नुसरत के बहाने से…


एक तरफ़ जब भ्रातृवर पार्थसारथी थपलियाल अपने मित्र रज्जब अली के कुरेदने पर भारतीय दृष्टि में ‘ईश्वर’ के बारे में मूलभूत जानकारी एकत्र संकलित करने का महत्कार्य कर रहे थे, दूसरी तरफ़ बंगाल में हुए देवी के मुस्लिम अवतार नुसरत को लेकर हंगामा बरपा था. तीसरी तरफ़ आरएसएस वाले श्री मोहन भागवत हमेशा की तरह विजयदशमी पर अपना अद्भुत भाषण दे रहे थे. मोदीजी से बेहतर भाषण कोई दे सकता है तो वह निःसन्देह भागवतजी हैं. मोदीजी बोलते हैं तो हम सोच सकते हैं राजा दशरथ कितना उम्दा बोलते होंगे. उन्हें भी शासन-प्रशासन आदि की मर्यादा का ध्यान रखना पड़ता होगा. भागवतजी बोलते हैं तो लगता है मानो मर्यादाओं का निर्धारण करने वाले गुरु वसिष्ठ कुछ कह रहे हैं.

बहरहाल, आरएसएस को लेकर गच्चा खा गए निंदकों का मन-विज्ञान बाद में खंगालेंगे, फ़िलहाल तो यह सोचना होगा कि आख़िर थपलियालजी, नुसरत जहाँ और भागवतजी में कौन से एक सूत्र का संबंध है जो दूसरी तरफ़-तीसरी तरफ़ गिनाना पड़ गया? ईश्वर हिन्दू होता है, अल्लाह मुसलमान, देवी मुसलमान नहीं होती, मुसलमानों में देवियों का अवतार लेना अमान्य है, अल्लाह के सिवा किसी और की पूजा करना कुफ़्र है, और हिंदुस्तान में रहने वाले सब हिन्दू नहीं होते. अतः इन तीनों बातों में किसी तरह कोई रिश्ता नहीं बैठता.

इस तरह के विश्लेषण से क्या पता चला? पता यह चला कि विश्लेषण का काम है तोड़ना जबकि अल्लाह की बनायी इस कायनात में सब कुछ आपस में गूँथा हुआ है, संश्लिष्ट है. विश्लेषण करने के लिए मैं टहनी से एक ताज़ा खिला गुलाब तोड़ता हूँ. उसकी पंखुड़ियाँ खसोटता हूँ. पूरा-पूरा एनालिसिस करने के लिए लेबोरेटरी में ले जाता हूँ. विश्लेषण करके जान लेता हूँ इसमें इतना-इतना क्लोरोफ़िल है – उसे काँच के एक जार में संभाल लेता हूँ; इसमें इतना जल-तत्त्व – water content है – काँच के दूसरे जार में समेट लेता हूँ; इतना color content है – उसे तीसरे जार में बंद कर लेता हूँ; पंखुड़ियों और पत्तियों के तन्तुओं का structure ऐसा-ऐसा है – चौथे और पाँचवे  बर्त्तनों में ढँक कर रख लेता हूँ ! इस तरह काँच के दसियों पारदर्शी बंद बर्त्तनों में गुलाब का पूर्ण विश्लेषण संभाल कर अब मैं गुलाब का सबसे बड़ा एक्स्पर्ट हूँ और उसके बारे में सब जानता हूँ.

मगर एक बात नहीं जानता. उन सभी बंद पात्रों को एक कवि के सम्मुख रख दूँ कि यह रहा गुलाब, ज़रा इस पर एक सुंदर गीत तो लिख दो, वह नहीं लिख पाएगा. गीत ईश्वर के रचे गुलाब पर ही लिखे जा सकते हैं क्योंकि तब वह अपने संश्लिष्ट स्वरूप में है ! विश्लेषण – analysis हमारी जानकारी भले बढ़ाता हो, यह संश्लेषण– synthesis ही है जो हमारे ज्ञान और विवेक को बढ़ाता है.

इसलिए भागवतजी के भाषण में से टीवी बहस का विषय यह नहीं था कि ‘लिंचिंग’ किस देश का शब्द है. विषय था क्या शिक्षा पैसा कमाना और पेट भरना सिखाने मात्र के लिए है? या ऐसा ही कुछ और. उनके भाषण में विचार-विमर्ष करने योग्य विषय भरे पड़े थे. किन्तु तोड़क-एक्स्पर्ट हम लोग संश्लेषण की (जिसमें विश्लेषण स्वतः निहित है) क्षमता गँवा चुके लगते हैं. अन्यथा ‘हिन्दू’ को लेकर निरर्थक-निराधार  प्रश्न न करते. रज्जब अली को भी थपलियाल जी को हिन्दू ईश्वर के बारे में उकसाना न पड़ता. इस सबके बीच पार्थसारथी थपलियाल ने जो जानकारी संकलित की वह संश्लेषण का एक बेहतरीन नमूना है.

इसी से जुड़ा है बंगाल में देवी का मुसलमान अवतार जो वहाँ संश्लेषण ही तो कर रही थी.

पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि नुसरत जहाँ ने जो दुर्गा पूजा की न तो वह क़ुरान-ए-पाक हाथ में लेकर की, न कलमा पढ़ते हुए की, और न इस्लाम से मुँह फेरकर की. अल्लाह के सिवा किसी और की पूजा इस्लाम में मना है, दुर्गा के पंडाल में नहीं. अबू धाबी के मंदिर में अरब शेख़ ने जो आरती की थी उससे न तो इस्लाम का अपमान हुआ, न कोई कुफ़्र हुआ. हाँ, वही अरब शेख़ अगर मस्जिद में जाकर मूर्त्ति बैठायें और आरती करें तो अवश्य कुफ़्र है, और निंदनीय-दण्डनीय भी है. उन शेख़ की तरह नुसरत जहाँ ने भी ऐसा कुछ नहीं किया जो इस्लाम के खिलाफ़ ठहरता हो.

इस्लाम किसी की बपौती नहीं है. न क़ुरान मुसलमानों की निजी संपत्ति है. ऐसा भी नहीं है कि ग़ैर-मुस्लिम को क़ुरान शरीफ़ घर में रखना, उसकी इज़्ज़त करना या पढ़ना, उस पर मनन-चिन्तन करना मना है. ये हिल-हिल कर क़ुरान पढ़ने वाले मुसलमान – विशेषतः हिंदुस्तान-पाकिस्तान में, या फिर और भी कहीं – बेसिर-पैर की सोचते हैं कि चलो, क़ुरान-ए-मजीद के अक्षर बाँच लिये, इसलिए अब उनका बाक़ी दुनिया को हिलाना बनता है ! ऐसे ही लोगों के लिए क़ुरान में बार-बार कहा गया है कि ये लोग समझते नहीं, सब स्तुति अल्लाह के लिए है और ये बातें समझदारों के लिए इशारा हैं. ‘अल्लाह’ अरबी भाषा का शब्द है. इसका यह अर्थ कैसे हो गया कि सब स्तुति God के लिए नहीं है? या राम के लिए नहीं है? आख़िर God या राम अरबी से इतर भाषाओं में अल्लाह को ही कहते हैं.

हम अरबी में नमस्ते करते हैं तो कहते हैं – “अस्सलाम अलैकुम”. ‘अस्सलाम’ अल्लाह के 99 नामों में से एक है. वैसे ही जैसे परमात्मा का एक नाम ‘राम’ है. इसलिए  “अस्सलाम अलैकुम” बोलकर हम एक भाषा में “राम-राम” कह रहे हैं और “राम-राम” बोलकर दूसरी भाषा में “अस्सलाम अलैकुम” बोल रहे हैं. अब कोई कूड़मगज ही ऐसा कहेगा कि ख़बरदार जो संस्कृत, हिन्दी, लैटिन, ग्रीक  या अंग्रेज़ी बोली तो ! सिर्फ़ अरबी बोलो !

क़ुरान ने कहा है हर इंसान को अल्लाह के रास्ते पर लाना मुसलमानों पर फ़र्ज़ है. कोई हिन्दू अगर ईश्वर के रास्ते से भटक जाये और कोई मुसलमान उसे रामायण पढ़ने की प्रेरणा देकर, या किसी ईसाई को बाइबिल के माध्यम से वापिस अल्लाह के रास्ते पर ला दे, तो यह क़ुरान का हुक्म मानना हुआ या नहीं? किसने कहा गर्दन पर तलवार रखकर क़ुरान ही पढ़वाई जाए तभी God पर ईमान लाना माना जाएगा?  

इस्लाम में क़ुरान के इशारे सिर्फ़ समझदारों के लिए हैं, हिंदुस्तान के “हाय मुसलमान” “हाय मुसलमान” वाले नव-जिन्नाहों – neo-Jinnahites — के लिए नहीं. यहाँ इस्लाम की नहीं, सभी मुसलमानों की भी नहीं, केवल नव-जिन्नाह टाईप मुसलमानों की निंदा की जा रही है. हर किसी को करनी चाहिए.

1947 के भारत-विभाजन के बाद लगभग 4 करोड़ मुसलमान ऐसे थे जिन्होंने हिंदुस्तान में रहना चुना था. उनमें तक़रीबन एक करोड़ वे मुसलमान थे जिन्होंने पाकिस्तान के बनने में जी-जान लगाया था. जो चार करोड़ आज बढ़कर 20 करोड़ हो गए हैं, उनमें वे एक करोड़ ‘जिन्नाहवादी’ भी हैं जो आज बढ़कर पाँच करोड़ हो गए हैं. कोलकाता के अपने भाषण में यह तथ्य उस वक़्त के गृह-मन्त्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने देश के सामने रखा था. इन्हीं ‘नव-जिन्नाहों’ को आज भी उसी ‘ग़ज़वा-ए-हिन्द’ का इंतज़ार है, जिसका नमूना कभी नादिरशाह के लश्कर ने दिल्ली में एक लाख लोगों की ‘लिंचिंग’ करके, और ख़ुद इन्होंने 1947 में पेश किया था, क्योंकि इनके मुताबिक समझे बिना भी क़ुरान से बेहतर ‘किताब’ नहीं है. अगर ‘मशरिक़’ में है — मुहम्मद साहब का इस्तेमाल किया शब्द – “मुझे मशरिक़ से ठंडी हवाएं आती हैं” – तो वहाँ ग़ज़वा-ए-हिन्द कर डालो ! इन्हें मालूम होना चाहिए कि 1947 में हिन्द के पास आज वाला अपना संविधान रहा होता तो जिन्नाह को पाकिस्तान नहीं, फाँसी मिलती ! जिन्नाह को फाँसी न देकर पाकिस्तान देने और एक इस्लामी मुल्क बनाने का नतीजा आज सबके सामने है. ये नव-जिन्नाह पाकिस्तान सहित इस्लाम पर कलंक सिद्ध हुए हैं और ग़ज़वा-ए-हिन्द की परिकल्पना करते-करते दोज़ख़ के आख़िरी खड्डे में जा गिरे हैं.

सच पूछा जाये तो ये मुसलमान हैं ही नहीं. क्योंकि ये इस्लाम और क़ुरान को ज़रा नहीं जानते. हाँ बड़ी-बड़ी इस्लामिक व्याकरण ज़रूर हाँक सकते हैं — फ़तवा यह होता है, ग़ाज़ी उसे कहते हैं, जिहाद का यह नहीं वह मतलब है — वगैरह-वगैरह. जिस तरह चाँद का कलंक चाँद का हिस्सा होते हुए भी चाँद नहीं कहलाता, उसी तरह ये नव-जिन्नाह इस्लाम का हिस्सा हैं ज़रूर पर मुसलमान नहीं कहला सकते. इसलिए दुनिया भर में ये अपने विनाश को नित नूतन न्योता देते रहते हैं और चिल्लाते रहते हैं — “इस्लामोफ़ोबिया, इस्लामोफ़ोबिया” !

थपलियालजी के लेख में ईश्वर को लेकर जो इशारे हैं वे बार-बार क़ुरान-ए-मजीद की भी याद दिलाते हैं —  एको: देव: — अल्लाह एक है; न तस्य प्रतिमा अस्ति – उसकी कोई मूर्त्ति नहीं अर्थात् वैसा दूसरा नहीं है, या उसका कोई साकार रूप नहीं है, उसे किसी ने देखा नहीं है; एकोहं द्वितीयोनास्ति – “मैं केवल एक हूँ, दूसरा कोई नहीं”; एकमेवाद्वितीयम् – एक ही है, अद्वितीय है, अद्भुत है, उस जैसा दूसरा नहीं है; आदि. मगर ये इस्लाम के self-appointed फ़र्माबरदार इशारे समझने जितना समझदार हों तब न !

क्योंकि बक़रीद मनाने की भी कथा कुछ इस तरह है:

हजरत इब्राहीम अपनी पत्नी हाजरा और पुत्र इस्माइल के साथ रहते थे. मान्यता है कि हजरत इब्राहीम ने एक स्वप्न देखा था जिसमें वह अपने पुत्र इस्माइल की – जो उन्हें सबसे प्यारा था — कुर्बानी दे रहे थे. हजरत इब्राहीम इस स्वप्न को अल्लाह का आदेश मानकर अपने दस वर्षीय पुत्र इस्माइल को ईश्वर की राह पर कुर्बान करने के लिए निकल पड़े. पुस्तकों में पढ़ने में आता है कि ईश्वर ने अपने फरिश्तों को भेजकर इस्माइल की जगह एक जानवर की कुर्बानी करने को कहा. दरअसल इब्राहीम से जो असल कुर्बानी मांगी गई थी वह उनकी ख़ुद की थी अर्थात यह कि ख़ुद को भूल जाओ. तब उन्होनें पुत्र इस्माइल और उसकी मां हाजरा को मक्का में बसाने का निर्णय लिया. लेकिन मक्का उस समय रेगिस्तान के सिवा कुछ न था. इस तरह एक रेगिस्तान में बसना उनकी और उनके पूरे परिवार की बहुत बड़ी क़ुर्बानी थी.

ईद-उल-अज़हा अहंकार के विसर्जन का संदेश देने वाली ‘बड़ी ईद’ है. अहंकार ही मनुष्य को सबसे ज़्यादा प्यारा है – उसी की क़ुरबानी. मगर ये इस बात को स्वीकार नहीं करेंगे. इस्लाम इनकी बपौती जो हुआ !

एक पुराना किस्सा है. किस्सा उस अरब सुलतान  का है जिसने रूस पर चढ़ाई की थी और युद्ध में उसे परास्त किया था. कहते हैं कि मस्क्वा (मॉस्को) की लाइब्रेरी इतनी बड़ी थी और उसमें हर भाषा की जानी-मानी पुस्तकें और ग्रन्थ इतनी बड़ी संख्या में उपलब्ध थे कि उन्हें एक के आगे एक रखा जाता तो पृथ्वी से चंद्रमा तक सात चक्कर लग जाते. सुलतान  अपने घोड़े पर सवार लाइब्रेरी के सामने खड़ा था और होठों पर विजेता की मुस्कान लिये उस पुस्तकालय को ताक रहा था. 

अचानक सुलतान ने कहा, “क्या इन किताबों में एक भी किताब ऐसी है जो क़ुरान-ए-मजीद से बेहतर है?”

जवाब कौन देता? थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद सुलतान ने फिर कहा, “है कोई बेहतर किताब? अगर नहीं है तो इन सब के होने का क्या मतलब है? मैं इस लाइब्रेरी को जला दूँगा. और अगर एक भी किताब यहाँ ऐसी रखी है जो क़ुरान से बढ़कर है, तब तो मैं इस लाइब्रेरी को ज़रूर जला डालूँगा.”

और वह महान् ग्रंथालय फूँक डाला गया !

यही मानसिकता है जो नुसरत जहाँ को यह मानकर भी गाली देगी कि उसका किया इस्लाम से बेहतर नहीं था, और तब भी गाली देगी जब लगेगा कि इनकी मुस्लिम ठेकेदारी के बावजूद उसका किया उचित और बेहतर आचरण था, इस्लाम का अपमान किये बिना था और एक सामान्य मुसलमान होकर था !

मेरे बचपन के दिनों की बात है. पिताजी के एक मुस्लिम मित्र तरह-तरह के विषयों पर चर्चा करने हमारे घर आया करते थे. भले आदमी थे और हम बच्चों से भी लाड़-प्यार से पेश आते थे. एक रोज़ वह आये तो कुछ परेशान दिखे. पिताजी ने कुशल-मंगल पूछा तो उन्होंने बताया, “आज हमारा एक आदमी मारा गया.”

हम बच्चों ने भी सोचा, बेचारों का कोई नज़दीकी रिश्तेदार नहीं रहा इसलिए वह दु:खी हैं.

पिताजी ने भी मातमपुर्सी के अंदाज़ में पूछ लिया कि क्या हुआ?

पता चला कि उनका रिश्तेदार साइकिल से कहीं जा रहा था कि अचानक तेज़ दौड़ते एक ट्रक से टकरा गया और मौके पर ही उसकी मौत हो गई.

“आपका क्या लगता था?” पूछने पर उन्होंने बताया, “नहीं-नहीं, रिश्तेदार नहीं था. मैं तो उसे जानता भी नहीं था. वह कोई एक मुसलमान था.”

कोई हिन्दू नाथूराम गोडसे को फाँसी दिये जाने पर कभी ऐसा नहीं कहेगा कि ‘हमारा’ एक आदमी मारा गया. जबकि यह मानसिकता भारतीय संसद् पर आतंकी हमले के षड्यंत्रकारी अफ़ज़ल गुरु को फाँसी होने पर ज़रूर शर्मिंदा रहेगी क्योंकि उसके ‘क़ातिल’ यानी सज़ा देने वाले जज ज़िंदा हैं. नुसरत जहाँ की निंदा तो चीज़ ही क्या है !

कोई भी वह व्यक्ति इस मानसिकता का दुश्मन है जो हर वक़्त छाती पीट-पीटकर असदुद्दीन ओवैसी की तरह “हाय मुसलमान” “हाय मुसलमान” नहीं करता.

ज़ाहिर है न तो इस्लाम बुरा, न क़ुरान में कोई दोष, न सब मुसलमान संकीर्ण विचारधारा में डिब्बा-बन्द अचार की तरह जीने वाले. बस इन नव-जिन्नाहों को यह समझाना होगा कि मियाँ, अपना रास्ता नापो. ग़ज़वा-ए-हिन्द जैसा कुछ होने वाला नहीं.

यही वजह है कि ये नव-जिन्नाह (और उनके सुर में सुर मिलाकर ‘प्रोग्रेसिव’ चोले व झोले वाले) आरएसएस को कोसते रहते हैं. उन्हें लगता है जिस आरएसएस ने एक मोदी दिया कि जिसने ‘ग़ज़वा-ए-हिन्द’ के हमारे प्रोग्राम को चौपट कर दिया, उस आरएसएस में न जाने कितने मोदी और होंगे ! हमारी शैतानी फ़ितरत की दुश्मन आरएसएस – तेरा बेड़ा ग़र्क़ हो !

हिंदुस्तान में एक-से-एक बेहतरीन मुसलमान हैं. यहाँ न तो मुसलमान होने में कुछ बुराई है और न मुसलमान होना कोई गुनाह है. इन पाँच करोड़ neo-Jinnahites के चलते अगर आरएसएस हिन्दू अस्मिता को जाग्रत करता-सा जान भी पड़ता है तो इसे भी इनके वाले कट्टरतावादी इस्लाम की ही जीत मानना चाहिये.

जहाँ तक देवी के मुस्लिम अवतार का प्रश्न है, उसे इस्लामिक सन्दर्भ देना अनुचित होगा. इस बात को केवल आधुनिक विज्ञान और भारतीय (हिन्दू) संदर्भों में ही समझा जा सकता है.

मनुष्यों का ईश्वर केवल इसलिए मनुष्यों जैसा है क्योंकि अगर चींटियों का कोई ईश्वर है तो वह चींटियों जैसा होगा और मच्छरों का मच्छर जैसा. वह निराकार परमात्मा जब स्वयं को मनुष्य रूप में प्रकट करता है तो वह शरीर के गुण-सूत्र – chromosome – से बचकर नहीं करता. एक्स (X) और वाई (Y) दोनों क्रोमोज़ोम का नियंता ईश्वर ही है. यह उसका ख़ुद का निर्णय है कि मनुष्य शरीर में XX क्रोमोज़ोम प्रधान होंगे तो वह मनुष्य-शरीर ‘स्त्री’ कहलाएगा. और जब XY के जोड़ीदार यानी pairing क्रोमोसोम की प्रधानता रहेगी तो मनुष्य-शरीर ‘पुरुष’ होगा. यों दोनों तरह के शरीरों में दोनों तरह के क्रोमोज़ोम मौजूद रहते ही हैं. इस कारण नारायण स्वयं वही हैं जो आदिशक्ति जगदंबिका हैं. और आद्याशक्ति देवी वही हैं जो नारायण हैं ! इस शक्ति के बिना शिव केवल ‘शव’ हैं. जब मनुष्य घोषणा करता है – ‘अनहल हक़’ —  ‘अहं ब्रह्मास्मि’ तो वह XY pairing वाले शरीर तक सीमित घोषणा नहीं है. ‘मैं ही सत्य हूँ, ब्रह्म हूँ’ का यह उद्घोष XX क्रोमोज़ोम-प्रधान शरीर वाली मानुषी के लिए स्वतः सिद्ध है. ‘देवी’ का अर्थ समझने का रहस्य मात्र इतना है. केवल भारत ने ही अल्लाह, ईश्वर या God को — जो भी कहें – स्त्री और पुरुष दोनों रूपों में जाना है और दोनों में कोई अंतर नहीं माना है.  

एक सवाल अब भी बाक़ी है. जब वह ब्रह्म निराकार है, उसकी कोई मूर्त्ति नहीं, वह केवल एक है, कोई दूसरा नहीं – तब ऐसा कैसे कि वह अवतार भी ले लेता है, स्वयं को प्रकट भी कर देता है और हम उसे मूर्त्ति बनाने योग्य ‘भगवान्’ भी मान लेते हैं? क़ुरान और पुराण दोनों के विचार से अलग चल देना क्या अनुचित नहीं?

कल्पना कीजिये, जब कोई करुण प्रसंग उपस्थित होता है तब क्या होता है. तब करुणावश पहले हृदय द्रवित होता है. उसके तुरंत बाद वह ‘द्रव’ आँख में अश्रु के रूप में दिखाई भी पड़ता है और टपक कर हथेली पर भी आ सकता है जिसे हम छू सकते हैं. यह क्या है? वह करुणा, हृदय का वह द्रवित होना निराकार है. इस निराकार का आकार में प्रगटीकरण ‘अश्रु’ है. बस उसी तरह अल्लाह वास्तव में है तो निराकार ही, मगर जब उसने यह ज़मीन हमें दी, पानी और हवा बनाये, सूरज-चाँद-तारे बनाये तो उसने स्वयं को ही इन आकारों में प्रकट किया. हम कैसे कह सकते हैं हमने अल्लाह को नहीं देखा?

आप क़ुरान को पुराण से भिन्न सिद्ध करना चाहते हैं जो कि है नहीं. आप “मुसलमान” “मुसलमान” इसलिए करते रहते हैं कि आप ग़ज़वा-ए-हिन्द करना चाहते है जो कि होना नहीं है. क्यों व्यर्थ सबका मगज  ख़राब करते हैं?

पार्थसारथी थपलियाल ने ठीक लिखा, नुसरत जहाँ ने ठीक किया, भागवतजी ने ठीक कहा. दुनिया इनकी है, आपकी नहीं.

14-10-2019   

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One thought on “नुसरत के बहाने से…

  1. बहुत अच्छा, भाषण को सुनकर लोग अपने हिसाब से उसे समझते (अगर समझते हैं तो) हैं और हर कोई अपने हिसाब से विवाद के लिए कुछ न कुछ निकाल ही लेते हैं। नुसरत ने किसी की परवाह न करते हुए जो उन्हें अच्छा लगा वो किया। नुसरत के बहाने बहुत कुछ सोचा और समझा जा सकता है अगर कोई समझना चाहे। काश लोग समझ सकें। ईश्वर, अल्लाह, गॉड में भाषाई अंतर है मूलतः कोई अंतर नहीं है। कोई भी धार्मिक पुस्तक पढ़ने पर किसी पर कोई रोक नहीं है उसी प्रकार किसी भी धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होना व्यक्ति की अपनी इच्छा पर निर्भर करता है। मुल्ला मौलवियों का काम फतवे जारी करना है वो करते रहेंगे। पार्लियामेंट में भी नुसरत के माँग में सिन्दूर डालकर जाने पर काफ़ी चर्चा हुई थी। मुझे तो नुसरत का सिंदूर खेला देखकर बहुत अच्छा लगा, पता नहीं इसलिए कि वो सुंदर लग रहीं थीं या ये आभास हो गया था कि बहुत लोग सुलग रहे होंगे। न जाने क्यों कुछ का सुलगना आजकल अच्छा लगने लगा है।

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