मौलाना गाँधी


चौंक गए ?

मत चौंकिए.

यह शीर्षक मेरा दिया हुआ नहीं है, कांग्रेसियों का है. मैं इन शब्दों को प्रयोग करने वाला (शायद) तीसरा व्यक्ति हूँ. मुझ से पहले दो बड़े कांग्रेसी नेता यह नेक काम कर गये हैं.

सन् 1942 में महात्मा गाँधी ने वर्धा में ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ की स्थापना की. डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, पंडित जवाहरलाल नेहरु, डॉ. ज़ाकिर हुसैन, आचार्य काकासाहेब कालेलकर, श्री बाला साहेब खेर, डॉ. ताराचंद, डॉ. जाफ़र हसन, प्रो. नजीब अशरफ नदवी, श्री श्रीमन्नारायण, पंडित सुन्दरलाल, पंडित सुदर्शन, श्री सीताराम सेक्सरिया, श्री अमृतलाल नानावटी, श्री वेदप्रकाश नायर जैसे अग्रगण्य कांग्रेसी नेताओं ने इस ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ के माध्यम से गाँधीजी के ‘उसूलों’ के प्रचार के लिए योगदान दिया.

इनमें श्री श्रीमन्नारायण (जिनका पूरा नाम श्रीमन्नारायण अग्रवाल था, और जो श्री जमनालाल बजाज के दामाद थे) इस सभा के संस्थापकों में थे और वर्धा के ही बजाज कॉलेज के प्रिंसिपल भी थे. (सब कुछ अपने परिवार का है — यह कांग्रेस के डी.एन.ए. में है!) अपने अंतिम दिनों में श्रीमन्नारायणजी गुजरात के राज्यपाल भी रहे. यही श्री श्रीमन्नारायण 1946 में हिन्दुस्तानी प्रचार सभा, वर्धा के प्रधानमन्त्री बने.

1946 में प्रकाशित ‘विशाल भारत’ का एप्रिल अंक और 19 मई, 1946 का ‘देशदूत’ यदि किसी ग्रंथालय-संग्रहालय में देखने को मिल जाए तो हम पायेंगे कि इन दोनों में श्री श्रीमन्नारायण का एक लेख प्रकाशित हुआ था. शीर्षक था “मौलाना गाँधी”. इस लेख में श्रीमन्नारायणजी ने गाँधीजी के ‘उसूलों’ को स्थापित करते हुए कहा था कि हिन्दी जैसी भाषा के स्थान पर हमें हिन्दुस्तानी का इस्तेमाल करना चाहिए. इस ‘उसूल’ के चलते हिन्दू नाम के पहले भले ‘श्री’ कहें, मगर अन्य धर्मों के लोगों का लिहाज़ रखते हुए ‘जनाब’ कहना चाहिए. ‘हिन्दी पत्र-पत्रिका’ मगर ‘उर्दू रिसाले’, ‘शब्द’ के बजाय ‘लफ़्ज़’, ‘संस्कृति’ के बजाय ‘तहज़ीब’, ‘साहित्य’ को ‘अदब’, ‘कविता’ को ‘नज़्म’, ‘विद्वान्’ को ‘माहिर’ आदि कहना राष्ट्रीय और भावनात्मक एकता के अनुकूल रहेगा.

उन दिनों रेडियो के लिए ‘आकाशवाणी’ शब्द प्रचलित नहीं हुआ था अतः ब्रिटिश हुकूमत होते हुए भी गाँधीजी के ‘उसूल’ के मुताबिक उसे ‘ऑल इंडिया रेडियो’ कहकर बोला जाता था. अतः वहाँ भी ‘हिदुस्तानी’ का प्रचलन हुआ. श्री अहमद शाह ‘पतरस’ बुखारी के रेडियो का डाइरेक्टर जनरल होने से और आसानी हो गई. यह ध्यान रखा जाने लगा कि किसी हिन्दू के लिए ‘स्वागत’ बोलें तो मुसलमान-ईसाई आदि के लिए ‘इस्तक़बाल’ कहा जाए. हिन्दू के बारे में बताना हो तो ‘सुरगबास हो गए’ और अन्य के लिए ‘इंतक़ाल फ़रमा गए’ अनाऊंस किया जाए. यह भी तय कर दिया गया कि जिस तरह अंग्रेज़ी भाषा की संस्कृति-धर्म ‘ईसाइयत’ है वैसे ही ‘हिन्दुस्तानी’ भाषा की धर्म-संस्कृति ‘इस्लाम’ निर्धारित कर दी जाए. इसलिए ऑल इंडिया रेडियो पर गॉड का अनुवाद हमेशा ‘ख़ुदा’, रिलीजन का ‘मज़हब’, फ़्राईडे का ‘जुम्मा’, ‘प्रे’ (pray) का ‘दुआ’ और ‘हिज़ एक्सेलैन्सी’ का ‘हुज़ूर वायसराय’ बोलकर प्रसारण किया जाने लगा. यह तो तब था जबकि अभी गाँधीजी ने हमको ‘बिना खड्ग-बिना ढाल’ वाली आज़ादी नहीं ले दी थी.

और इस तरह गाँधीजी के ‘उसूलों’ ने शुद्ध भारतीय भाषा उर्दू को एक धर्म दे दिया. बैठे-ठाले उसे मुसलमानों की भाषा बना दिया !

इसलिए अपने लेख में श्री श्रीमन्नारायण अग्रवालजी ने बताया कि ‘मौलाना’ शब्द ‘महात्मा’ के ही अर्थ में है, इसलिए हमें अब से ‘महात्मा गाँधी’ को ‘मौलाना गाँधी’ कहना चाहिए ताकि ‘हिन्दुस्तानी’ ज़ुबान को बढ़ावा मिल सके !

एक अन्य कांग्रेसी नेता थे पण्डित रविशंकर शुक्ल, श्री विद्याचरण शुक्ल के पिता, जो उस समय के ‘सेंट्रल प्रोविंस’ और स्वातंत्र्योत्तर मध्य प्रदेश के पहले मुख्य मंत्री बने. रविशंकर शुक्लजी निष्ठावान् हिन्दी-सेवी थे और हिन्दी को बढ़ावा देने वालों में गिने जाते थे. आप गांधीजी का विरोध तो नहीं करते थे, मगर हिन्दी के मामले में स्पष्टोक्ति कर दिया करते थे. शुक्लजी मानते थे कि भाषा और साहित्य की परम्पराएं हमें वाल्मीकि, व्यास, कालिदास और तुलसी से मिली हैं; अशोक, समुद्रगुप्त, अकबर और बाजीराव से नहीं. इसलिए न तो गाँधीजी हिन्दी के भाग्य का निर्णय कर सकते, न कांग्रेसी यह बता सकते कि इस लिपि में लिखो और ऐसी भाषा में बोलो.

यह पूरा प्रकरण इतिहास-वृक्ष का वह पत्ता है जिसे जान-बूझकर सूख जाने दिया गया क्योंकि यह हवा के हर झोंके के साथ सरसरा रहा था कि गाँधीजी के नेतृत्त्व में कांग्रेस बेतरह देश को गुमराह करने में लगी है. ये सब कांग्रेसी कर क्या रहे थे ? एक ओर गाँधीजी स्वयं ‘हरिजन’ की बात करते हुए डॉ. भीमराव अंबेडकर को आगे बढ़ा रहे थे, (जिन्होंने आगे चलकर बी.बी.सी. के अपने इंटरव्यू में कह दिया कि गाँधीजी ‘महात्मा’ कहलाने लायक व्यक्ति नहीं थे !), दूसरी ओर डॉ. सम्पूर्णान्द (जो गोविंदवल्लभ पंत के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे) किताब लिख रहे थे — ‘ब्राह्मण, सावधान’ ! एक ओर गाँधीजी ‘यूनाइटेड प्रोविंस’ (आज का यू.पी.) में ‘हिन्दी’ और ‘गाय’ की रक्षा करने की बात करने वाली कांग्रेसी सरकार बनवा रहे थे (जिससे जिन्नाह व अन्य मुसलमान और ‘असुरक्षित’ हो गए — “मुझे इस देश में डर लगता है” का मनोविज्ञान तभी से काम कर रहा है), दूसरी तरफ़ वही गाँधीजी वर्धा की ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ के माध्यम से हिन्दी की लुटिया डुबो रहे थे !

लिहाज़ा, पण्डित रविशंकर शुक्ल ने एक किताब लिखी — “हिन्दी वालो, सावधान”. उन्होंने इसकी भूमिका में स्वीकार किया कि शीर्षक की प्रेरणा उन्हें डॉ. संपूर्णानन्द की पुस्तक “ब्राह्मण, सावधान” से मिली है ! ‘हिन्दी वालो, सावधान’ में शुक्लजी ने एक पूरा प्रकरण रखा — “हिन्दुस्तानी की बला” — हिन्दुस्तानी अर्थात् गाँधीजी के ‘उसूलों’ वाली भाषा ! इस प्रकरण के तीन चेप्टर भी दिलचस्प हैं — हिन्दुस्तानी आंदोलन का एकतरफ़ा स्वरूप, हिन्दुस्तानी वालों की कारगुज़ारी, और हिन्दुस्तानी वालों के हथकण्डे !!!

‘हिंदुस्तानीवाले’ ‘हिंदीवाले’ — यानी अख़बारवाले, रद्दीवाले, दूधवाले, सब्ज़ीवाले, कपड़े इस्तरी करने वाले, बोझा ढोने वाले, वगैरह- वगैरह — समाज का अलग ही वर्ग — ऐसे ही हिंदी’वाले’ !!

वाह री कांग्रेस ! और वाह वाह हमारे राष्ट्रपिता !!

आँख पूरी-पूरी खोलने के लिए यह देखना-जानना शायद मददगार हो कि श्री श्रीमन्नारायण के लेख ‘मौलाना गाँधी’ को पं. रविशंकर शुक्ल ने क्या जवाब दिया. उन्होंने इसके उत्तर में एक सुदीर्घ लेख लिखा जो लगभग सौ पृष्ठ की एक लघु पुस्तिका बन गया. इस पुस्तिका को शुक्लजी ने भी शीर्षक दिया — ‘मौलाना गाँधी’ !

इस तरह मैं शायद “मौलाना गाँधी” — इन शब्दों को प्रयोग करने वाला तीसरा व्यक्ति रहा होऊँ !

श्रीमन्नारायणजी ने अपने लेख ‘मौलाना गाँधी’ में चिंता व्यक्त की — “उर्दू अख़बार और रिसाले यह कहकर गाँधीजी को दोष देते रहते हैं कि वह हिन्दुस्तानी की ओट में उर्दू का नाश कर हिन्दी का प्रचार करना चाहते हैं.”

पं. रविशंकर शुक्ल ने अपनी पुस्तिका ‘मौलाना गाँधी’ में इस चिंता का निवारण यों किया — “गाँधीजी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन छोड़ते हुए अपने मुँह से कहा है कि ‘सम्मेलन छोड़कर हिन्दी की और सेवा हो सकेगी’. ठीक भी है. सम्मेलन में रहते तो सेवा प्रत्यक्ष थी. ‘और सेवा’ करनी हो तो ओट से ही हो सकती है. ‘हिन्दुस्तानी’ ही तो वह ‘ओट’ है जिससे चाहे हिन्दी का नाश कर दो — (रेडियो की तरह), चाहे उर्दू का”.

गाँधीजी हिन्दू और मुसलमान को एक करने के नाम पर कैसे साफ़-साफ़ बाँट रहे थे उसकी झलक श्री श्रीमन्नारायण के ‘मौलाना गाँधी’ में इस तरह मिलती है — “अभी तक तो गाँधीजी क़ौमी ज़बान को ‘हिन्दी’ नाम से पुकारते रहे. लेकिन जब उन्होंने देखा कि ‘हिन्दी’ और ‘उर्दू’ धीरे-धीरे दो अलग-अलग धारायें हो रही हैं तो उन्हें मिलाने के लिए ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ की नींव डाली गई”.

शुक्लजी के ‘मौलाना गाँधी’ में इसके जवाब में लिखा है — “जब गाँधीजी ने ‘क़ौमी ज़बान’ को ‘हिन्दी’ नाम से पुकारना शुरू किया था, उस समय क्या ‘उर्दू’ भाषा और उस भाषा के इस नाम ‘उर्दू’ का अस्तित्त्व था या नहीं ? या उस समय हिन्दी और उर्दू एक ही चीज़ थीं? और गाँधीजी वाली हिन्दी वही थी जो उर्दू थी ? हिन्दी और उर्दू की धारायें कब से ‘धीरे-धीरे’ अलग होना शुरु हुईं ? आज की ‘अलग-अलग धारा’ हिन्दी और उर्दू की तुलना में क्या तुलसी का ‘मानस’ और ग़ालिब का ‘दीवान’ एक-दूसरे के अधिक निकट हैं जो आज हिन्दुस्तानी की ज़रूरत आन पड़ी ? अब क्या देवनागरी और फ़ारसी लिपियाँ भी ‘धीरे-धीरे’ दो अलग धारायें होना शुरु हो गई हैं या जब गाँधीजी ने ‘क़ौमी ज़बान’ को ‘हिन्दी’ कहना शुरु किया था उस समय सब हिंदियाँ देवनागरी में ही लिखी जातीं थीं? फिर, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा तो गाँधीजी के ही हाथ में थी. तभी उन्होंने वहीं से ‘दोनों लिपियाँ’ का प्रचार शुरु क्यों नहीं किया ? 1946 तक क्यों रुके रहे ? ‘हिन्दुस्तानी’ का प्रस्ताव तो 1925 में ही पास हो गया था. तब से 1946 तक क्यों गाँधीजी ‘राष्ट्र-लिपि देवनागरी’ के प्रचार में बराबर सहयोग देते रहे ? या फिर क्या वह देवनागरी को फ़ारसी लिपि का पर्याय मानने की भूल करते रहे थे?”

कहना न होगा कि गाँधीजी के ‘उसूल’ वर्धा की ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ की बदौलत पूरे-पूरे लागू हो गए होते तो आज तमिलनाडु को दो भाषाओं और दो लिपियों का विरोध करना पड़ रहा होता – हिन्दी का भी और उर्दू का भी! क्योंकि उन्हें तीन भाषाएं — तमिल, अंग्रेज़ी, और ‘हिन्दुस्तानी’ तथा चार लिपियाँ — अंग्रेज़ी की रोमन, तमिल, और ‘हिंदुस्तानी’ की ‘दो लिपियाँ’ — देवनागरी और उर्दू-लिपि सीखनी पड़तीं !

‘हिन्दुस्तानी’ भाषा और गाँधीजी के परम भक्त डॉ. ताराचंद ‘रेडियो कमेटी’ के सदस्य थे. सम्बन्धित बैठक में उन्होंने हिन्दी में और उर्दू में भी ख़बरें प्रसारित करने का विरोध यह कहकर किया कि इससे ‘हिन्दुस्तानी’ का एक्सपेरिमेंट सफल नहीं होगा. शुक्लजी पूछते हैं कि क्या यह हिन्दी और उर्दू दोनों को एक साथ हलाल करना नहीं हुआ ? मगर दूसरे ‘हिन्दुस्तानी’-स्टार और गाँधी-वादी पं. सुंदरलाल ने यहाँ तक कह डाला कि इस तरह हिन्दी और उर्दू में ख़बरों की मांग ‘टू नेशन थ्योरी विद ए वेंजिएन्स’ है !

उर्दू को उर्दू की और हिन्दी को हिन्दी की तरह सम्मान देने की हिमायत करते हुए शुक्लजी ने याद दिलाया है कि ‘मैं बड़ा होता हूँ तो अपनी शक्तियों से’. गाँधीजी के ‘उसूलों’ वाली ‘हिन्दुस्तानी’ और उसे लिखी जाने वाली दोनों लिपियों की स्वीकृति (देवनागरी और फ़ारसी) से भारतवर्ष का जो होगा उसकी ओर भी उन्होंने ध्यान आकर्षित किया है.

“हमारे पूर्वजों ने हमें सिखाया कि शब्द का अशुद्ध उच्चारण करने से पाप होता है. मन्त्र का अशुद्ध उच्चारण करने से उसका फल नहीं होता. और उन्होंने हमें एक ऐसी लिपि भी दी जिसमें दस हज़ार वर्ष पुराने उच्चारण सुरक्षित हैं. आज भी हम अपने एक शब्द का उच्चारण वैसा कर सकते हैं जैसा हमारे पूर्वज करते थे. ‘हिन्दुस्तानी’ और उसकी उर्दू-लिपि के कारण अब हमें सीखना होगा — साहित्या, वरत, रामायन, गनेश, बरहमन, सभापती, आचारिया नरेंदर देओ. अगर किसी को संदेह हो तो सुन ले रेडियो के हिन्दुस्तानी माहिरों का उच्चारण !”

बात यहाँ तक नहीं रुकी. गाँधीजी ने इस नियम को स्वीकृति दी कि ‘हिन्दुस्तानी’ अपनाने में उर्दू-बहुल क्षेत्रों पर यह बाध्यता नहीं होगी कि वे दोनों लिपियों का सिद्धान्त अपनाएं. वे नहीं चाहेंगे तो उन्हें देवनागरी सीखनी नहीं पड़ेगी. मगर हिन्दी-बहुल इलाक़ों में नागरी और उर्दू दोनों लिपियाँ सीखना ज़रूरी होगा. इसी तरह उर्दू-बहुल क्षेत्रों में उनका ‘मतरूकवाद’ भी मंज़ूर होगा — यानी उनके हिन्दी-अज्ञान और हिन्दी न सीखने की उनकी दृढ़-प्रतिज्ञा का भी सम्मान रखा जाएगा.

ये उर्दू-बहुल क्षेत्र थे कौन से, यह जानना बहुत ज़रूरी है. ये थे पंजाब, सिंध और सीमा-प्रान्त !

मतलब साफ़ है. ‘हिन्दुस्तानी’ भाषा पाकिस्तान बनाये जाने की रिहर्सल सिद्ध हुई. और बापू कह रहे थे पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा ! यह लाश 30 जनवरी, 1948 तक कहीं नज़र नहीं आई जबकि पाकिस्तान 14 अगस्त, 1947 को ही वजूद में आ चुका था — लाखों लोगों के रक्त की बाढ़ में तैरते पनीर के टुकड़े की तरह !!

भाषा केवल एक उदाहरण है जिसमें ‘महात्मा’ के स्थान पर ‘मौलाना गाँधी’ कहने की इस पुरज़ोर सिफ़ारिश के बाद गाँधीजी की और पड़ताल करना कुछ और भी सरल हो जाता है.

1915 में गाँधीजी दक्षिण अफ़्रीका से भारत लौटे तो सर ए. ओ. ह्यूम, दादाभाई नौरोजी और दिनशा वाचा द्वारा स्थापित कांग्रेस अङ्गरेज़ों और भारतीयों के बीच संवाद स्थापित करने के उद्देश्य को लेकर सक्रिय थी. इसमें दो तरह के मिजाज़ काम कर रहे थे. एक वे जो शांति के साथ अंग्रेज़ों से बात करने के विश्वासी थे ताकि उनके साथ मिलकर सरकार बनाई जा सके. इनमें गोपालकृष्ण गोखले और मोतीलाल नेहरू जैसे लोग थे. इन्हें कांग्रेस का ‘नरम दल’ कहा जाता था.

दूसरे वे लोग थे जो शुद्ध रूप से अंग्रेज़ों से मुक्त होकर अपनी सरकार बनाना चाहते थे. इनमें बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिनचन्द्र पाल प्रमुख थे जो ‘लाल-बाल-पाल’ के नाम से जाने जाते थे. इन्हें ‘गरम दल’ के ख़िताब से नवाज़ा गया था क्योंकि ये कहते थे ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा’.

गाँधीजी ने कांग्रेस की बैठकों में हिस्सा लेना शुरू किया और शीघ्र ही उनके विचारों, अनुभवों व जानकारी ने अपना प्रभाव दिखाना शुरु कर दिया. अब यह कल्पना करना हमारे लिए कठिन नहीं है कि यह प्रभाव नरम दल के लिए अधिक अनुकूल सिद्ध हुआ. गोखलेजी को गाँधीजी ने अपना राजनैतिक गुरु माना और आगे चलकर उनका अर्थव्यवस्था-सम्बन्धी ज्ञान गाँधीजी के बहुत काम आया. गरम दल धीरे-धीरे कांग्रेस से विदा हो गया. 1915 में ही गोखलेजी के देहान्त के बाद कांग्रेस पर मोतीलाल नेहरू और गाँधीजी का वर्चस्व स्थापित हो गया.

गाँधीजी के ये विचार और अनुभव क्या थे ?

अमेरिकी गृह युद्ध के बाद के विचारकों में एक प्रमुख नाम था हेनरी डेविड थोरो जिन्हें सँवारा था राल्फ़ इमर्सन नामक बड़े विचारक ने. थोरो चाहते थे कि वह जीवन के केवल बेहद ज़रूरी तथ्यों से सरोकार रखने वाला जीवन जीयें. ऐसा न हो कि मृत्यु की घड़ी में उन्हें आभास हो कि जीवन तो उन्होंने जीया ही नहीं. उनकी इस चिंता का समाधान दिया उन्हें इमर्सन ने. मेसाशुशेट के कोंकोर्ड में जंगलों की अपार शांति के बीच इमर्सन की जो संपत्ति थी वहाँ ‘वॉल्डन’ नामक तालाब के किनारे थोरो एक छोटी-सी कुटिया छाकर रहने लगे. यहाँ से उनका ‘सादा जीवन’-सिद्धान्त निकला.

कुछ समय बाद थोरो से सैम स्टेपल्स नाम का सरकारी अधिकारी टकरा गया जिसका काम था लोगों से टैक्स वसूलना. स्टेपल्स ने थोरो को बताया कि उन्होंने पिछले छः वर्ष से ‘चुनाव-टैक्स’ (प्रतिव्यक्ति कर) नहीं भरा है क्योंकि वह अपने स्थान से ग़ायब रहे हैं. वह टैक्स उन्हें अब देना पड़ेगा.

थोरो ने यह टैक्स देने से इनकार कर दिया. लिहाज़ा उन्हें एक रात के लिए हवालात में बन्द कर दिया गया. यहाँ से निकला थोरो का ‘सविनय अवज्ञा’-सिद्धान्त जिसके अनुसार व्यक्ति अपने तईं अन्याय करने वाली सरकार के नियम मानने से इनकार करने का हौसला दिखाये.

महान् रूसी लेखक लियो तोल्स्तोय ने ‘सादा जीवन’ और ‘सविनय अवज्ञा’ के ये दोनों सिद्धान्त थोरो से ग्रहण किए. दक्षिण अफ़्रीका में अपने ‘तोल्स्तोय फ़ार्म’ पर रहते हुए गाँधीजी ने ये दोनों सिद्धान्त तोल्स्तोय से प्राप्त किए. गाँधीजी का ‘सादा जीवन उच्च विचार’ का सन्देश यहीं से आरम्भ हुआ.

भारत में इन सिद्धान्तों ने लोगों के मन पर गहरी छाप छोड़ी. थोरो की ‘सविनय अवज्ञा’ व्यक्तिगत स्तर पर थी जबकि एक कुशल वकील होने के नाते गाँधीजी यह जानते थे कि क़ानून की हद में रहकर ही सरकार से भिड़ा जाना चाहिए. इस तरह उन्होंने सरकार की तरफ़ मुँह करके ख़ुद को सुरक्षित कर लिया. बहुत सोच-समझकर ‘सविनय अवज्ञा’ को ‘जन-आन्दोलन’ बनाने की प्रेरणा उन्होंने मार्क्सवाद से ग्रहण कर ली और पीठ की तरफ़ से भी सुरक्षित हो लिये.

इस सब में गाँधीजी का अपना क्या था ? एक चतुर भ्रमर की भाँति विभिन्न पुष्पों से अपने काम का तत्त्व ग्रहण करने की कला उनकी अपनी थी ! इस तरह कुछ ऐसा हुआ कि ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध बड़े-से-बड़ा जन-आन्दोलन गाँधीजी ने छेड़ा, महात्मा कहलाये, राष्ट्र-पिता बने, सरकार को चुनौती देने का साहस दिखाया, सब कुछ किया — मगर अपने को बचा-बचाकर किया. उनके ख़ासमख़ास मोतीलाल नेहरू — एक और कुशल वकील — यों भी सरकार के दुलारे थे ही — ‘क़ौम के ग़म में खाते हैं डिनर हुक्काम के साथ’ ! किसी भगतसिंह या सुभाषचन्द्र बोस की तरह गाँधीजी ने अपने को कभी किसी बड़े संकट में नहीं डाला. अंग्रेजों की सुरक्षित जेल में उनकी ‘अवज्ञा’ को सुभीता था. क़ानूनन उन्हें आग़ाखाँ महल वगैरह में ऐसी जेल ही दी जा सकती थी. गाँधी और नेहरू अगर वीर सावरकर से ज़्यादा बड़े देशभक्त थे तो उन्हें क्यों नहीं सर आग़ाखाँ पैलेस की जगह कभी काला पानी मिला?

वकील किस तरह राजनीति को पथभ्रष्ट करते हैं, कर सकते हैं, गाँधीजी का सिद्ध किया वह आदर्श हमारे देश में आज अडिग परम्परा बनकर स्थापित हो चुका है !

‘गरम दल’ कांग्रेस से विदा हुआ तो गाँधीजी को कोई कष्ट नहीं हुआ. जब भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दी गई तो गाँधीजी को बुरा नहीं लगा. ये क्रान्तिकारी देश का ‘ब्रिटिश’ क़ानून जो तोड़ रहे थे ! केशव बलिराम हेडगेवार ने कांग्रेसी नेता के रूप में 1921 के असहयोग आन्दोलन में गिरफ़्तारी दी और 1925 में कांग्रेस छोड़कर ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना करने के बावजूद गाँधीजी के 1930 के नमक-आंदोलन में शामिल हुए, उनके कांग्रेस का त्याग कर देने पर भी गाँधीजी को तकलीफ़ नहीं हुई. नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने कांग्रेस से निकलने का फ़ैसला किया तो शायद बापू ख़ुश ही हुए होंगे. हाँ, दोनों विश्वयुद्धों में ‘सरकार’ को सहयोग देकर, ब्रिटिश फ़ौजों के लिए भर्ती करवाकर अपने ‘अहिंसा’ के ‘उसूल’ पर प्रश्नचिह्न लगवाकर भी राष्ट्रपिता को कुछ फ़र्क नहीं पड़ा. लेकिन जब मुहम्मद अली जिन्नाह कांग्रेस से अलग हुए गाँधीजी की रातों की नींद ख़राब हो गई. एक बार बकरा खा ही चुके थे जो रात भर पेट में मिमियाता रहा था, तब भी नींद ख़राब हुई थी.

मौलाना गाँधी के हिंदुई मुसलमानों से इस रिश्ते को भी भली भाँति खंगालना बनता है.

मुहम्मद अली जिन्नाह कांग्रेस के ‘नरम-दल’ का हिस्सा थे. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के शिक्षा-जगत् से सर सैय्यद अहमद ख़ान की सरपरस्ती में पैदा हुई ‘मुस्लिम लीग’ में जिन्नाह को कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी. उनकी ज़्यादा रुचि थी अपनी वक़ालत में और अंग्रेजों से आज़ादी हासिल करने की नरम-दल कांग्रेसी कोशिशों में. लीग द्वारा प्रचारित मुसलमानों के अलग निर्वाचन-क्षेत्र के भी वह पक्षधर नहीं थे.

पहले विश्वयुद्ध में इंग्लैंड की जीत के बाद जर्मनी का साथ देने वाले उस्मान ख़लीफ़ा वाले तुर्की के लिए मुश्किल पैदा हो गई थी. दुनिया भर के मुसलमानों की तरह हिंदुस्तान के मुस्लिमों को भी तुर्की की ‘खिलाफ़त’ को सुरक्षित रखने की चिंता हुई और भारत में खिलाफ़त-आन्दोलन शुरू हुआ. जिन्नाह ने इस आंदोलन में भी दिलचस्पी नहीं ली, हालांकि अब वह मुस्लिम लीग में आ चुके थे. उनका कहना था हमें भारतीय मुसलमानों पर ध्यान देना चाहिए, तुर्की की ‘खिलाफ़त’ से हमें क्या लेना-देना.

इधर मौलाना गाँधी के क़ानूनी मन में एक पत्थर फेंक कर दो चिड़ियों को एक साथ चौंका देने का विचार आया. भारत का खिलाफ़त-आन्दोलन एक तरफ़ अंग्रेज़ों पर दबाव बनाने का अच्छा मौक़ा हो सकता था, तो दूसरी ओर यही अवसर था कि लीग के मुक़ाबले में हिंदुई मुसलमानों का दिल जीत लिया जाए. मुसलमानों का भी नेता बन जाया जाए.

गाँधीजी ने खिलाफ़त-आन्दोलन को कांग्रेस के समर्थन की घोषणा कर दी. जल्दी ही जिन्नाह को भी गाँधीजी को यह मौक़ा बख़्शने की भूल का अहसास हो गया. इस तरह कांग्रेस का नरम दल छोड़ने वाले जिन्नाह मुसलमानों के ‘गरम-दल’ में तब्दील हो गए !

जिन्नाह और मौलाना गाँधी की उड़ती नींदों ने यहीं सात फेरे ले लिए !

वह दिन और आज का दिन, हिंदुस्तान का मुसलमान अपना नेता किसे कहे इसी संभ्रम में चकराया बैठा है.

मौलाना गाँधी तो मुसलमानों के नेता नहीं बन पाये, जिन्नाह की भी इकलौती मुस्लिम-लीडरी स्थापित नहीं हो सकी. जिन्नाह और दूसरे मुसलमानों से गाँधीजी की यह लालसा छिपी न रही कि देश को अंग्रेज़ों से आज़ाद करवाते समय मुग़ल पकड़ से भी छुटकारा दिलाना है. वह दिल से चाहते थे कि स्वतन्त्र भारत मुसलमानों सहित एक आदर्श लोकतान्त्रिक राज्य बने — जो राम-राज्य हो ! उस समय तक यह स्पष्ट नहीं था कि स्वातंत्र्योत्तर भारत में उन पाँच-सात सौ राजे-रजवाड़ों का क्या स्वरूप होगा जो तब ब्रिटिश राज के झंडे तले अनुस्यूत थे. गाँधीजी को डर था ऐसा न हो अंग्रेजों से छूटें और एक केंद्रीय सत्ता के रूप में फिर मुसलमानों की बादशाहत के चंगुल में आ जाएं और हिन्दू हमेशा की तरह बिखरा-बिखरा ही रह जाए !

गाँधीजी को अपने वकीली कौशल पर इतना भरोसा था कि जैसे वह अंग्रेज़ों के सामने क़ानूनन डटे रह सके, वैसे ही प्रार्थना सभा, ईश्वर-अल्ला तेरो नाम और हिन्दुस्तानी भाषा जैसी ‘उदारता’ से मुसलमानों को भी समझा लेंगे. ऐसा हो न सका. हिन्दी, देवनागरी, गाय, राम-राज्य जैसे गाँधी-उद्गारों के सामने जिन्नाह जैसे मोहभंग से गुज़रे मुस्लिम-नेता एक आम मुसलमान का यह अहसास ज़िन्दा रखने में कामयाब रहे कि हिन्द के बादशाह तो मुसलमान ही हैं. अगर नहीं तो अलग मुस्लिम देश ही एक रास्ता है ताकि हिन्दू लोग मुसलमानों को परेशान न कर सकें. वे कैसे कहते कि लोभ या भयवश धर्म-परिवर्त्तन कर लेने वाला हर आदमी शाही-खानदान का नहीं हो जाता ! मौलाना गाँधी की ऐसा कहने की हिम्मत न हुई क्योंकि मुसलमानों को लेकर साफ़-साफ़ कुछ कहने की अनुमति उनकी वकीली अक्ल देती नहीं थी.

किसी एक महानायक के होने से समाज को बहुत से लाभ रहते हैं. हम भारतीयों के स्वभाव में विशेष रूप से ऐसा है कि कोई करने वाला मिल जाए तो हम जी-जान से उसके पीछे हो लेते हैं. महाभारत-युग में हमने श्रीकृष्ण को ऐसे ही महानायक के रूप में देखा था. इस बात को कैसे भुलाया जा सकता है कि श्रीकृष्ण के एक अवतारी पुरुष के रूप में स्थापित होने में उनके गुण जितने ज़िम्मेदार थे, जन-साधारण का जी-जान से अपने नायक के पीछे चल देने का गुण भी श्रेय का कम अधिकारी नहीं था. श्रीकृष्ण को श्रीकृष्ण बनाना ईश्वर का काम था या नहीं, मालूम नहीं, मगर भारतीय जन-जन का काम ज़रूर था. श्रीकृष्ण हों कि गाँधी, या फिर भले आज के मोदी, हम ‘We, the people’ को कभी न भूलें!

गाँधी की आँधी जो बीसवीं सदी में चली उसका हश्र यह हुआ कि हमारे मौलाना गाँधी हिन्दू और मुसलमान दोनों से मिले श्राप के कारण उस दिन कोलकाता (तब का कलकत्ता) में अनशन करते हुए खटिया पर पड़े थे जिस दिन उनका प्रिय जवाहरलाल अंग्रेज़ों से भी बढ़िया अङ्ग्रेज़ी में Tryst With Destiny वाला अपना भाषण दे रहा था और ‘बापू के बिना तिरंगा नहीं फहरेगा’ कहने की जिसके पास फ़ुरसत नहीं थी. परिणाम यह हुआ कि गाँधीजी इस देश को हमेशा के लिए एक नायक-विहीन समाज दे गए. नायक-विहीन समाज के सामने बहुत-से ख़तरे रहते हैं और आज का भारत उन्हीं ख़तरों के थपेड़ों में हाथ-पाँव मारता हुआ जैसे-तैसे तैर ले रहा है.

माँ-बाप के लाड़-प्यार से बिगड़े बच्चों को सबने देखा है. मगर राष्ट्र-पिता को जन-जन के लाड़-दुलार-विश्वास से बिगड़ते केवल बीसवीं सदी के भारत ने देखा है. सबने जिस बेतरह महात्माजी के हर आदेश को माना उसके नतीजे में जब कोई न माने तो अनशन की ज़बरदस्ती से मनवाने का हथियार इन बिगड़े हुए पिता के पास था. उन्हें भरोसा था कि मौलाना गाँधी होने में कोई अड़चन आएगी तो इस हथियार का इस्तेमाल कर लूँगा और देश का बँटवारा नहीं होने दूँगा. राष्ट्रपिता का वह हथियार अब बात-बिना बात के सत्याग्रहों और हड़तालों के रूप में हमारे सिरों के ऊपर मण्डराया करता है.

अफ़सोस कि गाँधीजी जीवनभर सत्य के प्रयोग करते रह गए और जिस दिन सत्य तक पहुँचे भी तो बहुत देर हो चुकी थी. जिन्नाह को अविभाजित भारत का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, उनका यह प्रस्ताव भी किसी काम न आया. अनेक इतिहासकारों ने इसे एक पराजित ‘बूढ़े फ़कीर’ की गाथा की तरह देखने की कोशिश की है. शायद इसीलिए 1960 का दशक आते-आते एक कहावत चल पड़ी थी — “मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी”.

1982-83 में कभी रिचर्ड एटनबोरो की फ़िल्म ‘गाँधी’ के आने के साथ ही गाँधी-गो लोगों ने फिर करवट ले ली और सब तरफ़ एक बार फिर ‘गाँधी-गाँधी’ होने लगा. यह आज तक पता नहीं चल पाया ये ‘गाँधी-गाँधी’ कर रहे लोग गाँधीजी से प्रभावित हैं या रिचर्ड एटनबोरो से ! कहावत के आसमान से गिरे तो एटनबोरो के खजूर में अटके!!

कुछ भी हो, आने वाले किसी भी युग में भारत की जब भी बात होगी गाँधीजी को छोड़ हो न सकेगी. सत्य के प्रयोग करते-करते सो जाने वाला यह बूढ़ा फ़कीर एक काम तो हम लोगों के लिए कर ही गया है. जिस तरह कुशल गृहिणियाँ जानती हैं कच्चे आम का मौसम हमेशा नहीं रहता. वे केरी के अचार से मर्त्तबान भर-भर कर रख लेती हैं ताकि आने वाले वक़्तों में काम आए. उसी तरह गाँधीजी ने भारत-राष्ट्र को लेकर शायद ही कोई चिंता हो जिस पर अपना चिन्तन मुखर न किया हो — स्वराज्य और अहिंसा से लेकर राष्ट्र, राम-राज्य, और पंचायत तक; जाति-व्यवस्था और धर्म से लेकर स्वच्छता, दलित, महिलाएं और प्रशासन तक. उन्हें लगता रहा सत्य के प्रयोगों का यह मौसम कभी-न-कभी तो बीतेगा. तब प्राप्त सत्य के मर्त्तबान काम आएंगे. वह सब किताबों में है पर एक भी बात किताबी नहीं है. ‘महात्मा’ से मौलाना’ के बीच का सफ़र गाँधीजी ने जितना सोचा था उतने से कहीं ज़्यादा लम्बा निकला — और अन्ततः निरर्थक भी. इसने ख़ुद गाँधीजी को अपने पाये सत्य को जी पाने का समय नहीं दिया. फिर भी वे सत्य हमारे लिए pre-cooked tinned food की तरह उपलब्ध हैं. बेईमान गाँधीवादी हमें उनका आस्वादन नहीं करने देंगे.

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और तकनीकी विज्ञानवाद के इस युग में एक बात तो तय है. हमारा साबिका अब सूक्ष्म से नहीं स्थूल से पड़ता है. बन्द tin को खोलने में स्थूल ही काम आयेगा. यहाँ इस्लाम हमारे लिए सहायक सिद्ध हो सकता है. अरबिस्तान की बर्बर जातियों के मनों में कभी ‘अल्लाहो-अकबर’ की स्थूल हुंकार ने अध्यात्म जैसे सूक्ष्म का ताला खोल डाला था. गाँधीजी के उपलब्ध सत्य का बन्द डिब्बा खोलने और देश के काम में लाने के लिए एक ठोस किस्म का ‘राष्ट्रवाद’ अपनी पूरी कट्टरता के साथ एकमात्र सटीक औज़ार है. आज बहुत लोग कहते हैं कि हमें किसी से देशभक्त होने का सर्टिफ़िकेट नहीं चाहिए. मगर सच यह है कि गाँधीजी निश्चित रूप से सही अर्थ में ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें किसी से राष्ट्र-भक्ति के सर्टिफ़िकेट की ज़रूरत नहीं. राष्ट्र-भावना की स्थूल तीव्रता के बिना महात्मा गाँधी 15 अगस्त, 1947 के पहले वाले मौलाना गाँधी होने पर ही रुक कर रह जाएंगे.

कोई क्योंकर भूले कि इन मौलाना गाँधी को दुलत्ती खाकर देश-विभाजन भी देखना पड़ा और स्वातंत्र्य के प्रथम ग्रास में अपने हाथों जवाहरलाल नामक मक्षिका-पात कर वह ग्रास निगलना भी पड़ा.

व्यक्ति-पूजा वाला यह ‘आँख-बन्द’ गाँधीवाद किस काम का?

केवल इस काम का कि सरकार का मतलब ‘गोरा साहब’ (जवाहरलाल) और गाँधी यानी अवज्ञा! आज़ादी है तो अब ‘अविनय’-अवज्ञा — फ़्रीडम ऑफ़ एक्स्प्रेशन!!

गाँधीजी के मर्त्तबान में यह नहीं मिलेगा!

हम राष्ट्र से जुड़कर चखें तो सही!!

गाँधीजी की क्या किसी की भी हत्या करने में नाथूराम गोडसे क़ानूनन उतना ही अपराधी होता. क़ानून ने उसे दण्डित भी किया. वह हर हाल में एक भावुक और कट्टर देशप्रेमी तो था ही. उसका अपराध हत्या का था, ‘महात्मा’ की ‘मौलाना’-असफलता को रिजेक्ट कर देने का नहीं. मौलाना गाँधी को नकार तो कांग्रेसियों ने ही दिया था !

अर्थहीन गाँधी-भक्तों की सुनने के पहले उन्हें ठोक-बजाकर परख लेना चाहिए. जो बहुत ‘गाँधी-गाँधी’ करे उसके गाल पर ज़न्नाटेदार थप्पड़ जड़ देना चाहिए. वह दूसरा गाल आगे करे तो समझ लीजिए गाँधीवादी है. पलटकर जवाब देने चले तो जान रखिए गोडसे-वादी है !

गाँधी-गाँधी सब करें, गाँधी बने न कोय.

थप्पड़ पड़े जो गाल पर, तुरत गोडसे होय.

अल्लाहो-अकबर !!!

11-12-2019

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