्रेज़ी बोली तो ! सिर्फ़ अरबी बोलो !

क़ुरान ने कहा है हर इंसान को अल्लाह के रास्ते पर लाना मुसलमानों पर फ़र्ज़ है. कोई हिन्दू अगर ईश्वर के रास्ते से भटक जाये और कोई मुसलमान उसे रामायण पढ़ने की प्रेरणा देकर, या किसी ईसाई को बाइबिल के माध्यम से वापिस अल्लाह के रास्ते पर ला दे, तो यह क़ुरान का हुक्म मानना हुआ या नहीं? किसने कहा गर्दन पर तलवार रखकर क़ुरान ही पढ़वाई जाए तभी God पर ईमान लाना माना जाएगा?  

इस्लाम में क़ुरान के इशारे सिर्फ़ समझदारों के लिए हैं, हिंदुस्तान के “हाय मुसलमान” “हाय मुसलमान” वाले नव-जिन्नाहों – neo-Jinnahites — के लिए नहीं. यहाँ इस्लाम की नहीं, सभी मुसलमानों की भी नहीं, केवल नव-जिन्नाह टाईप मुसलमानों की निंदा की जा रही है. हर किसी को करनी चाहिए.

1947 के भारत-विभाजन के बाद लगभग 4 करोड़ मुसलमान ऐसे थे जिन्होंने हिंदुस्तान में रहना चुना था. उनमें तक़रीबन एक करोड़ वे मुसलमान थे जिन्होंने पाकिस्तान के बनने में जी-जान लगाया था. जो चार करोड़ आज बढ़कर 20 करोड़ हो गए हैं, उनमें वे एक करोड़ ‘जिन्नाहवादी’ भी हैं जो आज बढ़कर पाँच करोड़ हो गए हैं. कोलकाता के अपने भाषण में यह तथ्य उस वक़्त के गृह-मन्त्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने देश के सामने रखा था. इन्हीं ‘नव-जिन्नाहों’ को आज भी उसी ‘ग़ज़वा-ए-हिन्द’ का इंतज़ार है, जिसका नमूना कभी नादिरशाह के लश्कर ने दिल्ली में एक लाख लोगों की ‘लिंचिंग’ करके, और ख़ुद इन्होंने 1947 में पेश किया था, क्योंकि इनके मुताबिक समझे बिना भी क़ुरान से बेहतर ‘किताब’ नहीं है. अगर ‘मशरिक़’ में है — मुहम्मद साहब का इस्तेमाल किया शब्द – “मुझे मशरिक़ से ठंडी हवाएं आती हैं” – तो वहाँ ग़ ज़वा-ए-हिन्द कर डालो ! इन्हें मालूम होना चाहिए कि 1947 में हिन्द के पास आज वाला अपना संविधान रहा होता तो जिन्नाह को पाकिस्तान नहीं, फाँसी मिलती ! जिन्नाह को फाँसी न देकर पाकिस्तान देने और एक इस्लामी मुल्क बनाने का नतीजा आज सबके सामने है. ये नव-जिन्नाह पाकिस्तान सहित इस्लाम पर कलंक सिद्ध हुए हैं और ग़ज़वा-ए-हिन्द की परिकल्पना करते-करते दोज़ख़ के आख़िरी खड्डे में जा गिरे हैं.

सच पूछा जाये तो ये मुसलमान हैं ही नहीं. क्योंकि ये इस्लाम और क़ुरान को ज़रा नहीं जानते. हाँ बड़ी-बड़ी इस्लामिक व्याकरण ज़रूर हाँक सकते हैं — फ़तवा यह होता है, ग़ाज़ी उसे कहते हैं, जिहाद का यह नहीं वह मतलब है — वगैरह-वगैरह. जिस तरह चाँद का कलंक चाँद का हिस्सा होते हुए भी चाँद नहीं कहलाता, उसी तरह ये नव-जिन्नाह इस्लाम का हिस्सा हैं ज़रूर पर मुसलमान नहीं कहला सकते. इसलिए दुनिया भर में ये अपने विनाश को नित नूतन न्योता देते रहते हैं और चिल्लाते रहते हैं — “इस्लामोफ़ोबिया, इस्लामोफ़ोबिया” !

थपलियालजी के लेख में ईश्वर को लेकर जो इशारे हैं वे बार-बार क़ुरान-ए-मजीद की भी याद दिलाते हैं —  एको: देव: — अल्लाह एक है; न तस्य प्रतिमा अस्ति – उसकी कोई मूर्त्ति नहीं अर्थात् वैसा दूसरा नहीं है, या उसका कोई साकार रूप नहीं है, उसे किसी ने देखा नहीं है; एकोहं द्वितीयोनास्ति – “मैं केवल एक हूँ, दूसरा कोई नहीं”; एकमेवाद्वितीयम् – एक ही है, अद्वितीय है, अद्भुत है, उस जैसा दूसरा नहीं है; आदि. मगर ये इस्लाम के self-appointed फ़र्माबरदार इशारे समझने जितना समझदार हों तब न !

क्योंकि बक़रीद मनाने की भी कथा कुछ इस तरह है:

हजरत इब्राहीम अपनी पत्नी हाजरा और पुत्र इस्माइल के साथ रहते थे. मान्यता है कि हजरत इब्राहीम ने एक स्वप्न देखा था जिसमें वह अपने पुत्र इस्माइल की – जो उन्हें सबसे प्यारा था — कुर्बानी दे रहे थे. हजरत इब्राहीम इस स्वप्न को अल्लाह का आदेश मानकर अपने दस वर्षीय पुत्र इस्माइल को ईश्वर की राह पर कुर्बान करने के लिए निकल पड़े. पुस्तकों में पढ़ने में आता है कि ईश्वर ने अपने फरिश्तों को भेजकर इस्माइल की जगह एक जानवर की कुर्बानी करने को कहा. दरअसल इब्राहीम से जो असल कुर्बानी मांगी गई थी वह उनकी ख़ुद की थी अर्थात यह कि ख़ुद को भूल जाओ. तब उन्होनें पुत्र इस्माइल और उसकी मां हाजरा को मक्का में बसाने का निर्णय लिया. लेकिन मक्का उस समय रेगिस्तान के सिवा कुछ न था. इस तरह एक रेगिस्तान में बसना उनकी और उनके पूरे परिवार की बहुत बड़ी क़ुर्बानी थी.

ईद-उल-अज़हा अहंकार के विसर्जन का संदेश देने वाली ‘बड़ी ईद’ है. अहंकार ही मनुष्य को सबसे ज़्यादा प्यारा है – उसी की क़ुरबानी. मगर ये इस बात को स्वीकार नहीं करेंगे. इस्लाम इनकी बपौती जो हुआ !

एक पुराना किस्सा है. किस्सा उस अरब सुलतान  का है जिसने रूस पर चढ़ाई की थी और युद्ध में उसे परास्त किया था. कहते हैं कि मस्क्वा (मॉस्को) की लाइब्रेरी इतनी बड़ी थी और उसमें हर भाषा की जानी-मानी पुस्तकें और ग्रन्थ इतनी बड़ी संख्या में उपलब्ध थे कि उन्हें एक के आगे एक रखा जाता तो पृथ्वी से चंद्रमा तक सात चक्कर लग जाते. सुलतान  अपने घोड़े पर सवार लाइब्रेरी के सामने खड़ा था और होठों पर विजेता की मुस्कान लिये उस पुस्तकालय को ताक रहा था. 

अचानक सुलतान ने कहा, “क्या इन किताबों में एक भी किताब ऐसी है जो क़ुरान-ए-मजीद से बेहतर है?”

जवाब कौन देता? थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद सुलतान ने फिर कहा, “है कोई बेहतर किताब? अगर नहीं है तो इन सब के होने का क्या मतलब है? मैं इस लाइब्रेरी को जला दूँगा. और अगर एक भी किताब यहाँ ऐसी रखी है जो क़ुरान से बढ़कर है, तब तो मैं इस लाइब्रेरी को ज़रूर जला डालूँगा.”

और वह महान् ग्रंथालय फूँक डाला गया !

यही मानसिकता है जो नुसरत जहाँ को यह मानकर भी गाली देगी कि उसका किया इस्लाम से बेहतर नहीं था, और तब भी गाली देगी जब लगेगा कि इनकी मुस्लिम ठेकेदारी के बावजूद उसका किया उचित और बेहतर आचरण था, इस्लाम का अपमान किये बिना था और एक सामान्य मुसलमान होकर था !

मेरे बचपन के दिनों की बात है. पिताजी के एक मुस्लिम मित्र तरह-तरह के विषयों पर चर्चा करने हमारे घर आया करते थे. भले आदमी थे और हम बच्चों से भी लाड़-प्यार से पेश आते थे. एक रोज़ वह आये तो कुछ परेशान दिखे. पिताजी ने कुशल-मंगल पूछा तो उन्होंने बताया, “आज हमारा एक आदमी मारा गया.”

हम बच्चों ने भी सोचा, बेचारों का कोई नज़दीकी रिश्तेदार नहीं रहा इसलिए वह दु:खी हैं.

पिताजी ने भी मातमपुर्सी के अंदाज़ में पूछ लिया कि क्या हुआ?

पता चला कि उनका रिश्तेदार साइकिल से कहीं जा रहा था कि अचानक तेज़ दौड़ते एक ट्रक से टकरा गया और मौके पर ही उसकी मौत हो गई.

“आपका क्या लगता था?” पूछने पर उन्होंने बताया, “नहीं-नहीं, रिश्तेदार नहीं था. मैं तो उसे जानता भी नहीं था. वह कोई एक मुसलमान था.”

कोई हिन्दू नाथूराम गोडसे को फाँसी दिये जाने पर कभी ऐसा नहीं कहेगा कि ‘हमारा’ एक आदमी मारा गया. जबकि यह मानसिकता भारतीय संसद् पर आतंकी हमले के षड्यंत्रकारी अफ़ज़ल गुरु को फाँसी होने पर ज़रूर शर्मिंदा रहेगी क्योंकि उसके ‘क़ातिल’ यानी सज़ा देने वाले जज ज़िंदा हैं. नुसरत जहाँ की निंदा तो चीज़ ही क्या है!

कोई भी वह व्यक्ति इस मानसिकता का दुश्मन है जो हर वक़्त छाती पीट-पीटकर असदुद्दीन ओवैसी की तरह “हाय मुसलमान” “हाय मुसलमान” नहीं करता.

ज़ाहिर है न तो इस्लाम बुरा, न क़ुरान में कोई दोष, न सब मुसलमान संकीर्ण विचारधारा में डिब्बा-बन्द अचार की तरह जीने वाले. बस इन नव-जिन्नाहों को यह समझाना होगा कि मियाँ, अपना रास्ता नापो. ग़ज़वा-ए-हिन्द जैसा कुछ होने वाला नहीं.

यही वजह है कि ये नव-जिन्नाह (और उनके सुर में सुर मिलाकर ‘प्रोग्रेसिव’ चोले व झोले वाले) आरएसएस को कोसते रहते हैं. उन्हें लगता है जिस आरएसएस ने एक मोदी दिया कि जिसने ‘ग़ज़वा-ए-हिन्द’ के हमारे प्रोग्राम को चौपट कर दिया, उस आरएसएस में न जाने कितने मोदी और होंगे ! हमारी शैतानी फ़ितरत की दुश्मन आरएसएस – तेरा बेड़ा ग़र्क़ हो !

हिंदुस्तान में एक-से-एक बेहतरीन मुसलमान हैं. यहाँ न तो मुसलमान होने में कुछ बुराई है और न मुसलमान होना कोई गुनाह है. इन पाँच करोड़ neo-Jinnahites के चलते अगर आरएसएस हिन्दू अस्मिता को जाग्रत करता-सा जान भी पड़ता है तो इसे भी इनके वाले कट्टरतावादी इस्लाम की ही जीत मानना चाहिये जो मुद्दआ पूछता नहीं, बस तलवार भाँजने को जिहाद कहता है. आर.एस.एस. हिन्दू की तरफ़ से इतना ही कह रहा है — मैं भी मुँह में ज़ुबान रखता हूँ. नुसरत इस ज़ुबान का ही एक नाम है.

जहाँ तक देवी के मुस्लिम अवतार का प्रश्न है, उसे इस्लामिक सन्दर्भ देना अनुचित होगा. इस बात को केवल आधुनिक विज्ञान और भारतीय (हिन्दू) संदर्भों में ही समझा जा सकता है.

मनुष्यों का ईश्वर केवल इसलिए मनुष्यों जैसा है क्योंकि अगर चींटियों का कोई ईश्वर है तो वह चींटियों जैसा होगा और मच्छरों का मच्छर जैसा. वह निराकार परमात्मा जब स्वयं को मनुष्य रूप में प्रकट करता है तो वह शरीर के गुण-सूत्र – chromosome – से बचकर नहीं करता. एक्स (X) और वाई (Y) दोनों क्रोमोज़ोम का नियंता ईश्वर ही है. यह उसका ख़ुद का निर्णय है कि मनुष्य शरीर में XX क्रोमोज़ोम प्रधान होंगे तो वह मनुष्य-शरीर ‘स्त्री’ कहलाएगा. और जब XY के जोड़ीदार यानी pairing क्रोमोसोम की प्रधानता रहेगी तो मनुष्य-शरीर ‘पुरुष’ होगा. यों दोनों तरह के शरीरों में दोनों तरह के क्रोमोज़ोम मौजूद रहते ही हैं. इस कारण नारायण स्वयं वही हैं जो आदिशक्ति जगदंबिका हैं. और आद्याशक्ति देवी वही हैं जो नारायण हैं ! इस शक्ति के बिना शिव केवल ‘शव’ हैं. जब मनुष्य घोषणा करता है – ‘अनहल हक़’ —  ‘अहं ब्रह्मास्मि’ तो वह XY pairing वाले शरीर तक सीमित घोषणा नहीं है. ‘मैं ही सत्य हूँ, ब्रह्म हूँ’ का यह उद्घोष XX क्रोमोज़ोम-प्रधान शरीर वाली मानुषी के लिए स्वतः सिद्ध है. ‘देवी’ का अर्थ समझने का रहस्य मात्र इतना है. केवल भारत ने ही अल्लाह, ईश्वर या God को — जो भी कहें – स्त्री और पुरुष दोनों रूपों में जाना है और दोनों में कोई अंतर नहीं माना है.

इसी से यह भी स्पष्ट होता है कि भारत ने स्त्री को श्रेष्ठ क्यों माना. क्योंकि यह विज्ञान-सम्मत सत्य है. पुरुष-शरीर के Y गुणसूत्र को पूर्ण होने के लिए X की आवश्यकता है जबकि स्त्री XX के साथ अपने आप में पूर्ण है. विज्ञान भी female species को अधिक मज़बूत – stronger – कहता है.

भारतीय पुराणों में संदर्भ है कि एक बार नारायण ध्यान लगाकर बैठ गए. ब्रह्मा सहित अन्य देवताओं ने जिज्ञासा व्यक्त की कि भगवान् पद्मनाभ तो स्वयं सबका ‘कारण’-तत्त्व हैं, सब उन्हीं का ध्यान करते हैं. उनसे ऊपर तो कोई है नहीं. तब नारायण किसका ध्यान कर रहे हैं ? नारायण ने स्पष्ट किया कि महामाया जगदम्बिका की शक्ति के बिना मैं तो क्या कोई भी कुछ नहीं कर सकता. मैं उन्हीं का ध्यान कर रहा हूँ.

इस मनोविज्ञान की पृष्ठभूमि में देखें तो हम पायेंगे कि भारत में जहाँ कहीं समाज इसलिए ‘पिछड़ा’ माना जाता है कि वह अभी तक भारतीय परम्पराओं में रहता है, वहाँ आज भी स्त्री का सम्मान है. जैसे कि मारवाड़ में. हरियाणा में तो बहन की गाली पर हत्या तक हो जाती है. गुजरात-महाराष्ट्र में अधिकांशतः स्त्रियाँ आधी रात में भी सड़कों पर अकेली आती-जाती देखी जा सकती हैं.

भारतीयता की चूलें तब से हिलने लगीं जब से भारतवासियों ने जिस किसी कारण अपनी वैज्ञानिक श्रेष्ठता को घुटनों के बल बैठा दिया और पश्चिम के ‘आधुनिक’ विज्ञान व जीवन-शैली की श्रेष्ठता स्वीकार कर ली. XX और XY क्रोमोज़ोम के सन्दर्भ में ध्यान देना होगा कि पश्चिम का मनोविकास इस पृष्ठभूमि में हुआ है कि हव्वा को आदम की पसली से बनाया गया. इसलिए जैसे पुरुष मूलतः ईश्वर (की सेवा) के लिए है वैसे ही स्त्री पुरुष (की अधीनता) के लिए है. ये संदर्भ बाइबिल के न्यू टेस्टामेंट में उपलब्ध हैं. स्वर्ग से आदम के पतन की भी वजह स्त्री को ठहराया गया. पश्चिमी मन पूरी तरह इस ‘आदिम पाप’ – archetypal sin – की छाया में पला-पनपा है तथा एक बुनियादी अपराध-बोध में क़ैद है. जिस देश में स्त्री की सहमति-अनुमति के बिना उसे हाथ लगाने तक का साहस करना कठिन था वहाँ आज इस ‘श्रेष्ठता’ के चलते आए दिन के बलात्कार आसान हो चुके हैं, क़ानून कितने भी कठोर बना लीजिये !  बलात्कार का सम्बन्ध क़ानून से है भी नहीं. आपके archetypal value system से है.

 एक सवाल अब भी बाक़ी है. जब वह ब्रह्म निराकार है, उसकी कोई मूर्त्ति नहीं, वह केवल एक है, कोई दूसरा नहीं – तब ऐसा कैसे कि वह अवतार भी ले लेता है, स्वयं को प्रकट भी कर देता है और हम उसे मूर्त्ति बनाने योग्य ‘भगवान्’ भी मान लेते हैं? क़ुरान और पुराण दोनों के विचार से अलग चल देना क्या अनुचित नहीं?

कल्पना कीजिये, जब कोई करुण प्रसंग उपस्थित होता है तब क्या होता है. तब करुणावश पहले हृदय द्रवित होता है. उसके तुरंत बाद वह ‘द्रव’ आँख में अश्रु के रूप में दिखाई भी पड़ता है और टपक कर हथेली पर भी आ सकता है जिसे हम छू सकते हैं. यह क्या है? वह करुणा, हृदय का वह द्रवित होना निराकार है. इस निराकार का आकार में प्रगटीकरण ‘अश्रु’ है. बस उसी तरह अल्लाह वास्तव में है तो निराकार ही, मगर जब उसने यह ज़मीन हमें दी, पानी और हवा बनाये, सूरज-चाँद-तारे बनाये तो उसने स्वयं को ही इन आकारों में प्रकट किया. हम कैसे कह सकते हैं हमने अल्लाह को नहीं देखा?

आप क़ुरान को पुराण से भिन्न सिद्ध करना चाहते हैं जो कि है नहीं. आप “मुसलमान” “मुसलमान” इसलिए करते रहते हैं कि आप ग़ज़वा-ए-हिन्द करना चाहते है जो कि होना नहीं है. क्यों व्यर्थ सबका मगज  ख़राब करते हैं?

पार्थसारथी थपलियाल ने ठीक लिखा, नुसरत जहाँ ने ठीक किया, भागवतजी ने ठीक कहा. दुनिया इनकी है, आपकी नहीं.

14-10-2019   

“Rajneeti Mat Karo”


देश-विदेश की राजनीति पर हर तरह की चुटकी लेते रहने वाले बहुत लोग ऐसे मिलेंगे जो सोशल मीडिया पर कोई ऐसी पोस्ट मिलते ही कहने लगते हैं “No Politics”, या “राजनीति मत करो”. राजनीति को लेकर उनका यह चौकन्नापन अथवा चिंता विशेष रूप से तब बहुत फुर्ती से मुखर होती है जब कोई पोस्ट बीजेपी या मोदीजी के अनुकूल लगती हो. ज़रा गहरे पैठकर देखेंगे तो पाएंगे कि राजनीति न करने की तटस्थता-मूलक सलाह देने वाले ये मित्र प्राय: तथाकथित लिबरल, प्रगतिशील या रेशनलिस्ट टाईप के well educated नागरिक होते हैं. दरअसल इनका न राजनीति से, न मोदीजी से और न बीजेपी या आरएसएस से कुछ अर्थपूर्ण संबंध या ज्ञान होता है. इनकी यह सजगता बस इतने भर तक महदूद है कि कोई इन्हें कहीं हिंदुत्व से न जोड़ बैठे. इनका सब पढ़ा-लिखा जैसे बेकार हो जाएगा !

फिर, इन्हें किसी से ‘हिन्दू’ होने का सर्टिफ़िकेट भी नहीं चाहिये. इनके लिए तो भोजन की थाली के किनारे बैठे रहना काफी है. इतने लोग खा तो रहे हैं. उसी से इनका भी पेट भर जाना चाहिए. इस देश में जो हिन्दू हैं, उनके बीच जन्म लेना भर क्यों न काफ़ी हो ! तिस पर यह तय होना अभी बाक़ी है कि ये लोग सही मायने में लिबरल या प्रोग्रेसिव होने का पैमाना हैं भी या नहीं.

यहाँ मुद्दा यह है कि अपने हिन्दू होने को लेकर self-conscious ये लोग सोशल मीडिया की हर पोस्ट शायद बंद आँख से पढ़ते हैं. 

हिन्दुत्व कहता है पिंड में ब्रह्मांड है. यह तभी सही होना चाहिए जब पिंड अपने ‘अंड’ से बाहर आ गया हो. ‘बन्द आँख’ अंडावस्था की सूचक है जब व्यक्ति को अपने छिलके के आगे कुछ दिखाई नहीं देता. यही कारण है कि आधुनिकता के भरम में भूले इन पढे-लिखे लोगों की पूरी-की-पूरी सुशिक्षा इनके ‘अंडत्व’ को उबाल-उबालकर ठस्स बनाती चली जाती है.

मुझे यह जानने की जिज्ञासा है कि लोकतंत्र में राजनीति क्या लोकमात्र के लिए अनिवार्य नहीं है? अब तक तो माना, भारतीय जाति स्वयं का नाश होते जाने को देखने के लिए विवश थी. मगर संवैधानिक लोकतंत्र में सम्यक् राजनीति से ही भारतीय अस्मिता की रक्षा हो पायेगी. दूसरी ओर भारतीय जीवन-पद्धति से ही राजनीति सम्यक् बनेगी. तुलसीदास कह गए हैं —  ‘बिनु सत्संग बिबेकु न होई। रामकृपा बिनु सुलभ न सोई॥‘ इसी तरह सम्यक् राजनीति भी विवेकपूर्ण आचरण से ही संभव है; और वैसा आचरण सही राजकाज के बिना आयेगा कैसे? विकास तभी सधेगा जब आप विश्वामित्र हों या वसिष्ठ, दशरथ व उनके पुत्रों को अनदेखा नहीं करेंगे. ‘कोई नृप होऊ’ षड्यंत्रकर्त्री मंथरा का कथन है, वसिष्ठ का नहीं.

राजनीति क्यों नहीं करें? इन पढे-लिखों के चलते हिदुस्तानी बस सोये रहें? संविधान के अधीन स्वतंत्र सत्ता रखने वाले राष्ट्र में मतदान की ज़िम्मेदारी से शुरू हो जाने वाली राजनीतिक जाग्रति प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक उत्तदायित्व है या नहीं?

उत्तरदायित्व – sense of responsibility — वह गर्माहट है जो अंड को सेती है. तब पिंड छिलका तोड़कर बाहर निकलता और आँख खोलता है.

हमारे पुराणों में वर्णन है कि नारायण के दो पुलिसवाले थे, जय और विजय. सनकादि मुनि (जिनका नारायण भी सम्मान करते थे) जब नारायण से मिलने गये, तो जय-विजय ने उन्हें द्वार पर ही रोक दिया. 

सनकादि मुनियों के श्राप से उन दोनों ने in line of duty अपने प्राण गँवाये.

 नारायण ने उन्हें duty करते हुए मारे जाने पर, पुरस्कार के रूप में हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के नाम से जन्म दिलवाया, उनका उद्धार किया और वे पुन: वैकुंठ-निवास की अपनी हैसियत में लौट सके.   

हमारी आधुनिक पुलिस के IPS अधिकारी शेर की तरह हैं. Association भेड़ियों की होती है, शेरों की नहीं. इसीलिए प्रचलित idiom है — “A Pack of Wolves”.

साधु-साध्वियों के श्राप की शक्ति पर संदेह करना भले ‘आधुनिकता’ कहलाता हो, लेकिन याद रहे, सेब के पेड़ से फल आधुनिक युग में भी नीचे ही गिरते हैं और न्यूटन के Law of Motion की पुष्टि करते हैं. 

हेमन्त करकरे ने line of duty में जो प्राण गँवाये, उसका सम्मान करने से साध्वी प्रज्ञा ने कब मना किया? 

लेकिन हिंदू आतंकवाद स्थापित करने में जिस किसी से भी ‘जय-विजय-पन’ होगा उसे duty करने और आतंकवाद से लड़ने में जान देने पर सम्मान तो मिलेगा, लेकिन की गई राजनैतिक भूल पर, साध्वी के श्राप से भी गुज़रना पड़ेगा.

 इसमें एक ओर चुनाव आयोग का दख़ल अज्ञान का सूचक लगता है.  दूसरी ओर साध्वी प्रज्ञा के हेमंत करकरे के व्यवहार से अपने ऊपर गुज़री बताने को लेकर IPS association की आपत्ति, शेर की हैसियत से गिरकर, उनका ‘भेड़ियापन’ जैसा हो जाता है.

जिन्हें चिंता यह है कि साध्वी प्रज्ञा अपने  ऊपर torture का वर्णन अब क्यों कर रही हैं, पहले क्यों नहीं किया, उन्हें बहुत पहले ही India TV पर ‘आपकी अदालत’ का साध्वी-एपिसोड देख रखना चाहिये था. 

मेरे विचार से साध्वी प्रज्ञा को पूरा-पूरा समर्थन दिया जाना इसलिए उचित है कि ऐसा करना हेमन्त करकरे का अपमान हरगिज़ नहीं है, बल्कि भगवा या हिंदू आतंकवाद जैसी घोर-शब्दावली को मिले श्राप का नारायणीय निराकरण है.

मित्रवर श्री लोकेन्द्र शर्मा का मीडिया में अनेक दशक का अनुभव है. व्हाट्सऐप पर साध्वी-विषयक मेरे उपर्युक्त मंतव्य पर उन्होंने जो कहा, मैं नीचे ज्यों-का-त्यों शामिल कर रहा हूँ. इससे कितनी ही बातें साफ़ हो रही हैं और ज़्यादा कुछ कहने को रह नहीं जाता.  

“हेमंत करकरे के विषय पर बहुत सारी बातें कही जा रही हैं. चलिये मैं कुछ तथ्य भी रख देता हूं.

“भारतीय सेना के निर्दोष कर्नल पुरोहित को, जो आर्मी इंटेलिजेंस के कार्य में लगे थे और आतंकवादियों के समूह में इनफ़िल्ट्रेट करके जासूसी से जानकारियां एकत्र कर रहे थे. उन कर्नल पुरोहित को फँसाने वाले और फ़र्ज़ी RDX प्लांट करने वाले हेमंत करकरे ही थे. हेमंत करकरे ने ही कर्नल पुरोहित पर झूठा आरोप लगाया था कि उन्होंने सेना का RDX चुराया और इसका बम धमाके में इस्तेमाल किया.

“हेमंत करकरे एक ऐसे आईपीएस अधिकारी थे, जिन्हें पता ही नहीं था कि इंडियन आर्मी आरडीएक्स का इस्तेमाल ही नहीं करती. इसीलिए उनका झूठ पकड़ा गया और कर्नल पुरोहित निर्दोष साबित हुए.

“यह भी खुलासा हुआ कि हेमंत करकरे, सीधे कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के निर्देश पर जांच को आगे बढ़ा रहे थे, जो उनके पक्षपाती होने और कांग्रेसी इशारों पर कार्य करने वाले प्यादे के रूप में स्थापित करता है.

“हेमंत करकरे ने साध्वी ठाकुर और कर्नल पुरोहित को प्रतिदिन प्रताड़ित किया, थर्ड डिग्री दी, कर्नल पुरोहित के मात्र एक पैर में ही, 43 जगह हड्डियाँ टूटी हुई थीं, और साध्वी ठाकुर की तो मार-मार कर रीढ़ की हड्डी ही तोड़ दी गई थी.

“यह सब कुछ केवल इन निर्दोषों से झूठे इक़बालिया बयान दिलवाने के लिए किया गया. कांग्रेस का उद्देश्य था मुस्लिम वोट बैंक को प्रसन्न करने के लिए हिंदुओं के ऊपर आतंकवादी होने का ठप्पा लगा दिया जाए.

“हेमंत करकरे कांग्रेस के इसी उद्देश्य की पूर्ति में लगे हुए थे.

 “विडंबना देखिए कि जिस मुस्लिम समाज को प्रसन्न करने के लिए यह सब कुछ किया जा रहा था, पाकिस्तान से आये उसी मुस्लिम समाज के एक आतंकी ने हेमंत करकरे को गोली मार दी.

“अब यदि 26/11 आतंकी हमले में हेमंत करकरे के मारे जाने की बात करें, तो हेमंत करकरे कॉम्बैट के समय नहीं मरे थे. जीप में बैठकर परिस्थिति का जायज़ा लेने गए हेमंत करकरे, विजय सालस्कर, अशोक काम्पटे पर आतंकवादियों ने AK 47 से फायरिंग कर दी थी. केवल अशोक काम्पटे ही जीप से कूदकर उतर पाये थे और काउंटर फायरिंग की थी. बाकी सब उसी फ़ायरिंग में मारे गए थे. हेमंत करकरे को गले और कंधे पर गोलियां लगी थी जिससे वह मारे गए.

“26/11 कॉम्बैट में असली वीरता का परिचय देने वाले थे, मुंबई पुलिस कांस्टेबल तुकाराम ओंबले, जिन्होंने हाथ में मात्र एक लाठी लेकर एके-47 से गोलियां चलाने वाले अजमल आमिर कसाब को पकड़ा. अपनी छाती पर उन्होंने AK 47 का एक पूरा बर्स्ट फ़ायर झेला, इसके बावजूद अजमल कसाब को नहीं छोड़ा.

“विश्वास मानिए यदि तुकाराम ओम्बले ने कसाब को ज़िंदा नहीं पकड़ा होता, तो कांग्रेस ने 26/11 आतंकी हमले का आरोप हिंदुओं पर मढ़ दिया होता, क्योंकि सभी जेहादी आतंकवादी अपने हाथों में कलावा और गले में हिंदू भगवानों के लॉकेट बांध कर आये थे. तुकाराम ओंबले अपने प्राणों का बलिदान देकर देश के सभी हिंदुओं को आतंकवाद के कलंक से बचा गए.

“कॉम्बैट में वीरगति प्राप्त करने वाले दूसरे व्यक्ति थे, एनएसजी कमांडो मेजर संदीप उन्नीकृष्णन, जिन्होंने अपने साथियों की जान बचाने हेतु, उन्हें ऊपर आने से मना कर कहा था “ऊपर मत आओ मैं संभाल लूंगा.”

“और आज जिन कांग्रेसियों और लिबरलों को शहीदों की चिंता हो रही है, तो उन्हें बता दूं कि दिल्ली के बटला हाउस कांड में मोहन चंद्र शर्मा दिल्ली पुलिस इंस्पेक्टर भी वीरगति को प्राप्त हुए थे, आतंकवादियों से लड़ते हुए; परंतु इन सभी लिबरलों, कांग्रेसियों और कई विपक्षी पार्टियों ने बटला हाउस एनकाउंटर को फ़ेक ही नहीं कहा, मोहन चंद शर्मा के बलिदान का मजाक भी  उड़ाया था. राहुल गांधी की माँ सोनिया गांधी तो फूट-फूट कर उन आतंकवादियों के मरने पर रोई भी थी, इसकी पुष्टि स्वयं कांग्रेस नेता, भूतपूर्व मंत्री सलमान खुर्शीद ने की थी.

“अतः कांग्रेसियों से निवेदन है कि कृपया, आम जनमानस में झूठ फैलाने का कष्ट न करें कि कौन शहीद था और कौन नहीं. तथ्य और सत्य सबके सामने हैं . प्रमाण सहित उपलब्ध हैं. आम जनता को अब सत्य व झूठ में अंतर करने की समझ है,

“और अब यदि IPS एसोसिएशन की बात करें, तो उन्हें भी अधिक उछलने के बदले 14 साल की रुचिका गिरहोत्रा के यौन उत्पीड़न करने वाले IPS एस.पी.एस. राठौर के विषय में याद कर लेना चाहिए. वह भी एक आईपीएस था. और यदि हर IPS अधिकारी बुरा नहीं होता, तो हर IPS अधिकारी दूध का धुला भी नहीं होता”.

22-04-2019