Hoshiyar, Adhyatm Media Ko Tak Raha Hai

Quote me as saying I was misquoted.

– Groucho Marx

(American actor-comedian)

If you don’t read newspapers you are uninformed. If you read newspapers you are misinformed.

— Mark Twain

सूचना या समाचार के नाम से टी.वी. चैनलों पर रोज़ाना मचते हुल्लड़ को देखकर कहना पड़ेगा कि यह शोर अब राक्षसी हो गया है. इधर मित्रवर रँगीले ठाकुर ने मेरा ध्यान इस प्रश्न की ओर खींचा कि क्या मीडिया आज के इन्सानों में आध्यात्मिकता का पुट भरने के लिए थोड़ा भी योगदान दे पा रहा है? इसकी अनुमति भी रँगीले ठाकुर राजा सा’ब ने मुझे दे दी है कि जब मैं उत्तर से दो-चार हो लूँ तो वेब पर उपलब्ध उनके लघु वक्तव्य को भी इस लेख में शामिल कर लूँ.

आम तौर पर हम संगठित धर्मों को आध्यात्मिकता का दर्जा देने की भूल करते हैं. मंदिरों, मस्जिदों, गिरजों में बैठी भीड़ देखकर सोचते हैं, कितने आध्यात्मिक लोग हैं ! जबकि यह भीड़ शायद ही कभी आध्यात्मिक आचरण करती हो!

आध्यात्मिकता हमारे अंतर्लोक में निवास करती है और अस्तित्त्व के एक अलग ही धरातल पर ध्यान केन्द्रित करती है. ब्रह्मांड की समरस ऊर्जा से जुडने का नाम अध्यात्म है. यह ‘समरस ऊर्जा’ उस वाद्यवृंद व्यवस्था की तरह है जिसमें अलग-अलग साज़ होते हुए भी एक ही सुमधुर संगीत-रचना निकल कर आती है. अपनी जीवन यात्रा में मिले तरह-तरह के अनुभवों को बीनते-छानते जब हम विश्व-व्यापी समरस ऊर्जा से ‘स्व’ को संश्लिष्ट कर लेते हैं तब कहीं जाकर ऐसा लगता है कि हम आध्यात्मिकता की दहलीज़ पर जा खड़े हुए हैं. उसके पहले कैसे कहें कि कोई आध्यात्मिक है?

अंतर्लोक से भिन्न बहिर्लोक में आयें तो पायेंगे कि मीडिया इसलिए बना था ताकि वह लोक-समुदाय के बड़े हिस्से के साथ संपर्क व संचार का एक प्रमुख माध्यम बन सके. एक खाके के रूप में अर्थात् शब्द-प्रयोग अथवा हाव-भाव के बिना सम्प्रेषण तो गुफ़ा-युग की पेंटिंग, चित्र-लिपि अथवा नक्शों से ही शुरु हो गया था. किन्तु आज के दौर में इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए सामान्यतः काम में लिये जा रहे जाने कितने आधारभूत साधन हो गए हैं – समाचार-पत्र, पत्रिकायें, रेडियो, टेलिविज़न, सिनेमा, रेकॉर्ड हुआ संगीत (विनाइल रेकॉर्ड, मेगनेटिक टेप, कैसेट, कार्टरिज, सी.डी., डीवीडी), इंटरनेट, मोबाईल हेंडसेट, स्पेस रेडिओ आदि प्लैटफ़ार्म ! लगभग सभी लोग मीडिया की ओर इसलिए तकते हैं कि वे उन्हें सूचित रखेंगे, शिक्षित करेंगे और साथ ही उनका मनोरंजन भी करेंगे क्योंकि उनका लक्ष्य निर्धारित किया गया था — to inform, to educate, to entertain.

इन उद्देश्यों के मद्देनज़र एक साधारण सी पारिभाषिक शब्दावली बनाई गई – जन माध्यम – mass media. इस साधारण लगने वाली शब्दावली में बेशुमार संस्थाएं और व्यक्ति समाये हुए हैं जिनके अपने-अपने लक्ष्य और साध्य हैं, भिन्न-भिन्न कार्य-क्षेत्र हैं, अलग-अलग तौर-तरीके हैं, और तदनुसार हरेक का अपना सांस्कृतिक संदर्भ है जिसके अनुकूल बने रहकर उन्हें mass media का उपयोग करना रहता है. जन-माध्यम में किसी भी तरह की सूचना हो सकती है जो सीमित अथवा विस्तृत जन-समूह तक पहुँचानी होती है – कभी हस्तांकित संकेतों में तो कहीं अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ नेटवर्क के द्वारा ! इसका कोई बना-बनाया माप-तौल या पैमाना नहीं हो सकता कि टारगेट श्रोता-दर्शकों की कितनी संख्या होने के बाद कोई कम्यूनिकेशन mass communication हो जायेगा अन्यथा नहीं हो पायेगा ! इसका भी कोई बंधन नहीं है कि प्रस्तुत की जा रही सामग्री किस तरह की हो ! जींस का एक विज्ञापन भी mass communication का ही उदाहरण है और संयुक्त राष्ट्र के किसी प्रस्ताव का विस्तृत ब्यौरा भी. यही कारण है कि जन माध्यम इतने सब प्लैटफ़ार्म के रूप में हमें उपलब्ध हैं.

इलेक्ट्रोनिक मीडिया में सूचना रेडियो या टेलिविज़न के माध्यम से प्रेषित होती है. इसमें भी लो-पॉवर ट्रांसमीटर (LPT) या Very Low Power ट्रांसमीटर (VLPT) शिक्षा प्रदान करने के काम आते हैं, जैसे कि किसी युनिवर्सिटी के कैम्पस से प्रसारण. कुछ लोग इस लो-पॉवर प्रसारण को narrowcasting मानने की भूल कर बैठते हैं, जबकि यह भी ब्रॉडकास्टिंग ही है. Narrowcasting मनोरंजन व सूचना देने के काम आता है, जैसे कि केबल टीवी.

डिजिटल मीडिया का काम है इंटरनेट और मोबाईल संचार नेटवर्क पर सूचना प्रदान करना. डिजिटल मीडिया में संचार-साधन और सूचना-सम्प्रेषण के लिए वेबसाइट, ब्लॉग, ई-मेल, एस.एम.एस./एम.एम.एस., इंटरनेट रेडियो और टेलीविज़न आदि का इस्तेमाल होता है. डिजिटल मीडिया के अंतर्गत एक अन्य साधन है ‘ऑग्मेंटेड रिएलिटी’ (AR) जो अभी अधिक प्रचलित नहीं है. इसमें स्थूल जगत के परिवेश को उसके ‘वास्तव’ में साक्षात् अथवा परोक्ष रूप से अनुभव करने के लिए कम्प्यूटर से काम लिया जाता है और उस परिवेश को ‘संवेदन’ के साधनों (sensory inputs) जैसे कि ऑडियो, वीडियो या ग्राफ़िक्स का उपयोग करके ‘ऑग्मेंट’ अर्थात् विस्तीर्ण (enlarge) या अभिवृद्ध (enhance) कर लिया जाता है. डिजिटल प्लैटफ़ार्म के रूप में AR दिव्यांगों को सूचना प्रेषित करने के लिये बहुत उपयोगी है.

प्रिंट माध्यम अपनी-अपनी सूचना प्रेषित करने के लिए स्थूल साधनों का प्रयोग करते हैं, जैसे कि अख़बार, पत्रिका, पुस्तक, पैमफ्लेट, कॉमिक्स आदि.

फिर हमें ‘आऊटडोर मीडिया’ भी उपलब्ध है, यथा, संकेत-चिह्न (symbols), प्लैकार्ड, सूचना-पट आदि. इन्हें सड़कों, व्यावसायिक इमारतों, हवाई अड्डों, खेल के स्टेडियमों, बसों, ट्रेनों आदि पर देखा जा सकता है. ‘ब्लिम्प’ अर्थात् लचीला छोटा वायुयान भी (जैसा जेम्स बॉण्ड फ़िल्म ‘A View To A Kill’ में ‘Zorin’ नाम की कम्पनी इस्तेमाल करती थी) ‘आऊटडोर मीडिया’ का अच्छा उदाहरण है. ‘Skywriting’ (उड़ते हुए हवाई जहाज़ से आकाश में विशेष प्रकार के धुएँ से पढ़ी जा सकने योग्य लिखावट) भी खुली हवा में प्रयुक्त संचार-माध्यम का एक अन्य रूप है.

इतनी बड़ी संख्या में प्रभावशाली माध्यमों के बीच मीडिया कोई भी हो, ये सभी किसी न किसी तरह ‘शिक्षा’ का ही विस्तार हैं. ‘शिक्षा’ स्कूल-कॉलेज-युनिवर्सिटी की हो या सूचना-प्रसारण के रूप में हो, उसे इस बात का ध्यान रखना अपरिहार्य है कि धन की कमाई का लोभ उसका अपहरण न कर ले ! न्यूज़-मीडिया तो हरगिज़ इसका अपवाद नहीं है. दोनों ही रूपों में ‘शिक्षा’ में इसके विपरीत होते देखना क्षुब्ध-क्रुद्ध कर देने वाला है. उस समय तो यह बहुत नागवार गुज़रता है जब आपको शीघ्र ही घर से निकलकर कहीं जाना है या किसी दूसरे काम के लिए थोड़ी देर के लिए टी.वी. के आगे से हटना है, और आप चलते-चलते जल्दी से न्यूज़-हेडलाईन से ‘सूचित’ हो लेने का उपक्रम करते हैं. मगर ‘ईडियट बॉक्स’ है कि आपको अनन्त प्रतीक्षा में खड़ा रखकर मज़ा लिये जा रहा है ! दस-दस मिनट तक वही-वही विज्ञापन स्क्रीन से आपको घूरे चले जा रहे हैं ! ये टीवी चैनल सूचना-सम्प्रेषण का अपना धर्म निबाह रहे हैं या आपकी घोर उपेक्षा करके पैसे के पीछे पगला रहे हैं ? अधिकांश विज्ञापनों के स्तर और कथ्य की गुणवत्ता की तो बात ही न करें ! कुछ विज्ञापन तो ऐसे हैं कि उन्हें देखने के बाद आप ब्लू-फ़िल्म देखें तो लगेगा कि यह भी शायद महर्षि वात्स्यायन की कृति का विज्ञापन होगा ! पत्र-पत्रिकाओं को ही देख लीजिये. व्यावहारिक सत्य तो यही है कि महिलाओं की हर पत्रिका महिलाओं के कितना काम आती होगी मालूम नहीं, मगर पुरुषों की आँखों के लिए सुसज्जित भोज अवश्य है, a feast for male eyes! और मज़े की बात यह कि यह सब ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ की आड़ में चलता रहता है. मीडिया इसलिए तो हरगिज़ नहीं था कि इस तरह लोभ का फंदा गले में डालकर आत्म-तुष्टि की राह चल पड़े ! इस तरह कमाये गए धन का कितना अंश नीति-सम्मत है, आप स्वयं फ़ैसला कर लें !

जैसे हम धर्मों को अध्यात्म मान लेते हैं, वैसे ही हम मीडिया को ऐसा ‘गुरु’ मान बैठते हैं जो हमें सही-सही सूचना-मार्ग दिखला रहा है. किसी भी प्रकार का मीडिया – अपने प्रत्येक स्वरूप में – प्रिंट माध्यम से लेकर रेडियो से लेकर टीवी से लगाकर सिनेमा तक, और ट्विटर, फ़ेसबुक या व्हाट्सऐप के सोशल मीडिया तक ऋषि-चेतना युक्त गुरु नहीं, मात्र एक साधन – एक tool है. ये सारे औज़ार मानस से मानस के आपसी सम्पर्क का माध्यम हैं. हम चाहें तो इस tool का इस्तेमाल चतुर्दिश विध्वंस के लिए कर लें और चाहें तो समूचे विश्व को शांति के एक सूत्र में पिरोने के लिए कर लें. अंततः सब कुछ केवल हम पर निर्भर है. जिस तरह के ‘हम’ ये धर्म अपने आप में या सब धर्म मिलकर तैयार कर पाये हैं, क्या हमें उन सब की गंभीरतापूर्वक जांच कर देखना उचित नहीं होगा? आख़िर यही वे लोग हैं जो अंततः ‘मास मीडिया’ का संचालन अपने हाथ में लेते हैं. क्या ये लोग मीडिया के इन अत्यंत शक्तिशाली tools पर हाथ रखने के लिए भरोसेमन्द इंसान हैं? ख़ास तौर से तब जबकि हम मीडिया के डी.एन.ए. में जो पाते हैं उसे लेकर चिंतित होने के कारणों से घिरे हुए हैं?

सूचना-सम्प्रेषण के क्षेत्र में हुए क्रांतिधर्मी विकास ने अब यह संभव कर दिया है कि हम विश्व के किसी भी कोने में बैठे मनुष्यों के साथ तुरत-फुरत सम्पर्क बना सकते हैं. इस कारण वर्त्तमान ‘मास-मीडिया’ में सार्वजनिक कल्याण का साधन बन सकने की भरपूर संभावनाएं निहित हैं. मास मीडिया के माध्यम से हम बहुत अधिक भिन्नता वाले समाजों तथा तरह-तरह की सांस्कृतिक या धार्मिक पृष्ठभूमि वाले मनुष्यों के बीच संवाद स्थापित कर सकते हैं, उनमें पारस्परिक सहभागिता और सहयोग का भाव उपजा सकते हैं, और इस तरह मानव-एकात्मता को मज़बूत बनाने की दिशा में काम कर सकते हैं. इसमें संदेह नहीं कि मीडिया के पास सूचना, शिक्षा और मनोरंजन के वास्तविक-मौलिक साधन के रूप में ऐसी प्रचुर संभावनायें मौजूद हैं जो न केवल सामाजिक मूल्यों की सृष्टि व स्थापना करें, बल्कि उन परिकल्पनाओं को भी अपने स्पर्श से प्रभावित कर लें जिनसे पता चलता है कि हम से नितांत भिन्न चरित्र वाले समुदाय हमारे बारे में क्या धारणा बनाकर चलते आये हैं. मनुष्यों को जोड़ने में इससे बड़ी भूमिका और क्या होगी?

भारत के संदर्भ में देखें तो हम पाएंगे कि इस क्षेत्र में सिनेमा और रेडियो ने अद्भुत भूमिका निभायी है. अब यह श्रेय बड़े परिमाण में रेडियो से हटकर टीवी को प्राप्त है, मगर यह सोच-सोच कर सिर चकरा जाता है कि टीवी के समाचार चैनल आख़िर कर क्या रहे हैं ! उदाहरण के लिए, ये न्यूज़ चैनल कम से कम अपने रोज़ाना प्राइम टाईम शो में देश के नॉर्थ-ईस्ट के विभिन्न राज्यों से एक प्रतिभागी अनिवार्य रूप से शामिल क्यों नहीं करते? ऐसा करना क्या इन चैनलों को आर्थिक रूप से इतना unproductive लगता है कि मोटी कमाई के अनुपात में उन्हें मंहगा पड़ता है? या फिर उत्तर-पूर्व का ध्यान रखना सिर्फ़ सरकार का काम है और देश के लोगों को जोड़ने में मीडिया की कोई भूमिका नहीं है? क्या ये केवल ‘मीडिया-माफ़िया’ बनने और शेख़ी बघारने भर को हैं? अधिकांश न्यूज़-मीडिया दिल्ली में स्थित हैं, इसके बावजूद इन्होंने दिल्ली और उत्तर-पूर्वी भारत के लोगों की दिली दूरी कम करने के लिए अब तक क्या किया?

भारत का न्यूज़ मीडिया शायद यह मुगालता पाले बैठा है कि लोग स्वयं यह निश्चय करके चलते हैं कि क्या देखना, सुनना, सोचना, पढ़ना है. वे मानते हैं कि मीडिया का इस निर्णय को प्रभावित करने में ‘शून्य’ के बराबर रोल है. इसलिए उन्हें तो केवल अपने तुमुल कलह-कोलाहल को प्रसारित भर करते रहना है, दिन भर की कमाई को जेबों में ठूँसना है और बैंक की दिशा में देखकर मुसकुराना भर है !

ये टीवी चैनल इस तथ्य की धज्जियाँ खुले आम उड़ा रहे हैं कि दरअसल वे समाज-निर्माण का बेहद ताक़तवर औज़ार हैं. ये भूल गए हैं कि यह बृहत् शक्ति अपने साथ मीडिया-कर्मियों के लिए उतनी ही भीमकाय ज़िम्मेदारी भी लेकर आती है जिसका संबंध सत्य, न्याय, आपसी भरोसा-विश्वास, शान्ति, अहिंसा और मानवीय एकात्मता जैसे मूल्यों को स्थापित करने से है. मीडिया-कर्मियों और उनके उपभोक्ताओं (दर्शकों) दोनों को एक बात अच्छी तरह जान रखनी चाहिए कि आधुनिक संचार माध्यम – प्रेस, टेलीविज़न, रेडियो, इंटरनेट अपने आप में मनुष्य के अद्भुत आविष्कार हैं, इसलिए इनके माध्यम से प्राप्त समाचार, सूचना, मनोरंजन आदि कुछ भी (मानवीय) मूल्यों से शून्य नहीं हो सकते. हमें यह जानना और न भूलना भी वांछित है कि आधुनिक समाज में सूचना का प्रसारण और मनोरंजन का विकीर्णन किसी न किसी तरह मीडिया को नियंत्रित करने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों के ‘झुकाव’ के मुताबिक सिद्धान्त घड़कर चलता है. हम इस ओर से इतमीनान करके कैसे बैठे रह सकते हैं कि हमें मिल रहे मनोरंजन या संचार के पीछे कोई पूर्व-निर्धारित मान्यता नहीं है, कोई राजनैतिक, सांस्कृतिक, वैचारिक, सैद्धान्तिक या आर्थिक परिकल्पना नहीं है? वे तो बस पूरे-पूरे objective हैं? अपने इस ‘भोलेपन’ का लाभ हम इन चैनलों को क्यों उठाने दें?

यह तथ्य भारतीय मीडिया के इस आचरण से उजागर हो जाता है कि वह इसे नियंत्रित कर रहे अत्यल्प ‘भद्रलोक’ के जीवन-दर्शन मात्र को व्यक्त और पुष्ट करता है. व्यावसायिक घरानों – corporate houses – को चलाने वाले व्यक्ति ही अमूमन मीडिया का संचालन करने वाला भद्रलोक हैं. इन चैनलों को यह चिंता ज़रा भी नहीं है कि जब यह मालकीयत चंद लोगों के पास हो तो जन-साधारण के दिलो-दिमाग़ की धड़कन-धबकन में जोड़-तोड़ करना इन्हीं इने-गिने लोगों के हाथ में चला जाता है. वे निर्धारित करने लगते हैं कि दुनिया क्या देखे, क्या सुने-समझे ! उदाहरण के लिए, ये मालिक लोग उस स्टोरी को बड़ी आसानी से दबा सकते हैं, या उससे आँख चुरा सकते हैं जो एक व्यावसायिक घराने या सरकार के किसी प्रकार के अनैतिक आचरण से संबन्धित रही हो, और इस तरह अपने ख़ुद के आचार-विचार या किसी हरकत के लिए इस या उस व्यावसायिक प्रतिष्ठान अथवा राजनैतिक दल को ज़िम्मेदार सिद्ध कर सकते हैं. इन चैनलों पर रात-दिन किसी न किसी को ‘बेपरदा’ करने या ‘भ्रष्ट’ सिद्ध करने का जो शोर-शराबा मचा रहता है उससे यह सत्य सिद्ध ही नहीं पुष्ट भी होता है. जिस तरह ये चैनल अपनी बहसों की व्यवस्था करते हैं और जिन शब्दों व शैली में सवाल उठाते हैं उससे इनकी नीयत में क्या था, साफ़ पता चल जाता है. ये किसी को इनके ‘कथ्य’ के सत्य पर यकीन तो क्या दिलाएंगे, स्वयं की निष्ठा भी स्थापित नहीं कर पाते क्योंकि इनका पूर्वाग्रह इनके हर शब्द में से झाँक रहा होता है. इनका यह उपक्रम ‘सूचित’ कम करता है, दर्शकों को कुढ़न से भर और जाता है.

यह बात तब खास तौर पर सच साबित होती है जब इन चैनलों की ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ किसी संघर्षपूर्ण ब्यौरे अथवा टकराव की स्थिति पर आधारित होती है. ज़्यादातर चैनलों में मुख्य समाचार अपराध की ताज़ातर सूचना से बनता है – किसी हत्या, गिरफ़्तारी, स्कैंडल आदि से. या फिर कोई विनाशक सुनामी हो, कोई आतंकवादी हमला हो तब बनता है. टकराव, उठा-पटक और आपाधापी से भरी ये ख़बरें, श्रोता, दर्शक अथवा पाठक को मीडिया तक खींच लाती हैं. यह संघर्ष जितना बड़ा होगा, दर्शक और श्रोता उतने ज़्यादा होंगे. श्रोताओं-दर्शकों की भारी संख्या का मतलब है ज़्यादा टी.आर.पी., जो कि मीडिया के बाज़ार की आर्थिक-व्यावसायिक सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक है. इसलिए मीडिया का हित इसमें है कि वह टकराहटों की ख़बरें बताते भी रहें और बढ़ा-चढ़ाकर उन्हें दोहराते भी रहें ताकि कोई घटना जितनी वास्तव में गंभीर थी उससे कहीं अधिक चिंताजनक लगने लगे. निरंतर news-fall चूँकि असंभव है, इसलिए वे अकसर ख़बरें घड़ते भी हैं (fake news), जो कि अपने आप में मीडिया-धर्म का सबसे घोर पाप माना गया है. तथापि, वह ख़बर ही क्या जो बिक न सके !

बड़े से बड़े संघर्ष में भी उसे सुलझाने के प्रयास हमेशा शुरू हो जाते हैं जो दीर्घावधि होने की वजह से बहुत धीमे होते हैं और उनका अंदाज़ भी ‘ड्रामाई’ नहीं होता. समस्या के समाधान की यह प्रक्रिया बहुत बार समझने में मुश्किल भी होती है, रिपोर्टिंग के लिए आसानी से उपलब्ध भी नहीं होती, और प्राय: मीडिया की निगाहों से दूर भी रखी जाती है. इसलिए समाधान वाली ये ख़बरें कितनी भी ‘पॉज़िटिव पब्लिसिटी’ का सामान क्यों न हों ज़्यादातर बुहारकर एक तरफ़ सरका दी जाती हैं और सबसे ताज़ातरीन संघर्ष के अधिक से अधिक चुस्की लेने लायक और घनघोर रूप से दहलाने वाले पहलू को ख़बर बनाकर पेश करने के लिए रास्ता साफ़ किया जाता है. जो मीडिया के इस चलन को समझते हैं वे मीडिया के केंद्र में आना और उसका लाभ लेना जानते हैं. कोई व्यक्ति या संगठन देश-हित और मानव-कल्याण में है ऐसा अकसर तो होता नहीं, ख़बरें ज़्यादातर बुरे लोगों से ही बना करती हैं. यही वह केंद्र-बिन्दु है जो मीडिया की सबसे बड़ी चुनौती है और जो सनसनी उत्पन्न करने के लोभ और लोगों को मूर्ख बना ले जाने या गुमराह करने की वृत्ति के पीछे खड़ी है.

इतने सब के बावजूद मीडिया का साम्राज्य अखण्ड है, क्योंकि इसके बिना दैनंदिन जीवन में लोग अपने पड़ोसी से आगे की किसी घटना के बारे में कैसे जान पाएंगे? अपने परिवार और मित्र-वर्ग के दायरे से कोई व्यक्ति जितना आगे निकलता है घटनाओं से अवगत रह पाना उतना ही समय और धन खपाने वाला होता जाता है. ड्राइंग रूम में रखा टीवी, सुबह घर की दहलीज़ पर पड़ा अख़बार, कार में लगा रेडियो, जेब में रखा स्मार्टफ़ोन और काम की मेज़ पर रखा कम्प्यूटर कुछ ऐसे मीडिया-माध्यम हैं जो हमें दिन-प्रतिदिन की ख़बरों, विज्ञापनों, बन-मिट रही opinions – धारणाओं, अभिमतों – से परिचित करवाते रहते हैं, संगीत सुनाते हैं, तथा मास-मीडिया के अन्य साधनों का भी लाभ लेने को प्रेरित करते हैं.

मीडिया के इन गुणों के संदर्भ में भारतीय चैनलों से यह ध्यान रखना अपेक्षित है कि जिस तरह हमारे यहाँ भरपूर शिक्षा (साक्षरता) मूलतः विचार-पद्धति का पाश्चात्यीकरण है, उसी तरह मीडिया की उपयोगिता के ये अवयव किसी औद्योगीकरण वाले अत्यंत विकसित समाज का चित्र अधिक उकेरते हैं, कृषि-प्रधान जीवन-शैली का कम. निश्चय ही हमारे मीडिया की विश्वसनीयता तब और बढ़ेगी जब भारत जो और जैसा है उसे स्वीकार करके अपने को ढालने में वह रुचि लेगा और देशवासियों को विश्वास में लेने के लिए काम करेगा. पाश्चात्य विकास को आदर्श मानकर किसी न किसी बहाने भारत और भारतीयों को शर्मिंदा किए जाने की आदत मीडिया के प्रति अधिकांश लोगों की अरुचि का बड़ा कारण बन गया है. पश्चिमी जीवन और विचार की ‘श्रेष्ठता’ स्थापित करने के प्रयत्न में भारतीय मीडिया केवल उन ताक़तों के आर्थिक हितों को मज़बूती दिये चला जा रहा है जो इस देश में नहीं देश के बाहर मौजूद हैं, और जिनकी रुचि ‘अस्थिर देश’ में news-fall पैदा करते रहने में है. फलस्वरूप भारत के अधिकांश लोग भले ग़रीबी-रेखा से जूझते रहें, मगर मीडिया को हुक्म देने वाले आक़ाओं की आज्ञानुसार अपने स्वरूप का संचालन करने का भरपूर पारिश्रमिक इन्हें मिलता रहता है.

लगता है भारतीय मीडिया को भारतीय अस्मिता – ‘गोपाल’ अस्मिता की– जो उत्पादकता का मूल है, कृषि-धर्मी पहचान के प्रति अपने उत्तरदायित्त्व की कोई चिंता नहीं है. तिस पर ये भारतीय भाषाओं का जो सत्यानाश करते हैं वह बतलाता है कि इनके ऐंकर साक्षर तो हैं, शिक्षित नहीं !

लुटिएन दिल्ली ने देश की जो लुटिया डुबोई है, उसी लुटिएन दिल्ली और उसके आसपास अंगद का पाँव बना मीडिया भारतीय भाषाओं और भारतीय अस्मिता को लेकर अवश्य आपत्ति उठा सकता है क्योंकि उनके अनुसार ये मात्र उन्मादी देशभक्ति – jingoism के सूचक हैं. उन्हें मीडिया कम्यूनिकेशन का एक सीधा-सा सिद्धान्त ध्यान में रखना ज़रूरी है कि प्रस्तुतीकरण की छोटी सी गलती भी श्रोता या दर्शक को अचकचा सकती है. कोई ऐसा दर्शक हो सकता है जिसे अच्छी भाषा पसंद है, कोई संगीत की खातिर रेडियो या टीवी ऑन करने वाला हो सकता है, बहुत से ऐसे होंगे जो खेल जगत के दीवाने हों, या फिर कोई अकादमिक मिजाज़ का हो सकता है, किसी को चिकित्सा व ओषधि में या विज्ञान में दिलचस्पी हो सकती है जिसके लिए उसने रेडियो या टीवी पर भरोसा किया. ये भले ही इन चैनलों से कभी संपर्क न साधें, मगर हैं ऑडिएंस ही. आपकी तथ्यों में गलती या भाषा के भ्रष्ट उपयोग से क्या इनकी अन्तरात्मा को कष्ट नहीं होता होगा, विशेषतः अगर इनमें कोई जानकार व्यक्ति बैठा हो? एक – मात्र एक भी श्रोता या दर्शक को तकलीफ़ पहुंचाने का किसी मीडिया को कोई अधिकार नहीं है. ज़िम्मेदारी का अहसास उस ‘एक’ से ही शुरू होता है ! वरना निश्चित है कि आप माने बैठे हैं लोग मूर्ख हैं और आप जो भी परोसेंगे वे निगल लेंगे ! आपको किसी भी भाषा का अशुद्ध उच्चारण क्यों माफ़ किया जाये, या शास्त्रीय संगीत में राग का नाम गलत बताना, या किसी आयुर्वैदिक जड़ी-बूटी की अनाप-शनाप जानकारी क्यों माफ़ की जाये? आप कुछ भी घिनौनापन करते रहें और लोग बर्दाश्त करते रहें ! क्यों? आपका साफ़-सुथरा दिखना आपका पाखण्ड नहीं तो और क्या है, जबकि आपकी यह जुर्रत कि ऑडिएंस में से किसी को jingoistic तक कह डालें ? जब तक आप विदेशी टुकड़ों पर पलेंगे आप ऑडिएंस का सम्मान करना नहीं सीखेंगे !

ग़ौर कीजिये, इन तथ्यों के चलते क्या Television Rating Point (TRP) की धारणा वाक्छल या मात्र शाब्दिक खिलवाड़ नहीं रह जाती? क्या मीडिया ने कभी यह जानने की कोशिश की कि उन्हें देख रहे लोगों में से कितने उनपर दुनिया की हर भाषा में उपलब्ध छंटी हुई गालियों की बौछार कर रहे होंगे? गाली खाकर भी TRP? अगर यह सच नहीं तो ये चैनल टीवी स्क्रीन से जितनी उपेक्षा दर्शक-समूह पर बरसाये चले जाते हैं, TRP उसका नाम होता होगा ! और विज्ञापन बेचने वालों को इसकी चिन्ता क्यों नहीं कि देखें, कहीं गुस्से से भरे लोगों में उनके उत्पाद के प्रति विद्रोह तो सिर नहीं उठा रहा? कहीं विज्ञापनकर्त्ता और चैनल ‘मौसेरे भाई’ तो नहीं? कि गाल पर भले जूते की छाप लगा दो, मगर पैसे दे दो !

फिर उन crawlers को क्या कहा जाये जो स्क्रीन के निचले हिस्से में बाएँ-दायें रेंगे चले जाते हैं ? बोला कुछ और जा रहा है और रेंग कुछ और ही रहा है ! ऐंकर बता रहा है, ‘नेता दिल्ली लौटा’, और नीचे रेंग रहा है – ‘दिल्ली में भूकंप के झटके’ ! जिसे समन्वय कहते हैं – coordination – उसके कहीं पते नहीं ! तभी घाव पर नमक छिड़कती एक स्लाईड भी प्रकट हो जाती है जो मूल ‘विंडो’ को आधा कर देती है ! ये ‘Presstitute’ पैसे के लिए कुछ भी करेंगे. ( यह शब्द घड़ा तो था अमेरिकी पूर्वानुमान-कर्त्ता गेराल्ड सेलेंट ने, बदनाम किये गए जनरल वी.के. सिंह !) सौ बात की एक बात, जिस व्यक्ति, समूह या संगठन में पैसे की खातिर कुछ भी कर गुज़रने का माद्दा प्रवेश कर जाए, वह भरोसे के काबिल नहीं रहता ! लगता है, वक्त आ गया है कि हम कह दें — “मिस्टर मीडिया, हमें आपकी ज़रूरत नहीं, क्योंकि आपको बस पैसे की ज़रूरत है.”

मीडिया के उस नीति-वाक्य का क्या हुआ – ‘It is a crime to start an item late, but a sin to start an item early’ ? इस नियम का शीलभंग करने वाले मीडिया को हम अपराध और पाप दोनों करते देख सकते हैं.

मीडिया को लोकतन्त्र का ‘चौथा स्तम्भ’ कहा गया है. दरअसल अठाहरवीं शताब्दी के ब्रिटेन में पहले वकीलों को ‘चौथा स्तम्भ’ कहा जाता था. बाद में किंग की सत्ता से अलग Queen Consort के स्वतंत्र ‘संघ’ को एक बाधा-मुक्त एजेंट की तरह काम करने का ज़िम्मा दिया गया और उसे लोकतन्त्र के हितों की रक्षा करने वाला ‘चौथा स्तम्भ’ माना जाने लगा. इसके बाद बारी आयी वेतनभोगी सर्वहारा — Proletariat — वर्ग की जो ‘चौथा स्तम्भ’ का यह दर्जा पा गए. अंततः हाऊस ऑफ़ कॉमन्स की एक बहस में आयरिश सांसद एडमंड बर्क ने कहा कि लोकतन्त्र का ‘चौथा स्तम्भ सही मायने में कोई है तो वह ‘प्रेस’ है. तभी से पत्रकारिता को, और अब मीडिया को ‘चौथा स्तम्भ’ कहने की परंपरा चली आ रही है. यह परम्परा अब अपने को अंतिम आदर्श मानने — self-idealization – की हद तक जा पहुंची है. इसलिए यह सही समय है जब हमें चौथे स्तम्भ का यह तमगा मीडिया के वक्ष से उतारकर सिनेमा को दे देना चाहिए, क्योंकि यह भूमिका हर तरह से सिनेमा ने कहीं बेहतर ढंग से निभा कर दिखा दी है.

भारतीय समाज के जिस ‘भोलेपन’ की चर्चा पहले भी की गई थी, यह हमारी वही सादगी है कि हम ‘बायस्कोप’ के आकर्षण से अधिक और मीडिया के कथ्य और शैली की हमारी अनुकूलता से कम प्रभावित होकर टीवी देखते हैं. फिर भी टीवी देखते ज़रूर हैं. जिस दिन भारतीय समाज की समझ में बैठ गया कि बहुत हुआ बायस्कोप, उसी दिन यह मीडिया औक़ात पर आ जायेगा.

सूचना का यह भी अर्थ है कि लोकतन्त्र में लोगों की चुनी हुई सरकार जन-साधारण को लोक-कल्याण की अपनी योजनाओं के बारे में बताये, पूरा विवरण दे और अपनी नीतियों को जनता की कसौटी पर कसे. मीडिया को इस प्रक्रिया का वाहक बनना होता है. सरकार और जनता के बीच की महत्त्वपूर्ण कड़ी मीडिया ही है. यहाँ तक कि सरकार की नीतियों की आलोचना में भी मीडिया को जन-संगठन और सरकार दोनों की अंतश्चेतना को जगाकर रखना होता है. Conscience-keeper की तरह काम करना होता है. तभी मीडिया राष्ट्र-निर्माण में अपनी भूमिका को वहन करने वाला कहा जाएगा. ऐसा तो तभी हो सकेगा जब मीडिया सनसनी पैदा करने की वृत्ति से मुक्त होगा. मगर ऐसा होता नहीं.

ऐसा होने के लिए यह भी देखना होगा कि एक सार्थक कड़ी बनने की प्रक्रिया में मीडिया अपने देश के लोगों से कितना जुड़ाव महसूस करता है. उत्तर-पूर्व के भारत की उपेक्षा का जायज़ा तो हमने लिया ही है, कुछ और बातों की परीक्षा भी करके देखते हैं.

2008-09 में तत्कालीन भारत सरकार ने कर-व्यवस्था से अपने व्यय के बराबर धन उगाह पाने में सफल न होने पर ‘उधार’ लेने – market borrowing में बढ़ोतरी कर दी थी. इसमें देश के धनिकों से लेकर वर्ल्ड बैंक तक किसी से भी ऋण लेने का प्रावधान है. इसका परिणाम यह हुआ कि कुछ ही वर्षों में सार्वजनिक ऋण में लगभग ₹3,00,000 करोड़ की वृद्धि हो गई. मार्च 2010 तक यह ऋण बढ़कर ₹3406322 करोड़ का आसमान छू गया. यह 2008 के पहले की घोषित रकम से दोगुना था. औसतन हर हिन्दुस्तानी के दस महीने की आय के बराबर का ऋण उसके सिर पर बताया गया. उस समय की कुल जनसंख्या का औसत निकालने पर यह ऋण इस तरह ब्यान किया गया : “हर हिन्दुस्तानी के खाते में 32871.65 का क़र्ज़ है.”

फ़रवरी 2012 में सीबीआई के डायरेक्टर ने सूचित किया था कि विदेशी बैंकों में भारतीयों का 500 बिलियन डॉलर काला धन जमा है, जो किसी भी अन्य देश से कहीं अधिक है. अगले ही महीने, यानी मार्च 2012 में भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि सीबीआई डायरेक्टर का यह बयान वही था जो हमने जुलाई 2011 में सुप्रीम कोर्ट को बताया था.

बोलचाल की हिन्दी में इस पूरे काले धन की वापसी को कैसे कहा जायेगा? 15-15 लाख हर हिंदुस्तानी के खाते में होगा”. इसमें बैंक खाता कहाँ से घुस गया?

मज़े की, बल्कि हैरतअंगेज़ बात यह है कि न्यूज़ चैनलों के ऐंकरों ने सही-सही बात कहकर मतलब समझना ऑडिएन्स पर न छोड़कर चुनावी सभा के भाषण के बाद से अपने बैंक खाते में 15 लाख का इंतज़ार करना और लोगों को बताना शुरु कर दिया कि मैं इंतज़ार कर रहा हूँ ! शायद प्रधानमंत्री बनने के बाद स्वयं नरेन्द्र मोदी ने इस पर कोई सफ़ाई इसलिये नहीं दी ताकि हम न्यूज़ चैनलों की समझ और नीयत दोनों की परख ख़ुद कर देखें.

जब सरकार ने ‘प्रधानमंत्री बीमा योजना’ घोषित की तो इन्हीं चैनलों ने लोगों को यह बताना शुरू कर दिया कि उनका पैसा बीमा अवधि के बाद कैसे डूबने वाला है ! यदि कोई अपने यहाँ काम करने वाली बाई के जन-धन-अकाऊंट में 12 रुपया हर साल जमा करता है और साल भर तक बाई पर ऐसी कोई आफ़त नहीं आती कि उसे बीमे का लाभ लेना पड़े और 12 रुपया प्रतिवर्ष lapse हो जाता है, तो ग़रीबों के लिए जो करोड़ों रुपया सरकार के पास जमा हुआ और जिन पर आफ़त पड़ी उनके काम आया तो कुछ बुरा हुआ क्या? मगर इस तरह तो वही सोच पायेगा जिसका जुड़ाव देश के आम लोगों से होगा. यह तो सही है कि ज़बरदस्ती सरकार की तारीफ़ करने की बाध्यता किसी चैनल पर नहीं है, मगर जहाँ जन-साधारण के कल्याण का मामला हो, उसकी पुष्टि करना इन चैनलों का नैतिक दायित्व है. लोक कल्याण को लोक की दिशा से देखा जाता है, न कि सरकार के दावों की तरफ़ से. इस मामले में न्यूज़ चैनल फ़ेल सिद्ध हुए.

मीडिया की सेवाओं में लोक-पक्षीय कोण होना ही उन सेवाओं की सिद्धि है, बशर्ते कि मीडिया की वैसी चाहत हो तो सही. हर मामले में डी.ए.वी.पी. का विज्ञापन मिले और कमाई हो, ऐसा इंतज़ार मीडिया के चरित्र को और उजागर करता है, जिनके लिए लोग गए भाड़ में, और उनके काम आने वाला सार्वजनिक कोष गया जहन्नुम में!

मीडिया किसे बता रहा कि वे लोग बहुत सूक्ष्मदर्शी हैं या वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष हैं?

भारतीय मीडिया से मिले अनुभव तो यही बताते हैं कि ‘मायावी’ जगत् में अपने कर्त्तव्य का पालन करने में मीडिया ‘धंधे’ के किसी खड्डे में जा गिरा है. यहाँ तक कि ‘धर्म’ के चैनल चलाने के बावजूद मीडिया धर्म के लिए भी शायद ही कुछ कर पाये, जबकि धर्म स्वयं में एक धंधा है. अध्यात्म की तो बात ही मत कीजिये.

पश्चिम में यह प्रचार ज़ोरों से किया जाता है कि मीडिया ने धर्म को digitalize करने का सुंदर काम किया है जिससे लोगों के जीवन में धर्म की वापसी की संभावनाएं बढ़ गई हैं. इन प्रचारकों के अनुसार इस डिजिटलीकरण ने धार्मिक संस्थाओं को यह चुनौती दे डाली है कि वे लोगों और समुदायों की आध्यात्मिक पहचान के प्रति अपनी धारणा में बदलाव लायें. ऐसा इसलिए कि धर्म का संबंध लोगों में उस अस्तित्त्वगत कामना से है जो उन्हें अपना जीवन सार्थकता और मूल्यों के आधारभूत प्रश्नों के अनुसार ढालने को प्रेरित करती है. (यह प्रचार का उलझाव है). ये ‘मूल्य’ और ‘सार्थकता’ समाज पर संगठनात्मक धर्मों के (धर्म-ग्रन्थों पर आधारित) शिकंजे को और कसने से ज़्यादा कुछ नहीं कर पाते. (क्योंकि वे प्रचार के उलझाव से ज़्यादा कुछ नहीं). इस तरह लोग आध्यात्मिकता से और दूर चले जाते हैं. परिणाम यह हुआ है कि सोशल मीडिया के अनुरूप विभिन्न धार्मिक ग्रुप नये-नये ‘हुक्मनामे’ –commandments – घड़ना शुरू हो गए हैं, ताकि लोग ‘उचित’ आचरण अपना सकें. आचरण का यह ‘औचित्य’ – उचित-पन – अन्ततः इतनी वैरायटी वाला हुआ जा रहा है कि जितनी संख्या में संगठित धर्म और उनकी आस्थाएं हैं, आचरण के उतने ही विकल्प हैं ! ये विविध आस्थाएं और विश्वास अकसर एक-दूसरे से टकराते भी रहते हैं — हमेशा की तरह. लिहाज़ा, डिजिटल मीडिया की बदौलत मनुष्य अब भी उसी सोच में है कि क्या करें, क्या न करें !

मीडिया अपने आन्तरिक चरित्रगत लक्षण से ही ‘भीड़’ के लिए बना है, जबकि अध्यात्म का संबंध भीड़ में मौजूद ‘व्यक्ति’ से है.

मीडिया का अस्तित्व ‘दूसरों’ की बदौलत है, कि दूसरे क्या करते हैं या उन्हें करना चाहिये. अध्यात्म का संबंध ‘स्व’ से है, कि मैं क्या करता हूँ.

औज़ार-जैसे मीडिया का दुरुपयोग किया जा सकता है, इसलिए वह धर्मों के बड़े काम का है. अध्यात्म के दुरुपयोग का कोई उपाय नहीं है, इसलिए मीडिया अध्यात्म में प्रासांगिक या उपयोगी ही नहीं है. ज्यों ही हम उपयोगिता,अथवा दुरुपयोग-सदुपयोग की भाषा में सोचते हैं, हम आध्यात्मिक नहीं रह जाते.

यदि आध्यात्मिक रूप से जाग्रत अथवा सक्रिय मनुष्य उपलब्ध हों तो मीडिया को उसकी अदायगी में अचानक सुधार प्राप्त हो जाता है. जबकि मीडिया के कितने भी प्लैटफ़ार्म उपलब्ध हों, अध्यात्म को कुछ नहीं मिलता! एक बार अध्यात्म उपलब्ध हो जाता है तो मीडिया की मौजूदगी के बावजूद उसका कुछ नहीं बनता-बिगड़ता. दूसरी ओर, अध्यात्म के संस्पर्श के बिना मीडिया कैसा हो जाता है? वैसा जैसा हम उसे आज देख रहे हैं !

मास मीडिया के क्षेत्र में उसके उपयोग को लेकर उच्चस्तरीय प्रशिक्षण की सुविधाएं उपलब्ध हैं. मीडिया की सुदीर्घ परम्परा और उसके निरंतर उपयोग के बल पर यह प्रशिक्षण संभव है. मीडिया के संचालन की निपुणता पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती आयी है.

अध्यात्म में प्रशिक्षण संभव ही नहीं है क्योंकि अध्यात्म परम्परा पर आधारित नहीं है. अंतश्चेतना की जागृति के लिए गुरु शिष्य को मार्ग तो दिखला सकता है, मगर किसी प्रकार का प्रशिक्षण नहीं दे सकता. यह कुछ-कुछ ऐसा है जैसे सूर्य को नित्य उदित होने का कोई प्रशिक्षण उपलब्ध नहीं है. सूर्य का रोज़ उगना भले एक परंपरा है, मगर सूर्योदय में कोई परम्परा नहीं है. जो सूरज कल उगा था, आज वही नहीं उगा है. उगने की परम्परा में रोज़ एक नया ही सूरज उगता है. हर शिष्य का इसी तरह आमूल-चूल नवीन आगमन होता है, तभी अध्यात्म है. हर गुलाब को परंपरा में नहीं, निजी प्रभुता से सम्पन्न होकर खिलना होता है. इसमें मीडिया की कोई भूमिका नहीं हो सकती. केवल गुरु है जो मार्गदर्शक है.

मीडिया हाथों-हाथ उपलब्ध वह साधन है जो युद्ध, अपराध, दुर्घटना, हत्या, भूकंप, महामारी, किसी सामाजिक सेवाकार्य के जमावड़े, कैन्डल मार्च, शेयर बाज़ार आदि के बारे में बताता है. मनोरंजन भी करता है. संक्षेप में कहें तो मीडिया का संबंध हर उस चीज़ से है जो ‘मृत’ है, जिसका अपना कोई जीवन नहीं है. सूचना तो यों भी ज्ञान नहीं है. Information is not knowledge. अतः अध्यात्म सूचना-माध्यमों से कहीं भिन्न है. अध्यात्म का संबंध ‘अ-मृत’ — non-dead से है. इस अंतर के कारण अध्यात्म आसानी से शुभ और अशुभ का निर्णय कर लेता है और सदा तरोताज़ा है. जबकि मीडिया अपने सामान्य कर्त्तव्य की पूर्त्ति करने में ही हाँफने लगा है.

मीडिया के इस विश्लेषण के बाद यही कहा जा सकता है कि अध्यात्म में मीडिया की वही भूमिका है जो शांति-स्थापना में युद्ध की हो सकती है, या जो स्त्री के शील की रक्षा में ‘रेप’ की है.

04-03-2019

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2 thoughts on “Hoshiyar, Adhyatm Media Ko Tak Raha Hai

  1. सारगर्भित लेख। काश मीडिया कर्मी समझ सकते कि वे क्या अनर्थ कर रहे हैं। गाला फाड़ू संवाद कभी आकर्षक नहीं हो सकता ये इन्हें जानना चाहिए। इशारा स्पष्ट है कि हमें अपने भोलेपन का लाभ इन्हें नहीं लेने देना है।कई महत्वपूर्ण बिंदु उठाये गए हैं जिनपर मीडियाकर्मियों के साथ साथ जनमानस को भी विचार करना चाहिए।

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