Neo-Nazism-2

एक साल से ऊपर हो गया, मैं निरन्तर मार्क्सवाद का विश्लेषण करके यह pinpoint कर रहा हूँ कि हिटलर मार्क्सवाद का peak था. पूँजीवाद के ख़िलाफ़ वह किसी भी हद तक जा सकता था. मार्क्सवादियों ने जब देखा कि उसके होने का मकसद पूरा हो चुका है और वह अब हार की कगार पर है तो उसके राष्ट्रवाद व racism आदि को नाज़ीवाद जैसी परिभाषाओं में लपेटकर आगे के लिए रख लिया. इतिहास की पूरी तोड़-मरोड़ और एक ख़ास किस्म की बौद्धिक तार्किकता स्थापित करने का काम पूरा हुआ तो उनके हाथ लगा इस्लामी कट्टरवाद.
यहाँ यह साफ़ होना ज़रूरी है कि इस तरह की खुराफात से हिंदुस्तान के आम मुसलमानों का कोई संबंध नहीं है. आम मुसलमान मेरी-आपकी तरह मगन रहकर अपना काम करनेवाला और अपना और अपने परिवार का पेट पालने में व्यस्त रहने वाला नागरिक है.
मार्क्सवाद ने पहले हिटलर के माध्यम से नाज़ीवादी नरसंहार किया. अब वह व्यस्त है कट्टर किस्म के वहाबी इस्लामी आतंकवाद के माध्यम से ‘नियो-नाज़ीवाद’ की स्थापना करने में ताकि हिटलर से बढ़कर कहीं अधिक नरसंहार किया जाये.
ज़ाहिर है कि इसे मानने के पहले कोई भी सबूत माँगेगा!
सबूत यह रहा. पूरे ध्यान से एक-एक शब्द पढ़ें:
“We are requesting Gulf countries and North Korea to help us since we at JNU and majority of Communist Kerala has always revered these two regions of the world and considered them our inspiration.
“By the Grace of Allah (SWAT) and Prophet Marx let us build a new Kerala over the one that Allah has washed now.
“A/c: 786786786786
“SBI JNU New Campus
“IFSC: SBI786786786”
यह उस पोस्टर से उल्लिखित है जो केरल के जल-प्लावन पर JNU के नाम से सोशल मीडिया पर चला.
ज़रूरी नहीं यह सही हो, दिये गए A/c आदि कुछ ऐसा ही बता रहे हैं.
मगर, सही होना न होना मायने नहीं रखता, ध्यान जाना चाहिए सोच और नीयत की उस दिशा पर जो इस उद्दंडता से साफ़ लकीर की तरह खिंच गई है.
ये बड़े आराम से कहेंगे : ‘थैंक गॉड’ , Allah has ‘washed’ Kerala.
भला ऐसा क्यों कहेंगे?
यह मैं उन दिनों की बता रहा हूँ जब मेरे श्वसुर दूसरे हार्ट अटैक से (लखनऊ में) अस्पताल में थे और ठीक होकर दो-एक दिन में discharge होने को थे. घर के लोग बारी-बारी अस्पताल में ड्यूटी लगा लेते थे. इत्तिफ़ाक से मैं भी वहाँ था और छोटे साले साहब के साथ अस्पताल से घर पहुंचा ही था कि बाहर हॉर्न बजा.
साले साहब ने खिड़की से झांका तो उसका दोस्त मोटरसाइकिल पर बैठे बैठे इतमीनान कर रहा था कि घर में कोई है या नहीं. अंदर आया तो उसने जानना चाहा — “अंकल हॉस्पिटल से आ गये क्या?”
“नहीं, अभी नहीं ”
मित्र राहत की सांस लेकर गले से पूरी हवा निकालते हुए बोला, “थैंक गॉड”.
“थैंक गॉड क्यों भाई?”
“दरअसल मैं अब तक उनका हाल पूछने नहीं जा सका था. अब आज जा सकूँगा.”
कोई अस्पताल में फँसा है और यह जनाब कह रहे हैं “थैंक गॉड “!
हमारी पूरी की पूरी आधुनिक सोच-सभ्यता इन मॉडर्न activist लोगों ने “थैंक गॉड “-सभ्यता बनाकर रख दी है.
फ़लां की मां मर गई. “थैंक गॉड “. उसकी टांग टूट गई. “थैंक गॉड “. वह मुसीबत में है और कोई मदद नहीं कर रहा. “थैंक गॉड “. वहाँ रेप हो गया. “थैंक गॉड “.
थैंक गॉड इसलिए कि अब हमें मौक़ा मिल गया!
मार्क्स को इनका नाजायज़ बाप इसलिए कहता हूँ कि ‘अब मिला मौक़ा ‘ का यह धंधा उसने mainstream सभ्यता का हिस्सा बनाया. ख़ुद एंजेल्स के यहां पड़ा रहता था. मुफ़्त की दारू गटकना. फ़्री की रोटी तोड़ना. करना कुछ नहीं. यहां तक कि उसकी Das Kapital भी एंजेल्स ने पूरी की.
जे एन यू के क्रांतिवीर 10साल में भी रिसर्च क्यों करें पूरी? मुफ़्त का scholarship ही तो मार्क्सवाद है. वजीफ़ा छूटा तो ‘कुछ-न-करने’ के साथ उनका जो कमिटमेंट है, वह छूट जाएगा!
इन्हें भी मालूम है, भारत के टुकड़े — इंशा अल्ला — होने होंगे तो अपने आप हो जाएंगे, इनके किये नहीं होंगे. इन्हें तो बस एक ही काम करना है– बकबक बकबक बकबक बकबक !
टांग टूट गई, उसने यह नहीं किया. बकबक बकबक. अमुक मुसीबत में पड़ा, इसने वह नहीं किया. बकबक बकबक. रेप हो गया, ‘गौरमेंट’ ने कुछ नहीं किया. बकबक बकबक. प्रधान मंत्री ने एक बयान तक नहीं दिया. बकबक बकबक.
आप इनसे पूछें, भाई, वह ग़रीबी में है, तुमने क्या किया?
जवाब मिलेगा, क्यों? ‘थैंक गॉड’ किसने कहा?
ये आपको केवल अपराध बोध देने की कोशिश करते हैं, ख़ुद कुछ नहीं करते.
किसी की सेवा-सहायता करना अच्छा है, पर कभी नहीं भी हो पायी तो मैं इनकी टी. वी. डिबेट का विषय कैसे बन गया!
इनके issue बनाने से न मैं अंधविश्वास छोड़ूंगा, न अपने देश, धर्म, जाति के ख़िलाफ़ जाऊंगा. मेरे पास इतनी आंतरिक शक्ति है कि विश्वास के क्षण में आंख बंद करके अंधा भी हो सकूं. मेरे अंधविश्वास का इनके जैसी बदनीयती से दूर-दूर का रिश्ता नहीं है.
Rationalist, progressive, scientific outlook वाले तोते की गर्दन मरोड़ूंगा क्योंकि ‘थैंक गॉड’-राक्षस के मरने के बाद ही हिंदुस्तान उठ खड़ा हो सकेगा.
24-09-2018

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The 3-Languages

KIND ATTENTION HRD/EDUCATION MINISTER, Government of India

The three-language formula for our education and teaching was devised in the Chief Ministers’ conference in 1961 and enunciated in the 1968 National Policy Resolution. The Union Education Ministry in consultation with the states formulated this formula of language learning. It provided that Hindi-speaking states would teach three languages, namely one of the local languages (mother tongue, viz. Maithili, Avadhi, Brajbhasha, Rajasthani), Hindi and English. The children in non-Hindi-speaking states were to be taught the local language (mother tongue), along with Hindi and English.

But alas! the way we have been running the affairs of the country from Delhi, that too under Nehruite Indian National Congress, Indian Education system was doomed to fail the three-language formula, only to blame the states, education being a state subject under the Constitution. Most of the states, except Puducherry, Tamil Nadu and Tripura, have implemented the Three-Language formula and three languages viz. Hindi, English and state’s official language are taught in the schools of these states. Hindi is not taught in the states of Tamil Nadu, Tripura and Puducherry. A few of the Education Boards in some states permit even foreign languages such as Spanish, French and German in place of Hindi. (I should stand corrected if there are some factual mistakes in my information on this).

Delhi/Congress have been pitiably deprived of a predisposition to ever introspect whether they had managed to teach Hindi as lingua franca or it was UP-MP-Bihar we were teaching. Why was it never propositioned from Delhi  under Congress that Hindi-speaking states should teach Hindi, English and a language from one of the non-Hindi-speaking states? As for Hindi we teach in each state including Hindi-speaking ones, literature from different state languages translated into Hindi should be taught. In principle, a poem from Hindi, an essay from Tamil, a short story from Kannada, a one-act play from Bengali, stories from Sanskrit, poetry from Urdu, essays from Sindhi, folklores from Ladakh and Kashmir, stories from Ramayana and Mahabharata – all translated into Hindi should constitute the Hindi syllabus, whichever the state may be. Teaching Hindi as link language ought to mean teaching India.

This should equally apply to English. Do we want to teach English language or intend to teach England, Europe and America in India? Content matter from each state language and every corner of country translated into English should be taught. What is the sense of teaching Keats, Wordsworth or Emerson in class 5th , 6th , or ninth and tenth instead of Akilan (Tamil), Vallathol (Malayalam), Tukaram or Gyaneshwar or Muktabai (Marathi), Kanchan Baruah (Assamese), Bulleshah and Nanak Singh (Punjabi), Ghalib or Iqbal (Urdu), Nazrul Islam and Rabindranath Tagore (Bengali) – all translated into English? Let us make our children learn the English language that had imbibed India, not some foreign lands. When we teach a language we don’t teach a mere language. We teach its literature which essentially belongs to people’s culture, thought, philosophy and lifestyle. Hindi and English we teach MUST belong to entire India, every corner of India.

By the way, what prevents us from teaching the same content in all the three languages? The same collection translated into Hindi, English and the state language being taught? It is likely to make learning languages and understanding matter for any child not only easier, but faster too!

Higher studies in English literature or Hindi or the regional language excepted of course; which are, even otherwise, not part of three-language formula, only a matter of choice and preference of the individual scholar.

24-09-2018

 

 

 

Neo-Nazism

न्यूयॉर्क टाइम्स के लेखक-संपादक जोसेफ़ होप  का एक लेख ख़ूब चला था “Who Is Modi?”

यह लेख जब originally अंग्रेज़ी में आया था तब भी इसी तरह सोशल मीडिया पर पढ़ने को मिला था  जैसे यह हिन्दी अनुवाद.

जिन लोगों की अंग्रेज़ी मुझ से भी खराब है उन्होंने अपनी गतिविधियाँ और तेज़ कर दी थीं क्योंकि इस पर अमल (भारत के हित (स्वार्थ?) के विपरीत आचरण) तो ये लोग पहले से कर ही रहे थे. जिनकी अङ्ग्रेज़ी मुझ से अच्छी है उन्होंने भी समझ लिया कि यह left handed compliment है, इसलिए compliment part को छोड़ दिया जाये, हमारे ही किसी हिन्दुस्तानी की तारीफ़ हो जाये, यह होना नहीं चाहिए! वरना हमें पढ़ा-लिखा कौन कहेगा? बाकी, मोदी को रोका जाये, यह ठीक है. 

अब यह लेख हिन्दी में आया है तो होगा यह कि जिन्हें पहले समझ में नहीं आया था वे मोदी-विरोध के नाम से भारत के हितों पर प्रहार बढ़ा देंगे. जिनकी समझ में आया था (समझ में यह facility मौजूद रहती है – in-built है – कि जैसा हमें suit करेगा वैसा समझेंगे!) वे दुनिया को बचाने के लिए मोदी-विरोध बढ़ा देंगे – हिंदुस्तान का क्या है, यह तो हमेशा से ऐसा ही रहा है और ऐसा ही रहेगा. थोड़ा बहुत इसे अंग्रेज़ संभाल गए, कुछ नेहरू और कांग्रेस ने संभाल दिया, और मार्क्सवाद ने इसे rationalist activism दे दिया तब जाकर कहीं बचा!

जोसेफ़ होप की दिक्कत यह है कि दुनिया के किसी भी पत्रकार की तरह इन्हें भी भ्रम है कि दुनिया के हर देश का नेता बेवकूफ़ है जो मोदी को आँखों में धूल झोंक लेने दे रहा है और अखिल ब्रह्मांड की समझदारी सिर्फ़ जोसेफ़ होप के पास है!

इन महाशय की समझदारी का आलम तो यह है कि इनके मुताबिक़ अमेरिका जानता था हिटलर उसका दुश्मन है. फिर भी होप साहब का समझदार देश (जो अब मोदी के सामने बेवकूफ़ हो गया है!) पूरे विश्वयुद्ध के दौरान अपनी मित्र allied forces को axis forces के सामने मरने को छोड़े रहा और जब लड़ाई में कूदा तो जितना हिटलर ने चार साल में नहीं किया उतना एक बार में हिरोशिमा और नागासाकी में कर दिया! इतने ग़ैरज़िम्मेदार अमेरिका से भी मोदी ज़्यादा ख़तरनाक है! भई वाह!

मोदी क्यों ख़तरनाक है – क्योंकि वह अपने देश भारत का हित (होप के शब्दों में ‘स्वार्थ’) देखता है! क्या ग़ज़ब का logic है!!

विश्व-शक्ति बनकर भारत पूरी दुनिया को आँख दिखाएगा – ऐसी बात केवल होप जैसा भयंकर विद्वान ही कह सकता है! इस एक बात ने ही बता दिया कि होप उन लोगों में से है जो Abrahamic religions (Christianity-Islam) के पीपे (tin-container) से कभी बाहर ही नहीं निकले जो जान पाते कि हिन्दुत्व पर चलने वाले हिंदुस्तान से तो विश्व-विजय के लिए निकला सिकंदर भी एक सबक लेकर वापसी यात्रा में अर्थी पर लेटा था – हाथ coffin से बाहर रहने चाहिएं ताकि दुनिया देखे, विश्व-विजय तो एक तरफ़, आदमी खाली हाथ जाता है.  

यह आपके पीपे की ही कृपा थी कि मार्क्स ने कह दिया religion is opium. मार्क्स को हिन्दुत्व का कुछ भी पता नहीं था. अब्राहमिक धर्म ही उसके लिए धर्म थे! यह भी आपका ही पीपा था कि नीत्शे  ने घोषित कर दिया – गॉड इज़ डेड! और जैसे ही मनुस्मृति उसके हाथ लगी, वह बोला, हमें धर्मों की कोई ज़रूरत नहीं है. मनुस्मृति वह वैज्ञानिक ग्रंथ है जो सिर्फ़ उसके बारे में बताता है जो आदमी नहीं करता,क़ुदरत करती है!

और जनाब होप साहब, आप जैसे विद्वान को यह तो मालूम था कि हिटलर अमेरिका का दुश्मन है, मगर यह कैसे पता नहीं चला कि हिटलर कट्टर मार्क्सवादी था? मार्क्सवाद का जो peak हो सकता है, वह हिटलर था. उसका स्वस्तिक रूसी लाल सेना के पहले झंडे से आया, गैस चैंबर स्टालिन-लेनिन से मिले,राष्ट्रवाद इंग्लैंड का nationalism नहीं,पूंजीवाद के विरुद्ध हथियार था –  संसाधनों का ही नहीं, नागरिकों का भी राष्ट्रीयकरण कर दो! हिटलर का कहना था यह कैसे हो सकता है कि आप समाजवाद की बात करें और सेमेटिक जातियों (अरब-यहूदी) के mammonism के खिलाफ़ न हों? यहूदी उसके लिए शेक्सपियर के मर्चेन्ट ऑफ वेनिस के पात्र शायलॉक का रूप थे! पूंजीवाद का चरम! उसकी चिंता थी कम्युनिस्टगण ठीक से मार्क्सवाद को न पढ़ते, न लागू करते!

हिटलर पूरी तरह से मार्क्सवाद की घड़न था. ठीक वैसे जैसे ओसामा बिन लादेन अमेरिका की रचना. जैसे भिंडरांवाले इन्दिरा की देन!

आप पूछेंगे फिर हिटलर ने रूस पर क्यों हमला किया?

जवाब है जिस कारण ओसामा ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर किया!

जोसेफ़ होप को भारत के विपक्ष को एकजुट होकर मोदी के खिलाफ देश को भड़काने के पक्ष में होते समय  यह सब दिखाई नहीं देगा. ऐसे बुद्धिजीवी/पत्रकार वे लोग हैं, मार्क्सवाद को जवाब देते वक़्त जिनकी घिग्घी बंध जाती है और rationalist हो जाने के सिवा जिन्हें और कोई उपाय नहीं दिखाई देता. ये वह लोग हैं जिनके लिए किसी ने ठीक कहा था कि अपने दुश्मन से लड़ने में एक दिन हम उसी का चेहरा बन जाते हैं!

अब इन्हें कैसे दिखाई देगा कि जैसे मार्क्सवाद ने हिटलर दिया, उसी को मंहगा पड़ा, अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन बनाया, उसी को भुगतना पड़ा, इन्दिरा गांधी ने भिंडरांवाले घड़ा और जान गंवायी, उसी तरह इस सोच के पीपाबंद पश्चिमवालों ने एक दिन पाकिस्तान बनाया और आज उन्हीं को आतंकवादी लादेन छिपाकर उसने मुँह चिढ़ा दिया! ऐसे individuals की तर्ज़ पर एक पूरे देश को लेकर experiment!!

पाकिस्तान-एक्सपेरिमेंट सफल होने पर वहाबी इस्लामी ताकतों का हौसला बुलंद हो गया जो आज ISIS के खलीफ़ा तक पहुंचा है. इधर पाकिस्तान का होना इसलिए ज़रूरी माना गया कि इसे बाक़ी बचे हिंदुस्तान के इस्लामीकरण की कोशिशों का कैंप बनाया जाये!

जो बात जोसेफ होप को और उसके पाले हुए हिन्दुस्तानी पत्रकारों को दिखाई नहीं देगी वह है कि इस वक़्त मार्क्सवादी ताक़तें इस्लामी आतंकवाद में से neo-Nazism घड़ रही हैं जो हिटलर से भी ज़्यादा मंहगा साबित होने जा रहा है. इस प्रयोग के लिए हिंदुस्तान की ज़मीन काम में ली जा रही है. केरल, कर्णाटक, JNU, पुणे-कोरेगाओं, भारत के टुकड़े-टुकड़े गैंग, PFI, NGO, सोशल एक्टिविस्ट, पत्रकार,विपक्षी राजनीतिक दल – सबको एकजुट किया जा रहा है, मोदी को बहाना बनाकर! अगर यह किसी को नहीं पता कि मोदी के मन में क्या है तो इसमें ऐतराज़ की बात क्या है? इतना तो पता है न कि अपने देश का हित है. यह कहाँ ज़रूरी है कि भारत का देश-हित जोसेफ़ होप से एप्रूव करवाने के बाद ही लागू किया जाये?

यह स्पष्ट होना चाहिए कि मोदी की कोई लड़ाई इस्लाम के खिलाफ़ नहीं है. इन चार वर्षों में एक भी ऐसा निर्णय नहीं है जो इस्लाम धर्म या मुसलमानों के खिलाफ़ हो!

मोदी का जो होना हो सो हो. भारत की ज़मीन जाने! मगर जोसेफ होप जैसे लोग और उसके पिछलग्गू Neo-Nazism की कामयाबी के लिए काम कर रहे हैं. इन्हें पराजित करने के लिए मोदी का जीतना ज़रूरी है!

रहा नियो-नाज़ीवाद, सो वह अकेले हिंदुस्तान का सिरदर्द नहीं है!!

23-09-2018

ShriGanesh

India and Indians are busy with Lord Ganesha. A video clip had gone viral recently on social media highlighting a Madrid Church inviting Lord’s procession inside and seek His blessings.
I too shared the clip with a lot of friends and acquaintances and followed with the complete news on how the priest Bishop Rafael Zornoza Boy had to apologise for causing “deep sorrow for this ‘unfortunate’ fact that has caused damage, confusion or scandal in the Christian community”.
I was questioned by a few of my ‘progressive’ activist friends if sharing the clip was not just sufficient in the interest of secularism. What was the need to share the complete news item which in the end harmed the ‘goodwill’?
Secularism? Was it a tool to speak “half-truths”?
I am firm in my opinion that no other nation, community or religion than only Hinduism & India could ever be truly secular. Because of Hindu lifestyle, India is the only land having world’s all religions.
We are like a rich library which contains all books of all languages.

India is a great library of all religions.

Abrahamic religions like Christianity and Islam usually don’t want to even dream of this. They feel insecure in such a scenario and feel an urge to criticize/destroy Hinduism.
Can we think of a reason for this attitude?
Reason could be they are religious, not spiritual. They know nothing about God or Allah. Whereas even a non-believer and atheist is allowed to be a good Hindu. They don’t feel like exploring to understand this.
All they can think of is a need to have more and more crowds of Christians or Muslims before and behind them. For this they more often indulge in conversions. They are then reassured that when such a large crowd speaks of a God/Allah, there M U S T be a God/Allah. This in turn certifies their authority as cleric. They are sure Hinduism should be opposed which can afford a नास्तिक among believing (religious) Hindus.
So, secularism is not the answer. Indian lifestyle IS. This they call हिन्दुत्व.
This lifestyle is not based in any religion. It is an economics, the agrarian economy which has so far successfully cushioned all world wide recessions.
Incidentally, ‘Hindu’ is a Persian word, nowhere to be seen in entire Samskrut literature and scriptures.
कल अनंत चतुर्दशी है. हम गणेशजी का विसर्जन करेंगे, secularism का नहीं.
Our Constitution tells us to be secular to religions, not to be secular to Lifestyle.
22-09-2018.